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मॉर्गेंथॉ का विचारधाराओं का वर्गीकरण

Morgenthau’s Classification of Ideologies

हैंस जे. मॉर्गेंथाऊ को आधुनिक यथार्थवाद (Classical Realism) का जनक माना जाता है। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति “Politics Among Nations: The Struggle for Power and Peace” (1948) अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन की आधारशिला मानी जाती है। इसी कृति में मॉर्गेंथाऊ ने विदेश नीति के “वैचारिक तत्व” (Ideological Element in International Policies) नामक अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके अंतर्गत उन्होंने राष्ट्रों की विदेश नीतियों के पीछे छिपी विचारधाराओं का वर्गीकरण किया।

मॉर्गेंथाऊ के अनुसार समस्त राजनीति, चाहे वह घरेलू हो या अंतरराष्ट्रीय, मूलतः शक्ति के संघर्ष (Struggle for Power) पर आधारित होती है। यह संघर्ष तीन मूल प्रतिमानों में व्यक्त होता है। पहला, शक्ति को बनाए रखना, जिसे यथास्थिति की नीति कहा जाता है। दूसरा, शक्ति में वृद्धि करना, जिसे साम्राज्यवाद की नीति कहा जाता है। तीसरा, शक्ति का प्रदर्शन करना, जिसे प्रतिष्ठा की नीति कहा जाता है।

इन्हीं तीन प्रकार की नीतियों को न्यायोचित ठहराने के लिए राष्ट्र जिन वैचारिक आवरणों का प्रयोग करते हैं, उन्हीं को मॉर्गेंथाऊ ने विदेश नीति की विचारधाराओं के रूप में वर्गीकृत किया है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि मॉर्गेंथाऊ के लिए विचारधारा का अर्थ कोई स्वतंत्र सिद्धांत नहीं, बल्कि वह औचित्य प्रदायक आवरण है जिसके पीछे राष्ट्र अपने वास्तविक शक्ति उद्देश्यों को छिपाते हैं। अर्थात विचारधारा और वास्तविक उद्देश्य में प्रायः अंतर होता है।

विचारधारा (Ideology) का अर्थ

मॉर्गेन्थाउ के अनुसार विचारधारा वह बौद्धिक या नैतिक आवरण है जिसके माध्यम से राज्य अपने शक्ति-आधारित उद्देश्यों को न्यायोचित ठहराते हैं। वास्तविक उद्देश्य शक्ति और राष्ट्रीय हित हो सकते हैं, लेकिन उन्हें आदर्शों, नैतिकता, न्याय, लोकतंत्र या मानवाधिकारों की भाषा में प्रस्तुत किया जाता है।

विचारधारा की अवधारणा: मॉर्गेंथाऊ का दृष्टिकोण
मॉर्गेंथाऊ के अनुसार राजनीतिक विचारधाराएँ शक्ति राजनीति को नैतिक एवं वैधानिक आवरण प्रदान करने का कार्य करती हैं। चूँकि कोई भी राष्ट्र खुलेआम यह स्वीकार नहीं करता कि वह केवल शक्ति वृद्धि के लिए कार्य कर रहा है, इसलिए वह अपनी नीतियों को शांति, न्याय, स्वतंत्रता या आत्मनिर्णय जैसे आदर्शों की भाषा में प्रस्तुत करता है। यहीं से वास्तविक उद्देश्य और घोषित विचारधारा के बीच का अंतर उत्पन्न होता है, जिसे समझना विदेश नीति विश्लेषण के लिए अनिवार्य है।
मॉर्गेंथाऊ की तीन प्रकार की विचारधाराएँ:

1- यथास्थिति की विचारधारा (Ideologies of the Status Quo)
जो राष्ट्र शक्ति के मौजूदा वितरण को बनाए रखना चाहते हैं, वे यथास्थिति की नीति अपनाते हैं। इसका मार्गदर्शक सिद्धांत है कि जो कुछ विद्यमान है, उसके पक्ष में अवश्य कुछ न कुछ है, अन्यथा वह अस्तित्व में ही न होता।
ऐसे राष्ट्र अपनी नीति को शांति और अंतरराष्ट्रीय विधि की भाषा में प्रस्तुत करते हैं। उदाहरणस्वरूप, स्विट्ज़रलैंड, डेनमार्क, नॉर्वे और स्वीडन जैसे राष्ट्रों की नीतियों को यथास्थितिवादी कहा जा सकता है, क्योंकि ये राष्ट्र अपनी पहले से प्राप्त शक्ति स्थिति को न्यायोचित ठहराने का प्रयास करते हैं। यथास्थिति की नीति को एक प्रकार की नैतिक वैधता प्राप्त होती है, क्योंकि यह विद्यमान व्यवस्था की रक्षा की बात करती है। यह विचारधारा साम्राज्यवाद की विचारधारा के सर्वथा विपरीत है, क्योंकि साम्राज्यवाद अपनी प्रकृति से ही यथास्थिति को उलटने का प्रयास करता है।

उदाहरण

  • प्रथम विश्व युद्ध के बाद की व्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास।
  • शीत युद्ध के दौरान कई पश्चिमी देशों द्वारा मौजूदा व्यवस्था का समर्थन।

आलोचना

  • यह व्यवस्था में मौजूद असमानताओं को स्थायी बना सकती है।
  • कमजोर राज्यों की समस्याओं की उपेक्षा कर सकती है।

2- साम्राज्यवाद की विचारधारा (Ideologies of Imperialism)
जो नीति विद्यमान शक्ति संतुलन या यथास्थिति को बदलने का प्रयास करती है, उसे साम्राज्यवादी नीति कहा जाता है। चूँकि यथास्थिति को उलटना सरलता से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए साम्राज्यवादी नीति को सदैव किसी न किसी नैतिक अथवा प्राकृतिक विधिक औचित्य की आवश्यकता होती है।
साम्राज्यवादी राष्ट्र यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि विद्यमान यथास्थिति अनावश्यक अथवा अन्यायपूर्ण है। ऐतिहासिक उदाहरण के रूप में, नाज़ी जर्मनी ने वर्साय संधि की यथास्थिति को बदलने की माँग समानता के सिद्धांत के आधार पर उचित ठहराई थी। यह तर्क दिया गया कि संधि ने जर्मनी के साथ असमान व्यवहार किया है। उपनिवेशों की माँग तथा एकपक्षीय निरस्त्रीकरण प्रावधानों के संशोधन की माँगें भी इसी सिद्धांत से प्रेरित थीं। साम्राज्यवाद की विचारधारा प्रायः स्वाभाविक अधिकार, ऐतिहासिक न्याय अथवा राष्ट्रीय गौरव जैसी भाषा का प्रयोग करती है।

उदाहरण

  • नाजी जर्मनी की विस्तारवादी नीति।
  • फासीवादी इटली की विदेश नीति।
  • औपनिवेशिक साम्राज्यों का विस्तार।

3- अस्पष्ट विचारधाराएँ (Ambiguous Ideologies)
यह तीसरी श्रेणी ऐसी विचारधाराओं की है जो स्वभाव से अस्पष्ट होती हैं, अर्थात इनका प्रयोग यथास्थिति बनाए रखने और साम्राज्यवादी विस्तार, दोनों के औचित्य हेतु किया जा सकता है। इनकी प्रकृति संदर्भ पर निर्भर करती है।
सबसे प्रमुख उदाहरण है राष्ट्रीय आत्मनिर्णय का सिद्धांत। यह सिद्धांत किसी समय यथास्थिति की रक्षा के लिए प्रयुक्त हो सकता है, जैसे किसी राष्ट्र की वर्तमान सीमाओं को न्यायोचित ठहराना। वहीं किसी अन्य संदर्भ में इसी सिद्धांत का प्रयोग साम्राज्यवादी विस्तार के औचित्य हेतु भी किया जा सकता है, जैसे किसी क्षेत्र में रहने वाले अपने समुदाय के नाम पर क्षेत्रीय दावा करना। इसी अस्पष्टता के कारण इसे संदिग्ध या द्विअर्थी विचारधारा कहा गया है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि कुछ स्रोतों में पामर एवं पर्किन्स का यह मत भी उद्धृत किया जाता है कि ये तीनों श्रेणियाँ वास्तव में विचारधाराएँ नहीं, बल्कि छत्र पद हैं, जो विभिन्न विचार प्रणालियों एवं प्रतिमानों के समूह को समाहित करती हैं।

मॉर्गेन्थाउ के वर्गीकरण की आलोचनाएँ:

1. अत्यधिक यथार्थवाद: उदारवादी विद्वानों के अनुसार मॉर्गेन्थाउ विचारधाराओं की स्वतंत्र भूमिका को कम करके देखते हैं।

2. नैतिक मूल्यों की उपेक्षा: उनकी व्याख्या में नैतिकता को अक्सर शक्ति राजनीति का उपकरण माना गया है।

3. शीत युद्ध केंद्रित दृष्टिकोण: उनका वर्गीकरण मुख्यतः 20वीं सदी की शक्ति राजनीति पर आधारित था।

4. वैश्वीकरण के युग में सीमाएँ: आज गैर-राज्यीय अभिनेता, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और वैश्विक संस्थाएँ भी विचारधाराओं को प्रभावित करती हैं।

UGC NET PYQ वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1

मॉर्गेन्थाउ के अनुसार निम्न में से कौन-सी विचारधारा उनके वर्गीकरण में शामिल नहीं है?

a. Ideology of Status Quo

b. Ideology of Imperialism

c. Ambiguous Ideologies

d. Ideology of Hegemony

उत्तर: d

प्रश्न: “हैंस मॉर्गेंथॉ के अनुसार, विदेश नीति के कितने प्रकार के विचारधाराएँ मौजूद हैं?”

(A) 2

(B) 3

(C) 4

(D) 5

उत्तर: (B) 3

निम्नलिखित में से किस विद्वान को शास्त्रीय यथार्थवाद का प्रमुख प्रवक्ता माना जाता है?

(a) केनेथ वॉल्ट्ज

(b) हांस मॉर्गेंथॉ

(c) रॉबर्ट कीओहेन

(d) अलेक्जेंडर वेंड्ट

उत्तर: (b)


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