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निर्वाचन लोकतंत्र को लेकर संविधान सभा में बहस

हाल के दिनों में निर्वाचन आयोग के भीतरी कामकाज को लेकर जो बातें सामने आई हैं, उनसे तीनों चुनाव आयुक्तों के आपसी रिश्ते में असमानता और अलोकतांत्रिक व्यवहार की झलक मिलती है। यह उस समय हुआ है जब विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर पहले से असंतोष फैला हुआ है। आशंका है कि इस प्रक्रिया में लगभग 13 करोड़ लोग अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं। इन घटनाओं ने आयोग की नीयत पर सवाल तो उठाए ही हैं, भारतीय लोकतंत्र और उसकी संस्थाओं के भविष्य को लेकर भी गहरी चिंता पैदा की है।

ऐसे माहौल में संविधान सभा की बहसों, निर्वाचन आयोग के विकास और 1995 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को दोबारा पढ़ना बहुत काम का है। ये आज़ादी के बाद के वे पड़ाव हैं जो निराशा के समय दिशा दिखाते हैं। SIR की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 से टकराती दिखती है, जो कहता है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि यह अधिकार किन परिस्थितियों में गढ़ा गया।

वयस्क मताधिकार की नींव

स्वतंत्रता संग्राम के दौर से ही हमारे संस्थापकों का विश्वास था कि सच्ची आज़ादी तभी अर्थपूर्ण होगी जब हर नागरिक के हाथ में मत की शक्ति हो। इस सोच को कानूनी रूप संविधान सभा की बहसों में मिला। इसके दो पड़ाव खास हैं:

  • 29 अप्रैल 1947: सभा की बैठक में डॉ. राजेंद्र प्रसाद अध्यक्षता कर रहे थे। सरदार वल्लभभाई पटेल ने मौलिक अधिकारों पर बनी सलाहकार समिति की अंतरिम रिपोर्ट सदन के सामने रखी। रिपोर्ट में कहा गया था कि 21 वर्ष से ऊपर के हर भारतीय नागरिक को मतदान का अधिकार मिले। बाद में 1988 में आयु सीमा घटाकर 18 वर्ष कर दी गई। शुरुआती दौर में ही यह अधिकार अपरिवर्तनीय और समझौते से परे मान लिया गया था।
  • 16 जून 1949: राजेंद्र प्रसाद फिर अध्यक्ष की कुर्सी पर थे और प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव आंबेडकर भी सदन में मौजूद थे।

विरोध के स्वर और उनके तर्क

  • सभा का हर सदस्य इस विचार से सहमत नहीं था। बिहार से चुने गए विधि स्नातक ब्रजेश्वर प्रसाद ने खुला विरोध किया।
  • उनका कहना था कि वयस्क मताधिकार लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों का घोर उल्लंघन है, क्योंकि यह मानकर चलता है कि मतदाता शिक्षित और जागरूक है, और जहां मतदाता जागरूक नहीं, वहां संसदीय लोकतंत्र नहीं चल सकता।
  • कई उच्च जाति के प्रतिनिधि भी “एक व्यक्ति, एक वोट” के सिद्धांत के विरुद्ध थे। यह एक ढीला-ढाला गठबंधन था, जो चाहता था कि पात्रता के नियम लगभग वैसे ही बने रहें जैसे भारत सरकार अधिनियम 1935 में थे।
  • उस अधिनियम के बड़े हिस्से पहले ही संविधान के मसौदे में जगह पा चुके थे। 1935 के कानून ने मताधिकार बहुत सीमित रखा था। केवल कर देने वाले, मैट्रिक पास या संपत्ति के मालिक ही वोट डाल सकते थे। नतीजा यह कि योग्य मतदाता आबादी का सिर्फ 20 से 25 प्रतिशत थे।
  • ब्रजेश्वर प्रसाद को आशंका थी कि वयस्क मताधिकार से चुना गया सदन अधिकतर अनपढ़ और कच्चे लोगों से भर जाएगा।
  • उन्हें हृदयनाथ कुंजरू, के.टी. शाह (जो अध्यक्षीय शासन प्रणाली के भी पक्षधर थे) और फ्रैंक एंथनी का साथ मिला।
  • लाहौर के लॉ कॉलेज और कोलकाता के प्रेसिडेंसी कॉलेज में पढ़े ठाकुर दास भार्गव ने सुझाव दिया कि पहले दस वर्ष केवल साक्षर लोगों को मतदान का अधिकार मिले।

विरोध क्यों टिक नहीं पाया

भारत को एक गुलाम उपनिवेश से पूर्ण लोकतंत्र की ओर बढ़ने से रोकने की ये कोशिशें ज़्यादातर विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों के सदस्यों की ओर से आई थीं। पर पहले दिन से सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के लिए जो भारी समर्थन था, उसके आगे ये टिक नहीं सकीं। यह मुद्दा नेतृत्व के लिए आस्था का प्रश्न बन चुका था और वह इस पर किसी असहमति को जगह देने को तैयार नहीं था।

यहां आंबेडकर की 25 नवंबर 1949 की चेतावनी भी याद आती है कि हम राजनीति में “एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य” के सिद्धांत को मानेंगे, पर सामाजिक और आर्थिक जीवन में यह समानता नहीं होगी।

मताधिकार को इसी असमानता को तोड़ने का पहला औज़ार माना गया। एक और बात गौर करने की है। ब्रिटेन में महिलाओं को बराबरी का वोट 1928 में मिला और अमेरिका में अश्वेत नागरिकों को वास्तविक मताधिकार दशकों बाद मिला। भारत ने गरीबी और निरक्षरता के बावजूद 1950 में सबको एक साथ यह अधिकार दे दिया।

आज का SIR: क्या यह नया द्वारपाल है?

अब इतिहास से वर्तमान में आएं। SIR को आधुनिक रूप में सामने आया पुराना द्वारपाल (gate-keeping) मान लेना जल्दबाज़ी हो सकती है, क्योंकि इरादों के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले साक्ष्य चाहिए। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह प्रक्रिया बहिष्कारी स्वभाव की है और अनुच्छेद 326 की भावना के विपरीत जाती दिखती है।

इसे परखने के लिए कुछ बिंदु देखने चाहिए:

  • मतदाता सूची में नाम बनाए रखने का बोझ नागरिक पर डालना, जबकि मताधिकार नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।
  • दस्तावेज़ों की मांग, जो गरीब, प्रवासी, महिलाओं और हाशिये के समुदायों के लिए सबसे कठिन होती है।
  • प्रक्रिया में दिखती गंभीर खामियां, जो इसके मकसद को ही संदिग्ध बनाती हैं।

बिहार के 2025 के पुनरीक्षण में मसौदा सूची से लगभग 65 लाख नाम हटे थे। सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप कर आधार को भी मान्य दस्तावेज़ों में शामिल करने का निर्देश देना पड़ा। यह बताता है कि अदालतें भी मानती हैं कि मताधिकार पर किसी भी अवरोध को बहुत सतर्क नज़र से देखना होगा।

स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की परिकल्पना

संविधान सभा के सदस्य यह साफ़ समझते थे कि वयस्क मताधिकार का मौलिक अधिकार तभी साकार होगा जब एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग हो, जिस पर कार्यपालिका का कोई प्रभाव न पड़े। इसी सोच से अनुच्छेद 324 बना, जिसने चुनावों के संचालन, निर्देशन और नियंत्रण का दायित्व आयोग को सौंपा। सदस्यों ने इस संस्था को इतनी स्वायत्तता देने का प्रयास किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जा सकें।

शुरुआत में केंद्र और राज्यों के लिए अलग-अलग निर्वाचन आयोगों की बात थी। बाद में इसे केंद्रीकृत ढांचे में बदल दिया गया, क्योंकि यह डर था कि राज्य या क्षेत्रीय आयोग “गैर-मूल निवासियों” के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने से हिचक सकते हैं। यानी एक एकीकृत आयोग का विचार भी इसी चिंता से उपजा कि कोई नागरिक अपने ही देश में स्थानीय पूर्वाग्रह का शिकार न बने।

आयोग के पर कतरने की कोशिशें

आयोग की शक्तियां शुरू से ही कुछ लोगों को खटकती रहीं। कुछ प्रस्ताव आए कि किसी उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने का अधिकार राज्यपाल या संबंधित सदन के अध्यक्ष के पास रहे। यह आयोग की निष्पक्षता को सीधे कमज़ोर करने वाला सुझाव था, इसलिए इसे भी जल्दी ही ख़ारिज कर दिया गया। यहां एक सैद्धांतिक बात समझनी चाहिए। जिस पद पर बैठा व्यक्ति स्वयं राजनीतिक प्रक्रिया से आता है, उसे प्रतियोगियों की पात्रता तय करने का अधिकार देना हितों के टकराव को जन्म देता।

आयोग की मजबूती: 1993 और 1995

चुनाव प्रक्रिया और आयोग की कार्यशैली को सुदृढ़ करने का काम आगे भी चलता रहा। इसका एक निर्णायक मोड़ 1993 में आया, जब मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ दो और चुनाव आयुक्त नियुक्त किए गए और उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त के बराबर शर्तें दी गईं। इस बदलाव को अदालत में चुनौती मिली। यह दौर टी.एन. शेषन की सक्रियता का भी था, जिन्होंने आचार संहिता को वास्तविक ताक़त दी।

1995 में सर्वोच्च न्यायालय (टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ) ने फैसला दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त अध्यक्ष की तरह काम तो करता है, पर तीनों आयुक्त पद और हैसियत में बराबर हैं। निर्णय सहमति से होने चाहिए और यदि सहमति न बने तो बहुमत से लिए जाएं। यही निर्णय आयोग की सामूहिक जवाबदेही की आधारशिला है। हाल के खुलासे इशारा करते हैं कि इस स्थापित प्रक्रिया को पलटने की कोशिशें हुई हैं। अगर यह सच है तो यह केवल आंतरिक प्रशासनिक मसला नहीं रह जाता, बल्कि न्यायालय के निर्णय की भावना का उल्लंघन बन जाता है।

इसी संदर्भ में एक और पहलू देखने लायक है। अनूप बरनवाल मामले (2023) में सर्वोच्च न्यायालय ने नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और मुख्य न्यायाधीश की समिति का निर्देश दिया था। बाद में बने कानून (2023) ने मुख्य न्यायाधीश की जगह एक केंद्रीय मंत्री को रख दिया। इससे नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका का पलड़ा भारी होने की बहस छिड़ी, और आयोग की स्वायत्तता पर बहस आज भी जारी है।

उपलब्धियां: 17 करोड़ से 97 करोड़ तक

आयोग की यात्रा को आंकड़ों में देखें तो उपलब्धि साफ़ दिखती है:

  • पहला आम चुनाव (अक्टूबर 1951 से फरवरी 1952): लगभग 17.3 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण हुआ, जो उस समय एक अविश्वसनीय काम था। इसमें बड़ी संख्या निरक्षर मतदाताओं की थी, जिनके लिए पार्टी चिह्न और अलग-अलग मतपेटियों की व्यवस्था की गई।
  • 2024 का आम चुनाव: पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 97 करोड़ तक पहुंच गई।
  • इन सात दशकों में अलग-अलग मुख्य चुनाव आयुक्तों के नेतृत्व में आयोग ने अधिकतम भागीदारी सुनिश्चित करने का मिशन जैसा काम किया। मतदाता पहचान पत्र, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, दूरदराज़ इलाकों में मतदान केंद्र और मतदाता जागरूकता अभियान, ये सब उसी प्रयास के हिस्से थे।

विडंबना और आगे की राह

विडंबना यह है कि वर्तमान SIR, जो प्रक्रियागत गड़बड़ियों से भरा दिखता है, पिछले अस्सी वर्षों की इन उपलब्धियों को उलटने पर आमादा लगता है। जिस संस्था का इतिहास मतदाताओं को जोड़ने का रहा है, वही अगर करोड़ों नामों को सूची से बाहर करने के जोखिम का कारण बने, तो यह उसके मूल चरित्र के विपरीत होगा।

कुछ बातें अपनाना लाज़िमी है:

  • नाम हटाने से पहले समुचित सूचना और सुनवाई: नागरिक को अपना पक्ष रखने का वास्तविक अवसर मिले। लाल बाबू हुसैन मामले (1995) में अदालत ने कहा था कि बिना नोटिस और जांच के नाम काटना ठीक नहीं।
  • आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय की परंपरा का सम्मान: 1995 के फैसले की भावना के अनुसार तीनों आयुक्तों की बराबर भूमिका सुनिश्चित हो।
  • पारदर्शिता: हटाए गए नामों की सूची, कारण और अपील की प्रक्रिया सार्वजनिक हो।
  • समावेश को प्राथमिकता: पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को सही बनाना हो, उसे छोटा करना नहीं।

नियुक्ति प्रक्रिया में निष्पक्षता: आयुक्तों के चयन में कार्यपालिका का एकतरफ़ा प्रभाव कम हो।

निष्कर्ष

संविधान सभा के सदस्यों ने जिन आशंकाओं को खारिज किया था, वही आशंकाएं कभी-कभी नए रूप में लौट आती हैं। तब अनपढ़ता को अयोग्यता बताया गया था, आज दस्तावेज़ों की कमी को। दोनों बार मूल प्रश्न एक ही है: मताधिकार नागरिक का जन्मसिद्ध अधिकार है या राज्य की दी हुई रियायत? हमारे संस्थापकों ने उत्तर बहुत स्पष्ट दिया था। उन्होंने भरोसा किया कि गरीब, अनपढ़ और हाशिये का नागरिक भी अपनी सरकार चुनने की समझ रखता है, और समय ने इस भरोसे को सही साबित किया।

इसलिए आगे बढ़ने के लिए पीछे देखना ज़रूरी है। निर्वाचन आयोग को अपनी स्वतंत्रता, सामूहिकता और समावेश की उस विरासत की ओर लौटना होगा, जिसने उसे दुनिया की सबसे बड़ी चुनाव प्रक्रिया का संचालक बनाया। लोकतंत्र की मज़बूती केवल चुनाव कराने में नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि कोई भी योग्य नागरिक मतदान के अधिकार से बाहर न रह जाए।


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