हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने दिल्ली स्थित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के तेरहवें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि आखिर संविधान में दी गई वह व्यवस्था, जिसके तहत किसी “विशिष्ट न्यायविद” (डिस्टिंग्विश्ड जुरिस्ट) को सीधे सुप्रीम कोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है, बीते छिहत्तर वर्षों से इस्तेमाल में क्यों नहीं लाई गई। जस्टिस भुइयां ने इसे संविधान के उन “अनुपयोगी अधिदेशों” में गिनाया, जिन्हें आज तक किसी सरकार या कॉलेजियम ने सक्रिय नहीं किया।
यह प्रश्न केवल तकनीकी या ऐतिहासिक जिज्ञासा भर नहीं है। यह भारत की न्यायपालिका की संरचना, उसमें विविधता की कमी, और न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया की सीमाओं पर एक गंभीर बहस को जन्म देता है। परीक्षा की दृष्टि से यह विषय संविधान निर्माण की बहसों, न्यायपालिका के गठन और वर्तमान शासन व्यवस्था की चुनौतियों को जोड़ने वाला एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
संविधान क्या कहता है?
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124(3) में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए योग्यताएं तय की गई हैं। इस अनुच्छेद के तहत तीन रास्तों से कोई व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट का जज बन सकता है:
- वह व्यक्ति किसी हाईकोर्ट का न्यायाधीश रहा हो और कम से कम पांच वर्ष तक इस पद पर कार्य किया हो
- वह व्यक्ति किसी हाईकोर्ट में कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता के रूप में प्रैक्टिस कर चुका हो
- वह व्यक्ति राष्ट्रपति की राय में एक “विशिष्ट न्यायविद” हो
तीसरी श्रेणी ही इस पूरी बहस का केंद्र बिंदु है। संविधान इस बात को स्पष्ट नहीं करता कि “विशिष्ट न्यायविद” किसे माना जाए, न ही इसके लिए कोई न्यूनतम अनुभव या योग्यता तय की गई है। यह अस्पष्टता ही इस प्रावधान के कभी इस्तेमाल न होने का एक बड़ा कारण मानी जाती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि इस श्रेणी के तहत नियुक्ति के लिए यह आवश्यक नहीं कि व्यक्ति ने कभी वकालत की हो या न्यायिक सेवा में रहा हो, अर्थात यह प्रावधान कानूनी विद्वानों और शिक्षाविदों के लिए भी दरवाजा खोलता है।
संविधान सभा की बहसें:
- संविधान सभा में हुई बहसों से यह स्पष्ट होता है कि इस प्रावधान को जोड़ने के पीछे मंशा न्यायपालिका में पेशेवर विविधता लाना थी।
- संविधान सभा के सदस्यों का मानना था कि सुप्रीम कोर्ट में केवल पारंपरिक न्यायिक सेवा या वकालत के रास्ते से आने वाले लोग ही नहीं, बल्कि प्रतिष्ठित विधि विद्वान और शिक्षाविद भी शामिल होने चाहिए।
- 24 मई 1949 को संविधान सभा के सदस्य एच.वी. कामथ ने अनुच्छेद 103 के मसौदे में एक संशोधन पेश किया, जिसमें राष्ट्रपति को एक तीसरा विकल्प देने की बात कही गई।
- डॉ. भीमराव आंबेडकर ने इस विचार को स्वीकार तो किया, लेकिन वे इस बात को लेकर अनिश्चित थे कि “विशिष्ट” शब्द बेहतर है या “प्रख्यात” (एमिनेंट)। अंततः यह फैसला प्रारूप समिति पर छोड़ दिया गया, जिसने “विशिष्ट” शब्द को चुना। इसी बहस के परिणामस्वरूप संविधान में अनुच्छेद 124(3)(सी) जोड़ा गया।
- एक अन्य महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, संविधान सभा के सदस्य एम. अनंतशयनम अयंगर ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फेलिक्स फ्रैंकफर्टर की नियुक्ति का उदाहरण दिया, जिन्हें उन्होंने एक “नवीन प्रयोग” बताया।
- फ्रैंकफर्टर हार्वर्ड लॉ स्कूल में पच्चीस वर्षों तक प्रोफेसर रहे थे और अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट ने 1939 में उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया था। अयंगर के अनुसार यह उदाहरण दिखाता है कि कानूनी विशेषज्ञता केवल प्रैक्टिस करने वाले वकीलों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।
- इसके करीब तीन दशक बाद, संविधान सभा की बहसों में एक और संदर्भ प्रोफेसर उपेंद्र बख्शी की चर्चा से जुड़ता है। जस्टिस पी.एन. भगवती ने 1985-86 में एक अमेरिकी विश्वविद्यालय में दिए संबोधन के दौरान प्रोफेसर बख्शी को सीधे “जज बख्शी” कहकर संबोधित किया था और उन्हें सुप्रीम कोर्ट में शामिल होने का न्योता तक दिया था, लेकिन यह प्रस्ताव कभी साकार नहीं हो सका।
क्या “विशिष्ट न्यायविद” को हाईकोर्ट जज बनाया जा सकता है?
- संविधान सभा में केवल सुप्रीम कोर्ट ही नहीं, बल्कि हाईकोर्ट में भी “विशिष्ट न्यायविदों” की नियुक्ति को लेकर विचार हुआ था।
- 7 जून 1949 को प्रोफेसर शिब्बन लाल सक्सेना ने एक संशोधन प्रस्तावित किया था, जिसमें हाईकोर्ट न्यायाधीशों के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र व्यक्तियों में “विशिष्ट न्यायविदों” को भी शामिल करने की मांग की गई थी। हालांकि, यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ।
- लगभग तीन दशक बाद, आपातकाल के दौरान संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 के माध्यम से अनुच्छेद 217 में संशोधन किया गया, जिसमें हाईकोर्ट जज की योग्यताओं में एक ऐसे व्यक्ति को शामिल करने का प्रावधान जोड़ा गया, जो राष्ट्रपति की राय में “विशिष्ट न्यायविद” हो।
- यह प्रावधान जनवरी 1977 में प्रभाव में आया, लेकिन इसे बाद में संविधान (चवालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1978 के जरिए हटा दिया गया।
इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि हाईकोर्ट के स्तर पर “विशिष्ट न्यायविद” संबंधी प्रावधान को अपनाया भी गया और फिर वापस भी लिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट के स्तर पर यह प्रावधान संविधान में बना हुआ है, परंतु व्यवहार में कभी इस्तेमाल नहीं हुआ।

यह प्रावधान अब तक इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ?
इस पूरी चर्चा में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि सुप्रीम कोर्ट में अब तक की सभी नियुक्तियां भारी बहुमत से हाईकोर्ट के न्यायाधीशों में से ही हुई हैं। केवल ग्यारह वकीलों को ही सीधे बार से सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत किया गया है, लेकिन आज तक किसी भी विशुद्ध विधि शिक्षाविद या न्यायविद को इस श्रेणी के तहत नियुक्त नहीं किया गया।
नियुक्ति प्रक्रिया इस प्रावधान के निष्क्रिय रहने का एक बड़ा कारण बताई जाती है। किसी भी नाम की सिफारिश पहले सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम द्वारा की जानी आवश्यक है, तभी वह नियुक्ति प्रक्रिया में आगे बढ़ सकता है। वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े अपने लेख में इस बिंदु को विस्तार से समझाते हैं। उनके अनुसार इसके पीछे चार प्रमुख कारण हैं:
- इस मार्ग की कोई “नर्सरी” नहीं है, अर्थात अनुच्छेद 217 में हाईकोर्ट के स्तर पर ऐसा कोई प्रावधान नहीं जो न्यायविदों को परखने का अवसर दे
- नियुक्ति की कोई स्पष्ट प्रक्रिया नहीं है, न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी ज्ञापन (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर) में इस बारे में कोई मार्गदर्शन नहीं मिलता कि विद्वानों और अधिवक्ताओं में से चयन कैसे किया जाए
- गणितीय समस्या भी है, क्योंकि बार से नियुक्त किया गया कोई भी जज वरिष्ठता में लंबे समय तक बना रहता है, जिससे मुख्य न्यायाधीश पद तक पहुंचने की उसकी संभावना बढ़ती जाती है, इसलिए ऐसे किसी भी नाम को कॉलेजियम बेहद सतर्कता से परखता है
- हमारी न्यायिक संस्कृति ही अदालत कक्ष को केंद्र में रखती है, जो न्यायविदों को उनकी अपनी परंपरा से बाहर मानती है
- एक ऐसी अदालत जो एक ही परंपरा से भर्ती होती है, वह एक ही ढर्रे पर सोचती है और यह प्रश्न पूछने में धीमी होती है कि कोई नियम कहां से आया और क्या वह आज भी उतना ही उपयुक्त है।
वे विद्वान जिनकी नियुक्ति की चर्चा हुई पर नियुक्ति हो न सकी
यहां नीचे कई ऐसे विद्वानों का उल्लेख है, जिनकी संभावित नियुक्ति पर चर्चा तो हुई, लेकिन वह कभी परिणीत नहीं हो सकी:
- प्रोफेसर उपेंद्र बख्शी, जिन्हें जस्टिस भगवती ने आमंत्रित किया था
- गोपाल सुब्रमण्यम और अमिता ढांडा, जो भी इस दौड़ में पीछे रह गए
- सुधीर कृष्णस्वामी, जिन्होंने बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत पर प्रामाणिक अध्ययन लिखा
- फैज़ान मुस्तफा, जो लगभग तीन दशकों से संविधान के शिक्षक रहे हैं और दो राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के निर्माण से जुड़े रहे हैं
आयु भी इस प्रावधान के निष्क्रिय रहने का एक कारण है, क्योंकि न्यायाधीशों की सेवानिवृत्ति की आयु पैंसठ वर्ष तय है, इसलिए कॉलेजियम स्वाभाविक रूप से युवा उम्मीदवारों को प्राथमिकता देता है, जबकि विद्वता अक्सर बाद की उम्र में परिपक्व होती है।
दुनिया के अन्य उदाहरण
- अमेरिका के संदर्भ में फेलिक्स फ्रैंकफर्टर के अलावा विलियम ओ. डगलस का उदाहरण भी दिया जाता है, जो येल विश्वविद्यालय से आए और अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले न्यायाधीश बने।
- ब्रिटेन में भी लॉर्ड बरोज़ 2020 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की एक अकादमिक कुर्सी से सीधे यूके सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, बीस वर्षों तक अंशकालिक न्यायाधीश रहने के बाद।
- यह उदाहरण दिखाते हैं कि विकसित लोकतंत्रों में यह मार्ग असामान्य नहीं है, बल्कि संस्थागत रूप से स्वीकृत परंपरा का हिस्सा है।
इस विषय पर सभी विद्वान एकमत नहीं हैं। एक तर्क यह भी है कि पूर्णकालिक विधि शिक्षकों में उन प्रतिबंधों के चलते व्यावहारिक अनुभव की कमी रह सकती है, जो उन्हें प्रैक्टिस करने से रोकते हैं। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियम संख्या 49 के अंतर्गत, कोई भी अधिवक्ता जो पूर्णकालिक वेतनभोगी नौकरी में चला जाता है, उसे प्रैक्टिस करना बंद करना पड़ता है, जब तक वह इस नौकरी में बना रहता है। 2019 में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज के एक संघ ने इस प्रतिबंध में छूट देने की मांग उठाई थी, ताकि पूर्णकालिक शिक्षाविद भी अदालतों में उपस्थित हो सकें और किताबी ज्ञान तथा व्यावहारिक कानून के बीच की खाई को पाट सकें।
एक अन्य चिंता यह है कि कानूनी शिक्षाविदों में अदालत कक्ष का अनुभव और प्रक्रियागत समझ की कमी हो सकती है। इस विषय पर प्रोफेसर उपेंद्र बख्शी ने 2015 में लाइवलॉ को दिए एक साक्षात्कार में इस संभावित नियुक्ति को “मृत मुद्दा” तक करार दिया था।
संवैधानिक इतिहास से जुड़े अन्य दिलचस्प उदाहरण
भारत की न्यायिक नियुक्ति परंपरा के कुछ ऐतिहासिक उदाहरण भी हैं, जो इस बात को रेखांकित करते हैं कि किस तरह से योग्यता और वरिष्ठता के मानदंड समय के साथ बदलते रहे हैं:
- एस.एम. सिकरी 1964 में सीधे पंजाब के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) पद से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे
- सुबिमल चंद्र रॉय और कुलदीप सिंह जैसे न्यायाधीश भी बार से ही ऊंचाई पर पहुंचे
- वी.आर. कृष्ण अय्यर केरल हाईकोर्ट से केवल तीन वर्ष सेवा देकर विधि आयोग होते हुए 1973 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे
ये उदाहरण दिखाते हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया में कठोरता के बजाय समय समय पर लचीलापन भी अपनाया गया है, बशर्ते संबंधित व्यक्ति की योग्यता असंदिग्ध रही हो।
बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत और वर्तमान संदर्भ
इस वर्ष बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत के इक्यावन वर्ष पूरे हुए हैं। इस सिद्धांत के गहन अध्येता माने जाने वाले विद्वान, जैसे अपर्णा चंद्रा, अनुप सुरेंद्रनाथ और तरुणाभ खेतान, अभी अपेक्षाकृत युवा हैं और भविष्य में उनकी बारी आ सकती है। यह इस बात का संकेत है कि यह बहस केवल ऐतिहासिक नहीं, बल्कि निरंतर प्रासंगिक बनी हुई है।
निष्कर्ष: संविधान की अनदेखी संभावनाएं
यह पूरा प्रकरण भारतीय संविधान की उन संभावनाओं को उजागर करता है, जो कागज पर तो मौजूद हैं, परंतु व्यवहार में अब तक साकार नहीं हो सकीं। जस्टिस भुइयां का बयान इस बात की ओर इशारा करता है कि न्यायपालिका को अपनी संरचनात्मक विविधता पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। एक ओर जहां हाईकोर्ट के अनुभवी न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता न्यायपालिका की रीढ़ बने हुए हैं, वहीं दूसरी ओर विधि शिक्षा और शोध की दुनिया से आने वाले विद्वानों के योगदान का द्वार अब तक बंद है।
संविधान निर्माताओं की मूल भावना विविधता और व्यापक दृष्टिकोण को अदालत में लाने की थी। इस भावना को व्यावहारिक रूप देना या न देना, यह पूरी तरह न्यायिक कॉलेजियम और शासन तंत्र की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। जैसा कि मॉन्टेस्क्यू का प्रसिद्ध कथन है कि न्यायाधीश केवल वह मुख हैं जो कानून के शब्दों का उच्चारण करते हैं, ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इस मुख की संरचना में विविधता लाने से न्याय व्यवस्था अधिक समृद्ध नहीं होगी।
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