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भारत की विदेश नीति की कसौटी : चीन या संयुक्त राज्य अमेरिका

इक्कीसवीं शताब्दी की विश्व व्यवस्था तीव्र परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। वैश्विक शक्ति संतुलन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी प्रभुत्व और सामरिक गठबंधनों का स्वरूप निरंतर बदल रहा है। इस परिवर्तित परिदृश्य में भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास और सामरिक स्वायत्तता के बीच संतुलन कैसे स्थापित करे। एक ओर चीन अपनी आर्थिक, सैन्य और तकनीकी शक्ति के बल पर एशिया में प्रभाव का विस्तार कर रहा है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका भारत को इंडो-पैसिफिक रणनीति का महत्वपूर्ण साझेदार मानता है। ऐसी स्थिति में भारत की विदेश नीति किसी एक शक्ति के साथ पूर्णतः जुड़ने के बजाय राष्ट्रीय हितों पर आधारित संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण की मांग करती है।

हाल के वर्षों में भारत और चीन के बीच सीमावर्ती तनाव, बढ़ता व्यापारिक असंतुलन तथा वैश्विक मंचों पर प्रतिस्पर्धा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि द्विपक्षीय संबंधों का मूल्यांकन केवल आर्थिक लाभ के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार अमेरिका के साथ बढ़ते सामरिक सहयोग को भी इस प्रकार विकसित करना आवश्यक है कि भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता प्रभावित न हो।

भारत और चीन के संबंधों का बदलता स्वरूप

एक समय भारत और चीन के संबंधों में आर्थिक सहयोग को प्राथमिकता दी जाती थी। यह धारणा थी कि व्यापारिक संबंधों की मजबूती राजनीतिक मतभेदों को सीमित कर देगी। किंतु पिछले एक दशक की घटनाओं ने इस धारणा को चुनौती दी है।

डोकलाम संकट, गलवान घाटी की हिंसक झड़प, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैन्य जमावड़ा तथा सीमा क्षेत्रों में चीन की आक्रामक गतिविधियों ने यह स्पष्ट कर दिया कि आर्थिक परस्पर निर्भरता अपने आप में स्थायी शांति की गारंटी नहीं है। चीन ने व्यापारिक संबंधों को बनाए रखते हुए भी सीमाई क्षेत्रों में दबाव की नीति जारी रखी। इससे भारत को अपनी चीन नीति का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ा।

आज भारत चीन को केवल एक व्यापारिक भागीदार के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रतिस्पर्धी राष्ट्र के रूप में देखता है जिसकी नीतियां भारत की सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव और आर्थिक हितों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करती हैं।

व्यापारिक संबंधों की वास्तविकता

भारत और चीन के बीच व्यापार निरंतर बढ़ा है, किंतु इसका लाभ दोनों देशों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ। भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता गया है। भारत बड़ी मात्रा में मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औद्योगिक कच्चा माल, सौर उपकरण तथा रासायनिक उत्पाद चीन से आयात करता है, जबकि भारतीय निर्यात अपेक्षाकृत सीमित है।

इस असंतुलन ने भारतीय उद्योगों को चीन पर अत्यधिक निर्भर बना दिया है। यदि किसी संकट की स्थिति में आपूर्ति शृंखला बाधित होती है तो भारतीय विनिर्माण क्षेत्र, औषधि उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इसी कारण भारत ने हाल के वर्षों में उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना, आत्मनिर्भर भारत अभियान, सेमीकंडक्टर निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण तथा आपूर्ति शृंखला विविधीकरण जैसे कदम उठाए हैं। इनका उद्देश्य चीन पर निर्भरता को क्रमिक रूप से कम करना है, न कि व्यापारिक संबंधों को पूरी तरह समाप्त करना।

क्या आर्थिक सहयोग से राजनीतिक मतभेद समाप्त हो सकते हैं?

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में लंबे समय तक यह विचार प्रभावी रहा कि यदि दो देशों के बीच व्यापार बढ़ेगा तो संघर्ष की संभावना घटेगी। किंतु चीन के व्यवहार ने इस सिद्धांत की सीमाओं को उजागर किया है।

चीन ने जापान, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, फिलीपींस और भारत जैसे देशों के साथ व्यापक व्यापारिक संबंध बनाए रखने के बावजूद समय-समय पर राजनीतिक तथा सामरिक दबाव की नीति अपनाई। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आर्थिक संबंध तभी स्थिरता ला सकते हैं जब उनके साथ पारस्परिक विश्वास और नियम आधारित व्यवहार भी जुड़ा हो।

भारत के लिए यह अनुभव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल व्यापारिक हितों के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

चीन की व्यापक रणनीति और भारत

चीन की विदेश नीति केवल सीमाई विवाद तक सीमित नहीं है। वह आर्थिक निवेश, आधारभूत संरचना निर्माण, तकनीकी मानकों, डिजिटल नेटवर्क तथा वैश्विक संस्थाओं के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार कर रहा है।

बेल्ट एंड रोड पहल इसका प्रमुख उदाहरण है। इस परियोजना के माध्यम से चीन एशिया, अफ्रीका और यूरोप में रणनीतिक संपर्क विकसित कर रहा है। भारत ने इस पहल का समर्थन नहीं किया क्योंकि इसका एक भाग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है, जिसे भारत अपनी संप्रभुता का उल्लंघन मानता है।

इसके अतिरिक्त हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती समुद्री उपस्थिति, पड़ोसी देशों में बंदरगाहों का विकास तथा सैन्य सहयोग भारत की सामरिक चिंताओं को बढ़ाते हैं। परिणामस्वरूप भारत ने भी हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी समुद्री क्षमता, अंडमान एवं निकोबार कमान, तटीय सुरक्षा तथा मित्र देशों के साथ नौसैनिक सहयोग को मजबूत किया है।

अमेरिका के साथ संबंधों का महत्व

चीन की बढ़ती शक्ति ने भारत और अमेरिका को कई क्षेत्रों में एक-दूसरे के निकट लाया है। रक्षा सहयोग, उच्च प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा, अंतरिक्ष अनुसंधान तथा समुद्री सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच उल्लेखनीय प्रगति हुई है।

क्वाड की सक्रियता, रक्षा समझौते, संयुक्त सैन्य अभ्यास तथा महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों पर सहयोग इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश साझा हितों के आधार पर अपनी साझेदारी का विस्तार कर रहे हैं।

फिर भी भारत की नीति किसी सैन्य गठबंधन का हिस्सा बनने की नहीं रही है। भारत स्पष्ट रूप से यह मानता है कि उसकी विदेश नीति का आधार सामरिक स्वायत्तता है। इसका अर्थ यह है कि भारत प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपना निर्णय स्वतंत्र रूप से लेगा, न कि किसी अन्य शक्ति की प्राथमिकताओं के आधार पर।

केवल अमेरिका पर निर्भरता भी समाधान नहीं

भारत को यह भी समझना होगा कि अमेरिका की विदेश नीति मुख्यतः उसके राष्ट्रीय हितों से संचालित होती है। विभिन्न अमेरिकी प्रशासन समय और परिस्थितियों के अनुसार अपनी प्राथमिकताएं बदलते रहे हैं। इसलिए भारत के लिए किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर होना दीर्घकालिक दृष्टि से उचित नहीं होगा।

भारत को अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाते हुए भी यूरोप, जापान, आसियान, पश्चिम एशिया, अफ्रीका तथा वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ समानांतर संबंधों को मजबूत बनाए रखना होगा। यही नीति भारत को बदलती विश्व व्यवस्था में अधिक लचीला और प्रभावशाली बनाएगी।

चीन के साथ संबंधों में “सामान्य स्थिति” की अवधारणा पर पुनर्विचार

भारत और चीन के संबंधों में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या सीमा पर तनाव बना रहने के बावजूद दोनों देशों के बीच सामान्य आर्थिक एवं राजनीतिक संबंध संभव हैं। पिछले कुछ वर्षों के अनुभव बताते हैं कि सीमा पर शांति और स्थिरता द्विपक्षीय संबंधों की आधारशिला है। यदि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर लगातार सैन्य तनाव बना रहे, विश्वास की कमी हो तथा पूर्व में हुए समझौतों का पालन न किया जाए, तो अन्य क्षेत्रों में सहयोग भी सीमित हो जाता है।

भारत ने स्पष्ट किया है कि सीमाई क्षेत्रों में शांति और यथास्थिति की पुनर्स्थापना के बिना संबंधों को पूर्ववत मान लेना यथार्थवादी नहीं होगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि संवाद समाप्त कर दिया जाए, बल्कि यह कि राजनीतिक और आर्थिक संबंधों को सुरक्षा संबंधी वास्तविकताओं से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

चीन की नीति में पारस्परिकता का अभाव

भारत सहित अनेक देशों का अनुभव यह रहा है कि चीन अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से व्यापक लाभ प्राप्त करता है, किंतु कई अवसरों पर समान स्तर की बाजार पहुंच, निवेश की पारदर्शिता तथा प्रतिस्पर्धा के समान अवसर उपलब्ध नहीं कराता। अनेक विदेशी कंपनियों को चीन में नियामकीय प्रतिबंधों, तकनीकी शर्तों तथा प्रशासनिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

इसी प्रकार चीन अपने आर्थिक प्रभाव का उपयोग कई बार राजनीतिक दबाव के साधन के रूप में भी करता रहा है। ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापारिक प्रतिबंध, लिथुआनिया पर आर्थिक दबाव तथा विभिन्न देशों के विरुद्ध व्यापारिक उपाय इस प्रवृत्ति के उदाहरण माने जाते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक संबंधों को राजनीतिक उद्देश्यों से पूर्णतः अलग नहीं रखा जाता।

भारत के लिए यह अनुभव महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह शिक्षा मिलती है कि आर्थिक सहयोग को राष्ट्रीय हितों, रणनीतिक सुरक्षा और दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता के साथ संतुलित करना आवश्यक है।

भारत के समक्ष नीति विकल्प

वर्तमान परिस्थितियों में भारत के समक्ष दो अतिवादी विकल्प नहीं हैं। पहला, चीन से पूर्ण दूरी बना लेना और दूसरा, सभी मतभेदों की उपेक्षा करते हुए केवल आर्थिक संबंधों पर ध्यान देना। दोनों ही दृष्टिकोण व्यावहारिक नहीं हैं।

भारत के लिए उपयुक्त नीति बहुस्तरीय होनी चाहिए।

  1. पहला, जहां राष्ट्रीय हितों का प्रश्न हो, वहां चीन के साथ दृढ़ और स्पष्ट रुख अपनाया जाए।
  2. दूसरा, जलवायु परिवर्तन, वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में सुधार, बहुपक्षीय मंचों तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे साझा हितों के क्षेत्रों में संवाद जारी रखा जाए।
  3. तीसरा, घरेलू विनिर्माण क्षमता, तकनीकी नवाचार तथा महत्वपूर्ण आपूर्ति शृंखलाओं का विविधीकरण किया जाए, ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता समाप्त हो सके।
  4. चौथा, सीमावर्ती अवसंरचना, रक्षा आधुनिकीकरण तथा समुद्री सुरक्षा को निरंतर सुदृढ़ किया जाए, जिससे भारत की प्रतिरोधक क्षमता बढ़े।

सामरिक स्वायत्तता ही भारत की सबसे बड़ी शक्ति

भारतीय विदेश नीति की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता उसकी सामरिक स्वायत्तता रही है। शीत युद्ध के समय गुटनिरपेक्षता इसी सोच का विस्तार थी, जबकि वर्तमान समय में इसे बहु-संरेखण की नीति के रूप में देखा जा सकता है। भारत आज अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, यूरोपीय संघ, पश्चिम एशिया तथा वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ समानांतर संबंध विकसित कर रहा है।

यह नीति भारत को किसी एक शक्ति के प्रभाव क्षेत्र में जाने से बचाती है तथा प्रत्येक मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है। रूस से ऊर्जा सहयोग, अमेरिका के साथ रक्षा एवं प्रौद्योगिकी साझेदारी, फ्रांस के साथ समुद्री सुरक्षा सहयोग तथा पश्चिम एशिया के साथ आर्थिक संपर्क इस संतुलित दृष्टिकोण के उदाहरण हैं।

यही रणनीति भविष्य में भी भारत के लिए सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होगी क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था लगातार बहुध्रुवीय होती जा रही है।

भारत की आर्थिक शक्ति ही वास्तविक सामरिक शक्ति

लेख का एक महत्वपूर्ण संदेश यह है कि किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति अंततः उसकी आर्थिक क्षमता पर आधारित होती है। यदि भारत को वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना है, तो केवल कूटनीतिक सक्रियता पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए मजबूत औद्योगिक आधार, तकनीकी आत्मनिर्भरता, गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना, अनुसंधान एवं विकास, कुशल मानव संसाधन तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप विनिर्माण क्षमता विकसित करनी होगी।

सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुर्लभ खनिज, स्वच्छ ऊर्जा, रक्षा उत्पादन और डिजिटल प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता भारत की सामरिक स्थिति को भी मजबूत करेगी। आर्थिक शक्ति जितनी अधिक होगी, विदेश नीति उतनी ही स्वतंत्र और प्रभावशाली होगी।

इंडो-पैसिफिक और वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका

भारत आज केवल दक्षिण एशिया तक सीमित शक्ति नहीं रह गया है। हिंद महासागर क्षेत्र, इंडो-पैसिफिक, अफ्रीका तथा वैश्विक दक्षिण में उसकी भूमिका निरंतर बढ़ रही है। विकास साझेदारी, मानवीय सहायता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, आपदा राहत तथा क्षमता निर्माण के माध्यम से भारत ने स्वयं को एक उत्तरदायी और विश्वसनीय भागीदार के रूप में स्थापित किया है।

यह भूमिका तभी प्रभावी बनी रहेगी जब भारत अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति की रणनीति का विस्तार बनने से बचाए तथा अपने स्वतंत्र हितों को प्राथमिकता देता रहे।

निष्कर्ष

भारत और चीन के संबंध आने वाले वर्षों में सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों के मिश्रण बने रहेंगे। दोनों एशिया की प्रमुख शक्तियां हैं, इसलिए संवाद बनाए रखना आवश्यक है, किंतु संवाद का अर्थ सुरक्षा संबंधी चुनौतियों की उपेक्षा नहीं हो सकता। सीमा पर स्थिरता, परस्पर सम्मान और समझौतों के पालन के बिना द्विपक्षीय संबंधों में वास्तविक विश्वास स्थापित नहीं हो सकता।

इसी प्रकार अमेरिका के साथ बढ़ती साझेदारी भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है, किंतु यह साझेदारी भारत की सामरिक स्वायत्तता को सीमित करने वाली नहीं होनी चाहिए। भारत की विदेश नीति का आधार किसी शक्ति विशेष के प्रति झुकाव नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित, रणनीतिक विवेक और दीर्घकालिक क्षमता निर्माण होना चाहिए।

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग वही है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक आत्मनिर्भरता, तकनीकी प्रगति, बहुपक्षीय कूटनीति तथा संतुलित वैश्विक साझेदारियों का समन्वय हो। यही दृष्टिकोण भारत को बदलती विश्व व्यवस्था में एक उत्तरदायी, आत्मविश्वासी और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।

लेख का सार:

  1. भारत के लिए चीन केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि एक प्रमुख सामरिक प्रतिस्पर्धी भी है।
  2. गलवान संघर्ष (2020) के बाद भारत ने स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति, द्विपक्षीय संबंधों की आधारशिला है।
  3. आर्थिक परस्पर निर्भरता अपने आप में राजनीतिक विश्वास या सीमा विवादों के समाधान की गारंटी नहीं देती।
  4. भारत का चीन के साथ लगातार बढ़ता व्यापार घाटा आर्थिक निर्भरता की प्रमुख चुनौती है।
  5. भारत की उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना का उद्देश्य चीन पर आयात निर्भरता कम करना भी है।
  6. आपूर्ति शृंखला विविधीकरण (Supply Chain Diversification) भारत की आर्थिक एवं राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है।
  7. चीन आर्थिक साधनों का उपयोग कई बार सामरिक एवं राजनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में करता रहा है।
  8. बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) का भारत ने विरोध किया क्योंकि इसका एक भाग पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है।
  9. हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों ने भारत की समुद्री सुरक्षा नीति को अधिक सक्रिय बनाया है।
  10. क्वाड (Quad) भारत के लिए किसी सैन्य गठबंधन के बजाय नियम आधारित इंडो-पैसिफिक व्यवस्था का मंच है।
  11. अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण सामरिक एवं प्रौद्योगिकी साझेदार है, किंतु भारत किसी एक शक्ति पर निर्भरता का पक्षधर नहीं है।
  12. सामरिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) भारत की विदेश नीति का मूल सिद्धांत बनी हुई है।
  13. बहु-संरेखण (Multi-alignment) वर्तमान भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है, जिसमें भारत अनेक शक्तियों के साथ समानांतर संबंध रखता है।
  14. दीर्घकाल में भारत की वैश्विक शक्ति का आधार मजबूत अर्थव्यवस्था, तकनीकी आत्मनिर्भरता और रक्षा क्षमता होगी।
  15. भारत की विदेश नीति का अंतिम उद्देश्य किसी गुट का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए संतुलित वैश्विक नेतृत्व स्थापित करना है।

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भारत की विदेश नीति का समुद्री आयाम और वैश्विक समुद्री शासन