जॉन रॉल्स बीसवीं सदी के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दार्शनिकों में से एक थे। उनका जन्म 1921 में अमेरिका में हुआ और वे हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे। रॉल्स को आधुनिक राजनीतिक दर्शन में उदारवादी न्याय सिद्धांत का प्रमुख प्रतिपादक माना जाता है। उनके विचारों ने उपयोगितावाद (Utilitarianism) की उस परंपरा को चुनौती दी जो जेरेमी बेंथम और जॉन स्टुअर्ट मिल से चली आ रही थी। रॉल्स का मुख्य प्रश्न यह था कि एक न्यायपूर्ण समाज की बुनियादी संरचना कैसी होनी चाहिए, जिसमें स्वतंत्रता और समानता के बीच संतुलन स्थापित हो सके।
मूल स्थिति और अज्ञानता का आवरण
रॉल्स के सिद्धांत का केंद्रीय विचार है मूल स्थिति। यह एक काल्पनिक स्थिति है जिसमें समाज के सदस्य यह निर्णय लेते हैं कि समाज के लिए न्याय के कौन से सिद्धांत होने चाहिए। इस मूल स्थिति में व्यक्ति अज्ञानता के आवरण के पीछे होते हैं। इसका अर्थ है कि उन्हें अपनी सामाजिक स्थिति, आर्थिक हैसियत, प्रतिभा, धर्म, लिंग या नस्ल के बारे में कोई जानकारी नहीं होती। इस तरह वे पूर्णतः निष्पक्ष रहकर न्याय के सिद्धांत तय करते हैं, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होता कि भविष्य में समाज में उनकी स्थिति क्या होगी। यह विचार सामाजिक अनुबंध सिद्धांत की परंपरा से प्रेरित है, जिसे रॉल्स ने एक नए स्तर पर विकसित किया।
न्याय के दो सिद्धांत
रॉल्स ने न्याय के दो मूल सिद्धांत प्रस्तुत किए:
1-पहला सिद्धांत, जिसे स्वतंत्रता का सिद्धांत कहा जाता है, यह कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान मौलिक स्वतंत्रताओं का सबसे व्यापक और समान अधिकार होना चाहिए, जो अन्य व्यक्तियों की स्वतंत्रता के साथ संगत हो। इसमें वाक् स्वतंत्रता, मताधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता आदि शामिल हैं।
2-दूसरा सिद्धांत सामाजिक और आर्थिक असमानताओं से संबंधित है। इसके दो उप भाग हैं:
- अवसर की समानता का सिद्धांत, जिसके अनुसार पद और पदवियां सभी के लिए समान अवसर की शर्तों के अंतर्गत खुली होनी चाहिए।
- भिन्नता सिद्धांत (Difference Principle), जिसके अनुसार सामाजिक और आर्थिक असमानताएं तभी न्यायसंगत मानी जाएंगी जब वे समाज के सबसे कम सुविधासंपन्न वर्ग को अधिकतम लाभ पहुंचाएं।
रॉल्स ने इन दोनों सिद्धांतों के बीच प्राथमिकता क्रम भी निर्धारित किया। स्वतंत्रता के सिद्धांत को दूसरे सिद्धांत पर प्राथमिकता दी जाती है, अर्थात आर्थिक लाभ के नाम पर मौलिक स्वतंत्रताओं का त्याग नहीं किया जा सकता।
अधिकतम न्यूनतम नियम (Maximin Rule)
रॉल्स का तर्क था कि अज्ञानता के आवरण के पीछे तर्कसंगत व्यक्ति जोखिम से बचने की रणनीति अपनाएंगे। इसे अधिकतम न्यूनतम नियम कहा जाता है। इसका अर्थ है कि वे उस विकल्प को चुनेंगे जिसमें सबसे बुरी संभावित स्थिति भी अन्य विकल्पों की तुलना में बेहतर हो। इसी तर्क के आधार पर भिन्नता सिद्धांत का औचित्य सिद्ध होता है, क्योंकि यह समाज के सबसे कमजोर वर्ग की स्थिति को केंद्र में रखता है।
प्रतिवर्ती संतुलन (Reflective Equilibrium)
रॉल्स की पद्धतिशास्त्रीय अवधारणा में प्रतिवर्ती संतुलन का विशेष महत्व है। इसके अनुसार नैतिक सिद्धांतों का निर्माण हमारे नैतिक अंतर्ज्ञान और सामान्य सिद्धांतों के बीच निरंतर समायोजन से होता है। जब कोई सिद्धांत हमारे गहरे नैतिक अंतर्ज्ञान के विपरीत परिणाम देता है तो हम उस सिद्धांत या अपने अंतर्ज्ञान में संशोधन करते हैं, जब तक कि दोनों में संतुलन स्थापित न हो जाए।
सामाजिक बुनियादी ढांचा (Basic Structure of Society)
रॉल्स के अनुसार न्याय का विषय समाज की बुनियादी संरचना है, अर्थात वे प्रमुख सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक संस्थाएं जो व्यक्तियों के अधिकारों, कर्तव्यों और लाभों के वितरण को निर्धारित करती हैं। इसमें संविधान, कानूनी व्यवस्था, आर्थिक व्यवस्था और सामाजिक संस्थाएं शामिल हैं।
प्राथमिक वस्तुएं (Primary Goods)
रॉल्स ने प्राथमिक वस्तुओं की अवधारणा प्रस्तुत की, जो वे साधन हैं जिनकी आवश्यकता प्रत्येक तर्कसंगत व्यक्ति को अपने जीवन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए होती है। इनमें अधिकार, स्वतंत्रता, अवसर, आय, संपत्ति और आत्मसम्मान की भावना शामिल हैं। न्याय का मूल कार्य इन प्राथमिक वस्तुओं का उचित वितरण सुनिश्चित करना है।
अतिव्यापी सहमति (Overlapping Consensus)
रॉल्स के बाद के लेखन में यह अवधारणा महत्वपूर्ण बनी। इसके अनुसार एक बहुलवादी समाज में भिन्न भिन्न धार्मिक, नैतिक और दार्शनिक विचारधाराओं के लोग भी न्याय के राजनीतिक सिद्धांतों पर सहमति बना सकते हैं, भले ही उनके गहरे दार्शनिक आधार अलग अलग हों। यह सहमति एक स्थिर और न्यायपूर्ण लोकतांत्रिक समाज के लिए आवश्यक मानी गई।
राजनीतिक बनाम व्यापक अवधारणा
रॉल्स ने अपनी बाद की रचनाओं में स्पष्ट किया कि उनका न्याय सिद्धांत एक व्यापक नैतिक या धार्मिक दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि यह केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित एक अवधारणा है। यह परिवर्तन उपयोगितावाद और समुदायवादी आलोचकों की प्रतिक्रिया में आया, जिन्होंने रॉल्स के प्रारंभिक सिद्धांत की आलोचना की थी।
आलोचनाएं
रॉल्स के सिद्धांत की कई विचारकों ने आलोचना की। रॉबर्ट नॉज़िक ने अधिकार आधारित दृष्टिकोण से भिन्नता सिद्धांत की आलोचना की और कहा कि यह व्यक्तिगत संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन करता है। समुदायवादी विचारक जैसे माइकल सैंडल और एलेस्डेयर मैकइंटायर ने रॉल्स के आत्म की अवधारणा की आलोचना की, यह कहते हुए कि व्यक्ति सामाजिक संदर्भ से पूर्णतः असंबद्ध नहीं हो सकता। नारीवादी विचारकों ने भी परिवार और लिंग संबंधी असमानताओं को पर्याप्त महत्व न देने के लिए रॉल्स की आलोचना की।
जॉन रॉल्स के प्रमुख लेखन
अब हम रॉल्स की चार प्रमुख रचनाओं को सरल भाषा में समझते हैं।
(A) A Theory of Justice (1971)
- यह रॉल्स की सबसे प्रसिद्ध और मौलिक कृति है। इसमें उन्होंने मूल स्थिति, अज्ञानता का आवरण, न्याय के दो सिद्धांत और भिन्नता सिद्धांत जैसी अवधारणाओं का प्रतिपादन किया।
- इस पुस्तक ने उपयोगितावादी न्याय सिद्धांत को चुनौती देकर एक नई उदारवादी न्याय अवधारणा प्रस्तुत की। इसे बीसवीं सदी के राजनीतिक दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण कृतियों में गिना जाता है।
(B) Political Liberalism (1993)
- इस पुस्तक में रॉल्स ने अपने पहले सिद्धांत में संशोधन किया। उन्होंने स्वीकार किया कि आधुनिक बहुलवादी समाज में लोगों के धार्मिक, नैतिक और दार्शनिक विचार भिन्न भिन्न होते हैं, इसलिए न्याय का सिद्धांत किसी एक व्यापक नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित नहीं हो सकता।
- यहां उन्होंने अतिव्यापी सहमति की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके अनुसार भिन्न विचारधाराओं के लोग भी साझा राजनीतिक सिद्धांतों पर सहमत हो सकते हैं।
- इस पुस्तक में सार्वजनिक तर्क (Public Reason) की अवधारणा भी महत्वपूर्ण है, जिसके अनुसार सार्वजनिक मामलों में निर्णय ऐसे तर्कों पर आधारित होने चाहिए जिन्हें सभी नागरिक स्वीकार कर सकें।
(C) Justice as Fairness: A Restatement (2001)
- यह पुस्तक वास्तव में रॉल्स के मूल सिद्धांत का पुनः प्रस्तुतीकरण है। इसमें उन्होंने अपने विद्यार्थियों के व्याख्यानों के आधार पर अपने सिद्धांतों को सरल और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया तथा कई आलोचनाओं का उत्तर दिया।
- इसमें उन्होंने भिन्नता सिद्धांत, प्राथमिक वस्तुओं और लोकतांत्रिक समानता की अवधारणाओं को अधिक स्पष्टता के साथ समझाया।
- यह पुस्तक रॉल्स के संपूर्ण चिंतन का सार प्रस्तुत करने वाली मानी जाती है, जिसमें न्याय के रूप में निष्पक्षता की अवधारणा का पुनर्कथन किया गया है।
(D) The Law of Peoples (1999)
- इस पुस्तक में रॉल्स ने अपने न्याय सिद्धांत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया।
- उन्होंने विचार किया कि विभिन्न प्रकार के समाजों, जैसे उदारवादी लोकतांत्रिक समाज, सभ्य श्रेणीबद्ध समाज और बहिष्कृत या दुष्ट राज्यों के बीच अंतरराष्ट्रीय न्याय के सिद्धांत कैसे निर्धारित हो सकते हैं।
- इसमें उन्होंने राष्ट्रों के बीच सहअस्तित्व, मानवाधिकार और वैश्विक न्याय के प्रश्नों पर विचार किया।
- यह पुस्तक आलोचना का विषय भी बनी, क्योंकि कुछ विचारकों ने कहा कि रॉल्स ने वैश्विक असमानता को दूर करने के लिए भिन्नता सिद्धांत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू नहीं किया।
निष्कर्ष
जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत आधुनिक राजनीतिक दर्शन की आधारशिला है। उनकी अवधारणाएं जैसे मूल स्थिति, अज्ञानता का आवरण, भिन्नता सिद्धांत और अतिव्यापी सहमति ने न्याय, समानता और लोकतंत्र के बारे में विचार करने की दिशा बदल दी। उनके लेखन ने उपयोगितावाद की सीमाओं को उजागर करते हुए एक ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जिसमें व्यक्ति की गरिमा और स्वतंत्रता को केंद्रीय स्थान मिला।
Points to Remember
- जॉन रॉल्स (1921 से 2002), अमेरिकी राजनीतिक दार्शनिक, हार्वर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक, उदारवादी न्याय सिद्धांत के प्रमुख प्रतिपादक
- मूल स्थिति एक काल्पनिक स्थिति है जिसमें अज्ञानता के आवरण के पीछे व्यक्ति निष्पक्ष रूप से न्याय के सिद्धांत तय करते हैं
- न्याय का पहला सिद्धांत समान मौलिक स्वतंत्रताओं से संबंधित है, दूसरा सिद्धांत अवसर की समानता और भिन्नता सिद्धांत (Difference Principle) से संबंधित है
- भिन्नता सिद्धांत के अनुसार असमानता तभी उचित है जब वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग को अधिकतम लाभ पहुंचाए, तथा स्वतंत्रता सिद्धांत को प्राथमिकता प्राप्त है
- अधिकतम न्यूनतम नियम के अनुसार व्यक्ति जोखिम से बचने की तर्कसंगत रणनीति अपनाते हैं, और प्रतिवर्ती संतुलन नैतिक सिद्धांतों और अंतर्ज्ञान के बीच समायोजन है
- अतिव्यापी सहमति के अनुसार भिन्न धार्मिक और नैतिक विचारधाराओं के लोग भी साझा राजनीतिक सिद्धांतों पर सहमत हो सकते हैं
- बाद में रॉल्स ने स्पष्ट किया कि उनका सिद्धांत केवल राजनीतिक क्षेत्र तक सीमित है, कोई व्यापक नैतिक दृष्टिकोण नहीं
- रॉबर्ट नॉज़िक ने अधिकार आधारित दृष्टिकोण से तथा माइकल सैंडल जैसे समुदायवादी विचारकों ने रॉल्स के सिद्धांत की आलोचना की
- A Theory of Justice (1971) में मूल सिद्धांत, Political Liberalism (1993) में अतिव्यापी सहमति, Justice as Fairness: A Restatement (2001) में सरल पुनर्कथन, और The Law of Peoples (1999) में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय सिद्धांत का विस्तार प्रस्तुत किया गया
UGC NET PYQ
Arrange John Rawls writings in chronological order which indicates his evolution as a philosopher of eminence?
(A) Political Liberalism
(B) A Theory of Justice
(C) Justice as Fairness
(D) The Law of Peoples
Choose the correct answer from the options given below :
(a) C-A-B-D
(b) D-B-C-A
(c) A-B-C-D
(d) B-A-C-D
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