वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध (Global War on Terror) की शुरुआत अमेरिका ने 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद की थी। इसका उद्देश्य आतंकवाद को समाप्त करना और अमेरिकी हितों के लिए उत्पन्न खतरों को नियंत्रित करना था। हालाँकि, अफगानिस्तान और इराक में अमेरिकी हस्तक्षेपों के ऐसे अनपेक्षित परिणाम (Unintended Consequences) सामने आए, जिनसे ईरान और अधिक मजबूत हुआ।
शत्रुतापूर्ण शासन को हटाने, राजनीतिक रिक्तता (Political Vacuums) पैदा करने और सांप्रदायिक संघर्षों को बढ़ाने के कारण अमेरिकी कार्रवाइयों ने तेहरान को एक शक्तिशाली क्षेत्रीय शक्ति के रूप में उभरने का अवसर दिया।ईरान का उदय यह दर्शाता है कि सैन्य हस्तक्षेप (Military Intervention) कभी-कभी अपने मूल उद्देश्यों के विपरीत रणनीतिक परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
ईरान के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का हटना
2001 से पहले ईरान को दो शत्रुतापूर्ण पड़ोसी देशों से रणनीतिक दबाव का सामना करना पड़ता था:
- अफगानिस्तान में तालिबान
- इराक में सद्दाम हुसैन का शासन
2001 में अफगानिस्तान और 2003 में इराक पर अमेरिकी आक्रमणों ने इन दोनों सरकारों को सत्ता से हटा दिया। इस प्रकार ईरान के सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी समाप्त हो गए।
- इराक में सद्दाम हुसैन के सुन्नी–प्रभुत्व वाले शासन के पतन ने एक ऐसे राजनीतिक व्यवस्था के उदय का मार्ग प्रशस्त किया जिसमें शिया राजनीतिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ा और जिनके तेहरान के साथ मजबूत संबंध थे।
- इसके बाद ईरान ने इराक की राजनीतिक संस्थाओं, सुरक्षा संगठनों और सशस्त्र मिलिशिया पर पर्याप्त प्रभाव विकसित कर लिया।
- धीरे-धीरे इराक एक शत्रुतापूर्ण पड़ोसी से बदलकर ईरान के लिए एक रणनीतिक साझेदार (Strategic Partner) बन गया। इससे क्षेत्रीय राजनीति में ईरान की स्थिति काफी मजबूत हुई।
सांप्रदायिकता और प्रॉक्सी युद्ध का विस्तार
शिया–सुन्नी विभाजन
- अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी आक्रमणों ने मौजूदा राजनीतिक संरचनाओं को अस्थिर कर दिया और शिया–सुन्नी सांप्रदायिक तनाव (Shia-Sunni Sectarian Tensions) को और बढ़ाया।
- केंद्रीय सत्ता के कमजोर होने से धार्मिक पहचान के आधार पर राजनीतिक लामबंदी और सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा मिला।
- इराक में सुन्नी विद्रोही समूह और शिया मिलिशिया प्रभाव और सत्ता के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगे, जबकि क्षेत्रीय शक्तियों ने अलग-अलग गुटों का समर्थन किया।
- ईरान ने शिया मिलिशिया को मजबूत किया, जबकि सऊदी अरब और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों ने सुन्नी राजनीतिक तथा सैन्य समूहों का समर्थन किया।
- इस प्रॉक्सी युद्ध (Proxy Warfare) ने तेहरान के प्रभाव को बढ़ाया और ईरान को अलग-थलग करने के अमेरिकी उद्देश्य को कमजोर कर दिया।
आतंकवाद विरोधी अभियान में ईरान की भूमिका
- ISIS (Islamic State of Iraq and Syria) के उदय ने विडंबनापूर्ण रूप से ईरान की क्षेत्रीय स्थिति को और मजबूत कर दिया।
- तेहरान इराकी सरकार का एक महत्वपूर्ण सैन्य समर्थक बन गया। ईरान ने सैन्य सलाहकारों को भेजा और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) की कुद्स फोर्स (Quds Force) के माध्यम से शिया मिलिशिया के बीच समन्वय स्थापित किया।
- ISIS के विरुद्ध अभियान में ईरान की भागीदारी ने इराक और सीरिया में उसकी सैन्य उपस्थिति को रणनीतिक वैधता प्रदान की।
- यद्यपि कुछ समय के लिए अमेरिका और ईरान दोनों का साझा हित ISIS को पराजित करने में था, फिर भी दोनों देशों के बीच सार्थक सहयोग विकसित नहीं हो सका।
- 2002 में अमेरिका द्वारा ईरान को “Axis of Evil” (बुराई की धुरी) का हिस्सा घोषित करना दोनों देशों के बीच जारी शत्रुता को दर्शाता था और स्थायी संवाद की संभावनाओं को सीमित करता था।
प्रतिरोध की धुरी (Axis of Resistance) और अग्रिम रक्षा
ईरान की क्षेत्रीय रणनीति “Axis of Resistance” (प्रतिरोध की धुरी) के इर्द-गिर्द विकसित हुई।
यह राजनीतिक, सैन्य और सामाजिक संगठनों का एक व्यापक नेटवर्क है, जो ईरान, इराक, सीरिया, लेबनान और फिलिस्तीन तक फैला हुआ है।
इसके प्रमुख घटकों में शामिल हैं:
- हिज़्बुल्लाह (Hezbollah)
- हमास (Hamas)
- हूती (Houthis)
- इराक में शिया मिलिशिया
ये संगठन ईरान को रणनीतिक गहराई (Strategic Depth) प्रदान करते हैं और उसे अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर भी प्रभाव स्थापित करने में सक्षम बनाते हैं।
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स और असममित शक्ति
ईरान की सैन्य रणनीति में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और विशेष रूप से इसकी कुद्स फोर्स की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
IRGC महत्वपूर्ण रणनीतिक संसाधनों को नियंत्रित करता है और ईरान की क्षेत्रीय साझेदारियों तथा अभियानों का समन्वय करता है।
पारंपरिक सैन्य शक्तियों के विपरीत, IRGC असममित युद्ध (Asymmetric Warfare) पर विशेष ध्यान देता है।
इसमें शामिल हैं:
- सैन्य सलाहकारों की तैनाती
- खुफिया क्षमताओं का उपयोग
- मिसाइल क्षमताएँ
- सहयोगी सशस्त्र समूहों का उपयोग
- क्षेत्रीय साझेदार संगठनों के माध्यम से शक्ति का प्रदर्शन
यह रणनीति ईरान को अमेरिका और इजरायल जैसी सैन्य रूप से अधिक शक्तिशाली शक्तियों को चुनौती देने की क्षमता प्रदान करती है, बिना उनकी पारंपरिक सैन्य शक्ति के बराबर पहुँचे।
इस प्रकार प्रॉक्सी नेटवर्क (Proxy Networks) ईरान की रक्षा और क्षेत्रीय सुरक्षा नीति का एक केंद्रीय स्तंभ बन गए हैं।
2011 के बाद शक्ति रिक्तता
- 2011 में अमेरिका की इराक से वापसी और अरब स्प्रिंग (Arab Spring) ने पश्चिम एशिया में कई राजनीतिक तथा सुरक्षा संबंधी रिक्तताएँ पैदा कीं।
- ईरान इन परिस्थितियों का लाभ उठाने के लिए अच्छी स्थिति में था क्योंकि उसके पास पहले से ही सहयोगियों के मजबूत नेटवर्क और सैन्य प्रभाव मौजूद थे।
इराक में
- ISIS के विरुद्ध संघर्ष में ईरान समर्थित सैन्य और राजनीतिक शक्तियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगीं।
सीरिया में
- ईरान ने बशर अल–असद (Bashar al-Assad) की सरकार का समर्थन करने के लिए हस्तक्षेप किया।
- इससे ईरान ने अपने प्रमुख राज्य सहयोगी की रक्षा की और लेबनान में हिज़्बुल्लाह तक अपनी पहुँच बनाए रखी।
- लंबे समय तक चले “Forever Wars” (लंबे समय तक चलने वाले युद्धों) ने अमेरिकी संसाधनों और रणनीतिक ध्यान को काफी हद तक प्रभावित किया। इसके विपरीत, ईरान को अपनी क्षेत्रीय स्थिति मजबूत करने का अवसर मिला।
- स्थानीय सहयोगियों के माध्यम से कार्य करने की क्षमता ने ईरान को प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप की तुलना में कम लागत पर अधिक व्यापक रणनीतिक प्रभाव स्थापित करने में मदद की।
ईरान का क्षेत्रीय शक्ति के रूप में परिवर्तन
शत्रुतापूर्ण शासन का हटना, राजनीतिक संस्थाओं का पतन और सांप्रदायिक संघर्षों का बढ़ना—इन सभी ने तेहरान को पश्चिम एशिया में अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर दिया।
ईरान की क्षेत्रीय शक्ति निम्नलिखित आधारों पर टिकी है:
- रणनीतिक गहराई (Strategic Depth)
- प्रॉक्सी युद्ध (Proxy Warfare)
- राजनीतिक गठबंधन
- सैन्य नेटवर्क
- राष्ट्रवाद (Nationalism)
IRGC क्षेत्रीय अभियानों का समन्वय करता है, जबकि सहयोगी सरकारें और सशस्त्र समूह बाहरी खतरों के विरुद्ध सुरक्षा कवच का कार्य करते हैं।
यह परिवर्तन उन रणनीतियों की सीमाओं को दर्शाता है जो केवल सैन्य नियंत्रण (Military Containment) पर आधारित होती हैं।
अमेरिका ने पश्चिम एशिया को सैन्य हस्तक्षेप के माध्यम से पुनर्गठित करने का प्रयास किया, लेकिन अनजाने में उसने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दीं जिनसे ईरान के उदय को बढ़ावा मिला।
विश्व के प्रमुख आतंकवादी संगठनों की एक व्यवस्थित तालिका इस प्रकार हैं:
| क्रम | आतंकवादी संगठन | प्रमुख क्षेत्र/देश | वैचारिक आधार / प्रकृति | प्रमुख गतिविधि / पहचान |
| 1 | Al-Qaeda (अल–कायदा) | अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मध्य-पूर्व, अफ्रीका | जिहादी इस्लामवाद | वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क; 9/11 से प्रमुख रूप से जुड़ा |
| 2 | ISIS / ISIL / Daesh | इराक, सीरिया तथा अफ्रीका के कुछ क्षेत्र | जिहादी इस्लामवाद | तथाकथित “खिलाफत” की स्थापना का प्रयास |
| 3 | Taliban (तालिबान) | अफगानिस्तान | इस्लामी कट्टरपंथी राजनीतिक-सैन्य आंदोलन | अफगानिस्तान में सत्ता पर नियंत्रण; अल-कायदा से ऐतिहासिक संबंध |
| 4 | Boko Haram (बोको हराम) | नाइजीरिया और लेक चाड क्षेत्र | जिहादी इस्लामवाद | अपहरण, हिंसा और आतंकवादी हमले |
| 5 | Al-Shabaab (अल–शबाब) | सोमालिया और पूर्वी अफ्रीका | जिहादी इस्लामवाद | सोमालिया में आतंकवादी हमले; अल-कायदा से संबद्ध |
| 6 | Hamas (हमास) | फिलिस्तीन/गाजा और क्षेत्रीय नेटवर्क | इस्लामी राजनीतिक-सैन्य संगठन | इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में सशस्त्र गतिविधियाँ |
| 7 | Hezbollah (हिज़्बुल्लाह) | लेबनान और पश्चिम एशिया | शिया इस्लामी राजनीतिक-सैन्य संगठन | लेबनान की राजनीति एवं क्षेत्रीय संघर्षों में सक्रिय |
| 8 | Houthis / Ansar Allah (हूती) | यमन | ज़ैदी शिया राजनीतिक-सैन्य आंदोलन | यमन का संघर्ष; लाल सागर क्षेत्र में हमले |
| 9 | Lashkar-e-Taiba (लश्कर–ए–तैयबा) | पाकिस्तान और भारत-केंद्रित क्षेत्र | जिहादी इस्लामवाद | भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ा |
| 10 | Jaish-e-Mohammed (जैश–ए–मोहम्मद) | पाकिस्तान और जम्मू-कश्मीर क्षेत्र | जिहादी इस्लामवाद | जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों से संबद्ध |
| 11 | Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) | पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा क्षेत्र | जिहादी इस्लामवाद | पाकिस्तान में आतंकवादी गतिविधियाँ |
| 12 | Abu Sayyaf Group (अबू सय्याफ) | फिलीपींस | जिहादी उग्रवाद | अपहरण और आतंकवादी हिंसा |
| 13 | Jemaah Islamiyah (जमाह इस्लामियाह) | दक्षिण-पूर्व एशिया | जिहादी इस्लामवाद | इंडोनेशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में आतंकवादी नेटवर्क |
| 14 | Al-Qaeda in the Islamic Maghreb (AQIM) | उत्तर एवं पश्चिम अफ्रीका | जिहादी इस्लामवाद | अल-कायदा से संबद्ध क्षेत्रीय संगठन |
| 15 | Al-Qaeda in the Arabian Peninsula (AQAP) | यमन और अरब प्रायद्वीप | जिहादी इस्लामवाद | अल-कायदा की क्षेत्रीय शाखा |
निष्कर्ष
यद्यपि अमेरिका का उद्देश्य आतंकवाद को समाप्त करना और ईरान को नियंत्रित करना था, लेकिन उसके हस्तक्षेपों ने ईरान के रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को समाप्त किया, पड़ोसी देशों को अस्थिर किया और तेहरान को अपना प्रभाव बढ़ाने का अवसर प्रदान किया।
ईरान ने इन परिस्थितियों का लाभ Axis of Resistance, IRGC और व्यापक क्षेत्रीय गठबंधनों के माध्यम से उठाया।
अमेरिका और इजरायल के दबाव का सामना करने की ईरान की वर्तमान क्षमता पिछले दो दशकों के दौरान प्राप्त इन संचयी रणनीतिक लाभों को दर्शाती है।
ईरान का उदय यह स्पष्ट करता है कि सैन्य हस्तक्षेप कई बार अनपेक्षित रणनीतिक परिणाम (Unintended Strategic Consequences) उत्पन्न कर सकते हैं, विशेषकर तब जब वे क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन को तोड़ दें लेकिन उसके स्थान पर स्थायी राजनीतिक स्थिरता स्थापित न कर सकें।
संबंधित MCQs
- 11 सितंबर 2001 के आतंकवादी हमलों के बाद अमेरिका द्वारा शुरू किए गए अभियान को सामान्यतः किस नाम से जाना जाता है?
- War on Poverty
B. Global War on Terror
C. Cold War
D. War on Drugs
सही उत्तर: B. Global War on Terror
- अमेरिका द्वारा 2003 में किस देश पर आक्रमण करने के बाद सद्दाम हुसैन का शासन समाप्त हुआ?
- ईरान
B. सीरिया
C. इराक
D. अफगानिस्तान
सही उत्तर: C. इराक
- ‘Axis of Resistance’ के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन–सा कथन सही है?
- यह केवल NATO सदस्य देशों का सैन्य गठबंधन है।
B. यह ईरान और उससे जुड़े राजनीतिक एवं सैन्य समूहों का क्षेत्रीय नेटवर्क है।
C. यह संयुक्त राष्ट्र का आतंकवाद-विरोधी अभियान है।
D. यह केवल अफ्रीकी देशों का संगठन है।
सही उत्तर: B. यह ईरान और उससे जुड़े राजनीतिक एवं सैन्य समूहों का क्षेत्रीय नेटवर्क है।
- निम्नलिखित में से कौन–सा संगठन सोमालिया में सक्रिय है और अल–कायदा से संबद्ध माना जाता है?
- Al-Shabaab
B. Boko Haram
C. Hezbollah
D. TTP
सही उत्तर: A. Al-Shabaab
- वैश्विक आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध (Global War on Terror) के संदर्भ में ईरान के सशक्त होने का प्रमुख कारण क्या था?
- ईरान ने NATO की सदस्यता प्राप्त कर ली।
B. अमेरिका ने ईरान को प्रत्यक्ष सैन्य सहायता दी।
C. अमेरिका के हस्तक्षेपों से ईरान के प्रमुख क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी कमजोर या समाप्त हुए और राजनीतिक शक्ति-रिक्तता पैदा हुई।
D. ईरान ने संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्राप्त कर ली।
सही उत्तर: C. अमेरिका के हस्तक्षेपों से ईरान के प्रमुख क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी कमजोर या समाप्त हुए और राजनीतिक शक्ति–रिक्तता पैदा हुई।
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