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सार्क को पुनर्जीवित करने का समय

Why India Must Resolve Not To Give Up On SAARC by pavan k verma

इक्कीसवीं सदी में किसी भी राष्ट्र की वैश्विक शक्ति केवल उसकी सैन्य क्षमता, आर्थिक सामर्थ्य या तकनीकी प्रगति से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होती है कि वह अपने पड़ोस के साथ किस प्रकार के संबंध बनाए रखता है। विश्व राजनीति का अनुभव बताता है कि कोई भी देश अपने आसपास अस्थिरता, अविश्वास और संघर्ष का वातावरण बनाए रखते हुए दीर्घकालिक वैश्विक नेतृत्व हासिल नहीं कर सकता।

भारत आज एक उभरती हुई वैश्विक शक्ति है। उसकी अर्थव्यवस्था दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, उसकी जनसंख्या और बाजार विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण हैं तथा उसकी कूटनीतिक भूमिका लगातार बढ़ रही है। किंतु इसके साथ ही यह प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि क्या भारत अपने पड़ोस को पर्याप्त महत्व दे रहा है? विशेष रूप से दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय संगठन सार्क (SAARC) के संदर्भ में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है।

आज जबकि सार्क लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुंच चुका है, यह आवश्यक हो गया है कि भारत इस संगठन के भविष्य पर गंभीरता से पुनर्विचार करे।


सार्क की स्थापना और मूल उद्देश्य

दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) की स्थापना वर्ष 1985 में ढाका शिखर सम्मेलन में हुई थी। इसके संस्थापक सदस्य भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और मालदीव थे। बाद में 2007 में अफगानिस्तान भी इसका सदस्य बना।

सार्क की स्थापना के पीछे एक महत्वपूर्ण विचार था। दक्षिण एशिया विश्व की लगभग एक-चौथाई आबादी का घर है। यह क्षेत्र साझा इतिहास, संस्कृति, सभ्यतागत संपर्क और आर्थिक संभावनाओं से परिपूर्ण है। इसके बावजूद यह विश्व के सबसे कम एकीकृत क्षेत्रों में से एक बना रहा।

सार्क के प्रमुख उद्देश्य थे—

  • क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • गरीबी उन्मूलन के लिए संयुक्त प्रयास करना।
  • शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना।
  • सांस्कृतिक आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करना।
  • पर्यावरणीय चुनौतियों का सामूहिक समाधान खोजना।
  • क्षेत्रीय संपर्क और कनेक्टिविटी को मजबूत करना।

विशेष रूप से सार्क चार्टर में द्विपक्षीय विवादों को चर्चा से बाहर रखा गया था ताकि राजनीतिक मतभेद विकासात्मक सहयोग में बाधा न बनें।


दक्षिण एशिया : अपार संभावनाओं वाला क्षेत्र

यदि हम भौगोलिक और सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो दक्षिण एशिया दुनिया के सबसे स्वाभाविक क्षेत्रीय समूहों में से एक है।

इस क्षेत्र के देशों के बीच—

  • ऐतिहासिक संबंध हैं।
  • धार्मिक और सांस्कृतिक संपर्क हैं।
  • भाषाई समानताएं हैं।
  • आर्थिक पूरकताएं हैं।
  • साझा पर्यावरणीय चुनौतियां हैं।

जलवायु परिवर्तन, जल संसाधन प्रबंधन, आपदा प्रबंधन, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जैसी अनेक समस्याएं ऐसी हैं जिनका समाधान अकेला कोई देश नहीं कर सकता।

ऐसी परिस्थितियों में क्षेत्रीय सहयोग केवल एक विकल्प नहीं बल्कि आवश्यकता बन जाता है।


सार्क के सामने सबसे बड़ी बाधा : भारत-पाकिस्तान संबंध

सार्क के सामने सबसे बड़ी चुनौती आरंभ से ही भारत और पाकिस्तान के तनावपूर्ण संबंध रहे हैं।

दोनों देशों के बीच युद्ध, सीमा विवाद, आतंकवाद और राजनीतिक अविश्वास ने अक्सर क्षेत्रीय सहयोग की प्रक्रिया को प्रभावित किया। यद्यपि सार्क के संस्थापकों ने द्विपक्षीय विवादों को संगठन से अलग रखने का प्रयास किया था, लेकिन व्यवहार में ऐसा संभव नहीं हो सका।

विशेष रूप से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने भारत के लिए गंभीर सुरक्षा चुनौतियां उत्पन्न कीं। इसके परिणामस्वरूप दोनों देशों के संबंध लगातार बिगड़ते गए।

वर्ष 2016 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित 19वां सार्क शिखर सम्मेलन उरी आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया। तब से लेकर आज तक कोई सार्क शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हुआ है और संगठन लगभग निष्क्रिय हो चुका है।


क्या पाकिस्तान के कारण पूरे संगठन को छोड़ देना उचित है?

यही वह प्रश्न है जो आज सबसे महत्वपूर्ण बन जाता है।

यह सत्य है कि पाकिस्तान की नीतियों ने सार्क की प्रगति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की चिंताएं पूरी तरह उचित हैं। किंतु क्या इसका अर्थ यह होना चाहिए कि भारत पूरे दक्षिण एशियाई सहयोग ढांचे से ही दूरी बना ले?

इसका उत्तर संभवतः नहीं है।

दक्षिण एशिया में केवल पाकिस्तान ही नहीं है। यहां बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और अफगानिस्तान जैसे देश भी हैं, जिनके साथ भारत के बहुआयामी हित जुड़े हुए हैं।

यदि सार्क निष्क्रिय रहता है तो नुकसान केवल पाकिस्तान का नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र का होता है।


इतिहास से मिलने वाले सबक

विश्व इतिहास ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत करता है जहां गहरे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद क्षेत्रीय सहयोग को बनाए रखा गया।

यूरोप ने दो विश्व युद्ध झेले, जिनमें करोड़ों लोग मारे गए। इसके बावजूद बाद में यूरोपीय देशों ने सहयोग की राह चुनी और अंततः यूरोपीय संघ का निर्माण हुआ।

दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों ने भी अनेक राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आसियान (ASEAN) को मजबूत बनाया।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि क्षेत्रीय संस्थाएं केवल मित्र देशों के लिए नहीं होतीं; वे उन देशों के लिए भी होती हैं जिनके बीच मतभेद मौजूद हों।


भारत की वैश्विक आकांक्षाएं और पड़ोस की आवश्यकता

भारत आज संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग कर रहा है। वह वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने का प्रयास कर रहा है और विश्व राजनीति में अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है।

लेकिन एक बुनियादी सिद्धांत है—कोई भी राष्ट्र तब तक पूर्ण वैश्विक प्रभाव नहीं प्राप्त कर सकता जब तक वह अपने पड़ोस में स्थिरता और सहयोग का वातावरण न बना सके।

यदि दक्षिण एशिया में सहयोग कमजोर पड़ता है तो इसका प्रतिकूल प्रभाव भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।

भारत को यह समझना होगा कि पड़ोसी देशों के साथ सकारात्मक संबंध उसकी वैश्विक शक्ति का आधार हैं, न कि उससे अलग कोई विषय।


चीन की बढ़ती उपस्थिति और क्षेत्रीय संतुलन

हाल के वर्षों में दक्षिण एशिया में चीन की आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति तेजी से बढ़ी है।

  • श्रीलंका में बंदरगाह परियोजनाएं।
  • नेपाल में आधारभूत संरचना निवेश।
  • बांग्लादेश में आर्थिक सहयोग।
  • मालदीव में निवेश परियोजनाएं।

इन सबने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित किया है।

यदि भारत क्षेत्रीय मंचों से दूरी बनाता है, तो स्वाभाविक रूप से अन्य शक्तियों के लिए अवसर बढ़ेंगे। इसलिए सार्क जैसे मंच भारत को अपने पड़ोसियों के साथ संस्थागत संपर्क बनाए रखने का अवसर प्रदान करते हैं।


सार्क को पुनर्जीवित करने के संभावित क्षेत्र

यदि सार्क को पुनर्जीवित किया जाए तो कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सहयोग अपेक्षाकृत आसान और लाभकारी हो सकता है—

1. स्वास्थ्य सहयोग

कोविड-19 महामारी ने दिखाया कि सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियां सीमाओं को नहीं मानतीं।

  • रोग निगरानी प्रणाली
  • चिकित्सा अनुसंधान
  • वैक्सीन सहयोग
  • आपातकालीन स्वास्थ्य नेटवर्क

इन क्षेत्रों में सार्क महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

2. जलवायु परिवर्तन

दक्षिण एशिया विश्व के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है।

  • बाढ़
  • सूखा
  • हिमनदों का पिघलना
  • समुद्री जलस्तर में वृद्धि

इन समस्याओं का समाधान क्षेत्रीय सहयोग के बिना संभव नहीं है।

3. व्यापार और संपर्क

दक्षिण एशिया के भीतर व्यापार की मात्रा विश्व के अन्य क्षेत्रों की तुलना में अत्यंत कम है।

बेहतर सड़क, रेल, ऊर्जा और डिजिटल संपर्क से करोड़ों लोगों को लाभ मिल सकता है।

4. शिक्षा और संस्कृति

विद्यार्थी विनिमय कार्यक्रम, संयुक्त अनुसंधान, सांस्कृतिक उत्सव और पर्यटन सहयोग क्षेत्रीय सद्भाव को बढ़ा सकते हैं।


भारत को क्या करना चाहिए?

भारत को सार्क के पुनरुद्धार के लिए यथार्थवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

इसके लिए कुछ कदम महत्वपूर्ण हो सकते हैं—

  • गैर-विवादित क्षेत्रों में सहयोग को प्राथमिकता देना।
  • छोटे सदस्य देशों की चिंताओं को संवेदनशीलता से समझना।
  • आर्थिक और विकासात्मक परियोजनाओं को आगे बढ़ाना।
  • लोगों के बीच संपर्क को प्रोत्साहित करना।
  • आतंकवाद के मुद्दे पर अपनी दृढ़ नीति बनाए रखते हुए सहयोग के अन्य रास्ते खुले रखना।

यह नीति आदर्शवाद नहीं बल्कि व्यावहारिक कूटनीति होगी।


निष्कर्ष

सार्क आज कठिन दौर से गुजर रहा है। भारत-पाकिस्तान तनाव, आतंकवाद और राजनीतिक अविश्वास ने इसे लगभग निष्क्रिय बना दिया है। फिर भी किसी संगठन की वर्तमान कमजोरी उसके स्थायी अंत का प्रमाण नहीं होती।

दक्षिण एशिया विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला और संभावनाओं से भरा क्षेत्र है। यहां की साझा चुनौतियां और साझा अवसर दोनों ही क्षेत्रीय सहयोग की मांग करते हैं। भारत यदि एक जिम्मेदार क्षेत्रीय और वैश्विक शक्ति बनना चाहता है, तो उसे अपने पड़ोस को प्राथमिकता देनी होगी।

पाकिस्तान के साथ समस्याएं वास्तविक हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किंतु पूरे दक्षिण एशिया को उन समस्याओं का बंधक बना देना भी दूरदर्शी नीति नहीं होगी।

इसलिए समय की मांग है कि भारत सार्क को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसे नए दृष्टिकोण, नई ऊर्जा और नए एजेंडे के साथ पुनर्जीवित करने का प्रयास करे। एक मजबूत, स्थिर और सहयोगी दक्षिण एशिया न केवल क्षेत्र के देशों के लिए बल्कि स्वयं भारत की वैश्विक आकांक्षाओं के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।


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