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दक्षिण एशिया के प्रमुख क्षेत्रीय संगठन : SARC

भाग -1

1- South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC)

यह दक्षिण एशिया का सबसे महत्वपूर्ण अंतरसरकारी क्षेत्रीय संगठन है। इसकी स्थापना दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा तकनीकी सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से की गई थी। यह विश्व के उन क्षेत्रीय संगठनों में से एक है जो साझा इतिहास, सांस्कृतिक विरासत, भौगोलिक निकटता तथा विकास संबंधी समान चुनौतियों के आधार पर गठित हुए।

दक्षिण एशिया विश्व की लगभग एक चौथाई जनसंख्या का निवास क्षेत्र है, किंतु वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद और अंतरक्षेत्रीय व्यापार में इसका योगदान अपेक्षाकृत कम है। इसी असमानता को दूर करने तथा क्षेत्रीय सहयोग को संस्थागत रूप देने के लिए SAARC की स्थापना की गई।

आज SAARC की प्रासंगिकता केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, ऊर्जा सहयोग, शिक्षा, संस्कृति तथा लोगों के बीच संपर्क को भी बढ़ावा देता है। हालाँकि भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक तनाव के कारण संगठन की सक्रियता पिछले कुछ वर्षों में प्रभावित हुई है।

स्थापना की पृष्ठभूमि

दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग का विचार सर्वप्रथम बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान द्वारा वर्ष 1977 में प्रस्तुत किया गया। उनका मानना था कि दक्षिण एशिया के विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग आवश्यक है।

वर्ष 1980 में बांग्लादेश ने “Regional Cooperation in South Asia” नामक कार्यपत्र सभी दक्षिण एशियाई देशों को भेजा। इसके बाद विदेश सचिवों तथा विदेश मंत्रियों के अनेक दौर की बैठकें हुईं।

अप्रैल 1981 में कोलंबो में पहली बैठक आयोजित हुई जिसमें सहयोग के विभिन्न क्षेत्रों की पहचान की गई। इसके बाद नई दिल्ली, इस्लामाबाद, थिम्फू, माले और ढाका में बैठकों का आयोजन हुआ।

7 से 8 दिसंबर 1985 को ढाका में प्रथम शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, जहाँ SAARC Charter पर हस्ताक्षर किए गए और संगठन की औपचारिक स्थापना हुई।

स्थापना

स्थापना तिथि: 8 दिसंबर 1985

स्थापना स्थान: ढाका, बांग्लादेश

संस्थापक सदस्य: भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल, भूटान और मालदीव

वर्ष 2007 में अफगानिस्तान आठवें सदस्य के रूप में शामिल हुआ।

मुख्यालय

  • मुख्यालय काठमांडू, नेपाल में स्थित है।
  • स्थायी सचिवालय की स्थापना 16 जनवरी 1987 को हुई।

सदस्य देश

वर्तमान में SAARC के आठ सदस्य देश हैं।

  1. भारत
  2. पाकिस्तान
  3. बांग्लादेश
  4. नेपाल
  5. भूटान
  6. श्रीलंका
  7. मालदीव
  8. अफगानिस्तान

अफगानिस्तान की सदस्यता औपचारिक रूप से बनी हुई है, यद्यपि अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद उसकी राजनीतिक प्रतिनिधित्व संबंधी स्थिति व्यावहारिक रूप से अनिश्चित बनी हुई है। जून 2026 तक SAARC ने इस विषय में कोई औपचारिक परिवर्तन नहीं किया है।

पर्यवेक्षक (Observer) देश एवं संगठन

SAARC ने समय के साथ कई देशों और संगठनों को पर्यवेक्षक का दर्जा प्रदान किया है। इनमें प्रमुख हैं:

  • चीन
  • जापान
  • संयुक्त राज्य अमेरिका
  • यूरोपीय संघ
  • ईरान
  • दक्षिण कोरिया
  • मॉरीशस
  • म्यांमार
  • ऑस्ट्रेलिया

इन पर्यवेक्षकों को बैठकों में भाग लेने का अवसर मिलता है, किंतु निर्णय प्रक्रिया में मतदान का अधिकार नहीं होता।

SAARC Charter की प्रमुख विशेषताएँ

  • SAARC Charter संगठन का मूल संवैधानिक दस्तावेज है।
  • इसमें स्पष्ट किया गया है कि संगठन का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच सहयोग बढ़ाना है, न कि राजनीतिक विवादों का समाधान करना।
  • Charter के अनुसार द्विपक्षीय एवं विवादास्पद मुद्दों पर SAARC के मंच पर चर्चा नहीं की जाएगी। यही कारण है कि भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर सहित अन्य विवाद SAARC के एजेंडे का भाग नहीं बनते।
  • सभी निर्णय सर्वसम्मति के आधार पर लिए जाते हैं।
  • प्रत्येक सदस्य देश की संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक स्वतंत्रता तथा आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत को स्वीकार किया गया है।

उद्देश्य

SAARC का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के लोगों के जीवन स्तर में सुधार करना तथा क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से आर्थिक और सामाजिक विकास को बढ़ावा देना है।

संगठन का लक्ष्य गरीबी उन्मूलन, शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, कृषि, पर्यावरण संरक्षण, ऊर्जा सहयोग, महिला सशक्तीकरण तथा सांस्कृतिक आदान प्रदान को प्रोत्साहित करना है।

साथ ही यह विकासशील देशों के साझा हितों की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रक्षा करने का भी प्रयास करता है।

मूल सिद्धांत

SAARC निम्न सिद्धांतों पर आधारित है:

  • सभी सदस्य देशों की संप्रभु समानता।
  • क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान।
  • आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना।
  • आपसी लाभ के आधार पर सहयोग।
  • सर्वसम्मति से निर्णय लेना।
  • द्विपक्षीय विवादों को संगठन के बाहर रखना।

संस्थागत संरचना

  • SAARC की संस्थागत संरचना बहुस्तरीय है।
  • सबसे ऊपर शिखर सम्मेलन (Summit) होता है, जिसमें सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष अथवा शासनाध्यक्ष भाग लेते हैं। सामान्यतः इसका आयोजन दो वर्ष में एक बार किया जाना निर्धारित है, यद्यपि राजनीतिक परिस्थितियों के कारण इसमें व्यवधान आया है।
  • इसके नीचे विदेश मंत्रियों की परिषद (Council of Ministers) कार्य करती है, जो संगठन की नीतियों का निर्धारण करती है तथा कार्यक्रमों की समीक्षा करती है।
  • इसके बाद स्थायी समिति (Standing Committee) आती है, जिसमें सदस्य देशों के विदेश सचिव शामिल होते हैं। यह समन्वय तथा प्रशासनिक कार्यों की देखरेख करती है।
  • इसके अधीन प्रोग्रामिंग समिति तथा विभिन्न तकनीकी समितियाँ कार्य करती हैं, जो कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, पर्यटन तथा अन्य क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देती हैं।
  • सचिवालय का नेतृत्व महासचिव (Secretary General) करते हैं। महासचिव का कार्यकाल तीन वर्ष का होता है तथा यह पद सदस्य देशों के बीच क्रमवार बदलता है।

महासचिव

  • महासचिव का चयन सदस्य देशों के बीच वर्णानुक्रम के आधार पर किया जाता है।
  • महासचिव सचिवालय का प्रशासनिक प्रमुख होता है और संगठन की विभिन्न बैठकों तथा कार्यक्रमों के समन्वय का कार्य करता है।

आधिकारिक भाषा

SAARC की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है।

प्रमुख सहयोग क्षेत्र

समय के साथ SAARC ने सहयोग के अनेक क्षेत्रों को शामिल किया है।

  • कृषि एवं खाद्य सुरक्षा
  • गरीबी उन्मूलन
  • स्वास्थ्य
  • शिक्षा
  • महिला एवं बाल विकास
  • विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
  • ऊर्जा
  • जलवायु परिवर्तन
  • आपदा प्रबंधन
  • पर्यटन
  • संस्कृति
  • डिजिटल सहयोग
  • लोगों के बीच संपर्क

प्रमुख समझौते

SAFTA

South Asian Free Trade Area (SAFTA) पर वर्ष 2004 में इस्लामाबाद शिखर सम्मेलन में हस्ताक्षर हुए और 2006 से लागू हुआ।

इसका उद्देश्य सदस्य देशों के बीच शुल्कों में कमी लाकर मुक्त व्यापार को बढ़ावा देना था।

हालाँकि भारत और पाकिस्तान के तनाव तथा गैर शुल्कीय बाधाओं के कारण SAFTA अपेक्षित सफलता प्राप्त नहीं कर सका।

SAPTA

South Asian Preferential Trading Arrangement (SAPTA) वर्ष 1993 में स्वीकार किया गया।

यह SAFTA का पूर्ववर्ती समझौता था।

Agreement on Rapid Response to Natural Disasters

आपदा प्रबंधन में क्षेत्रीय सहयोग को मजबूत करने के लिए यह समझौता किया गया।

SAARC Food Bank

खाद्य संकट की स्थिति में सदस्य देशों को सहायता उपलब्ध कराने के उद्देश्य से Food Bank की स्थापना की गई।

SAARC Development Fund (SDF)

इसकी स्थापना वर्ष 2010 में हुई।

मुख्यालय थिम्फू, भूटान में स्थित है।

यह सामाजिक, आर्थिक तथा आधारभूत संरचना संबंधी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

SAARC Arbitration Council

मुख्यालय इस्लामाबाद, पाकिस्तान।

यह सदस्य देशों के बीच व्यापारिक विवादों के समाधान हेतु स्थापित किया गया।

South Asian University

नई दिल्ली में स्थित यह विश्वविद्यालय SAARC देशों के विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को उच्च शिक्षा उपलब्ध कराता है।

यह संगठन की सबसे सफल संस्थागत उपलब्धियों में से एक माना जाता है।

प्रमुख क्षेत्रीय केन्द्र

  • प्रारंभिक वर्षों में SAARC के अनेक क्षेत्रीय केन्द्र विभिन्न सदस्य देशों में स्थापित किए गए थे। बाद में प्रशासनिक सुधारों के अंतर्गत अधिकांश केन्द्रों का एकीकरण कर दिया गया तथा उनके कार्य सचिवालय अथवा अन्य संस्थानों को सौंप दिए गए।
  • आज SAARC Development Fund, South Asian University तथा कुछ विशिष्ट संस्थाएँ संगठन की प्रमुख कार्यात्मक इकाइयों के रूप में कार्य कर रही हैं।

अब तक के शिखर सम्मेलन

  • 1985 से 2014 तक कुल 18 शिखर सम्मेलन आयोजित हुए।
  • 18वाँ शिखर सम्मेलन नवंबर 2014 में काठमांडू, नेपाल में आयोजित हुआ।
  • 19वाँ शिखर सम्मेलन नवंबर 2016 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित था, किंतु भारत सहित कई देशों द्वारा बहिष्कार किए जाने के कारण इसे स्थगित कर दिया गया।
  • जून 2026 तक 19वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो पाया है।
  • इस कारण SAARC की राजनीतिक गतिविधियाँ काफी सीमित हो गई हैं, जबकि इसकी कुछ तकनीकी और संस्थागत गतिविधियाँ सीमित स्तर पर जारी हैं।

SAARC की प्रमुख उपलब्धियाँ

यद्यपि SAARC अपनी पूर्ण क्षमता के अनुरूप कार्य नहीं कर सका है, फिर भी दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय सहयोग की संस्थागत नींव रखने का श्रेय इसी संगठन को जाता है। इसने सदस्य देशों के बीच नियमित संवाद की संस्कृति विकसित की तथा आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में अनेक सहयोगात्मक व्यवस्थाएँ स्थापित कीं।

सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि South Asian Free Trade Area (SAFTA) का लागू होना है। इसके माध्यम से सदस्य देशों के बीच शुल्कों में क्रमिक कमी लाने का प्रयास किया गया। यद्यपि व्यापार अपेक्षित स्तर तक नहीं बढ़ पाया, फिर भी इस समझौते ने दक्षिण एशिया में व्यापार उदारीकरण की दिशा में आधार तैयार किया।

SAARC Development Fund (SDF) संगठन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। यह सामाजिक विकास, आर्थिक सहयोग और आधारभूत संरचना से संबंधित परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है। इसके माध्यम से महिला सशक्तीकरण, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलवायु परिवर्तन तथा ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में अनेक परियोजनाएँ संचालित की गई हैं।

  • नई दिल्ली स्थित South Asian University क्षेत्रीय शिक्षा सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ सभी सदस्य देशों के विद्यार्थी एवं शोधार्थी उच्च शिक्षा और शोध कार्य करते हैं। इस विश्वविद्यालय ने दक्षिण एशिया में शैक्षणिक सहयोग को नई दिशा प्रदान की है।
  • खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्थापित SAARC Food Bank ने प्राकृतिक आपदाओं तथा खाद्यान्न संकट की स्थिति में सदस्य देशों के बीच सहयोग की व्यवस्था विकसित की।
  • स्वास्थ्य क्षेत्र में SAARC ने तपेदिक, मलेरिया, एचआईवी, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा महामारी नियंत्रण जैसे विषयों पर सहयोग को बढ़ावा दिया। कोविड 19 महामारी के प्रारंभिक चरण में भी SAARC देशों ने संयुक्त पहल की।
  • आपदा प्रबंधन, मौसम विज्ञान, कृषि अनुसंधान, सांस्कृतिक आदान प्रदान, युवा कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएँ तथा साहित्यिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी SAARC ने क्षेत्रीय पहचान को मजबूत किया।

SAARC की प्रमुख सीमाएँ एवं चुनौतियाँ

  • SAARC की सबसे बड़ी चुनौती भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चला आ रहा राजनीतिक और सुरक्षा संबंधी तनाव है। दोनों देशों के संबंधों में उत्पन्न तनाव का प्रत्यक्ष प्रभाव संगठन की बैठकों, निर्णयों तथा कार्यक्रमों पर पड़ा है।
  • SAARC Charter के अनुसार सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं। परिणामस्वरूप किसी एक सदस्य देश के विरोध के कारण अनेक महत्वपूर्ण प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाते। यह व्यवस्था निर्णय प्रक्रिया को अत्यधिक धीमा बना देती है।
  • संगठन का एक अन्य प्रमुख दोष यह है कि इसके मंच पर द्विपक्षीय विवादों पर चर्चा नहीं की जा सकती। इसलिए क्षेत्रीय सहयोग को प्रभावित करने वाले अनेक वास्तविक राजनीतिक मुद्दों का समाधान संगठन के भीतर संभव नहीं हो पाता।
  • दक्षिण एशिया विश्व के सबसे कम क्षेत्रीय रूप से एकीकृत क्षेत्रों में गिना जाता है। सदस्य देशों के बीच कुल व्यापार, उनके कुल वैश्विक व्यापार का बहुत छोटा भाग है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यह लगभग 5 प्रतिशत से भी कम रहा है, जबकि यूरोप और दक्षिण पूर्व एशिया में यह कई गुना अधिक है।
  • सीमापार परिवहन, सीमा शुल्क प्रक्रियाओं की जटिलता, गैर शुल्कीय बाधाएँ, कमजोर संपर्क व्यवस्था तथा सीमित निवेश भी क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को प्रभावित करते हैं।
  • चीन के बढ़ते प्रभाव तथा सदस्य देशों की भिन्न विदेश नीति प्राथमिकताओं ने भी SAARC की एकजुटता को प्रभावित किया है।

हाल के वर्षों में BIMSTEC जैसे वैकल्पिक क्षेत्रीय मंचों की सक्रियता बढ़ने से SAARC की राजनीतिक प्रासंगिकता अपेक्षाकृत कम हुई है।

भारत की भूमिका

  • भारत SAARC का सबसे बड़ा सदस्य देश है। क्षेत्रफल, जनसंख्या, अर्थव्यवस्था तथा सामरिक क्षमता की दृष्टि से भारत संगठन में केंद्रीय स्थान रखता है।
  • भारत ने SAARC की स्थापना से लेकर अब तक संगठन को संस्थागत रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नई दिल्ली में South Asian University की स्थापना भारत के सहयोग से हुई। भारत SAARC Development Fund सहित अनेक परियोजनाओं में वित्तीय योगदान देता है।
  • भारत ने स्वास्थ्य, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी, उपग्रह प्रौद्योगिकी, आपदा प्रबंधन, डिजिटल शिक्षा तथा क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सदस्य देशों को तकनीकी सहायता प्रदान की है।
  • मार्च 2020 में कोविड 19 महामारी के दौरान भारत के प्रधानमंत्री ने SAARC देशों की वीडियो कॉन्फ्रेंस आयोजित करने का प्रस्ताव रखा। इसके परिणामस्वरूप SAARC COVID 19 Emergency Fund की स्थापना की गई। भारत ने इस कोष में प्रारंभिक 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया तथा अन्य सदस्य देशों ने भी स्वैच्छिक योगदान दिया।
  • भारत का मानना है कि क्षेत्रीय सहयोग आतंकवाद मुक्त वातावरण में ही प्रभावी हो सकता है। इसी कारण भारत ने सीमा पार आतंकवाद के मुद्दे को अपनी क्षेत्रीय नीति का महत्वपूर्ण आधार बनाया है।
  • भारत की “Neighbourhood First Policy” तथा “Act East Policy” के अंतर्गत SAARC और BIMSTEC दोनों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। हालाँकि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने BIMSTEC को अपेक्षाकृत अधिक सक्रिय मंच के रूप में विकसित करने पर विशेष बल दिया है।

SAARC और BIMSTEC का तुलनात्मक महत्व

हाल के वर्षों में भारत की क्षेत्रीय कूटनीति में BIMSTEC का महत्व बढ़ा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि BIMSTEC में पाकिस्तान सदस्य नहीं है तथा इसमें दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया दोनों क्षेत्रों के देश शामिल हैं।

BIMSTEC के माध्यम से बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में संपर्क, ऊर्जा, समुद्री सुरक्षा तथा आर्थिक सहयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके विपरीत SAARC भारत पाकिस्तान संबंधों के कारण अपेक्षाकृत निष्क्रिय रहा है।

फिर भी भारत ने SAARC को समाप्त करने या उससे बाहर निकलने का कभी समर्थन नहीं किया है। भारत का दृष्टिकोण यह है कि यदि क्षेत्रीय परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, तो SAARC को पुनः सक्रिय किया जा सकता है।


जून 2026 तक के प्रमुख घटनाक्रम

जून 2026 तक SAARC का 19वाँ शिखर सम्मेलन आयोजित नहीं हो पाया है। वर्ष 2016 के बाद से शिखर स्तर की बैठक लंबित बनी हुई है।

संगठन का सचिवालय काठमांडू में कार्य करता रहा है तथा कुछ तकनीकी समितियाँ, विशेषज्ञ समूह और संस्थागत गतिविधियाँ सीमित स्तर पर जारी हैं।

South Asian University, SAARC Development Fund तथा कुछ अन्य संस्थागत व्यवस्थाएँ नियमित रूप से कार्य करती रही हैं।

भारत ने अपनी क्षेत्रीय कूटनीति में BIMSTEC, BBIN तथा IORA जैसे मंचों पर अधिक सक्रियता दिखाई है, जबकि SAARC को औपचारिक रूप से जीवित रखा गया है।

अफगानिस्तान की सदस्यता यथावत बनी हुई है, किंतु अगस्त 2021 के बाद उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों के कारण उसके प्रतिनिधित्व का प्रश्न अभी भी पूर्णतः स्पष्ट नहीं है।


SAARC का समग्र मूल्यांकन

SAARC दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय पहचान का सबसे महत्वपूर्ण संस्थागत मंच है। इसने क्षेत्रीय सहयोग की अवधारणा को स्थापित किया, अनेक संस्थाओं की स्थापना की तथा आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में सहयोग का आधार तैयार किया।

हालाँकि राजनीतिक अविश्वास, भारत पाकिस्तान तनाव, सर्वसम्मति आधारित निर्णय प्रणाली, सीमित आर्थिक एकीकरण तथा कमजोर संपर्क व्यवस्था के कारण संगठन अपनी संभावित उपलब्धियों तक नहीं पहुँच सका।

इसके बावजूद दक्षिण एशिया में दीर्घकालिक क्षेत्रीय सहयोग के लिए SAARC आज भी सबसे व्यापक मंच बना हुआ है। यदि सदस्य देशों के बीच राजनीतिक विश्वास बढ़ता है और आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता दी जाती है, तो भविष्य में इसकी भूमिका पुनः महत्वपूर्ण हो सकती है।

यूजीसी नेट परीक्षा हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य

  • स्थापना: 8 दिसंबर 1985
  • स्थापना स्थान: ढाका, बांग्लादेश
  • मुख्यालय: काठमांडू, नेपाल
  • सदस्य देश: 8
  • नवीनतम सदस्य: अफगानिस्तान (2007)
  • आधिकारिक भाषा: अंग्रेजी
  • निर्णय प्रणाली: सर्वसम्मति
  • 18वाँ शिखर सम्मेलन: काठमांडू, 2014
  • 19वाँ शिखर सम्मेलन: प्रस्तावित इस्लामाबाद, 2016, आयोजित नहीं हुआ
  • SAFTA लागू: 2006
  • SAARC Development Fund मुख्यालय: थिम्फू, भूटान
  • South Asian University: नई दिल्ली, भारत
  • SAARC Arbitration Council: इस्लामाबाद, पाकिस्तान
  • SAARC Charter के अनुसार द्विपक्षीय विवाद संगठन के एजेंडे में शामिल नहीं किए जाते।
  • जून 2026 तक संगठन औपचारिक रूप से अस्तित्व में है, परंतु शिखर स्तर की गतिविधियाँ लंबे समय से स्थगित हैं।

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