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मतदान का अधिकार एक वैधानिक अधिकार, मौलिक अधिकार या संवैधानिक विरोधाभास?

The right to vote: a statutory right, a fundamental right, or a constitutional paradox?

लोकतंत्र की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण आधार नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी है। यह भागीदारी मुख्य रूप से मतदान के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। मतदान केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता की संप्रभुता (Popular Sovereignty) की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।

  • संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” (We the People) से प्रारंभ होती है, जो इस तथ्य को रेखांकित करती है कि भारत की समस्त राजनीतिक शक्ति का स्रोत जनता है। जनता अपने इस अधिकार का प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से करती है और प्रतिनिधियों के चुनाव का एकमात्र लोकतांत्रिक साधन मतदान है।

पृष्ठभूमि

  • लोकतंत्र की अवधारणा का मूल सिद्धांत यह है कि शासन जनता की सहमति से संचालित होगा। यह सहमति चुनावों के माध्यम से प्राप्त होती है। चुनावों के बिना लोकतंत्र केवल एक सैद्धांतिक अवधारणा बनकर रह जाएगा।
  • भारतीय लोकतंत्र जहाँ करोड़ों मतदाता प्रत्येक चुनाव में भाग लेते हैं। इसके बावजूद भारतीय न्यायपालिका ने लंबे समय तक मतदान के अधिकार को केवल वैधानिक (Statutory Right) माना है, अर्थात् ऐसा अधिकार जो संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से उत्पन्न होता है, न कि संविधान के भाग-III द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार के रूप में।
  • समय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने मतदान की प्रक्रिया से जुड़े अनेक पहलुओं जैसे मतदाता का जानने का अधिकार, स्वतंत्र एवं सूचित मतदान, मतपत्र की गोपनीयता तथा NOTA को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया है।
  • परिणामस्वरूप एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई है जिसमें मतदान की लगभग सभी आवश्यक विशेषताएँ संविधान द्वारा संरक्षित हैं, लेकिन स्वयं मतदान का मूल अधिकार अब भी केवल वैधानिक माना जाता है। यही स्थिति एक महत्वपूर्ण संवैधानिक विरोधाभास (Constitutional Paradox) को जन्म देती है।

मतदान सरकार की वैधता (Legitimacy) का स्रोत भी है। कोई भी सरकार तभी लोकतांत्रिक कहलाती है जब उसे जनता का जनादेश प्राप्त हो।

यदि नागरिकों को मतदान का प्रभावी अधिकार न मिले, तो सरकार की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाएगा। इसके अतिरिक्त मतदान शासन को उत्तरदायी (Accountable) बनाता है। जनता अपने मत के माध्यम से अच्छे शासन को पुरस्कृत तथा खराब शासन को दंडित करती है। इस प्रकार चुनाव लोकतांत्रिक नियंत्रण का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

भारत में मतदान अधिकार का संवैधानिक एवं विधिक आधार

  • भारतीय संविधान ने प्रारंभ से ही सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Suffrage) को स्वीकार किया।
  • अनुच्छेद 326 लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है।
  • वर्तमान में 18 वर्ष से अधिक आयु का प्रत्येक भारतीय नागरिक, यदि वह कानून द्वारा निर्धारित अयोग्यताओं के अंतर्गत नहीं आता, मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का अधिकारी है।
  • हालाँकि अनुच्छेद 326 मतदान की संवैधानिक व्यवस्था का आधार है, लेकिन चुनाव कराने, मतदाता सूची तैयार करने, निर्वाचन क्षेत्रों के निर्धारण तथा चुनाव प्रक्रिया का विस्तृत संचालन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 एवं 1951 (Representation of the People Acts) द्वारा किया जाता है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने मतदान के अधिकार को इन अधिनियमों से उत्पन्न वैधानिक अधिकार माना।

मतदान अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय का पारंपरिक दृष्टिकोण

भारतीय न्यायपालिका का प्रारंभिक दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से यह था कि मतदान का अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार नहीं है।

पी. पोनुस्वामी बनाम रिटर्निंग ऑफिसर (1952)

  • यह इस विषय का पहला महत्वपूर्ण निर्णय था। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मतदान और चुनाव लड़ने का अधिकार संविधान से नहीं बल्कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से उत्पन्न होता है। इसलिए यह एक वैधानिक अधिकार है।
  • इस निर्णय का प्रभाव यह हुआ कि चुनाव संबंधी अधिकांश विवादों को मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के रूप में नहीं देखा गया, बल्कि चुनाव कानूनों के दायरे में सीमित रखा गया।

ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल (1982)

  • इस मामले में न्यायमूर्ति ओ. चिनप्पा रेड्डी ने कहा कि लोकतंत्र में मतदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी कानूनी प्रकृति अभी भी वैधानिक ही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि चुनाव संबंधी अधिकार सामान्य विधि (Common Law) या संविधान से स्वतः उत्पन्न नहीं होते, बल्कि केवल कानून द्वारा दिए जाते हैं।

कुलदीप नायर बनाम भारत संघ (2006)

  • इस संविधान पीठ ने पुनः दोहराया कि यद्यपि लोकतंत्र संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा है, फिर भी मतदान का अधिकार जन प्रतिनिधित्व अधिनियमों से प्राप्त होता है। संसद चुनाव प्रक्रिया में आवश्यक संशोधन करने के लिए सक्षम है।

इस प्रकार लगभग पाँच दशकों तक न्यायपालिका ने मतदान को मौलिक अधिकार के बजाय वैधानिक अधिकार ही माना।

मतदान अधिकार का संवैधानिकीकरण (Constitutionalisation of Voting Rights)

समय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने मतदान से जुड़े अनेक पहलुओं को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) अर्थात अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अंतर्गत संरक्षण देना प्रारंभ किया।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स मामला (2002)

  • इस ऐतिहासिक निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मतदाता को उम्मीदवार की आपराधिक पृष्ठभूमि, शैक्षणिक योग्यता तथा संपत्ति संबंधी जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है।
  • न्यायालय ने माना कि यदि मतदाता को उम्मीदवार के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं मिलेगी तो वह स्वतंत्र एवं विवेकपूर्ण निर्णय नहीं ले पाएगा। इसलिए सूचना प्राप्त करने का अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आवश्यक अंग है।

इस निर्णय के परिणामस्वरूप उम्मीदवारों के लिए शपथपत्र (Affidavit) देना अनिवार्य हो गया।

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ (2003)

  • इस निर्णय में न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण अंतर स्थापित किया। न्यायालय ने कहा कि मतदान का अधिकार वैधानिक है, लेकिन मतदान की स्वतंत्रता (Freedom to Vote) संवैधानिक संरक्षण प्राप्त करती है। अर्थात नागरिक किसे वोट देगा, यह उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है।
  • यह निर्णय मतदान को केवल तकनीकी चुनावी प्रक्रिया न मानकर लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का माध्यम घोषित करता है।

NOTA निर्णय (2013)

  • सर्वोच्च न्यायालय ने “None of the Above (NOTA)” को मान्यता प्रदान करते हुए कहा कि किसी भी उम्मीदवार को पसंद न करना भी राजनीतिक अभिव्यक्ति का एक रूप है।
  • न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया कि NOTA चुनने वाले मतदाता की पहचान गोपनीय रहे।
  • यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने नकारात्मक मतदान (Negative Voting) को भी संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया।

संवैधानिक विरोधाभास (Constitutional Paradox)

आज भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में निम्नलिखित अधिकार संविधान द्वारा संरक्षित हैं;

  • उम्मीदवार के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार।
  • स्वतंत्र एवं विवेकपूर्ण मतदान का अधिकार।
  • मतपत्र की गोपनीयता।
  • NOTA के माध्यम से सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने का अधिकार।

लेकिन जिस मूल अधिकार के कारण ये सभी अधिकार अस्तित्व में हैं, अर्थात मतदान का अधिकार, उसे अब भी वैधानिक कहा जाता है।

यह स्थिति तार्किक रूप से विरोधाभासी प्रतीत होती है। यदि किसी नागरिक को किसी भी उम्मीदवार को अस्वीकार करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है, तो किसी उम्मीदवार को चुनने का अधिकार भी समान स्तर का संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होना चाहिए।

इसी कारण अनेक संवैधानिक विशेषज्ञ वर्तमान न्यायिक दृष्टिकोण पर पुनर्विचार की आवश्यकता महसूस करते हैं।

हालिया न्यायिक विकास : अनूप बरनवाल मामला (2023)

  • Anoop Baranwal v. Union of India (2023) में सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर विचार किया।
  • यद्यपि इस निर्णय का मुख्य विषय निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता था, लेकिन न्यायमूर्ति अजय रस्तोगी ने अपने मत में मतदान को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता देने का समर्थन किया।
  • संविधान पीठ ने कई स्थानों पर मतदान को “संवैधानिक अधिकार” कहा, जो पहले की न्यायिक भाषा से एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था।
  • हालाँकि यह अभी अंतिम न्यायिक सिद्धांत नहीं बना है, लेकिन इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि न्यायपालिका मतदान की संवैधानिक स्थिति को पुनर्परिभाषित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।

मूल संरचना सिद्धांत और मतदान

  • केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) प्रतिपादित किया।
  • इस सिद्धांत के अनुसार संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन संविधान की मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।
  • लोकतंत्र इस मूल संरचना का अभिन्न अंग है।
  • इसके बाद इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में न्यायालय ने स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों (Free and Fair Elections) को लोकतंत्र का अनिवार्य तत्व घोषित किया।
  • यदि लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनाव संविधान की मूल संरचना हैं, तो मतदान उनका सबसे आवश्यक साधन है। बिना मतदान के लोकतंत्र की कल्पना असंभव है। इसलिए मतदान को केवल साधारण वैधानिक अधिकार मानना संविधान की मूल संरचना की अवधारणा से पूर्णतः मेल नहीं खाता।

अनुच्छेद 326 का महत्व

  • अनुच्छेद 326 भारतीय लोकतंत्र का आधार है। यह केवल चुनाव प्रक्रिया का प्रावधान नहीं करता बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग लेने का संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम केवल इस अधिकार के क्रियान्वयन (Operationalisation) की व्यवस्था करते हैं।
  • अर्थात मतदान का मूल स्रोत संविधान है जबकि चुनाव संबंधी प्रक्रियाएँ कानून द्वारा संचालित होती हैं।
  • इसी आधार पर अनेक संवैधानिक विद्वान तर्क देते हैं कि मतदान का अधिकार कम से कम संवैधानिक अधिकार (Constitutional Right) के रूप में तो अवश्य स्वीकार किया जाना चाहिए।

मतदान को संवैधानिक अथवा मौलिक अधिकार बनाने के पक्ष में तर्क

  • मतदान नागरिक संप्रभुता का प्रत्यक्ष साधन है। यदि जनता सर्वोच्च शक्ति का स्रोत है, तो उस शक्ति के प्रयोग के साधन को भी संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होना चाहिए।
  • मतदान लोकतांत्रिक वैधता का आधार है। यदि मतदान अधिकार कमजोर होगा तो लोकतंत्र की वैधता भी कमजोर होगी।
  • मतदान को संवैधानिक संरक्षण मिलने से राज्य द्वारा मतदाता सूची से नाम हटाने, अनुचित प्रतिबंध लगाने या मतदान में बाधा उत्पन्न करने जैसी समस्याओं पर अधिक प्रभावी न्यायिक नियंत्रण संभव होगा।
  • विश्व के अनेक लोकतांत्रिक देशों में मतदान को मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार माना जाता है। भारत में भी लोकतंत्र की परिपक्वता को देखते हुए इस दिशा में विचार किया जा सकता है।

विपक्ष में तर्क

  • कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि मतदान को मौलिक अधिकार बनाने से चुनाव संबंधी प्रत्येक विवाद सीधे उच्च न्यायालयों एवं सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच सकता है।
  • इसके अतिरिक्त संसद को चुनावी सुधारों में अपेक्षित लचीलापन कम हो सकता है।
  • कुछ विद्वानों का मत है कि वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था पर्याप्त है क्योंकि चुनाव आयोग तथा न्यायपालिका पहले से ही चुनाव प्रक्रिया की रक्षा कर रहे हैं।

निष्कर्ष

भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार केवल चुनाव कराना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को प्रभावी, स्वतंत्र और सुरक्षित मतदान का अवसर प्रदान करना है। पिछले दो दशकों में सर्वोच्च न्यायालय ने मतदान से जुड़े लगभग सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया है। इस पृष्ठभूमि में मतदान के मूल अधिकार को केवल वैधानिक अधिकार मानना एक संवैधानिक विरोधाभास उत्पन्न करता है।

अनुच्छेद 326, मूल संरचना सिद्धांत, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों की संवैधानिक मान्यता तथा जनता की संप्रभुता के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि मतदान केवल संसद द्वारा प्रदत्त सुविधा नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक गणराज्य की आत्मा है। इसलिए भविष्य में न्यायपालिका अथवा संविधान संशोधन के माध्यम से मतदान को कम-से-कम संवैधानिक अधिकार, और दीर्घकाल में मौलिक लोकतांत्रिक अधिकार के रूप में मान्यता देने की दिशा में गंभीर विचार किया जाना चाहिए। ऐसा कदम न केवल भारतीय लोकतंत्र को अधिक सुदृढ़ बनाएगा, बल्कि नागरिकों और संविधान के बीच लोकतांत्रिक संबंधों को भी और अधिक मजबूत करेगा।

स्रोत – The Hindu

 


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