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जम्मू और कश्मीर राज्य का दर्जा (Statehood) प्राप्त करने की जटिल चुनौती

Jammu and Kashmir the elusive quest for Statehood (Seven years on, J&K still awaits restored Statehood and accountable governance)

अगस्त 2019 में जम्मू और कश्मीर (J&K) में हुए संवैधानिक एवं राजनीतिक परिवर्तन ने उसके संवैधानिक और राजनीतिक ढाँचे को मूल रूप से बदल दिया। अनुच्छेद 370 में परिवर्तन तथा राज्य का दर्जा (Statehood) समाप्त करने के साथ व्यापक स्तर पर सुरक्षा बलों की तैनाती, राजनीतिक नेताओं की हिरासत, कर्फ्यू तथा संचार प्रतिबंध लगाए गए। इन उपायों को हिंसा समाप्त करने और विकास को गति देने के लिए अस्थायी कदम बताया गया था।

सात वर्ष बाद भी जारी हिंसा, आर्थिक चुनौतियाँ तथा सीमित लोकतांत्रिक जवाबदेही यह प्रश्न उठाती हैं कि क्या केवल सुरक्षा-केंद्रित (Security-Centric) दृष्टिकोण दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ हो सकता है।

2019 का परिवर्तन और उसके परिणाम (The 2019 Transformation and Its Consequences)

  • 2019 के निर्णयों के तहत व्यापक सुरक्षा लॉकडाउन लागू किया गया, जिसमें राजनीतिक नेताओं की हिरासत, संचार पर प्रतिबंध तथा कर्फ्यू शामिल थे।
  • यद्यपि इन्हें अस्थायी आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन इनमें से अनेक प्रतिबंध लंबे समय तक जारी रहे।
  • हिंसा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई, बल्कि उन क्षेत्रों तक फैल गई जो पहले उग्रवाद से अपेक्षाकृत कम प्रभावित थे।
  • यह दर्शाता है कि केवल सुरक्षा अभियान (Security Operations) संघर्ष के राजनीतिक और सामाजिक कारणों का समाधान नहीं कर सकते।

राजनीतिक सुलह के बिना सुरक्षा अधूरी (Security Without Political Reconciliation)

  • जम्मू और कश्मीर का अनुभव अत्यधिक बल-प्रयोग (Excessive Coercion) की सीमाओं को स्पष्ट करता है।
  • आतंकवाद के प्रति जनता की अस्वीकृति तथा शांति के समर्थन में प्रदर्शनों ने शांति-निर्माण (Peacebuilding) और विश्वास-निर्माण (Confidence-Building) के अवसर प्रदान किए हैं।
  • ऐसे अवसरों पर सुरक्षा उपायों के साथ-साथ राजनीतिक संवाद भी आवश्यक है।
  • निवारक हिरासत (Preventive Detention), कर्फ्यू, पूछताछ तथा संचार प्रतिबंधों पर अत्यधिक निर्भरता लोगों में अलगाव (Alienation) और अविश्वास (Distrust) को बढ़ा सकती है।
  • इसलिए एक प्रभावी आतंकवाद-रोधी रणनीति (Counter-Terrorism Strategy) में खुफिया-आधारित अभियान (Intelligence-Led Operations), राजनीतिक संवाद, पुनर्वास (Rehabilitation), रोजगार सृजन तथा नागरिक स्वतंत्रताओं (Civil Liberties) की सुरक्षा का संतुलित समावेश होना चाहिए।

आर्थिक विकास : अधूरा लाभांश (Economic Development: The Missing Dividend)

  • 2019 के परिवर्तनों का एक प्रमुख उद्देश्य आर्थिक परिवर्तन (Economic Transformation) था।
  • फिर भी जम्मू और कश्मीर आज भी गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है।
  • राष्ट्रीय औसत की तुलना में इसकी प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) में गिरावट आई है, जबकि विशेष रूप से स्नातक युवाओं में बेरोजगारी (Unemployment) उच्च बनी हुई है।
  • सतत विकास (Sustainable Development) के लिए निजी निवेश, पर्यटन, औद्योगिक विविधीकरण (Industrial Diversification), मानव पूंजी विकास (Human Capital Development) तथा युवाओं के रोजगार को बढ़ावा देना आवश्यक है।
  • केवल आधारभूत संरचना (Infrastructure) का विस्तार समावेशी समृद्धि (Inclusive Prosperity) सुनिश्चित नहीं कर सकता।
  • आर्थिक अवसर सामाजिक असंतोष को कम करने और दीर्घकालिक स्थिरता को मजबूत करने के लिए भी आवश्यक हैं।

संवैधानिकता और संघवाद (Constitutionalism and Federalism)

  • जम्मू और कश्मीर का परिवर्तन संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality), संघवाद (Federalism) तथा लोकतांत्रिक सहमति (Democratic Consent) से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
  • इसके संवैधानिक दर्जे में परिवर्तन तथा राज्य से संघ शासित प्रदेश (Union Territory) में रूपांतरण ने केंद्र और एक संघीय इकाई (Constituent State) के बीच संबंधों को मूल रूप से बदल दिया।
  • यह केवल जम्मू और कश्मीर का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारत की संघीय व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, संस्थागत संतुलन (Institutional Checks) तथा संवैधानिक संयम (Constitutional Restraint) पर आधारित है।
  • संवैधानिक परिणामों (Constitutional Outcomes) जितनी ही महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रक्रियाएँ (Constitutional Processes) भी हैं।
  • असाधारण सरकारी उपायों की संवैधानिक वैधता तथा अनुपातिकता (Proportionality) सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा (Judicial Scrutiny) आवश्यक है।

राज्य का दर्जा और जवाबदेही का अभाव (The Statehood and Accountability Deficit)

  • चुनावों की पुनर्बहाली लोकतांत्रिक सामान्यीकरण (Democratic Normalisation) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थी, किंतु केवल चुनाव पर्याप्त नहीं हैं।
  • लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व तभी प्रभावी होता है जब निर्वाचित सरकार के पास वास्तविक संस्थागत अधिकार (Meaningful Institutional Authority) हों।
  • वर्तमान व्यवस्था में पर्याप्त शक्तियाँ उप-राज्यपाल (Lieutenant-Governor) के पास केंद्रित हैं, जिससे जवाबदेही का अभाव (Accountability Deficit) उत्पन्न होता है क्योंकि नियुक्त प्राधिकारी अंततः केंद्र सरकार के प्रति उत्तरदायी होता है, न कि सीधे मतदाताओं के प्रति।
  • इस प्रकार पर्याप्त अधिकारों के बिना चुनाव, जवाबदेही रहित प्रतिनिधित्व (Representation Without Accountability) का कारण बन सकते हैं।
  • लोकतांत्रिक वैधता (Democratic Legitimacy) की पुनर्स्थापना के लिए निर्वाचित सरकार को अधिक अधिकार देना आवश्यक है।

सुलह की आधारशिला के रूप में लोकतंत्र (Democracy as the Foundation of Reconciliation)

  • राज्य का दर्जा बहाल करना केवल प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सुलह (Democratic Reconciliation) और विश्वास-निर्माण का माध्यम माना जाना चाहिए।
  • सशक्त निर्वाचित सरकार राजनीतिक संवाद को प्रोत्साहित कर सकती है, विधायी निगरानी (Legislative Oversight) को मजबूत बना सकती है, नागरिक सहभागिता (Civic Participation) बढ़ा सकती है तथा सार्वजनिक जवाबदेही (Public Accountability) को बेहतर बना सकती है।
  • लोकतांत्रिक संस्थाएँ अकेले आतंकवाद समाप्त नहीं कर सकतीं, किंतु वे शिकायतों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए संस्थागत मंच उपलब्ध कराती हैं तथा अलगाव और उग्रवाद (Radicalisation) के लिए उपलब्ध राजनीतिक अवसरों को सीमित करती हैं।

नकारात्मक उदाहरणों से सकारात्मक उदाहरणों की ओर (From Negative Firsts to Positive Firsts)

जम्मू और कश्मीर ने कई विवादास्पद घटनाओं का अनुभव किया है, जैसे

  • पेलेट गन (Pellet Guns) का व्यापक उपयोग।
  • विशेष दर्जे (Special Status) और राज्य के दर्जे (Statehood) का समाप्त होना।
  • लंबे समय तक प्रतिबंध।
  • विवादास्पद राजनीतिक परिवर्तन।

इसके विपरीत यह क्षेत्र सकारात्मक लोकतांत्रिक परिवर्तन (Positive Democratic Transformation) का उदाहरण भी बन सकता है।

हाल के चुनावों तथा बहुलतावादी (Pluralist) राजनीतिक दलों की सक्रिय भागीदारी ने लोकतांत्रिक आकांक्षाओं (Democratic Aspirations) की दृढ़ता को प्रदर्शित किया है।

राज्य का दर्जा बहाल कर इस लोकतांत्रिक क्षमता को मजबूत संस्थाओं और जवाबदेह शासन में परिवर्तित किया जा सकता है।

Way Forward (आगे की राह)

  • राज्य का दर्जा (Statehood) बहाल कर निर्वाचित सरकार को अधिक अधिकार दिए जाएँ।
  • लक्षित (Targeted), अनुपातिक (Proportionate) तथा जवाबदेह सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाएँ।
  • विधिक प्रक्रिया (Due Process) की रक्षा करते हुए अनावश्यक संचार प्रतिबंधों को न्यूनतम रखा जाए।
  • निर्वाचित प्रतिनिधियों तथा नागरिक समाज (Civil Society) के साथ राजनीतिक संवाद और सुलह को बढ़ावा दिया जाए।
  • निवेश, पर्यटन, उद्यमिता (Entrepreneurship) तथा कौशल विकास (Skill Development) के माध्यम से युवाओं के रोजगार को बढ़ाया जाए।
  • न्यायपालिका, विधायिका तथा मीडिया सहित स्वतंत्र संस्थाओं को सशक्त बनाया जाए।
  • आतंकवाद-रोधी नीति को संवैधानिक अधिकारों तथा मानवीय गरिमा (Human Dignity) के अनुरूप रखा जाए।
  • पारदर्शी (Transparent) तथा सहभागी (Participatory) शासन के माध्यम से जनता का विश्वास मजबूत किया जाए।

Conclusion (निष्कर्ष)

जम्मू और कश्मीर की सबसे बड़ी चुनौती केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि वैध (Legitimate), जवाबदेह (Accountable) और स्थायी शांति (Durable Peace) स्थापित करना है। आतंकवाद से निपटने के लिए सुरक्षा आवश्यक है, किंतु राजनीतिक वैधता के बिना सुरक्षा उपाय दीर्घकाल में प्रतिकूल सिद्ध हो सकते हैं। इसी प्रकार लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के बिना विकास भी अलगाव की भावना को पूर्णतः समाप्त नहीं कर सकता। राज्य का दर्जा बहाल करना विश्वास-निर्माण (Confidence-Building) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

संवैधानिक संस्थाओं द्वारा समर्थित एक सशक्त निर्वाचित सरकार यह प्रदर्शित कर सकती है कि राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) सबसे अधिक मजबूत तब होता है जब सुरक्षा, विकास, संघवाद और लोकतंत्र एक-दूसरे को सुदृढ़ करें।


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