सर्वोच्च न्यायालय के कोलेजियम द्वारा उस अध्यादेश को स्वीकार करना, जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में चार अतिरिक्त न्यायाधीशों के पद सृजित किए गए हैं, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा तथा कार्यपालिका से संस्थागत दूरी बनाए रखने जैसे मूलभूत संवैधानिक सिद्धांतों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। न्यायालय ने वस्तुतः अपनी स्वतंत्रता को सरकार और संसद की सद्भावना पर आधारित एक गणनात्मक जोखिम के रूप में दांव पर लगा दिया है।
ऐतिहासिक संदर्भ
फरवरी 1937 में अमेरिका के राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था। उनका उद्देश्य उन वृद्ध न्यायाधीशों के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त करना था जो सेवानिवृत्त नहीं हो रहे थे। किंतु अमेरिकी सीनेट ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। सीनेट का मत था कि देश को एक स्वतंत्र और निर्भीक न्यायालय चाहिए, ऐसा न्यायालय नहीं जो नियुक्ति करने वाली सत्ता के प्रति भय या कृतज्ञता की भावना से बंधा हो।
भारत में हाल ही में पाँच नए न्यायाधीशों ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। इनमें से तीन न्यायाधीश ऐसे पदों पर बैठे हैं जिनका अस्तित्व किसी संसदीय कानून से नहीं बल्कि राष्ट्रपति द्वारा जारी अध्यादेश से उत्पन्न हुआ है। इस अध्यादेश ने सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत न्यायाधीश संख्या 34 से बढ़ाकर 38 कर दी है।
अध्यादेश द्वारा निर्मित पद
इन पाँचों न्यायाधीशों की योग्यता या क्षमता पर कोई प्रश्न नहीं है। उनमें से चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं और एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता समुदाय से आई हैं। विवाद उनकी नियुक्ति की योग्यता नहीं, बल्कि नियुक्ति की प्रक्रिया और उसके संवैधानिक प्रभावों को लेकर है।
अध्यादेश 16 मई को जारी किया गया था। उस समय सर्वोच्च न्यायालय में 34 स्वीकृत पदों में से केवल 32 न्यायाधीश कार्यरत थे। पाँच नियुक्तियों में से दो नियुक्तियाँ पहले से रिक्त पदों को भरती हैं, जबकि शेष तीन नियुक्तियाँ पूर्णतः अध्यादेश द्वारा निर्मित अतिरिक्त पदों पर आधारित हैं।
संविधान का अनुच्छेद 124(1) स्पष्ट करता है कि सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या संसद द्वारा निर्धारित की जाएगी। यद्यपि अनुच्छेद 123 के अंतर्गत जारी अध्यादेश को अस्थायी रूप से कानून के समान प्रभाव प्राप्त होता है, फिर भी उसकी प्रकृति अस्थायी होती है। प्रश्न केवल कानूनी वैधता का नहीं है, बल्कि न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता का भी है। यदि न्यायालय के कुछ पद ऐसे अध्यादेश पर आधारित हों जिसकी अवधि सीमित हो और जिसका अस्तित्व कार्यपालिका तथा संसद की स्वीकृति पर निर्भर करता हो, तो न्यायपालिका की स्वतंत्र छवि प्रभावित हो सकती है।
सिद्धांत की कसौटी
वर्ष 2015 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने Supreme Court Advocates-on-Record Association v. Union of India मामले में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित कर दिया था। न्यायालय ने माना था कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में न्यायपालिका की प्रधानता (judicial primacy) संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
उस समय न्यायालय को यह चिंता थी कि यदि कार्यपालिका को नियुक्ति प्रक्रिया में प्रभावशाली भूमिका दी गई, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। किंतु अब वही कोलेजियम ऐसे अध्यादेश को स्वीकार कर रहा है जिसकी निरंतरता स्वयं कार्यपालिका और संसद के निर्णय पर निर्भर है।
संविधान के अनुसार राष्ट्रपति किसी भी समय अध्यादेश वापस ले सकते हैं। संसद के दोनों सदन भी उसे अस्वीकार कर सकते हैं। यदि संसद पुनः एकत्र होने के छह सप्ताह के भीतर अध्यादेश को कानून का रूप नहीं दिया जाता, तो वह स्वतः समाप्त हो जाता है।
न्यायालय के अपने पूर्व निर्णय
सर्वोच्च न्यायालय स्वयं कई बार अध्यादेशों के दुरुपयोग के विरुद्ध चेतावनी दे चुका है।
- D.C. Wadhwa v. State of Bihar (1986) में न्यायालय ने बार-बार अध्यादेश जारी करने की प्रवृत्ति को संविधान के साथ धोखाधड़ी बताया था।
- इसके बाद Krishna Kumar Singh v. State of Bihar (2017) में सात-न्यायाधीशीय पीठ ने स्पष्ट कहा कि अध्यादेश निर्माण की शक्ति विधायिका के समानांतर कानून बनाने का स्थायी स्रोत नहीं बन सकती।
यदि संसद अध्यादेश को विधेयक के रूप में पारित कर देती है, तो समस्या समाप्त हो जाएगी। किंतु यदि ऐसा नहीं होता, तो सर्वोच्च न्यायालय की स्वीकृत संख्या पुनः 34 हो जाएगी। ऐसी स्थिति में अध्यादेश द्वारा सृजित पदों पर नियुक्त न्यायाधीशों की संवैधानिक स्थिति को लेकर जटिल प्रश्न उत्पन्न हो सकते हैं।
यद्यपि उनके द्वारा दिए गए निर्णय de facto doctrine के कारण वैध बने रहेंगे, फिर भी संस्थागत दृष्टि से यह स्थिति असहज होगी। विशेषकर तब जब वही सरकार, जिसकी संसदीय बहुमत पर इन पदों का भविष्य निर्भर है, न्यायालय के समक्ष पक्षकार के रूप में उपस्थित हो।
गणनात्मक जोखिम
वर्तमान परिस्थिति में सर्वोच्च न्यायालय की कुल कार्यरत संख्या 37 है और 38वाँ स्वीकृत पद रिक्त है। आगामी महीनों में कुछ न्यायाधीश सेवानिवृत्त होने वाले हैं, जिससे वर्तमान रिक्तियाँ पुनः खुल जाएँगी। इन रिक्तियों में अध्यादेश के आधार पर नियुक्त कुछ न्यायाधीश समायोजित हो सकते हैं।
फिर भी एक न्यायाधीश की स्थिति विशेष रूप से अध्यादेश के भाग्य पर निर्भर रहती है। यदि संसद समय पर अध्यादेश को कानून में परिवर्तित कर देती है, तो कोई समस्या नहीं होगी। लेकिन यदि अध्यादेश समाप्त हो जाए या उसे विधायी स्वीकृति न मिले, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जिसमें कोई न्यायाधीश ऐसे पद पर कार्यरत हो जिसे कानून मान्यता ही न देता हो।
यही वह संभावना है जिसने संवैधानिक चिंता को जन्म दिया है।
व्यापक संवैधानिक प्रश्न
- व्यावहारिक दृष्टि से संभवतः सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है और अंततः अध्यादेश को कानून का रूप मिल जाएगा। इसलिए यह दांव शायद सफल भी हो जाए। लेकिन वास्तविक प्रश्न परिणाम का नहीं, सिद्धांत का है।
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल इस क्षमता में नहीं निहित है कि वह कार्यपालिका को “न” कह सके। स्वतंत्रता का अर्थ यह भी है कि न्यायपालिका स्वयं को किसी प्रकार के राजनीतिक या संस्थागत दायित्व से मुक्त रखे। जब न्यायाधीशों के पदों का भविष्य कार्यपालिका और संसद की स्वीकृति पर निर्भर दिखाई देता है, तब न्यायपालिका की निष्पक्षता की सार्वजनिक धारणा प्रभावित हो सकती है।
- 1937 में अमेरिकी सीनेट ने जिस न्यायालय के प्रति चेतावनी दी थी—जो नियुक्ति करने वाली सत्ता के प्रति कृतज्ञता या दायित्व की भावना से बंध जाए—वह चेतावनी आज भी प्रासंगिक है। अधिक गंभीर खतरा तब उत्पन्न होता है जब कोई संस्था इस संभावित निर्भरता को महसूस करना ही बंद कर दे।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय में अतिरिक्त न्यायाधीशों के पदों के लिए अध्यादेश का सहारा लेना केवल प्रशासनिक सुविधा का प्रश्न नहीं है। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा और संविधान द्वारा परिकल्पित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत से जुड़ा हुआ विषय है। भले ही अंततः संसद अध्यादेश को कानून का रूप दे दे, फिर भी यह प्रकरण इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने लाता है कि क्या न्यायपालिका को अपने संस्थागत ढाँचे और पदों के अस्तित्व के लिए कार्यपालिका तथा संसद की सद्भावना पर निर्भर दिखाई देना चाहिए। यही इस पूरे विवाद का मूल संवैधानिक प्रश्न है।
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