in , , , ,

केनेथ वॉल्ट्ज और जॉन जे. मियरशाइमर

Kenneth Waltz and John J. Mearsheimer’s Theory of Balance of Power

शक्ति संतुलन (Balance of Power) अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणाओं में से एक है। इसका मूल प्रश्न यह है कि जब अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई सर्वोच्च विश्व सरकार नहीं होती, तब राज्य अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को कैसे सुनिश्चित करते हैं तथा किसी एक शक्तिशाली राज्य को पूरे अंतरराष्ट्रीय तंत्र पर प्रभुत्व स्थापित करने से कैसे रोकते हैं।

शक्ति संतुलन की अवधारणा का विकास शास्त्रीय यथार्थवाद (Classical Realism) से लेकर संरचनात्मक यथार्थवाद (Structural Realism) और आक्रामक यथार्थवाद (Offensive Realism) तक हुआ है। हांस मॉर्गेंथाउ (Hans Morgenthau) ने इसे शक्ति राजनीति और राष्ट्रीय हित के संदर्भ में समझाया, जबकि केनेथ वॉल्ट्ज (Kenneth Waltz) ने इसे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना और अराजकता से जोड़कर अधिक व्यवस्थित सिद्धांत के रूप में विकसित किया। इसके बाद जॉन जे. मियरशाइमर (John J. Mearsheimer) ने आक्रामक यथार्थवाद के माध्यम से तर्क दिया कि महान शक्तियाँ केवल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि अवसर मिलने पर अपनी सापेक्ष शक्ति (Relative Power) को अधिकतम करने और क्षेत्रीय वर्चस्व (Regional Hegemony) प्राप्त करने का प्रयास करती हैं।

इस प्रकार वॉल्ट्ज और मियरशाइमर के बीच सबसे महत्वपूर्ण अंतर यह है कि वॉल्ट्ज के लिए राज्य मुख्यतः अस्तित्व और सुरक्षा चाहते हैं, जबकि मियरशाइमर के लिए महान शक्तियाँ अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए शक्ति अधिकतमीकरण की ओर भी बढ़ती हैं।

शक्ति संतुलन का मूल अर्थ

  • शक्ति संतुलन का सामान्य अर्थ ऐसी अंतरराष्ट्रीय स्थिति से है जिसमें किसी एक राज्य या शक्ति समूह के पास इतनी अधिक शक्ति न हो कि वह अन्य राज्यों को अपनी इच्छा के अनुसार नियंत्रित कर सके।
  • यदि किसी राज्य की शक्ति तेजी से बढ़ती है, तो अन्य राज्य उसके विरुद्ध संतुलनकारी व्यवहार (Balancing) कर सकते हैं। वे अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं, गठबंधन बना सकते हैं या किसी अन्य शक्तिशाली राज्य के साथ रणनीतिक साझेदारी स्थापित कर सकते हैं।
  • इस प्रकार शक्ति संतुलन का मूल उद्देश्य केवल शक्ति का समान वितरण करना नहीं है। इसका व्यापक उद्देश्य प्रभुत्व को रोकना और राज्य के अस्तित्व को सुरक्षित करना है।

शक्ति संतुलन और सुरक्षा

  • यथार्थवादी दृष्टिकोण के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक (Anarchic) है। यहाँ अराजकता का अर्थ अव्यवस्था या पूर्ण अराजक स्थिति नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था से है जिसमें राज्यों के ऊपर कोई सर्वोच्च राजनीतिक प्राधिकरण नहीं है जो उनकी सुरक्षा की अंतिम गारंटी दे सके।
  • इस स्थिति में प्रत्येक राज्य को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं प्रयास करना पड़ता है।
  • इसी कारण राज्य सैन्य क्षमता विकसित करते हैं, गठबंधन बनाते हैं, रणनीतिक साझेदारियाँ करते हैं, अपने विरोधियों की क्षमताओं पर निगरानी रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर संतुलनकारी व्यवहार करते हैं।
  • इससे स्पष्ट होता है कि शक्ति संतुलन का मूल संबंध सुरक्षा दुविधा (Security Dilemma), स्वसहायता (Self Help) और अस्तित्व (Survival) से है।

केनेथ वॉल्ट्ज और शक्ति संतुलन

केनेथ वॉल्ट्ज (Kenneth Waltz) ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक अंतरराष्ट्रीय राजनीति का सिद्धांत (Theory of International Politics) के माध्यम से नव यथार्थवाद (Neorealism) या संरचनात्मक यथार्थवाद (Structural Realism) को व्यवस्थित रूप दिया।

वॉल्ट्ज ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए मानव स्वभाव की तुलना में अंतरराष्ट्रीय संरचना (International Structure) को अधिक महत्व दिया।

उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की तीन प्रमुख विशेषताएँ हैं:

  1. पहली, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई केंद्रीय प्राधिकरण नहीं है, इसलिए यह अराजक (Anarchic) है।
  2. दूसरी, राज्य कार्यात्मक दृष्टि से व्यापक रूप से समान हैं, क्योंकि प्रत्येक राज्य को अस्तित्व, सुरक्षा और बुनियादी राजनीतिक कार्यों को सुनिश्चित करना होता है।
  3. तीसरी, राज्यों के बीच मुख्य अंतर उनकी क्षमताओं के वितरण (Distribution of Capabilities) में होता है।

इस प्रकार वॉल्ट्ज के लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने का केंद्रीय प्रश्न यह है कि व्यवस्था में क्षमताएँ किस प्रकार वितरित हैं।

वॉल्ट्ज का संरचनात्मक यथार्थवाद

  • वॉल्ट्ज शास्त्रीय यथार्थवाद से अलग होकर यह प्रश्न पूछते हैं कि यदि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राज्य बार-बार समान प्रकार के संतुलनकारी व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं, तो इसका कारण केवल मानव स्वभाव कैसे हो सकता है?
  • उनके अनुसार इसका उत्तर अंतरराष्ट्रीय संरचना में है।
  • यदि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक है और प्रत्येक राज्य अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं जिम्मेदार है, तो राज्यों को दूसरे राज्यों की क्षमताओं पर लगातार ध्यान देना पड़ेगा।
  • यदि कोई राज्य अत्यधिक शक्तिशाली हो जाता है, तो अन्य राज्य उसकी शक्ति को संतुलित करने का प्रयास कर सकते हैं।
  • इसलिए वॉल्ट्ज के लिए शक्ति संतुलन किसी एक राज्य की व्यक्तिगत इच्छा का परिणाम मात्र नहीं है। यह व्यवस्थागत दबाव (Systemic Pressure) का परिणाम है।

वॉल्ट्ज की स्वसहायता व्यवस्था

वॉल्ट्ज के सिद्धांत में स्वसहायता (Self Help) अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कोई विश्व सरकार राज्यों को सुरक्षा प्रदान नहीं करती। इसलिए प्रत्येक राज्य को अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं तैयारी करनी होती है।
  • यह स्व-सहायता व्यवस्था राज्यों को सैन्य क्षमताएँ बढ़ाने, गठबंधन बनाने, रणनीतिक साझेदारियाँ विकसित करने और सापेक्ष क्षमताओं पर नजर रखने के लिए प्रेरित करती है।
  • यही स्व-सहायता का वातावरण संतुलनकारी व्यवहार को जन्म देता है।
  • उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में एक राज्य की सैन्य और आर्थिक क्षमताएँ बहुत तेजी से बढ़ने लगें, तो दूसरे राज्य उसकी शक्ति को संतुलित करने के लिए अपनी क्षमताएँ बढ़ा सकते हैं या गठबंधन बना सकते हैं।

वॉल्ट्ज: संतुलनकारी व्यवहार और शक्तिशाली पक्ष के साथ जुड़ना

  • जब किसी राज्य की शक्ति बढ़ती है, तो अन्य राज्यों के पास व्यापक रूप से दो प्रकार के विकल्प हो सकते हैं।
  • वे उसके विरुद्ध संतुलनकारी व्यवहार (Balancing) कर सकते हैं या शक्तिशाली राज्य के साथ शक्तिशाली पक्ष के साथ जुड़ने (Bandwagoning) का विकल्प चुन सकते हैं।
  • संतुलनकारी व्यवहार में राज्य शक्तिशाली पक्ष के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करता है।
  • शक्तिशाली पक्ष के साथ जुड़ने में राज्य शक्तिशाली राज्य के साथ जुड़ने का विकल्प चुनता है।
  • यथार्थवादी सिद्धांत में संतुलनकारी व्यवहार को अधिक सामान्य प्रवृत्ति माना जाता है, क्योंकि राज्य शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण से खतरा महसूस कर सकते हैं।
  • हालाँकि वास्तविक दुनिया में छोटे राज्य अपने अस्तित्व और आर्थिक हितों के लिए शक्तिशाली राज्यों के साथ संरेखण भी कर सकते हैं।

वॉल्ट्ज के अनुसार शक्ति संतुलन क्यों उत्पन्न होता है?

  • वॉल्ट्ज के अनुसार शक्ति संतुलन किसी आदर्श नैतिक सिद्धांत का परिणाम नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचनात्मक परिस्थितियों से उत्पन्न होता है।
  • यदि व्यवस्था में अराजकता + स्वसहायता + असमान क्षमताएँ मौजूद हैं, तो राज्यों को अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दूसरे राज्यों की शक्ति पर ध्यान देना होगा।
  • जब कोई राज्य अत्यधिक शक्तिशाली बनने लगे, तो अन्य राज्य उसके विरुद्ध संतुलनकारी व्यवहार कर सकते हैं।
  • इस प्रकार शक्ति संतुलन एक प्रकार का व्यवस्थागत परिणाम (Systemic Outcome) है।
  • महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्यों को संतुलन बनाने के लिए किसी औपचारिक समझौते की आवश्यकता नहीं होती। व्यवस्थागत दबाव स्वयं संतुलनकारी व्यवहार को उत्पन्न कर सकते हैं।

जॉन जे. मियरशाइमर और आक्रामक यथार्थवाद

  • अब शक्ति संतुलन की दूसरी महत्वपूर्ण व्याख्या जॉन जे. मियरशाइमर (John J. Mearsheimer) के आक्रामक यथार्थवाद (Offensive Realism) से आती है।
  • मियरशाइमर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक महाशक्ति राजनीति की त्रासदी (The Tragedy of Great Power Politics) में तर्क दिया कि महान शक्तियों की सुरक्षा प्रतिस्पर्धा केवल रक्षात्मक नहीं होती।
  • उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की कुछ मूलभूत विशेषताएँ राज्यों को शक्ति संचय की ओर प्रेरित करती हैं।

मियरशाइमर के ढाँचे में पाँच धारणाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं:

  1. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अराजक है।
  2. महान शक्तियों के पास आक्रामक सैन्य क्षमताएँ होती हैं।
  3. राज्य यह सुनिश्चित नहीं कर सकते कि दूसरे राज्यों के इरादे वास्तव में शांतिपूर्ण हैं।
  4. अस्तित्व राज्यों का प्राथमिक उद्देश्य है।
  5. राज्य सापेक्ष शक्ति को लेकर रणनीतिक गणना करते हैं।

इन परिस्थितियों के कारण महान शक्तियाँ केवल सुरक्षा बनाए रखने तक सीमित नहीं रहतीं।

मियरशाइमर: शक्ति अधिकतमीकरण

  • मियरशाइमर का मुख्य तर्क यह है कि महान शक्तियाँ अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सापेक्ष शक्ति अधिकतमीकरण (Relative Power Maximisation) की ओर बढ़ती हैं।
  • यदि किसी राज्य के पास अपने प्रतिद्वंद्वी की तुलना में अधिक शक्ति है, तो उसके अस्तित्व की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं।
  • इसलिए महान शक्तियाँ केवल रक्षात्मक संतुलन नहीं करतीं। वे अवसर मिलने पर अपनी शक्ति बढ़ाने की कोशिश भी कर सकती हैं।

यहीं मियरशाइमर और वॉल्ट्ज के बीच अंतर स्पष्ट हो जाता है।

वॉल्ट्जसुरक्षा अधिकतमीकरण (Security Maximisation)

मियरशाइमरशक्ति अधिकतमीकरण (Power Maximisation)

हालाँकि मियरशाइमर भी अस्तित्व को अंतिम लक्ष्य मानते हैं। शक्ति अधिकतमीकरण उनके लिए अस्तित्व सुनिश्चित करने का रणनीतिक साधन है।

मियरशाइमर और शक्ति संतुलन

  • मियरशाइमर के अनुसार यदि कोई महान शक्ति अत्यधिक शक्तिशाली बनने लगे, तो अन्य राज्य उसके विरुद्ध संतुलनकारी व्यवहार करेंगे।
  • लेकिन महान शक्तियाँ केवल निष्क्रिय संतुलन नहीं करतीं। वे स्वयं भी शक्ति अधिकतमीकरण का प्रयास करती हैं।
  • इससे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में लगातार प्रतिस्पर्धा बनी रहती है।
  • यहाँ संतुलन एक स्थिर अवस्था नहीं बल्कि निरंतर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा (Continuous Strategic Competition) का परिणाम है।
  • इसी कारण मियरशाइमर का आक्रामक यथार्थवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति को स्वभावतः प्रतिस्पर्धात्मक मानता है।

वॉल्ट्ज बनाम मियरशाइमर

आधारकेनेथ वॉल्ट्जजॉन जे. मियरशाइमर
सिद्धांतरक्षात्मक संरचनात्मक यथार्थवादआक्रामक यथार्थवाद
मुख्य चिंताअस्तित्व और सुरक्षाअस्तित्व के लिए शक्ति अधिकतमीकरण
शक्तिआवश्यक लेकिन सीमितअधिक से अधिक सापेक्ष शक्ति का प्रयास
राज्य व्यवहाररक्षात्मक प्रवृत्तिआक्रामक प्रवृत्ति
अराजकतासुरक्षा प्रतिस्पर्धा उत्पन्न करती हैशक्ति संचय को प्रोत्साहित करती है
संतुलनकारी व्यवहारव्यवस्थागत परिणामप्रतिस्पर्धा का महत्वपूर्ण परिणाम
वर्चस्वअत्यधिक शक्ति संचय संतुलनकारी व्यवहार को जन्म देता हैमहान शक्तियाँ क्षेत्रीय वर्चस्व की ओर बढ़ सकती हैं
जोखिमअत्यधिक विस्तार संतुलनकारी व्यवहार को जन्म दे सकता हैअपर्याप्त शक्ति अस्तित्व को खतरे में डाल सकती है
प्रमुख अवधारणाशक्ति संतुलनशक्ति अधिकतमीकरण

शक्ति संतुलन और प्रतिरोध

  • शक्ति संतुलन का संबंध प्रतिरोध (Deterrence) से भी गहरा है।
  • यदि किसी राज्य के पास विश्वसनीय सैन्य क्षमता है, तो वह दूसरे राज्य को आक्रामकता से रोक सकता है।
  • परमाणु हथियारों ने प्रतिरोध को और अधिक जटिल बना दिया है, क्योंकि परमाणु शक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध की लागत अत्यंत अधिक हो सकती है।
  • इसलिए परमाणु संतुलन कई परिस्थितियों में रणनीतिक स्थिरता पैदा कर सकता है।
  • लेकिन परमाणु प्रतिरोध के बावजूद पारंपरिक संघर्ष, परोक्ष संघर्ष, साइबर प्रतिस्पर्धा और ग्रेज़ोन रणनीतियाँ (Grey-Zone Strategies) जारी रह सकती हैं।

इसलिए शक्ति संतुलन को केवल परमाणु हथियारों के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है।

वॉल्ट्ज की आलोचना

  • वॉल्ट्ज के सिद्धांत की आलोचना मुख्यतः इस आधार पर की गई है कि उनका संरचनात्मक दृष्टिकोण राज्यों की घरेलू राजनीति और विदेश नीति के अंतर को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
  • यदि अंतरराष्ट्रीय संरचना सभी राज्यों पर समान व्यवस्थागत दबाव डालती है, तो अलग-अलग राज्य समान परिस्थितियों में अलग-अलग विदेश नीतियाँ क्यों अपनाते हैं? यह प्रश्न नव यथार्थवाद के लिए चुनौती बनता है।

इसके अलावा संस्थाओं, मानदंडों, आर्थिक परस्पर निर्भरता और घरेलू राजनीतिक संरचनाओं को केवल द्वितीयक चर मानना उदारवादी और रचनावादी विद्वानों को पर्याप्त नहीं लगता।

मियरशाइमर की आलोचना

  • मियरशाइमर के आक्रामक यथार्थवाद की आलोचना यह कहकर की जाती है कि सभी महान शक्तियाँ हमेशा अधिकतम शक्ति की तलाश नहीं करतीं।
  • कई बार राज्य सुरक्षा को पर्याप्त मानकर सहयोग, आर्थिक एकीकरण और संस्थागत व्यवस्थाओं को प्राथमिकता देते हैं।
  • यूरोपीय संघ (European Union) इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जहाँ ऐतिहासिक प्रतिद्वंद्वियों ने संस्थागत सहयोग और आर्थिक परस्पर निर्भरता के माध्यम से सुरक्षा प्रतिस्पर्धा को काफी हद तक नियंत्रित किया।
  • मियरशाइमर के आलोचक यह भी कहते हैं कि उनका सिद्धांत संस्थाओं और घरेलू राजनीतिक कारकों की स्वतंत्र भूमिका को कम करके देखता है।

निष्कर्ष

शक्ति संतुलन का सिद्धांत (Balance of Power Theory) अंतरराष्ट्रीय संबंधों में यह समझने का प्रयास करता है कि अराजक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में राज्य अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को कैसे सुरक्षित करते हैं तथा किसी एक शक्ति को अत्यधिक प्रभुत्वशाली बनने से कैसे रोकते हैं।

केनेथ वॉल्ट्ज (Kenneth Waltz) ने शक्ति संतुलन को संरचनात्मक यथार्थवाद के आधार पर समझाया। उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय अराजकता, स्व-सहायता और क्षमताओं का असमान वितरण राज्यों को संतुलनकारी व्यवहार के लिए प्रेरित करते हैं। राज्यों का प्राथमिक उद्देश्य अस्तित्व है और वे आवश्यक सुरक्षा प्राप्त करने के लिए पर्याप्त शक्ति बनाए रखने का प्रयास करते हैं।

इसके विपरीत जॉन जे. मियरशाइमर (John J. Mearsheimer) का आक्रामक यथार्थवाद अधिक निराशावादी और शक्ति-केंद्रित है। उनके अनुसार महान शक्तियाँ अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केवल रक्षात्मक संतुलन नहीं करतीं, बल्कि अवसर मिलने पर अपनी सापेक्ष शक्ति को अधिकतम करने का प्रयास करती हैं। उनका अंतिम रणनीतिक उद्देश्य कई परिस्थितियों में क्षेत्रीय वर्चस्व (Regional Hegemony) प्राप्त करना हो सकता है।

Related MCQ

प्रश्न 1: केनेथ वॉल्ट्ज (Kenneth Waltz) के अनुसार शक्ति संतुलन के उत्पन्न होने का प्रमुख कारण क्या है?

  1. राज्यों की नैतिक चेतना
    B. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अराजक संरचना और स्व-सहायता
    C. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का प्रभाव
    D. लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था

उत्तर: B. अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अराजक संरचना और स्वसहायता

प्रश्न 2: निम्नलिखित में से किस विद्वान ने शक्ति संतुलन को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की संरचना और अराजकता से जोड़ा?

  1. हांस मॉर्गेंथाउ
    B. जॉन लॉक
    C. केनेथ वॉल्ट्ज
    D. रॉबर्ट कीओहेन

उत्तर: C. केनेथ वॉल्ट्ज

प्रश्न 3: जॉन जे. मियरशाइमर (John J. Mearsheimer) के आक्रामक यथार्थवाद के अनुसार महान शक्तियाँ मुख्यतः किसकी ओर प्रवृत्त होती हैं?

  1. केवल अंतरराष्ट्रीय सहयोग
    B. केवल आर्थिक विकास
    C. सापेक्ष शक्ति के अधिकतमीकरण की ओर
    D. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करने की ओर

उत्तर: C. सापेक्ष शक्ति के अधिकतमीकरण की ओर

प्रश्न 4: केनेथ वॉल्ट्ज और जॉन जे. मियरशाइमर के सिद्धांतों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौनसा युग्म सही है?

  1. वॉल्ट्ज: शक्ति अधिकतमीकरण, मियरशाइमर: सुरक्षा अधिकतमीकरण
    B. वॉल्ट्ज: सुरक्षा अधिकतमीकरण, मियरशाइमर: शक्ति अधिकतमीकरण
    C. वॉल्ट्ज: उदारवाद, मियरशाइमर: रचनावाद
    D. वॉल्ट्ज: लोकतांत्रिक शांति, मियरशाइमर: संस्थागतवाद

उत्तर: B. वॉल्ट्ज: सुरक्षा अधिकतमीकरण, मियरशाइमर: शक्ति अधिकतमीकरण

प्रश्न 5: मियरशाइमर के अनुसार महान शक्तियों का संभावित अंतिम रणनीतिक उद्देश्य क्या हो सकता है?

  1. वैश्विक लोकतंत्र की स्थापना
    B. क्षेत्रीय वर्चस्व प्राप्त करना
    C. अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का विस्तार
    D. पूर्ण निरस्त्रीकरण

उत्तर: B. क्षेत्रीय वर्चस्व प्राप्त करना


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

80वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री का संबोधन के विभिन्न आयाम