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अनुच्छेद 21 के तहत चलने का अधिकार, स्ट्रीट वेंडर्स और समावेशी शहरी नियोजन

अनुच्छेद 21 से अब चलने का अधिकार

20 जून 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) की व्यापक व्याख्या करते हुए कहा कि निर्धारित फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। यह निर्णय पैदल यात्रियों की सुरक्षा और स्ट्रीट वेंडर्स के आजीविका के अधिकार के बीच संतुलन की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।

चलने का अधिकार (Right to Walk) क्या है?

  • न्यायालय ने घोषित किया कि निर्धारित (Demarcated) फुटपाथों पर सुरक्षित रूप से चलने का अधिकार, अनुच्छेद 21 (जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 19(1)(d) (देश में स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार) का अभिन्न हिस्सा है।
  • निर्णय के अनुसार, शहरी नियोजन में पैदल चलने का अधिकार सर्वोच्च प्राथमिकता रखता है और यह मोटर चालित वाहनों की आवाजाही से ऊपर है।
  • शहरी विकास प्राधिकरण (Urban Development Authorities), नगर निगम (Municipal Corporations), नगरपालिकाएँ (Municipalities) तथा पंचायतें (Panchayats) सुरक्षित पैदल अवसंरचना (Pedestrian Infrastructure) के निर्माण और रखरखाव के लिए कानूनी रूप से उत्तरदायी हैं।
  • यदि इन संस्थाओं द्वारा अपने दायित्वों का पालन नहीं किया जाता, तो नागरिक मोटर वाहन अधिनियम, 1988 से अलग संवैधानिक उपचार एवं क्षतिपूर्ति (Restitution and Compensation) की मांग कर सकते हैं।

संवैधानिक टकराव: पैदल यात्री बनाम स्ट्रीट वेंडर्स

  • पैदल यात्रियों का अधिकार: अनुच्छेद 21 के अंतर्गत सुरक्षित आवागमन।
  • स्ट्रीट वेंडर्स का अधिकार: अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत व्यवसाय एवं आजीविका का अधिकार।
  • चुनौती यह है कि दोनों अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित किया जाए।

संवैधानिक आधार

सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिकार को निम्नलिखित प्रावधानों से जोड़ा:

  • अनुच्छेद 19(1)(d) – देश में स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार।
  • अनुच्छेद 19(1)(a) – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  • अनुच्छेद 19(1)(b) – शांतिपूर्ण सभा का अधिकार।
  • अनुच्छेद 19(1)(c) – संघ बनाने का अधिकार।
  • अनुच्छेद 21 – जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार।

अदालत ने कहा कि सुरक्षित रूप से पैदल चलना गरिमापूर्ण जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

स्ट्रीट वेंडर्स (जीविका संरक्षण और विनियमन) अधिनियम, 2014

  • इस कानून का उद्देश्य स्ट्रीट वेंडर्स को मनमाने ढंग से हटाने से बचाना है।
  • टाउन वेंडिंग कमेटियों (TVCs) का गठन कर सर्वेक्षण और वेंडिंग ज़ोन निर्धारित करने का प्रावधान किया गया है।
  • कई नगर निकायों में इसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो पाया है।

शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की चुनौतियाँ

  • सर्वेक्षण और वेंडिंग ज़ोन निर्धारित करने में देरी।
  • योजनाबद्ध व्यवस्था के बजाय अचानक अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई।
  • इससे भ्रष्टाचार, अस्थिरता और गरीब विक्रेताओं की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

समावेशी शहरी नियोजन की आवश्यकता

  • स्ट्रीट वेंडर्स को “अतिक्रमणकारी” मानने के बजाय शहरी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाना चाहिए।
  • शहरों में सतत, सुरक्षित और बाधारहित फुटपाथों के साथ-साथ संगठित वेंडिंग क्षेत्रों का विकास आवश्यक है।
  • इससे पैदल यात्रियों की सुविधा और विक्रेताओं की आजीविका दोनों सुरक्षित रह सकती हैं।

PM SVANidhi योजना की भूमिका

  • यह योजना स्ट्रीट वेंडर्स को बिना गारंटी के कार्यशील पूंजी ऋण उपलब्ध कराती है।
  • इसका उद्देश्य उन्हें औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से जोड़ना और उनके आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है।

नए कानून और नियामक संस्था की आवश्यकता

अदालत ने सुझाव दिया कि:

  • पैदल यात्रियों के अधिकारों की सुरक्षा हेतु विशेष कानून बनाए जाएँ।
  • इस क्षेत्र के लिए स्वतंत्र और विशेषज्ञ नियामक संस्था स्थापित की जाए।

स्वतः संज्ञान (Suo Motu) निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय की प्रति निम्न संस्थाओं को भेजने का निर्देश दिया:

  • भारत का विधि आयोग,
  • आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय,
  • ग्रामीण विकास मंत्रालय,
  • सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय,

ताकि आवश्यक कानूनी एवं नीतिगत ढाँचा विकसित किया जा सके।

निर्णय का महत्व (Significance of the Judgment)

  • न्यायिक व्याख्या का विस्तार (Expansion of Jurisprudence): यह निर्णय सुरक्षित शहरी अवसंरचना को गरिमापूर्ण जीवन के संवैधानिक अधिकार के बराबर महत्व देता है।
  • जवाबदेही (Accountability): विशिष्ट स्थानीय निकायों को जिम्मेदार ठहराकर न्यायालय ने प्रशासनिक अस्पष्टता को कम किया है।
  • नीति निर्माण को प्रोत्साहन (Policy Impetus): न्यायालय ने आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय तथा भारत के विधि आयोग (Law Commission of India) को व्यापक कानूनी ढाँचा तैयार करने की दिशा में कदम उठाने का निर्देश दिया है।

आगे की राह (Way Forward)

  1. सरकारी योजनाओं से एकीकरण (Integration with Missions)

फुटपाथों के निर्माण एवं रखरखाव को स्मार्ट सिटीज मिशन (Smart Cities Mission) और अमृत (AMRUT) जैसी योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए।

  1. अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई (Anti-Encroachment Drives)

स्थानीय निकायों को बाधारहित आवागमन सुनिश्चित करने के लिए सभी अवरोधों को स्थायी रूप से हटाना चाहिए।

  1. सार्वभौमिक मानकों का पालन (Universal Standards)

राज्यों को इंडियन रोड्स कांग्रेस (IRC) के मानकों तथा बॉम्बे हाई कोर्ट द्वारा सुझाए गए सुलभ (Accessible) क्षेत्रीय दिशानिर्देशों को अनिवार्य रूप से लागू करना चाहिए।

  1. समर्पित कानून (Dedicated Legislation)

संसद को राइट टू वॉक (Right to Walk) नाम से एक पृथक कानून बनाना चाहिए, जिसमें:

  • पैदल यात्रियों के अधिकार स्पष्ट हों,
  • एक केंद्रीय नियामक संस्था स्थापित की जाए,
  • उल्लंघन पर दंडात्मक प्रावधान निर्धारित किए जाएँ।
  1. नेटज़ीरो लक्ष्य के अनुरूप (Net-Zero Alignment)

भारत के 2070 नेटज़ीरो लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गैर-मोटरीकृत परिवहन (NMT) को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना आवश्यक है।

आलोचनात्मक विश्लेषण

  • केवल न्यायालय द्वारा अधिकार घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है।
  • यदि सरकारें गुणवत्तापूर्ण फुटपाथ, उचित शहरी डिज़ाइन और प्रभावी वेंडिंग ज़ोन विकसित नहीं करतीं, तो “चलने का अधिकार” व्यवहार में सीमित रह जाएगा।
  • दूसरी ओर, यदि इस निर्णय का उपयोग स्ट्रीट वेंडर्स को हटाने के औज़ार के रूप में किया गया, तो यह सामाजिक न्याय और समावेशी विकास की भावना के विपरीत होगा।

निष्कर्ष

भारत में पैदल चलने का अधिकार और स्ट्रीट वेंडर्स की आजीविका का अधिकार परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित शहरी नियोजन के माध्यम से एक-दूसरे के पूरक बनाए जा सकते हैं। सरकारों को चाहिए कि वे सुरक्षित फुटपाथ, वैज्ञानिक वेंडिंग ज़ोन, और प्रभावी नगर नियोजन के माध्यम से मानवकेंद्रित एवं समावेशी शहरों का निर्माण करें।

 

 

 


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