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रणनीतिक स्थिरता बनाम शक्ति-प्रतिस्पर्धा: बदलती विश्व-व्यवस्था की नई चुनौती

Strategic Stability’ Is a Comforting Foreign-Policy Fantasy – Tod Lindberg and Corban Teague

हाल ही में टॉड लिंडबर्ग और कॉर्बन टीग (Tod Lindberg and Corban Teague) ने अपने लेख “Strategic Stability’ Is a Comforting Foreign-Policy Fantasy” में यह महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि आज की बदलती विश्व-व्यवस्था में रणनीतिक स्थिरता (Strategic Stability) को विदेश नीति का प्रमुख लक्ष्य मानना कितना यथार्थवादी है। लेखकों के अनुसार, अमेरिका–चीन संबंधों में रणनीतिक स्थिरता, संवाद और तनाव-नियंत्रण की बात आकर्षक अवश्य है, लेकिन केवल इन्हीं के आधार पर अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझना पर्याप्त नहीं है।

उनके अनुसार, वर्तमान विश्व में शक्ति-प्रतिस्पर्धा, राष्ट्रीय हित, सैन्य क्षमता, प्रतिरोधक क्षमता और संभावित प्रतिद्वंद्वियों के रणनीतिक उद्देश्यों को भी गंभीरता से समझना आवश्यक है। इसलिए आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल सहयोग और स्थिरता की दृष्टि से नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन और प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से भी देखना होगा।

रणनीतिक स्थिरता का अर्थ और इसकी पृष्ठभूमि

  • रणनीतिक स्थिरता से सामान्यतः ऐसी अंतरराष्ट्रीय स्थिति का अर्थ है, जिसमें प्रमुख शक्तियाँ एक-दूसरे के विरुद्ध ऐसा कदम उठाने से बचें जिससे व्यापक युद्ध, विशेषकर परमाणु युद्ध, का खतरा उत्पन्न हो। इसका संबंध मुख्यतः परमाणु प्रतिरोधक क्षमता (Nuclear Deterrence), सैन्य संतुलन, परमाणु क्षमता और संकट-प्रबंधन से रहा है।
  • इस अवधारणा की पृष्ठभूमि शीतयुद्ध में देखी जा सकती है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तीव्र वैचारिक, राजनीतिक और सैन्य प्रतिस्पर्धा शुरू हुई। दोनों देशों ने विशाल परमाणु शस्त्रागार विकसित कर लिए। परिणामस्वरूप दोनों पक्षों को यह स्पष्ट था कि प्रत्यक्ष परमाणु युद्ध की स्थिति में दोनों को भारी विनाश का सामना करना पड़ेगा।

इस प्रकार एक ऐसी स्थिति विकसित हुई जिसमें एक-दूसरे के विनाश की क्षमता ही युद्ध को रोकने का साधन बन गई।

इसे तीन बिंदुओं में समझा जा सकता है-

  • परमाणु क्षमता ने पारस्परिक असुरक्षा (Mutual Vulnerability) पैदा की।
  • पारस्परिक असुरक्षा ने परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence) को मजबूत किया।
  • प्रतिरोधक क्षमता ने प्रत्यक्ष महाशक्ति युद्ध की संभावना को कम करने में भूमिका निभाई।

शीतयुद्ध की रणनीतिक स्थिरता और उसका महत्व

  • शीतयुद्ध में अमेरिका और सोवियत संघ के बीच केवल हथियारों की दौड़ नहीं हुई, बल्कि दोनों ने हथियार नियंत्रण और संवाद की व्यवस्थाएँ भी विकसित कीं। सामरिक हथियार सीमा वार्ता (SALT), मध्यम दूरी परमाणु बल संधि (INF), सामरिक हथियार न्यूनीकरण संधि (START) और नई सामरिक हथियार न्यूनीकरण संधि (New START) इसके प्रमुख उदाहरण थे।
  • इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि दोनों महाशक्तियाँ अपनी सैन्य प्रतिस्पर्धा को पूरी तरह अनियंत्रित न होने दें। इसका एक उद्देश्य परमाणु हथियारों की संख्या को सीमित करना तथा दूसरा अचानक सैन्य संघर्ष और गलत आकलन की संभावना को कम करना था।
  • इसलिए रणनीतिक स्थिरता का अर्थ केवल “युद्ध न होना” नहीं है। इसका व्यापक अर्थ ऐसी व्यवस्था से है जिसमें प्रतिद्वंद्वी शक्तियाँ अपनी सैन्य क्षमता, एक-दूसरे की प्रतिक्रिया और युद्ध की संभावित लागत को समझते हुए अत्यधिक जोखिम उठाने से बचें।

इसके प्रमुख तत्व थे-

  • परमाणु हथियारों और सैन्य क्षमता पर नियंत्रण।
  • परमाणु युद्ध के जोखिम को कम करना।
  • संकट के समय संवाद के माध्यम बनाए रखना।
  • हथियारों की अनियंत्रित दौड़ को सीमित करना।

शीतयुद्ध की समाप्ति और स्थिरता की उम्मीद

  • 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन आया। अमेरिका विश्व की सबसे शक्तिशाली शक्ति के रूप में उभरा और कुछ समय के लिए ऐसा लगा कि शीतयुद्ध जैसी महाशक्ति प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई है।
  • इसी अवधि में आर्थिक वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, आर्थिक परस्पर-निर्भरता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के विस्तार पर जोर बढ़ा। यह विश्वास मजबूत हुआ कि आर्थिक सहयोग और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ बड़े देशों के बीच युद्ध की संभावना को कम कर सकती हैं।

लेकिन आज प्रश्न यह है कि क्या शीतयुद्ध के बाद की यह स्थिरता वास्तव में स्थायी थी या केवल एक ऐतिहासिक अंतराल थी?

शीतयुद्ध के बाद की व्यवस्था की प्रमुख विशेषताएँ थीं-

  • अमेरिका की असाधारण वैश्विक शक्ति।
  • आर्थिक वैश्वीकरण और बढ़ती परस्पर-निर्भरता।
  • अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में बढ़ता विश्वास।
  • महाशक्ति संघर्ष की संभावना में कमी की धारणा।

समस्या कहाँ उत्पन्न हुई?

समस्या तब सामने आई जब शीतयुद्ध के बाद की अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण अवधि को स्थायी स्थिति मान लिया गया। अमेरिका और उसके सहयोगियों में यह विश्वास बढ़ा कि रूस और चीन जैसी बड़ी शक्तियाँ अंततः मौजूदा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के साथ समायोजित हो जाएँगी।

लेकिन समय के साथ रूस ने अपनी सैन्य और क्षेत्रीय शक्ति को पुनः मजबूत किया तथा चीन ने आर्थिक शक्ति के साथ-साथ तकनीकी, सैन्य और समुद्री शक्ति में भी तेजी से वृद्धि की।

इससे विश्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया-

  • एकध्रुवीय व्यवस्था से बहुध्रुवीय और प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था की ओर परिवर्तन।
  • अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती।
  • रूस की पुनः सक्रिय रणनीतिक भूमिका।
  • चीन का व्यापक आर्थिक और सैन्य उदय।

चीन का उदय और अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा

आज रणनीतिक स्थिरता की बहस का सबसे महत्वपूर्ण संदर्भ अमेरिका और चीन के संबंध हैं। चीन अब केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं है, बल्कि वह तकनीकी, सैन्य, समुद्री और कूटनीतिक क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।

चीन की बढ़ती शक्ति के कारण अमेरिका और चीन के संबंधों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों दिखाई देते हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, प्रौद्योगिकी, अर्धचालक, आपूर्ति शृंखला, ताइवान और हिंद-प्रशांत जैसे मुद्दे रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर रहे हैं।

चीन के उदय के प्रमुख आयाम हैं-

  • आर्थिक शक्ति और विशाल विनिर्माण क्षमता।
  • उन्नत प्रौद्योगिकी और अर्धचालक क्षमता।
  • सैन्य आधुनिकीकरण।
  • समुद्री और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती उपस्थिति।
  • ताइवान और दक्षिण चीन सागर से जुड़े रणनीतिक हित।

क्या केवल संवाद से रणनीतिक स्थिरता प्राप्त हो सकती है?

  • लेख की सबसे महत्वपूर्ण आलोचना यही है कि केवल रणनीतिक स्थिरता की भाषा या शीर्ष नेताओं के बीच संवाद को पर्याप्त समाधान नहीं माना जा सकता। यदि दो शक्तियों के राष्ट्रीय हित, शक्ति-संतुलन और रणनीतिक उद्देश्य अलग-अलग हैं, तो केवल बातचीत से प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं होती।
  • यहाँ यथार्थवादी अंतरराष्ट्रीय संबंध दृष्टिकोण (Realist Approach) महत्वपूर्ण हो जाता है। यथार्थवादी दृष्टिकोण के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई ऐसी सर्वोच्च विश्व सरकार नहीं है जो प्रत्येक राज्य की सुरक्षा की गारंटी दे सके। इसलिए प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं जिम्मेदार होता है।

इस दृष्टिकोण के प्रमुख तत्व हैं-

  • अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई सर्वोच्च विश्व सरकार नहीं।
  • प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं जिम्मेदार है।
  • शक्ति और राष्ट्रीय हित अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रमुख आधार हैं।
  • सुरक्षा की चिंता सुरक्षा दुविधा (Security Dilemma) को जन्म दे सकती है।

रणनीतिक स्थिरता और यथास्थिति में अंतर

  • रणनीतिक स्थिरता का अर्थ यह नहीं है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था हमेशा उसी रूप में बनी रहे। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति लगातार बदलती रहती है।
  • जब किसी उभरती हुई शक्ति की आर्थिक और सैन्य क्षमता बढ़ती है, तो वह मौजूदा व्यवस्था में अधिक प्रभाव की मांग कर सकती है। दूसरी ओर, स्थापित शक्ति अपनी वर्तमान स्थिति और प्रभाव को बनाए रखना चाह सकती है।

इसलिए वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या रणनीतिक स्थिरता का अर्थ यथास्थिति को बनाए रखना है, या बदलते शक्ति-संतुलन के बीच संघर्ष को नियंत्रित करना?

यह प्रश्न आज अमेरिका–चीन संबंधों को समझने में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

रूस का पुनरुत्थान और यूरोपीय सुरक्षा

  • शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद रूस की शक्ति कमजोर हुई, लेकिन बाद के वर्षों में उसने अपनी सैन्य और रणनीतिक क्षमता को पुनः मजबूत किया। रूस की विदेश नीति में अपने निकटवर्ती क्षेत्र और सुरक्षा हितों को लेकर अधिक सक्रियता दिखाई दी।
  • विशेष रूप से यूक्रेन संघर्ष ने यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है। इससे रूस और पश्चिम के बीच तनाव बढ़ा तथा यूरोपीय देशों ने अपनी रक्षा क्षमताओं पर अधिक ध्यान देना शुरू किया।

इसके परिणामस्वरूप

  • यूरोपीय देशों में रक्षा तैयारियों पर अधिक जोर।
  • नाटो की रणनीतिक भूमिका का पुनर्मूल्यांकन।
  • रूस और पश्चिम के बीच अविश्वास में वृद्धि।
  • परमाणु हथियारों और सैन्य विस्तार को लेकर चिंता।

प्रौद्योगिकी ने रणनीतिक स्थिरता को और जटिल बनाया

आज रणनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल पारंपरिक और परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर युद्ध, अंतरिक्ष क्षमता, अति-तीव्र गति वाले हथियार और स्वायत्त हथियार प्रणालियाँ युद्ध की प्रकृति को बदल रही हैं।

विशेष रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबर तकनीक निर्णय लेने की गति को बहुत कम कर सकती हैं। यदि किसी देश को लगे कि उसकी सैन्य संचार या नियंत्रण प्रणाली पर हमला हुआ है, तो वह वास्तविक स्थिति समझने से पहले प्रतिक्रिया दे सकता है।

इससे कुछ नई चुनौतियाँ पैदा होती हैं-

  • साइबर हमले के कारण गलत आकलन।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सैन्य निर्णय।
  • अंतरिक्ष प्रणालियों पर बढ़ती निर्भरता।
  • अति-तीव्र गति वाले हथियारों के कारण प्रतिक्रिया का कम समय।
  • स्वायत्त हथियारों से अनियंत्रित सैन्य वृद्धि का जोखिम।

हथियार नियंत्रण व्यवस्था का कमजोर होना

शीतयुद्ध के दौरान हथियार नियंत्रण समझौतों ने अमेरिका–सोवियत प्रतिस्पर्धा को कुछ सीमाओं में रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन हाल के वर्षों में यह व्यवस्था कमजोर हुई है।

विशेष रूप से नई सामरिक हथियार न्यूनीकरण संधि (New START) के 5 फरवरी 2026 को समाप्त होने के बाद अमेरिका और रूस के सामरिक परमाणु शस्त्रागार पर पहले जैसी बाध्यकारी संधि-आधारित सीमाएँ नहीं रहीं।

इससे कुछ महत्वपूर्ण चिंताएँ उत्पन्न होती हैं;

  • नई हथियारों की दौड़ की संभावना।
  • परमाणु पारदर्शिता में कमी।
  • रणनीतिक अनिश्चितता में वृद्धि।
  • संकट के समय गलत आकलन और अनियंत्रित वृद्धि का खतरा।

हालाँकि इसका अर्थ यह नहीं है कि हथियार नियंत्रण अप्रासंगिक हो गया है। इसके विपरीत, बदलती तकनीक और बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण हथियार नियंत्रण की आवश्यकता और अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

यथार्थवाद और उदारवाद के बीच बहस

इस लेख को यथार्थवाद और उदारवाद के बीच अंतरराष्ट्रीय संबंधों की बहस के संदर्भ में भी समझा जा सकता है।

उदारवादी दृष्टिकोण यह मानता है कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, आर्थिक परस्पर-निर्भरता, अंतरराष्ट्रीय कानून और सहयोग देशों के बीच संघर्ष को कम कर सकते हैं। इसके विपरीत यथार्थवादी दृष्टिकोण यह चेतावनी देता है कि संस्थाओं के बावजूद राज्य शक्ति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित की खोज करते रहेंगे।

इसलिए वर्तमान विश्व को समझने के लिए दोनों दृष्टिकोण उपयोगी हैं;

  • उदारवाद हमें संस्थाओं और सहयोग का महत्व समझाता है।
  • यथार्थवाद हमें शक्ति, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित की वास्तविकता समझाता है।
  • दोनों को साथ रखकर संघर्ष-प्रबंधन को अधिक व्यापक रूप से समझा जा सकता है।

ताइवान का महत्व

अमेरिका–चीन रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में ताइवान सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक है। इसका महत्व केवल राजनीतिक नहीं बल्कि सैन्य, आर्थिक और तकनीकी भी है।

ताइवान जलडमरूमध्य में किसी बड़े संकट का प्रभाव केवल चीन और अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा। इससे वैश्विक अर्धचालक आपूर्ति, हिंद-प्रशांत की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

ताइवान के तीन प्रमुख आयाम हैं;

  • सुरक्षा: अमेरिका–चीन सैन्य संघर्ष का संभावित केंद्र।
  • प्रौद्योगिकी: अर्धचालक आपूर्ति शृंखला में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका।
  • भू-राजनीति: हिंद-प्रशांत शक्ति-संतुलन पर प्रभाव।

भारत के लिए इसका महत्व

भारत के लिए रणनीतिक स्थिरता की बहस सीधे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी है। भारत एक परमाणु-सक्षम शक्ति, प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्था और हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्वपूर्ण देश है। उसके रणनीतिक परिवेश में चीन और पाकिस्तान दोनों परमाणु-सक्षम पड़ोसी हैं।

साथ ही भारत के अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया तथा वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ अलग-अलग प्रकार के संबंध हैं। इसलिए भारत के लिए किसी एक शक्ति-गुट पर पूरी तरह निर्भर होना उसके रणनीतिक विकल्पों को सीमित कर सकता है।

भारत–चीन के संदर्भ में रणनीतिक स्थिरता

  • भारत और चीन के बीच सीमा विवाद, सैन्य तैनाती, आधारभूत संरचना और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के कारण दोनों देशों के संबंधों में सुरक्षा दुविधा दिखाई देती है।
  • भारत के लिए केवल सैन्य तैयारी पर्याप्त नहीं है। सीमा पर विश्वसनीय प्रतिरोधक क्षमता के साथ-साथ राजनयिक संवाद और सैन्य संपर्क के माध्यम भी बनाए रखना आवश्यक है।
  • इसका उद्देश्य चीन के साथ प्रतिस्पर्धा समाप्त करना नहीं, बल्कि इस प्रतिस्पर्धा को अनियंत्रित सैन्य संघर्ष में बदलने से रोकना होना चाहिए।

भारत की रणनीतिक स्वायत्तता

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण सबक रणनीतिक स्वायत्तता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत सभी शक्तियों से समान दूरी बनाए रखे। इसका अर्थ है कि भारत अपनी विदेश और सुरक्षा नीति से जुड़े निर्णय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र रूप से लेने की क्षमता बनाए रखे।

इसी कारण भारत अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग शक्तियों के साथ सहयोग करता है। अमेरिका के साथ प्रौद्योगिकी और हिंद-प्रशांत सहयोग, रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध तथा बहुपक्षीय मंचों में सक्रिय भागीदारी इसके उदाहरण हैं।

निष्कर्ष

आज की विश्व-व्यवस्था शीतयुद्ध की तरह केवल दो महाशक्तियों के बीच सीमित नहीं है। अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा, रूस की पुनः सक्रिय भूमिका, परमाणु आधुनिकीकरण, नई सैन्य प्रौद्योगिकियाँ, यूक्रेन संघर्ष और कमजोर होती हथियार-नियंत्रण व्यवस्था ने रणनीतिक स्थिरता को अधिक जटिल बना दिया है।

इसलिए रणनीतिक स्थिरता को केवल संवाद या शक्ति-संतुलन के एक सूत्र के रूप में नहीं देखा जा सकता। स्थिरता तभी टिकाऊ हो सकती है जब उसके पीछे विश्वसनीय प्रतिरोध, प्रभावी कूटनीति, संकट-संचार, हथियार नियंत्रण, आर्थिक शक्ति और तकनीकी क्षमता मौजूद हो।

भारत के लिए इसका सबसे महत्वपूर्ण सबक यह है कि रणनीतिक स्वायत्तता केवल विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने का नाम नहीं है, बल्कि उसके लिए मजबूत सैन्य, आर्थिक, तकनीकी और संस्थागत क्षमता भी आवश्यक है। भारत को एक ओर अपनी सुरक्षा और प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करनी होगी, वहीं दूसरी ओर संवाद, बहुपक्षवाद, हथियार नियंत्रण और संकट-प्रबंधन के तंत्रों को भी मजबूत करने में योगदान देना होगा।


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