पाश्चात्य राजनीतिक दर्शन के इतिहास में थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes, 1588–1679) का नाम आधुनिक राजनीतिक चिंतन के सबसे प्रभावशाली विचारकों में लिया जाता है। यदि निकोलो मैकियावेली ने राजनीति को धर्म और नैतिकता से अलग करके यथार्थवादी दृष्टिकोण प्रदान किया, तो हॉब्स ने पहली बार राज्य की उत्पत्ति, सत्ता की वैधता और सामाजिक व्यवस्था को वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार पर समझाने का प्रयास किया। उनकी महान कृति Leviathan, जिसका प्रकाशन 1651 में हुआ, आधुनिक राज्य, सामाजिक अनुबंध (Social Contract) और संप्रभुता (Sovereignty) के सिद्धांत की आधारभूत रचना मानी जाती है। यह केवल एक राजनीतिक ग्रंथ नहीं है, बल्कि मनुष्य के स्वभाव, समाज, धर्म, कानून और शासन की व्यापक दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करती है।
Leviathan का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसमें हॉब्स ने यह प्रतिपादित किया कि राज्य कोई दैवीय संस्था नहीं, बल्कि मनुष्यों द्वारा अपनी सुरक्षा और शांति के लिए निर्मित एक कृत्रिम संस्था (Artificial Institution) है। उनके अनुसार राज्य का अस्तित्व केवल सत्ता स्थापित करने के लिए नहीं, बल्कि अराजकता, हिंसा और भय से मुक्त सुरक्षित सामाजिक जीवन सुनिश्चित करने के लिए है। यही कारण है कि आधुनिक राजनीतिक विज्ञान में हॉब्स को सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का प्रथम व्यवस्थित प्रतिपादक माना जाता है।
पुस्तक का ऐतिहासिक एवं बौद्धिक संदर्भ
Leviathan को समझने के लिए उसके ऐतिहासिक संदर्भ को जानना आवश्यक है। सत्रहवीं शताब्दी का इंग्लैंड गहरे राजनीतिक और धार्मिक संघर्षों से गुजर रहा था। राजा और संसद के बीच सत्ता संघर्ष, धार्मिक मतभेद तथा अंततः इंग्लिश गृहयुद्ध (English Civil War, 1642–1651) ने पूरे समाज को अस्थिर कर दिया था। इस संघर्ष के दौरान व्यापक हिंसा, अव्यवस्था और राजनीतिक अराजकता ने हॉब्स को गहराई से प्रभावित किया।
हॉब्स का विश्वास था कि जब राज्य कमजोर हो जाता है और कोई सर्वोच्च सत्ता नहीं रहती, तब समाज हिंसा, भय और असुरक्षा का शिकार हो जाता है। इसी अनुभव ने उन्हें यह निष्कर्ष निकालने के लिए प्रेरित किया कि समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए एक शक्तिशाली तथा अविभाजित संप्रभु सत्ता का होना अनिवार्य है। इस प्रकार Leviathan केवल सैद्धांतिक ग्रंथ नहीं, बल्कि गृहयुद्ध की वास्तविक परिस्थितियों से उत्पन्न राजनीतिक समाधान भी है।
पुस्तक की संरचना
Leviathan चार प्रमुख भागों में विभाजित है। प्रथम भाग में हॉब्स ने मनुष्य के स्वभाव और उसकी मानसिक तथा शारीरिक प्रवृत्तियों का विश्लेषण किया है। दूसरे भाग में राज्य (Commonwealth) की उत्पत्ति, सामाजिक अनुबंध और संप्रभुता की व्याख्या की गई है। तीसरे भाग में ईसाई धर्म और चर्च की भूमिका का विश्लेषण किया गया है, जबकि चौथे भाग में अंधविश्वास, धार्मिक सत्ता तथा चर्च के राजनीतिक हस्तक्षेप की आलोचना की गई है। इस प्रकार यह ग्रंथ केवल राजनीतिक दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि धर्म, समाज और सत्ता के संबंधों का भी गहन अध्ययन प्रस्तुत करता है।
मानव स्वभाव की अवधारणा
Leviathan का प्रारंभ मनुष्य के स्वभाव के विश्लेषण से होता है। हॉब्स के अनुसार सभी मनुष्य मूलतः समान हैं। यद्यपि उनकी शारीरिक और बौद्धिक क्षमताओं में कुछ अंतर हो सकता है, फिर भी कोई व्यक्ति इतना शक्तिशाली नहीं कि दूसरों पर स्थायी रूप से प्रभुत्व स्थापित कर सके। इसी समानता के कारण सभी व्यक्तियों में समान इच्छाएँ और आकांक्षाएँ उत्पन्न होती हैं।
हॉब्स का मानना था कि मनुष्य स्वभावतः स्वार्थी, आत्मरक्षक तथा सुख की खोज करने वाला प्राणी है। वह अपनी सुरक्षा, सम्मान और संपत्ति की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास करता है। जब अनेक व्यक्ति एक ही संसाधन पर अधिकार प्राप्त करना चाहते हैं, तब उनके बीच प्रतिस्पर्धा, अविश्वास और संघर्ष उत्पन्न होता है। इसलिए मनुष्य का व्यवहार मुख्यतः भय, स्वार्थ और आत्मरक्षा की भावना से संचालित होता है।
हॉब्स का यह दृष्टिकोण प्लेटो और अरस्तू के विचारों से भिन्न है। जहाँ अरस्तू ने मनुष्य को “स्वभावतः राजनीतिक प्राणी” कहा, वहीं हॉब्स ने मनुष्य को मूलतः आत्महित से प्रेरित प्राणी माना, जो केवल सुरक्षा की आवश्यकता के कारण समाज और राज्य की स्थापना करता है।
प्राकृतिक अवस्था (State of Nature)
हॉब्स की सबसे प्रसिद्ध अवधारणा प्राकृतिक अवस्था (State of Nature) है। उनके अनुसार राज्य की स्थापना से पूर्व मनुष्य ऐसी अवस्था में रहता था जहाँ कोई सरकार, कानून या न्यायिक व्यवस्था नहीं थी। इस अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को हर वस्तु पर अधिकार प्राप्त था और किसी भी प्रकार की कानूनी सीमा अस्तित्व में नहीं थी।
ऐसी स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं उत्तरदायी था। परिणामस्वरूप सभी व्यक्तियों के बीच निरंतर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गई, जिसे हॉब्स ने “सभी का सभी के विरुद्ध युद्ध” (War of All Against All) कहा। इस अवस्था में जीवन भय, असुरक्षा और हिंसा से भर जाता है। हॉब्स ने प्रसिद्ध शब्दों में लिखा कि प्राकृतिक अवस्था में मनुष्य का जीवन “एकाकी (Solitary), निर्धन (Poor), घृणित (Nasty), पशुवत् (Brutish) और अल्पकालिक (Short)” होता है।
यह वर्णन किसी ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि यह दिखाने के लिए किया गया है कि यदि राज्य और कानून समाप्त हो जाएँ तो समाज किस प्रकार अराजकता में बदल सकता है।
प्राकृतिक अधिकार और प्राकृतिक नियम
हॉब्स ने प्राकृतिक अधिकार (Natural Right) और प्राकृतिक नियम (Natural Law) के बीच स्पष्ट अंतर किया। प्राकृतिक अधिकार का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी रक्षा के लिए आवश्यक सभी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता है। दूसरी ओर प्राकृतिक नियम विवेक द्वारा निर्धारित वे सिद्धांत हैं जो मनुष्य को शांति स्थापित करने की सलाह देते हैं।
हॉब्स के अनुसार मनुष्य का विवेक उसे यह समझाता है कि निरंतर युद्ध की स्थिति उसके अपने हित में नहीं है। इसलिए वह शांति स्थापित करने के लिए तैयार होता है। यही विवेक सामाजिक अनुबंध की आधारशिला बनता है।
सामाजिक अनुबंध (Social Contract)
हॉब्स का सबसे महत्वपूर्ण योगदान सामाजिक अनुबंध का सिद्धांत है। उनके अनुसार प्राकृतिक अवस्था की असुरक्षा और हिंसा से बचने के लिए सभी व्यक्ति परस्पर समझौता करते हैं। वे अपने अधिकांश प्राकृतिक अधिकार एक सर्वोच्च सत्ता को सौंप देते हैं ताकि वह सभी की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।
यह अनुबंध नागरिकों के बीच होता है, न कि नागरिकों और शासक के बीच। इसलिए संप्रभु स्वयं अनुबंध का पक्षकार नहीं होता। परिणामस्वरूप नागरिक संप्रभु के विरुद्ध विद्रोह करने का अधिकार नहीं रखते, क्योंकि ऐसा करने से समाज पुनः प्राकृतिक अवस्था की अराजकता में लौट जाएगा।
हॉब्स के लिए सामाजिक अनुबंध का उद्देश्य स्वतंत्रता का विस्तार नहीं, बल्कि सुरक्षा और शांति की स्थापना है। यही कारण है कि उन्होंने सुरक्षा को स्वतंत्रता से अधिक महत्व दिया।
संप्रभुता (Sovereignty)
Leviathan का केंद्रीय सिद्धांत संप्रभुता है। हॉब्स के अनुसार राज्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पास एक सर्वोच्च, अविभाजित और पूर्ण सत्ता हो। यदि सत्ता अनेक संस्थाओं में विभाजित हो जाए तो संघर्ष और गृहयुद्ध की संभावना बढ़ जाती है।
संप्रभु व्यक्ति, सभा या राजतंत्र किसी भी रूप में हो सकता है, किंतु उसकी शक्ति सर्वोच्च होनी चाहिए। वही कानून बनाएगा, न्याय करेगा, सेना का संचालन करेगा, कर लगाएगा और विदेश नीति निर्धारित करेगा। हॉब्स ने विशेष रूप से राजतंत्र को सबसे प्रभावी शासन-व्यवस्था माना, क्योंकि उनके अनुसार उसमें निर्णय शीघ्र लिए जा सकते हैं और सत्ता का विभाजन नहीं होता।
राज्य की अवधारणा : Leviathan
हॉब्स ने राज्य को एक कृत्रिम व्यक्ति (Artificial Person) कहा, जिसकी रचना नागरिकों ने अपनी सुरक्षा के लिए की है। उन्होंने इस राज्य की तुलना बाइबिल में वर्णित विशाल समुद्री जीव Leviathan से की, जो अत्यंत शक्तिशाली था। पुस्तक के मुखपृष्ठ पर राज्य को हजारों नागरिकों के शरीर से निर्मित एक विशाल मानव के रूप में चित्रित किया गया है, जिसके हाथ में तलवार और राजदंड है। यह चित्र इस बात का प्रतीक है कि राज्य की शक्ति वास्तव में नागरिकों द्वारा प्रदान की गई शक्ति है।
कानून, स्वतंत्रता और न्याय
हॉब्स के अनुसार जहाँ कानून नहीं होता, वहाँ न्याय भी नहीं हो सकता। प्राकृतिक अवस्था में न्याय और अन्याय जैसी अवधारणाओं का कोई अर्थ नहीं है क्योंकि वहाँ कोई विधिक व्यवस्था नहीं होती। न्याय का अस्तित्व तभी संभव है जब संप्रभु द्वारा बनाए गए कानूनों का पालन किया जाए।
स्वतंत्रता की उनकी अवधारणा भी आधुनिक उदारवाद से भिन्न है। हॉब्स के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ कानूनों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि उन कार्यों को करने की छूट है जिन्हें कानून ने प्रतिबंधित नहीं किया है। इस प्रकार वे कानून और स्वतंत्रता को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक मानते हैं।
धर्म और राज्य
Leviathan का एक महत्वपूर्ण पक्ष धर्म और राजनीति के संबंधों का विश्लेषण है। हॉब्स का मत था कि यदि धार्मिक संस्थाएँ राजनीतिक सत्ता को चुनौती दें, तो समाज में गृहयुद्ध और अराजकता उत्पन्न हो सकती है। इसलिए चर्च भी संप्रभु सत्ता के अधीन होना चाहिए। उन्होंने दैवीय अधिकार सिद्धांत (Divine Right Theory) की आलोचना करते हुए स्पष्ट किया कि राज्य की वैधता ईश्वर से नहीं, बल्कि नागरिकों की सहमति से प्राप्त होती है।
यह विचार आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State) की अवधारणा के विकास में अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।
लॉक और रूसो से तुलना
सामाजिक अनुबंध की परंपरा में हॉब्स के बाद जॉन लॉक और जाँ-जाक रूसो ने अपने सिद्धांत विकसित किए। लॉक ने प्राकृतिक अवस्था को अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण माना और नागरिकों को सरकार के विरुद्ध विद्रोह का अधिकार दिया। रूसो ने सामाजिक अनुबंध का आधार सामान्य इच्छा (General Will) को बनाया और जनसत्ता पर बल दिया। इसके विपरीत हॉब्स ने सुरक्षा को सर्वोच्च मानते हुए शक्तिशाली संप्रभु की आवश्यकता पर जोर दिया। इस प्रकार तीनों विचारकों के सामाजिक अनुबंध सिद्धांतों में मूलभूत अंतर दिखाई देता है।
पुस्तक का आलोचनात्मक मूल्यांकन
Leviathan की सबसे बड़ी विशेषता इसकी तार्किकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और राजनीतिक यथार्थवाद है। हॉब्स ने पहली बार राज्य की उत्पत्ति को दैवीय इच्छा के स्थान पर मानवीय विवेक और सामाजिक आवश्यकता से जोड़ा। उन्होंने आधुनिक संप्रभु राज्य, विधि के शासन और राजनीतिक स्थिरता की अवधारणाओं को मजबूत आधार प्रदान किया।
फिर भी इस पुस्तक की कुछ सीमाएँ भी हैं। हॉब्स ने मानव स्वभाव को अत्यधिक निराशावादी रूप में प्रस्तुत किया है। आधुनिक मनोविज्ञान और समाजशास्त्र यह स्वीकार करते हैं कि मनुष्य केवल स्वार्थी ही नहीं, बल्कि सहयोगी और नैतिक भी होता है। इसी प्रकार उन्होंने संप्रभु को अत्यधिक शक्तियाँ प्रदान कीं, जिससे निरंकुश शासन (Absolutism) को वैचारिक समर्थन मिलता है। नागरिकों को विद्रोह का अधिकार न देना भी आधुनिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों से मेल नहीं खाता। इसलिए उदारवादी विचारकों ने हॉब्स की इस अवधारणा की व्यापक आलोचना की है।
समकालीन प्रासंगिकता
लगभग चार शताब्दियों पूर्व लिखी गई Leviathan आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। आधुनिक राज्यों में राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद, गृहयुद्ध, आंतरिक अशांति और कानून-व्यवस्था जैसे प्रश्न हॉब्स के विचारों को पुनः महत्वपूर्ण बना देते हैं। कोविड-19 महामारी, आपातकालीन परिस्थितियों तथा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े निर्णयों के दौरान यह बहस बार-बार सामने आई कि नागरिक स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। हॉब्स का यह तर्क कि शांति और सुरक्षा के बिना स्वतंत्रता का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है, आज भी राजनीतिक विमर्श में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
निष्कर्ष
थॉमस हॉब्स की Leviathan आधुनिक राजनीतिक दर्शन की सबसे प्रभावशाली और क्रांतिकारी कृतियों में से एक है। इस पुस्तक ने राज्य को पहली बार एक मानवीय और कृत्रिम संस्था के रूप में प्रस्तुत किया तथा सामाजिक अनुबंध और संप्रभुता के सिद्धांत को व्यवस्थित रूप प्रदान किया। यद्यपि हॉब्स का निरंकुश संप्रभु आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जाता, फिर भी राज्य की आवश्यकता, कानून की सर्वोच्चता, सामाजिक व्यवस्था और राजनीतिक स्थिरता के संबंध में उनके विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं। Leviathan केवल सत्रहवीं शताब्दी के इंग्लैंड की राजनीतिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तक नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक युग के लिए यह मूलभूत प्रश्न उठाती है कि सुरक्षा, स्वतंत्रता और सत्ता के बीच उचित संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाए। इसी कारण यह कृति आज भी राजनीतिक विज्ञान, दर्शन, विधि और लोक प्रशासन के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य अध्ययन का विषय बनी हुई है।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.

