भारत में बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों को रोकने और पीड़ित बच्चों को प्रभावी कानूनी सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से “बच्चों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012” (Protection of Children from Sexual Offences Act – POCSO Act, 2012) लागू किया गया।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त अपनी असाधारण शक्तियों (Extraordinary Powers) का प्रयोग करते हुए POCSO अधिनियम, 2012 के अंतर्गत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को निरस्त (Quash) कर दिया।
- न्यायालय ने यह ध्यान में रखा कि पीड़िता बालिग (18 वर्ष से अधिक आयु) होने के बाद उसी व्यक्ति से विवाह कर चुकी थी। यह एक विशेष मामले के तथ्यों पर आधारित निर्णय था।
- इस प्रकार का निर्णय POCSO कानून के सामान्य अनुप्रयोग को समाप्त नहीं करता। प्रत्येक मामला उसके अपने तथ्यों और कानून के आधार पर तय किया जाता है।

POCSO अधिनियम, 2012 क्या है?
- POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम, 2012 एक विशेष कानून है, जिसका उद्देश्य 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों को यौन शोषण, यौन उत्पीड़न, यौन हमला और अश्लील सामग्री से संबंधित अपराधों से सुरक्षा प्रदान करना है।
- यह अधिनियम भारत द्वारा संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UN Conve?ntion on the Rights of the Child) के प्रति अपनी प्रतिबद्धताओं को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था।
POCSO अधिनियम की आवश्यकता क्यों पड़ी?
POCSO लागू होने से पहले बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों के लिए अलग और व्यापक कानून उपलब्ध नहीं था। भारतीय दंड संहिता (IPC) के प्रावधान पर्याप्त नहीं माने जाते थे। इसलिए एक ऐसे कानून की आवश्यकता महसूस हुई जो;
- बच्चों की विशेष सुरक्षा सुनिश्चित करे,
- बाल-अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया प्रदान करे,
- अपराधियों को कठोर दंड दे,
- पीड़ित की गरिमा और गोपनीयता बनाए रखे।
POCSO अधिनियम की प्रमुख विशेषताएँ
- 18 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों पर लागू
इस कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का प्रत्येक व्यक्ति “बालक/बालिका (Child)” माना जाता है और उसे विशेष कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
- लैंगिक–तटस्थ (Gender Neutral) कानून
POCSO की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह केवल लड़कियों ही नहीं, बल्कि लड़कों और अन्य सभी बच्चों को भी समान सुरक्षा प्रदान करता है।
- विभिन्न प्रकार के अपराधों की स्पष्ट परिभाषा
अधिनियम में निम्न प्रकार के अपराधों को परिभाषित किया गया है—
- यौन उत्पीड़न (Sexual Assault)
- गंभीर यौन उत्पीड़न (Aggravated Sexual Assault)
- लैंगिक उत्पीड़न (Sexual Harassment)
- बच्चों का अश्लील उद्देश्यों के लिए उपयोग (Pornographic Purposes)
- बाल–अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया
- बच्चे का बयान संवेदनशील तरीके से दर्ज किया जाता है।
- पुलिस और न्यायालय को बाल-मित्र वातावरण सुनिश्चित करना होता है।
- अनावश्यक पूछताछ और मानसिक दबाव से बचाने का प्रयास किया जाता है।
- पीड़ित की पहचान की गोपनीयता
धारा 23 के अनुसार मीडिया या कोई अन्य व्यक्ति ऐसी जानकारी सार्वजनिक नहीं कर सकता जिससे पीड़ित बच्चे की पहचान उजागर हो।
- अनिवार्य रिपोर्टिंग
धारा 19 से 22 के तहत यदि किसी व्यक्ति को ऐसे अपराध की जानकारी या उचित संदेह हो, तो उसे संबंधित अधिकारियों को इसकी सूचना देना आवश्यक है।
- कठोर दंड
अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुसार कारावास से लेकर गंभीर मामलों में कठोर दंड का प्रावधान है। 2019 के संशोधनों के बाद कुछ विशेष परिस्थितियों में दंड और अधिक कठोर बनाए गए।
अनुच्छेद 142 क्या है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह शक्ति देता है कि वह किसी भी मामले में “पूर्ण न्याय” (Complete Justice) सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश पारित कर सके।
इसका उद्देश्य उन असाधारण परिस्थितियों में न्याय करना है जहाँ केवल सामान्य कानूनी प्रावधान पर्याप्त न हों।
अनुच्छेद 142 और POCSO के बीच संतुलन
इस प्रकार के मामलों में न्यायालय को दो महत्वपूर्ण उद्देश्यों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है—
- बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करना।
- मामले की विशिष्ट परिस्थितियों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करना।
इसी कारण अनुच्छेद 142 का प्रयोग अत्यंत सीमित और सावधानीपूर्वक किया जाता है।
POCSO अधिनियम का महत्व
- बच्चों के अधिकारों की रक्षा करता है।
- यौन अपराधों के विरुद्ध स्पष्ट कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
- पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली को बढ़ावा देता है।
- बच्चों के प्रति संवेदनशील जांच और सुनवाई सुनिश्चित करता है।
- समाज में बाल सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने में सहायक है।
चुनौतियाँ
- मामलों के निस्तारण में विलंब।
- जागरूकता की कमी के कारण कई मामलों की रिपोर्ट नहीं हो पाती।
- जांच एजेंसियों और न्यायिक तंत्र पर बढ़ता कार्यभार।
- बाल-मित्र प्रक्रियाओं का सभी स्थानों पर समान रूप से पालन सुनिश्चित करना।
आगे की दिशा
- पुलिस, अभियोजन और न्यायिक अधिकारियों का नियमित प्रशिक्षण।
- बच्चों और अभिभावकों में कानूनी जागरूकता बढ़ाना।
- तेज और संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करना।
- पीड़ितों के पुनर्वास और मनोवैज्ञानिक सहायता को मजबूत करना।
- गोपनीयता और गरिमा की रक्षा के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करना।
निष्कर्ष
POCSO अधिनियम, 2012 भारत में बच्चों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण और व्यापक कानून है, जिसका उद्देश्य बाल यौन अपराधों की रोकथाम, पीड़ितों की सुरक्षा और अपराधियों को दंडित करना है। दूसरी ओर, संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को असाधारण परिस्थितियों में “पूर्ण न्याय” करने की शक्ति प्रदान करता है। हालिया निर्णय यह दर्शाता है कि न्यायालय कभी-कभी मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखते हुए विशेष संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर सकता है, किंतु इससे POCSO अधिनियम का मूल उद्देश्य बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा कमज़ोर नहीं होता। UPSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के दृष्टिकोण से POCSO की विशेषताएँ, अनुच्छेद 142 का महत्व तथा दोनों के बीच संतुलन को समझना अत्यंत आवश्यक है।
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