विनायक दामोदर सावरकर भारतीय आधुनिक राजनीतिक चिंतन के सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक विवादित विचारकों में से एक हैं। उन्हें एक ओर क्रांतिकारी राष्ट्रवादी, लेखक, इतिहास-चिंतक और सामाजिक सुधारक के रूप में देखा जाता है, तो दूसरी ओर उनकी हिंदुत्व की अवधारणा, हिंदू राष्ट्र की कल्पना और मुस्लिम समुदाय के संबंध में उनके विचारों को लेकर गंभीर आलोचनाएँ भी की गई हैं। इसलिए सावरकर का अध्ययन केवल उनके समर्थकों या आलोचकों के दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि उनके मूल राजनीतिक विचारों और उनके ऐतिहासिक संदर्भ दोनों को ध्यान में रखकर करना आवश्यक है।
सावरकर की पृष्ठभूमि
- सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर में हुआ था। विद्यार्थी जीवन से ही वे औपनिवेशिक शासन के विरोध और क्रांतिकारी राजनीति की ओर आकर्षित हुए। 1904 में उन्होंने अपने भाई गणेश दामोदर सावरकर के साथ अभिनव भारत नामक क्रांतिकारी संगठन की स्थापना की। बाद में वे उच्च शिक्षा के लिए लंदन गए और वहाँ भी भारतीय स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े रहे।
- उनके राजनीतिक जीवन का प्रारंभिक चरण मुख्यतः ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी संघर्ष से जुड़ा था। वे मानते थे कि औपनिवेशिक शासन को केवल याचिकाओं और सीमित संवैधानिक सुधारों के माध्यम से समाप्त नहीं किया जा सकता। इस कारण उनका राष्ट्रवाद प्रारंभिक दौर में उग्र और क्रांतिकारी स्वरूप ग्रहण करता है। 1857 के विद्रोह की उनकी व्याख्या इसी दृष्टिकोण को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
सावरकर और 1857 का विद्रोह
- सावरकर की प्रसिद्ध कृति The First War of Indian Independence 1909 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक में उन्होंने 1857 की घटना को केवल सैनिक विद्रोह या ब्रिटिश शासन के विरुद्ध सीमित बगावत के रूप में स्वीकार करने के बजाय उसे भारतीय स्वतंत्रता के संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया। इस व्याख्या का राजनीतिक महत्व इसलिए था क्योंकि इससे 1857 को भारतीय राष्ट्रवादी इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया गया।
- सावरकर के लिए इतिहास केवल अतीत का वर्णन नहीं था। इतिहास राष्ट्रीय चेतना के निर्माण का साधन भी बन सकता था। इसलिए उन्होंने भारतीय इतिहास के उन प्रसंगों को विशेष महत्व दिया जिन्हें वे विदेशी शासन के विरुद्ध प्रतिरोध और राष्ट्रीय गौरव की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते थे।
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और अभिनव भारत
- सावरकर की प्रारंभिक राजनीतिक विचारधारा में क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का महत्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने गुप्त क्रांतिकारी संगठन बनाए और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की वकालत की। अभिनव भारत इसी राजनीतिक गतिविधि का प्रमुख उदाहरण था। बाद में 1952 में इस संगठन के औपचारिक विघटन की घोषणा की गई।
- उनकी क्रांतिकारी राजनीति को उस समय के व्यापक औपनिवेशिक संदर्भ में समझना चाहिए। बीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारतीय राष्ट्रवाद के भीतर एक ऐसी धारा विकसित हो रही थी जो ब्रिटिश शासन को केवल राजनीतिक सुधारों के माध्यम से चुनौती देने के बजाय प्रत्यक्ष प्रतिरोध और क्रांतिकारी कार्रवाई पर बल देती थी। सावरकर इस धारा के प्रमुख चेहरों में थे।
कारावास और राजनीतिक चिंतन में परिवर्तन
- 1909-10 के दौरान सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार किया। उन्हें दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और 1911 में अंडमान की Cellular Jail भेजा गया। बाद में उन्हें भारत वापस लाया गया और 1924 से 1937 के बीच वे रत्नागिरी में नजरबंद रहे।
- कारावास और उसके बाद के वर्षों में उनके राजनीतिक चिंतन का केंद्र धीरे-धीरे बदलता दिखाई देता है। प्रारंभिक क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ-साथ वे भारतीय समाज, हिंदू पहचान, सांस्कृतिक एकता और राष्ट्र की प्रकृति पर अधिक व्यवस्थित ढंग से लिखने लगे। इसी व्यापक वैचारिक विकास के संदर्भ में उनकी हिंदुत्व की अवधारणा को समझना चाहिए।
हिंदुत्व : सावरकर के राजनीतिक चिंतन का केंद्रीय विचार
- सावरकर की सबसे प्रसिद्ध वैचारिक अवधारणा हिंदुत्व है। 1923 में प्रकाशित उनके प्रसिद्ध राजनीतिक पुस्तिका Essentials of Hindutva, जिसे बाद की editions में Hindutva: Who is a Hindu? नाम से भी जाना गया, में उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि “हिंदू” की पहचान को किस प्रकार समझा जाए।
- यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर समझना आवश्यक है। सावरकर ने हिंदुत्व को केवल धार्मिक आस्था या धार्मिक अनुष्ठानों के अर्थ में प्रस्तुत नहीं किया। उन्होंने इसे व्यापक सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रीय पहचान के रूप में परिभाषित करने का प्रयास किया। इसी कारण उनके हिंदुत्व के अध्ययन में धर्म के साथ-साथ भूगोल, इतिहास, संस्कृति और सामूहिक स्मृति भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
- उनकी अवधारणा में भारतभूमि के साथ संबंध विशेष महत्व रखता है। उन्होंने पितृभूमि और पुण्यभूमि जैसी अवधारणाओं का उपयोग करते हुए यह समझाने का प्रयास किया कि भारतीय राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान किन ऐतिहासिक और सभ्यतागत आधारों पर निर्मित होती है। यही वह बिंदु है जहाँ उनका हिंदुत्व आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद की एक विशिष्ट और विवादास्पद व्याख्या बन जाता है।
हिंदुत्व और हिंदू धर्म में अंतर
- सावरकर के विचारों को समझने में सबसे सामान्य भूल यह है कि हिंदुत्व को सीधे हिंदू धर्म का पर्याय मान लिया जाए। सावरकर स्वयं हिंदुत्व को धार्मिक कर्मकांड या धार्मिक सिद्धांतों तक सीमित नहीं करते थे। उनके लिए यह मुख्यतः एक राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न था।
- इसी कारण उनके चिंतन को समझते समय यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि वे “हिंदू” शब्द का उपयोग किस अर्थ में कर रहे थे। उनका उत्तर केवल धार्मिक विश्वास पर आधारित नहीं था; वे भारतीय इतिहास, संस्कृति और सभ्यतागत संबंधों को भी इसमें शामिल करते थे।
- हालाँकि, इसी परिभाषा की आलोचना भी हुई। आलोचकों का तर्क है कि जब राष्ट्रीय पहचान को पितृभूमि और पुण्यभूमि जैसे मानदंडों से जोड़ा जाता है, तो उन समुदायों की राष्ट्रीय स्थिति को लेकर प्रश्न उत्पन्न हो सकता है जिनके प्रमुख धार्मिक पवित्र स्थल भारत के बाहर स्थित हैं। यही कारण है कि सावरकर की हिंदुत्व अवधारणा भारतीय राष्ट्रवाद में समावेशिता और बहुलतावाद के प्रश्न से सीधे जुड़ जाती है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय पहचान
- सावरकर के राष्ट्रवाद में संस्कृति का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उनके अनुसार राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमा या प्रशासनिक व्यवस्था का नाम नहीं है। राष्ट्र की एक सामूहिक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान भी होती है।
- इस दृष्टि से वे भारतीय राष्ट्रवाद को एक विशिष्ट सांस्कृतिक आधार देना चाहते थे। उनके विचार में हिंदू समाज के भीतर मौजूद जातिगत और क्षेत्रीय विभाजनों को कम करके व्यापक सामुदायिक एकता स्थापित करना आवश्यक था।
- यहाँ सावरकर के चिंतन का एक दूसरा पहलू भी सामने आता है। वे केवल बाहरी राजनीतिक स्वतंत्रता की बात नहीं करते थे, बल्कि हिंदू समाज के आंतरिक संगठन और सामाजिक सुधार को भी महत्वपूर्ण मानते थे। उन्होंने अस्पृश्यता और जातिगत विभाजन जैसी समस्याओं के विरुद्ध भी आवाज उठाई। इसलिए उन्हें केवल सांप्रदायिक राजनीति के संदर्भ में पढ़ना उनके सामाजिक सुधार संबंधी विचारों को अधूरा छोड़ देगा।
हिंदू एकता और सामाजिक सुधार
- सावरकर के लिए हिंदू समाज की राजनीतिक शक्ति उसके आंतरिक विभाजनों से प्रभावित होती थी। वे जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता को हिंदू समाज की एकता के लिए बाधा मानते थे।
- उनका सामाजिक सुधार दृष्टिकोण धार्मिक रूढ़िवाद के समर्थन पर आधारित नहीं था। इसके विपरीत, वे स्वयं को तर्कवादी और सामाजिक सुधार का समर्थक मानते थे। उनके सामाजिक विचारों में विज्ञान, तर्क और आधुनिकता के प्रति आकर्षण दिखाई देता है।
- इस संदर्भ में सावरकर की विचारधारा में एक दिलचस्प तनाव दिखाई देता है। एक ओर वे हिंदू सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, दूसरी ओर वे हिंदू समाज के भीतर मौजूद सामाजिक रूढ़ियों और जातिगत विभाजनों को कमजोर करना चाहते हैं। यही द्वंद्व उनके चिंतन को अधिक जटिल बनाता है।
सावरकर और Two-Nation Theory
- सावरकर के राजनीतिक चिंतन का सबसे विवादास्पद पक्ष हिंदू-मुस्लिम संबंधों के बारे में उनका दृष्टिकोण है। 1937 में हिंदू महासभा के अहमदाबाद अधिवेशन में उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों को अलग राजनीतिक राष्ट्रों के रूप में वर्णित किया। बाद के वर्षों में इस विचार को Two-Nation Theory के व्यापक विमर्श से जोड़ा गया।
- यहाँ ऐतिहासिक सावधानी आवश्यक है। सावरकर का यह विचार मुस्लिम लीग की 1940 की पाकिस्तान मांग के समान नहीं था। सावरकर एक ऐसे भारत की कल्पना कर रहे थे जिसमें हिंदू और मुसलमान अलग-अलग राष्ट्रीय समुदायों के रूप में मौजूद हों; उनका राजनीतिक प्रस्ताव सीधे पाकिस्तान की स्थापना का समर्थन नहीं था। इसलिए “सावरकर ने पाकिस्तान की मांग की” कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
- उनका राष्ट्रवाद हिंदू राजनीतिक बहुसंख्यकता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित था, जबकि मुस्लिम लीग की राजनीति बाद में अलग मुस्लिम राज्य की मांग की दिशा में विकसित हुई। दोनों को ऐतिहासिक रूप से अलग-अलग समझना आवश्यक है।
सावरकर और हिंदू महासभा
- सावरकर का राजनीतिक जीवन हिंदू महासभा से भी गहराई से जुड़ा था। वे 1937 में इसके अध्यक्ष बने और 1943 तक इस पद पर रहे। उनके नेतृत्व में हिंदू महासभा ने हिंदू राजनीतिक हितों और हिंदू एकता को अधिक स्पष्ट रूप से राजनीतिक मुद्दा बनाया।
- यहाँ सावरकर के राष्ट्रवाद का स्वरूप कांग्रेस के बहुलतावादी राष्ट्रवाद से अलग दिखाई देता है। जहाँ कांग्रेस की मुख्यधारा भारतीय राष्ट्रवाद को धर्म से ऊपर उठाकर एक साझा राजनीतिक समुदाय बनाने का प्रयास कर रही थी, वहीं सावरकर भारतीय राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान में हिंदू तत्व को केंद्रीय स्थान देते थे।
इसी अंतर के कारण सावरकर भारतीय राष्ट्रवाद की वैकल्पिक धारा के प्रमुख प्रतिनिधि माने जाते हैं।
मजबूत राज्य की अवधारणा
- सावरकर के राजनीतिक चिंतन में एक मजबूत और प्रभावी राज्य की आवश्यकता पर बल मिलता है। वे राजनीतिक शक्ति को राष्ट्रीय सुरक्षा और सामुदायिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक मानते थे।
- उनका दृष्टिकोण कमजोर या अत्यधिक विकेंद्रीकृत राज्य की तुलना में एक ऐसे राज्य की ओर झुकता था जो राष्ट्रीय एकता, सुरक्षा और राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित कर सके।
- इस संदर्भ में उनका राष्ट्रवाद केवल सांस्कृतिक विचार नहीं था। उसके साथ सैन्य शक्ति, राजनीतिक संगठन और राज्य की क्षमता का प्रश्न भी जुड़ा हुआ था।
सावरकर और पश्चिमी विचार
- सावरकर को केवल परंपरावादी विचारक मानना भी उचित नहीं होगा। वे विज्ञान, तर्क, आधुनिक तकनीक और सैन्य शक्ति को महत्व देते थे। वे सामाजिक जीवन में अंधविश्वास और रूढ़िवाद की आलोचना करते थे।
- उनकी आधुनिकता की यह समझ उन्हें उन विचारकों से अलग करती है जो राष्ट्रवाद को केवल प्राचीन परंपराओं की पुनर्स्थापना के रूप में देखते थे। सावरकर भारतीय सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए आधुनिक विज्ञान और राजनीतिक शक्ति को अपनाने के पक्ष में थे।
- इसी कारण उनके चिंतन में एक ओर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है, तो दूसरी ओर तर्कवाद और आधुनिकता के प्रति आकर्षण भी दिखाई देता है।
सावरकर की प्रमुख कृतियाँ
सावरकर की राजनीतिक और ऐतिहासिक विचारधारा को समझने के लिए उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं।
- The First War of Indian Independence (1909) में उन्होंने 1857 के विद्रोह की राष्ट्रवादी व्याख्या प्रस्तुत की।
- Essentials of Hindutva (1923) उनकी हिंदुत्व संबंधी विचारधारा का सबसे महत्वपूर्ण पाठ है। इसे बाद में Hindutva: Who is a Hindu? के नाम से भी जाना गया।
- Six Glorious Epochs of Indian History में उन्होंने भारतीय इतिहास को संघर्ष, प्रतिरोध और हिंदू राजनीतिक शक्ति के संदर्भ में देखने का प्रयास किया।
इसके अलावा उनकी आत्मकथात्मक और संस्मरणात्मक रचनाएँ उनके क्रांतिकारी जीवन और कारावास के अनुभवों को समझने में उपयोगी हैं।
सावरकर की विचारधारा की आलोचना
- सावरकर की सबसे प्रमुख आलोचना उनकी राष्ट्र की सांस्कृतिक परिभाषा को लेकर की जाती है। आलोचकों का तर्क है कि यदि राष्ट्रीय पहचान को एक विशेष सभ्यतागत और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा के साथ अत्यधिक निकटता से जोड़ दिया जाए, तो धार्मिक अल्पसंख्यकों की समान राष्ट्रीय सदस्यता पर प्रश्न उत्पन्न हो सकता है।
- विशेष रूप से मुस्लिम और ईसाई समुदायों के संदर्भ में सावरकर की पितृभूमि-पुण्यभूमि संबंधी अवधारणा को आलोचना का विषय बनाया गया है।
- उनके आलोचक यह भी मानते हैं कि उनकी राजनीतिक भाषा भारतीय राष्ट्रवाद के बहुलतावादी स्वरूप को कमजोर कर सकती थी। दूसरी ओर, सावरकर के समर्थक यह तर्क देते हैं कि उनका हिंदुत्व धार्मिक अनुष्ठानों की व्यवस्था नहीं बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान की अवधारणा था और वे आधुनिक, तर्कवादी तथा सामाजिक रूप से सुधारवादी राजनीति के समर्थक थे।
- इसलिए सावरकर की विचारधारा का मूल्यांकन करते समय केवल एक पक्ष को प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
सावरकर की विरासत : राष्ट्रवादी या सांप्रदायिक विचारक?
- सावरकर की विरासत आज भी भारतीय राजनीतिक बहस में अत्यंत प्रभावशाली है। उनके समर्थक उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष करने वाले साहसी क्रांतिकारी, इतिहास-चिंतक और हिंदू समाज में सामाजिक सुधार की आवश्यकता पर बल देने वाले विचारक के रूप में देखते हैं।
- उनके आलोचक उनके हिंदुत्व को बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद की वैचारिक नींव के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि उनकी राष्ट्रीय पहचान की परिभाषा भारतीय बहुलतावाद के साथ तनाव पैदा करती है।
- वास्तविकता यह है कि सावरकर का चिंतन इन दोनों आयामों को साथ लेकर चलता है। वे एक ओर औपनिवेशिक शासन के कट्टर विरोधी थे और दूसरी ओर स्वतंत्र भारत की राष्ट्रीय पहचान को हिंदू सांस्कृतिक दृष्टि से परिभाषित करना चाहते थे। वे सामाजिक सुधार और आधुनिक विज्ञान के समर्थक थे, लेकिन धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक संगठन का महत्वपूर्ण आधार भी मानते थे।
इसी जटिलता के कारण सावरकर को भारतीय राजनीतिक चिंतन में केवल “क्रांतिकारी”, केवल “राष्ट्रवादी” या केवल “हिंदुत्ववादी” कहकर समझना पर्याप्त नहीं है।
निष्कर्ष
विनायक दामोदर सावरकर का राजनीतिक चिंतन आधुनिक भारत में राष्ट्र, संस्कृति, धर्म, पहचान और राज्य के संबंधों को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। उनका राष्ट्रवाद औपनिवेशिक शासन के विरोध से प्रारंभ होकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा तक विकसित हुआ।
उनकी दृष्टि में भारतीय राष्ट्र की कल्पना केवल आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के आधार पर नहीं की जा सकती थी। वे भारत के ऐतिहासिक अनुभव, सांस्कृतिक स्मृति और हिंदू सभ्यतागत पहचान को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में रखना चाहते थे। साथ ही वे हिंदू समाज के भीतर जातिगत विभाजन और सामाजिक रूढ़ियों को समाप्त करने तथा आधुनिक विज्ञान और तर्क को अपनाने के पक्षधर थे।
लेकिन यही विचार उनके चिंतन को विवादास्पद भी बनाते हैं। भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक समाज में राष्ट्र की परिभाषा किस आधार पर की जाए—यह प्रश्न सावरकर की विचारधारा के केंद्र में है। उनके आलोचकों के लिए उनकी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अवधारणा बहुलतावादी भारतीय राष्ट्रवाद के साथ तनाव पैदा करती है, जबकि उनके समर्थकों के लिए यही अवधारणा भारतीय सभ्यतागत आत्मचेतना और राष्ट्रीय एकता का आधार है।
MCQs
प्रश्न 1. सावरकर के Hindutva की अवधारणा का केंद्रीय तत्व क्या है?
(A) केवल धार्मिक आस्था
(B) हिंदुओं की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक एकता
(C) वर्ग-संघर्ष
(D) उदारवादी व्यक्तिवाद
सही उत्तर: (B)
प्रश्न 2. सावरकर की पुस्तक “Hindutva – Who is a Hindu?” मुख्यतः किस विषय से संबंधित है?
(A) समाजवादी क्रांति
(B) हिंदू पहचान और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
(C) उदार लोकतंत्र
(D) अंतरराष्ट्रीयतावाद
सही उत्तर: (B)
प्रश्न 3. सावरकर के राष्ट्रवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता क्या थी?
(A) केवल आर्थिक राष्ट्रवाद
(B) सांस्कृतिक पहचान पर आधारित राष्ट्रवाद
(C) वर्ग-आधारित राष्ट्रवाद
(D) राज्यविहीन राष्ट्रवाद
सही उत्तर: (B)
प्रश्न 4. सावरकर की Two-Nation Theory के अनुसार हिंदू और मुस्लिम किस रूप में देखे गए?
(A) एक ही राजनीतिक राष्ट्र के दो वर्ग
(B) दो अलग-अलग राष्ट्र
(C) केवल दो धार्मिक समुदाय
(D) दो आर्थिक वर्ग
सही उत्तर: (B)
प्रश्न 5. सावरकर का Anti-Colonialism किस प्रकार का था?
(A) केवल संवैधानिक सुधारों पर आधारित
(B) ब्रिटिश शासन के साथ सहयोग पर आधारित
(C) क्रांतिकारी गतिविधियों और सशस्त्र प्रतिरोध पर आधारित
(D) केवल सामाजिक सुधार पर आधारित
सही उत्तर: (C)
प्रश्न 6. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- सावरकर ने Hindutva को सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से जोड़ा।
- उन्होंने हिंदू एकता पर बल दिया।
- उन्होंने राष्ट्र की पहचान को संस्कृति से जोड़ने का प्रयास किया।
- उन्होंने राष्ट्रवाद को केवल आर्थिक वर्ग-संघर्ष के रूप में देखा।
सही उत्तर चुनिए:
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 1, 2 और 3
(C) केवल 2 और 4
(D) 1, 2, 3 और 4
सही उत्तर: (B)
प्रश्न 7. सावरकर की राजनीतिक विचारधारा के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन–से कथन सही हैं?
- Hindutva उनकी विचारधारा का केंद्रीय तत्व था।
- वे औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे।
- वे एक मजबूत केंद्रीय राज्य के पक्षधर थे।
- वे राजनीति में सांस्कृतिक पहचान की भूमिका को महत्व देते थे।
(A) केवल 1 और 2
(B) केवल 2 और 3
(C) केवल 1, 2 और 3
(D) 1, 2, 3 और 4
सही उत्तर: (D)
प्रश्न 8. सावरकर के सामाजिक एवं सांस्कृतिक चिंतन के संदर्भ में कौन–सा कथन सही है?
(A) वे भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान और हिंदू एकता पर बल देते थे।
(B) वे भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं को पूरी तरह अस्वीकार करते थे।
(C) वे सांस्कृतिक पहचान को राजनीति से अलग रखते थे।
(D) वे राष्ट्र को केवल आर्थिक संस्था मानते थे।
सही उत्तर: (A)
Assertion–Reason
प्रश्न 9. Assertion (A):
सावरकर के राष्ट्रवाद में सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण स्थान था।
Reason (R):
सावरकर के अनुसार संस्कृति राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(C) A सही है, लेकिन R गलत है।
(D) A गलत है, लेकिन R सही है।
सही उत्तर: (A)
प्रश्न 10. Assertion (A):
सावरकर को केवल उदारवादी राष्ट्रवादी के रूप में वर्गीकृत करना उचित नहीं है।
Reason (R):
उनका राष्ट्रवाद सांस्कृतिक पहचान, हिंदू एकता और मजबूत राज्य की अवधारणाओं से जुड़ा था।
(A) A और R दोनों सही हैं तथा R, A की सही व्याख्या है।
(B) A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(C) A सही है, लेकिन R गलत है।
(D) दोनों गलत हैं।
सही उत्तर: (A)
प्रश्न 11. निम्नलिखित का सही मिलान कीजिए:
| सूची–I | सूची–II |
| A. Hindutva – Who is a Hindu? | 1. 1857 का विद्रोह |
| B. The First War of Indian Independence | 2. हिंदू पहचान |
| C. Six Glorious Epochs | 3. भारतीय इतिहास |
| D. Hindu Mahasabha | 4. हिंदू हित और एकता |
(A) A-2, B-1, C-3, D-4
(B) A-1, B-2, C-4, D-3
(C) A-3, B-4, C-2, D-1
(D) A-4, B-3, C-1, D-2
सही उत्तर: (A)
प्रश्न 12. निम्नलिखित को सुमेलित कीजिए:
| अवधारणा | सावरकर के चिंतन में अर्थ |
| A. Hindutva | 1. क्रांतिकारी प्रतिरोध |
| B. Anti-Colonialism | 2. सांस्कृतिक हिंदू पहचान |
| C. Strong State | 3. केंद्रीकृत राजनीतिक शक्ति |
| D. Cultural Identity | 4. राष्ट्र-निर्माण का आधार |
(A) A-2, B-1, C-3, D-4
(B) A-1, B-2, C-4, D-3
(C) A-4, B-3, C-2, D-1
(D) A-3, B-4, C-1, D-2
सही उत्तर: (A)
प्रश्न 13. सावरकर के चिंतन में Culture और Nation के संबंध को किस प्रकार समझा जा सकता है?
(A) संस्कृति का राष्ट्र से कोई संबंध नहीं है।
(B) राष्ट्र केवल प्रशासनिक सीमाओं से बनता है।
(C) सांस्कृतिक पहचान राष्ट्र-निर्माण और राष्ट्रीय एकता का महत्वपूर्ण आधार है।
(D) राष्ट्र केवल आर्थिक वर्गों से निर्मित होता है।
सही उत्तर: (C)
प्रश्न 14. सावरकर के राजनीतिक चिंतन में Strong Centralised State की अवधारणा का उद्देश्य क्या था?
(A) राज्य को समाप्त करना
(B) हिंदू हितों की रक्षा और राजनीतिक शक्ति को मजबूत करना
(C) बाजार को समाप्त करना
(D) स्थानीय समुदायों को पूर्ण राजनीतिक स्वतंत्रता देना
सही उत्तर: (B)
प्रश्न 15. निम्नलिखित में से कौन–सा सावरकर के राष्ट्रवाद और उनके आलोचकों के बीच मुख्य विवाद को सबसे अच्छी तरह व्यक्त करता है?
(A) राष्ट्रवाद बनाम समाजवाद
(B) सांस्कृतिक राष्ट्रवाद बनाम समावेशी/बहुलतावादी भारतीय पहचान
(C) राजतंत्र बनाम लोकतंत्र
(D) पूंजीवाद बनाम साम्यवाद
सही उत्तर: (B)
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