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न्यायाधीशों की नियुक्ति की समस्या

दक्षिण अफ्रीका के अनुभव से भारत के लिए सीख

न्यायपालिका किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रीढ़ मानी जाती है, परंतु न्यायाधीशों की नियुक्ति स्वयं किस प्रक्रिया से हो, यह प्रश्न भारत में वर्षों से बहस का विषय बना हुआ है। यह लेख दक्षिण अफ्रीका के संवैधानिक न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जेड एम याकूब के एक आलेख पर आधारित है, जो भारत के उच्चतम न्यायालय के अरविंद मल्होत्रा बनाम हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय मामले के निर्णय के संदर्भ में लिखा गया था। इस मामले में एक अनुभवी और सक्षम न्यायाधीश, जिन्हें राजनीतिक रूप से सत्तापक्ष के प्रति समर्थक नहीं माना जाता था, की उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश आवेदक के प्रति सहमत नहीं थे और उन्होंने किसी अन्य न्यायाधीश की पदोन्नति की सिफारिश की। शीर्ष न्यायालय ने इस निर्णय को यह कहते हुए बरकरार रखा कि न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया की गोपनीयता को बनाए रखना संस्था की अखंडता की रक्षा के लिए आवश्यक है। इस प्रसंग ने भारत में न्यायिक नियुक्तियों की पारदर्शिता को लेकर एक बार फिर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।

लेखक की पृष्ठभूमि

लेखक स्वयं दक्षिण अफ्रीका के संवैधानिक न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रहे हैं। वे उस प्रक्रिया के प्रत्यक्ष भागीदार थे जिसने रंगभेद के बाद दक्षिण अफ्रीका के नए संविधान का प्रारूप तैयार किया, और उन्होंने संविधान सभा को न्यायाधीशों की नियुक्ति की व्यवस्था पर परामर्श भी दिया था। इस निजी अनुभव के आधार पर उन्होंने भारत की प्रचलित व्यवस्था की तुलना दक्षिण अफ्रीका के मॉडल से करने का प्रयास किया।

भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था

भारत में उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होती है, जो संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 की न्यायिक व्याख्या से विकसित हुई है।

प्रथम न्यायाधीश मामला (1981) में यह माना गया कि राष्ट्रपति मुख्य न्यायाधीश की सलाह को मानने के लिए बाध्य नहीं हैं।

द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993) में उच्चतम न्यायालय ने कॉलेजियम प्रणाली स्थापित की, जिसमें मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह नियुक्ति की सिफारिश करता है।

तृतीय न्यायाधीश मामला (1998) में परामर्श प्रक्रिया को और विस्तृत करते हुए पांच वरिष्ठ न्यायाधीशों के समूह को शामिल किया गया।

वर्ष 2014 में संसद ने 99वां संविधान संशोधन पारित करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) की स्थापना की, जिसमें कार्यपालिका और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रेकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015) मामले में उच्चतम न्यायालय ने इस संशोधन को यह कहते हुए असंवैधानिक घोषित कर दिया कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होती है, और कॉलेजियम प्रणाली को पुनः बहाल किया गया।

इस प्रकार भारत की व्यवस्था मूलतः गोपनीय है। सिफारिशें आंतरिक रूप से तय होती हैं, बैठकों का विवरण सार्वजनिक नहीं होता, और नाम बताए बिना ही नियुक्ति या अस्वीकृति की जाती है।

दक्षिण अफ्रीका में न्यायिक सेवा आयोग की व्यवस्था

दक्षिण अफ्रीका के संविधान की धारा 178 के अंतर्गत न्यायिक सेवा आयोग (जेएससी) की स्थापना की गई है। यह एक संवैधानिक निकाय है जिसमें लगभग 23 सदस्य होते हैं। इसकी संरचना में शामिल हैं:

  • मुख्य न्यायाधीश, जो बैठकों की अध्यक्षता करते हैं
  • अपील न्यायालय के अध्यक्ष और एक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का प्रतिनिधि
  • न्याय मंत्रालय का प्रभारी कैबिनेट सदस्य
  • दो व्यवसायरत अधिवक्ता और दो अटॉर्नी
  • विधि का एक प्रोफेसर
  • नेशनल असेंबली द्वारा नामित सदस्य, जिनमें विपक्षी दलों का भी प्रतिनिधित्व होता है
  • राष्ट्रपति द्वारा नामित कुछ सदस्य

इस प्रकार आयोग में न्यायपालिका, विधि व्यवसाय, शिक्षा जगत और राजनीतिक दलों, सभी का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है। यह ढांचा इस विचार पर आधारित है कि न्यायपालिका सार्वजनिक कार्य करती है, अतः उसकी नियुक्ति प्रक्रिया में समाज के विविध वर्गों की भागीदारी होनी चाहिए।

नियुक्ति प्रक्रिया में सार्वजनिक भागीदारी

दक्षिण अफ्रीका की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है:

  • रिक्त पद की सार्वजनिक सूचना जारी की जाती है और नामांकन आमंत्रित किए जाते हैं।
  • उम्मीदवारों की सूची तैयार कर उन्हें साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है।
  • साक्षात्कार पूर्णतः खुले होते हैं और रेडियो तथा टेलीविजन पर सीधा प्रसारण किया जाता है।
  • जनता तथा पेशेवर संगठनों से उम्मीदवारों की उपयुक्तता पर टिप्पणियां आमंत्रित की जाती हैं।
  • साक्षात्कार के बाद आयोग निजी रूप से विचार-विमर्श करता है, और यदि सहमति न बने तो मतदान होता है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में केवल एक ही तत्व गोपनीय रखा जाता है, अर्थात किस सदस्य ने किस उम्मीदवार के पक्ष या विपक्ष में मत दिया। शेष सारी प्रक्रिया जनता के सामने होती है। साक्षात्कार के दौरान उम्मीदवारों से उनकी जीवनशैली, पूर्व में व्यक्त किए गए विचार, यदि वे अधिवक्ता रहे हैं तो उनके तर्कों की गुणवत्ता, और उनकी निष्पक्षता तथा स्वतंत्रता के संबंध में गहन प्रश्न पूछे जाते हैं। कई बार इस कठोर जांच में कोई उम्मीदवार अनुपयुक्त पाया जाता है, चाहे उसकी योग्यता कागज़ पर कितनी भी अच्छी दिखे।

न्यायाधीशों के विरुद्ध कदाचार की शिकायतों की जांच

  • दक्षिण अफ्रीका में न्यायाधीशों को किसी विशेष उन्मुक्ति का लाभ प्राप्त नहीं है। यदि किसी न्यायाधीश के विरुद्ध अनुचित व्यवहार की शिकायत आती है, तो न्यायिक सेवा आयोग उसकी जांच करता है, और उपयुक्त होने पर सार्वजनिक जांच का आदेश देता है।
  • ऐसी सुनवाइयां भी रेडियो और टेलीविजन पर प्रसारित होती हैं। इस व्यवस्था का एक वास्तविक और सुपरिचित उदाहरण न्यायाधीश जॉन ह्लोफे का मामला है, जो वेस्टर्न केप उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे। उन पर संवैधानिक न्यायालय के न्यायाधीशों को जैकब जुमा से संबंधित एक मामले में प्रभावित करने का प्रयास करने का आरोप था।
  • लंबी न्यायिक लड़ाई के बाद वर्ष 2021 में न्यायिक कदाचार अधिकरण ने उन्हें गंभीर कदाचार का दोषी पाया, और फरवरी 2024 में संसद ने उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव पारित किया।
  • यह स्वतंत्र दक्षिण अफ्रीका के इतिहास में किसी न्यायाधीश का पहला महाभियोग था। यह उदाहरण दर्शाता है कि जांच अत्यंत धीमी हो सकती है, परंतु प्रक्रिया अंततः खुली और जनता के प्रति उत्तरदायी बनी रहती है।

दो व्यवस्थाओं की तुलना से उभरते चार प्रमुख प्रश्न

भारत और दक्षिण अफ्रीका की व्यवस्थाओं की तुलना से लेखक चार बुनियादी प्रश्न उठाते हैं, जो उपसी के विद्यार्थियों के लिए वैचारिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं।

पहला प्रश्न, पारदर्शिता बनाम गोपनीयता

  • क्या नियुक्ति और अनुशासनात्मक प्रक्रिया को पूर्णतः खुला रखा जाना चाहिए, या गोपनीयता में ही संस्था की गरिमा सुरक्षित रहती है।
  • लेखक का तर्क है कि पारदर्शी प्रक्रिया ही जनता के मन में न्यायपालिका के प्रति विश्वास उत्पन्न कर सकती है, और यही विश्वास उस अखंडता का आधार है जिसकी रक्षा के नाम पर भारत में गोपनीयता को उचित ठहराया जाता है।
  • यदि प्रक्रिया गुप्त रहेगी तो जनता को यह जानने का अवसर ही नहीं मिलेगा कि निर्णय किस आधार पर लिया गया, और इससे संदेह तथा अफवाहों को बढ़ावा मिलता है, जैसा कि अरविंद मल्होत्रा प्रकरण में देखा गया।

दूसरा प्रश्न, नियुक्ति करने वाली संस्था की संरचना

  • क्या नियुक्ति प्राधिकरण को समाज का व्यापक प्रतिनिधित्व करना चाहिए, जिसमें राजनीतिक दल, विधि व्यवसाय और न्यायपालिका सभी शामिल हों।
  • भारत की कॉलेजियम व्यवस्था में केवल वरिष्ठतम न्यायाधीश ही निर्णय लेते हैं, जबकि दक्षिण अफ्रीका में विविध हितधारकों की भागीदारी है।
  • लेखक का विचार है कि जब न्यायाधीश एक सार्वजनिक कार्य करते हैं, तो उनकी नियुक्ति में समाज के विभिन्न वर्गों का विश्वास भी आवश्यक है, और यह विश्वास केवल न्यायपालिका के आत्म-चयन से नहीं आ सकता।

तीसरा प्रश्न, अनुशासनात्मक कार्यवाही खुली हो या गुप्त

क्या किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध शिकायत की जांच खुली सुनवाई में होनी चाहिए, या पूर्णतः गुप्त रखी जानी चाहिए?

  • भारत में इस उद्देश्य के लिए 1997 का इन-हाउस प्रक्रिया तंत्र प्रचलित है, जो के वीरस्वामी मामले से विकसित हुआ था, और यह पूर्णतः गोपनीय होता है।
  • महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया अनुच्छेद 124(4) और 218 के अंतर्गत है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है।
  • न्यायमूर्ति वी रामास्वामी, न्यायमूर्ति सौमित्र सेन और न्यायमूर्ति पी डी दिनाकरण जैसे मामलों में यह देखा गया है कि यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल और राजनीतिक रूप से कठिन है।
  • लेखक स्पष्ट रूप से दक्षिण अफ्रीका के संवैधानिक प्रावधान को प्राथमिकता देते हैं, जो सार्वजनिक जांच को सामान्य नियम मानता है।

चौथा प्रश्न, समाधान का मार्ग

अंतिम प्रश्न यह है कि इस समस्या को किस प्रकार सुधारा जाए?

  • लेखक के अनुसार इसका समाधान किसी एकतरफा निर्णय में नहीं, बल्कि खुली और निष्पक्ष सार्वजनिक बहस में है।
  • अधिवक्ताओं, राजनेताओं, विधि शिक्षाविदों और न्यायपालिका को स्वयं इस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से विचार-विमर्श करना चाहिए।
  • यह मार्ग आसान नहीं होगा, परंतु एक सच्चे लोकतांत्रिक समाज के लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने वाला यह वैचारिक संघर्ष अनिवार्य है।

निष्कर्ष

यह तुलनात्मक अध्ययन उपसी के विद्यार्थियों के लिए विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह भारत की न्यायिक नियुक्ति प्रणाली की सीमाओं को एक व्यावहारिक वैश्विक उदाहरण के प्रकाश में समझने का अवसर देता है। दक्षिण अफ्रीका का अनुभव यह दर्शाता है कि पारदर्शिता और स्वतंत्रता परस्पर विरोधी नहीं, अपितु एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। भारत में एनजेएसी के प्रयोग की असफलता के बाद यह प्रश्न अब भी अनुत्तरित है कि कॉलेजियम प्रणाली में सुधार किस दिशा में हो। न्यायिक उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करना ही आने वाले समय में भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बना रहेगा।


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