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रेड सी के नए शासक: हूती बनाम सऊदी अरब

पिछले कुछ हफ्तों में यमन में एक ऐसी सैन्य घटना घटी है जिसने पूरे मध्य पूर्व की सामरिक भूगोल को हिला दिया है। ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने यमन के रणनीतिक बंदरगाह शहर मोखा और धुबाब पर कब्जा कर लिया है और साथ ही बाब अल मंडब जलडमरूमध्य के निकट स्थित पेरिम द्वीप पर भी नियंत्रण स्थापित कर लिया है। यह घटनाक्रम केवल यमन के गृहयुद्ध का विस्तार नहीं है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और ईरान अमेरिका इजरायल के बीच चल रहे व्यापक टकराव की एक नई परत है।

हूती आंदोलन की उत्पत्ति

  • हूती आंदोलन की जड़ें 1990 के दशक की शुरुआत में उत्तरी यमन में जन्मे ‘बिलिविंग यूथ’ नामक जायदी पुनरुत्थानवादी समूह में मिलती हैं। यह समूह जायदी शिया समुदाय के भीतर धार्मिक और राजनीतिक चेतना जगाने के उद्देश्य से बना था।
  • जायदी समुदाय यमन की कुल जनसंख्या का लगभग एक तिहाई भाग है और ऐतिहासिक रूप से यह समूह उत्तरी यमन में केंद्रित रहा है।
  • हुसैन अल हूती और उनके पिता बद्र अल दीन अल हूती इस आंदोलन के प्रमुख नेता बने।
  • ईरान की 1979 की इस्लामी क्रांति और दक्षिणी लेबनान में हिज़्बुल्लाह के उभार ने इस आंदोलन को गहराई से प्रेरित किया। इसी वजह से हूती आंदोलन की वैचारिक और सामरिक निकटता आगे चलकर ईरान से स्वाभाविक रूप से जुड़ती चली गई।
  • वर्ष 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह ने बढ़ती हूती लोकप्रियता से चिंतित होकर हुसैन अल हूती के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किया।
  • इसके बाद हुई सैन्य कार्रवाई में हुसैन की मौत हो गई, लेकिन इस घटना ने आंदोलन को समाप्त करने के बजाय उसे और मजबूत कर दिया।
  • सितंबर माह में सरकारी बलों ने विद्रोह को कुचलने का प्रयास किया और स्वयं सालेह के परिवार को भी बंदी बनाया, जिससे यह संघर्ष और गहरा गया।

अरब क्रांति और सत्ता परिवर्तन

वर्ष 2011 की अरब क्रांति की लहर ने यमन को भी अपनी जकड़ में ले लिया। सालेह की गिरती लोकप्रियता और क्षेत्र में बढ़ते विरोध प्रदर्शनों के कारण उन्हें 2012 में सत्ता छोड़नी पड़ी। इसके बाद अब्द रब्बू मंसूर हादी को राष्ट्रपति बनाया गया, परंतु स्थिरता स्थापित करने में यह सरकार पूरी तरह असफल रही।

वर्ष 2014 में हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया। यह घटना यमन के आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी टर्निंग पॉइंट सिद्ध हुई। इसी दौरान सऊदी अरब समर्थित एक अलग गठबंधन सक्रिय हुआ और वर्ष 2015 में हूती विद्रोहियों के विरुद्ध औपचारिक रूप से युद्ध की घोषणा कर दी गई। इस अरब गठबंधन द्वारा आरोपित तीव्र हवाई नाकेबंदी के परिणामस्वरूप विद्रोही सत्ता से पूरी तरह बेदखल तो नहीं हुए, लेकिन उत्तरी यमन में उनकी एक समानांतर सत्ता स्थापित हो गई।

एक समानांतर राज्य का उदय

आगामी वर्षों में हूती समूह ने केवल एक विद्रोही गिरोह से आगे बढ़कर एक वास्तविक राज्य संरचना खड़ी कर ली। इसके प्रमुख आयाम निम्नलिखित हैं:

  • अपनी सीमाओं के भीतर कर संग्रहण और प्रशासनिक तंत्र का निर्माण
  • क्षेत्रीय राजनीतिक और धार्मिक नेटवर्क पर पूर्ण नियंत्रण
  • ईरान से निरंतर सैन्य, वित्तीय और वैचारिक सहायता प्राप्त करना
  • रेड सी तटरेखा तक पहुंच स्थापित करना, जिससे इसका सामरिक भार बहुत बढ़ गया
  • वर्ष 2022 में सऊदी अरब और हूती पक्षों के बीच एक व्यापक शांति समझौते की दिशा में प्रगति हुई और संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता से एक अनौपचारिक युद्धविराम लागू हुआ।
  • इस युद्धविराम ने बड़े पैमाने की लड़ाई को थाम दिया, लेकिन इससे स्थायी समाधान नहीं निकल सका। यह संघर्ष एक प्रकार से हिमीकृत अवस्था में चला गया, जो किसी भी क्षण फिर सुलग सकता था।

जुलाई 2026 की घटना और युद्धविराम का टूटना

  • इस वर्ष जुलाई माह में एक ईरानी नागरिक विमान उच्चस्तरीय हूती प्रतिनिधिमंडल को लेकर सना जा रहा था।इस प्रतिनिधिमंडल का उद्देश्य ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई के अंतिम संस्कार में भाग लेना था, जिनकी मृत्यु फरवरी माह में अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए हमलों में हुई थी।
  • सऊदी अरब समर्थित यमन सरकार ने इस विमान को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की पूर्व स्वीकृति की मांग की, जिसे हूती पक्ष ने अपनी संप्रभुता पर आघात मानते हुए अस्वीकार कर दिया।
  • इस विवाद ने संघर्ष की चिंगारी को फिर से भड़का दिया। हूती पक्ष ने प्रतिशोध में सऊदी ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले किए और होदेदाह तथा ताइज प्रांतों में आक्रमण शुरू कर दिया।
  • इसके साथ ही सरकार समर्थित नौसैनिक जहाजों की नाकेबंदी भी की गई, जिससे दो माह के भीतर हूती पक्ष ने यमन की रेड सी तटरेखा और बाब अल मंडब के आसपास के महत्वपूर्ण भूभाग पर नियंत्रण कर लिया।

सितंबर 2026 का बड़ा सैन्य आक्रमण

सितंबर माह की शुरुआत में हूती बलों ने एक निर्णायक आक्रमण छेड़ दिया। इसकी प्रमुख घटनाएं इस प्रकार रहीं:

  • 8 सितंबर को हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के चार शहरों पर हमला किया, जिसमें कम से कम 73 नागरिक घायल हुए और तेल प्रतिष्ठानों में आग लग गई
  • 10 सितंबर को हूती बलों ने ऐतिहासिक बंदरगाह शहर मोखा पर पूर्ण कब्जा कर लिया, जो सरकार समर्थित बलों का दीर्घकालिक गढ़ माना जाता था
  • ग्यारह सितंबर को हूती बलों ने धुबाब कस्बे और बाब अल मंडब के निकट स्थित सामरिक रूप से महत्वपूर्ण पेरिम द्वीप पर भी कब्जा कर लिया
  • संयुक्त राष्ट्र को प्राप्त जानकारी के अनुसार 3 सितंबर के बाद से ग्यारह हजार से अधिक नागरिक इस संघर्ष के कारण विस्थापित हुए हैं।
  • यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि यह संघर्ष केवल सामरिक बिसात नहीं है, बल्कि इसका मानवीय मूल्य भी अत्यंत भारी है।
  • मोखा बंदरगाह पर हुए हमलों में सैनिकों और नागरिकों दोनों की मृत्यु हुई और बंदरगाह की संरचना को भारी क्षति पहुंची।

विस्तारित नियंत्रण का सामरिक महत्व

  • बाब अल मंडब जलडमरूमध्य, जिसका शाब्दिक अर्थ है आंसुओं का द्वार, यमन को अफ्रीकी महाद्वीप के जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। यह जलमार्ग स्वेज नहर के माध्यम से भूमध्य सागर और लाल सागर को जोड़ता है और इसके माध्यम से विश्व के लगभग बारह से पंद्रह प्रतिशत वैश्विक व्यापार का संचालन होता है।
  • मोखा पर कब्जे से हूती बलों को इस जलमार्ग पर पहले से कहीं अधिक व्यवस्थित रूप से नियंत्रण स्थापित करने की क्षमता मिल गई है।
  • वर्ष 2023 के अंत से हूती हमलों के कारण इस मार्ग से गुजरने वाले शिपिंग यातायात में लगभग साठ प्रतिशत की गिरावट आई है, जिसके कारण अनेक शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग को पूरी तरह त्याग दिया।

होर्मुज जलडमरूमध्य और रेड सी का जुड़ा हुआ संकट

  • इस पूरी घटना को समझने के लिए एक और महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक धुरी को समझना आवश्यक है, वह है होर्मुज जलडमरूमध्य।

  • फरवरी 2026 में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हवाई और नौसैनिक हमलों के बाद ईरान ने अपने प्रमुख दबाव बिंदु के रूप में होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले यातायात को बाधित करना शुरू कर दिया।
  • इस जलडमरूमध्य से पूर्व अमेरिका और इजरायल के हमलों से पहले विश्व के बीस प्रतिशत से अधिक समुद्री तेल व्यापार का संचालन होता था।
  • होर्मुज में बाधा उत्पन्न होने के कारण सऊदी अरब ने अपने ईस्ट वेस्ट पाइपलाइन के माध्यम से अपने तेल निर्यात को रेड सी के बंदरगाहों की ओर मोड़ने का प्रयास किया।
  • परंतु हूती बलों द्वारा रेड सी पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद सऊदी अरब का यह विकल्प भी संकट में पड़ गया है।
  • इस प्रकार ईरान और उसके सहयोगी हूती अब एक साथ दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स पर दबाव डालने की स्थिति में आ गए हैं। यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक मानी जा रही है।

अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक प्रयास और उनकी सीमाएं

  • फरवरी 2026 में जब होर्मुज और बाब अल मंडब दोनों जलमार्ग युद्ध से पूर्व खुले हुए थे, तब ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर कुछ रियायतें देने की मुद्रा में था।
  • 17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर हुए, जिसमें तेहरान ने अमेरिका को दी गई प्रतिबंधों में राहत के बदले होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने की प्रतिबद्धता जताई।
  • इसके साथ ही लेबनान से जुड़े एक क्षेत्रीय संघर्षविराम की भी बात हुई, हालांकि बाब अल मंडब को लेकर स्थिति अभी भी पूरी तरह खुली नहीं थी।
  • आज की स्थिति में दोनों चोकपॉइंट्स पर यातायात बाधित है और यमन में युद्ध के कारण किसी भी अंतिम क्षेत्रीय समझौते में हूती की मांगों को भी शामिल करना अनिवार्य हो गया है, जबकि ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी पृष्ठभूमि में धकेल दिया गया प्रतीत होता है।

हूती की सामरिक भूमिका पर विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण:

हूती नेतृत्व की समझ यह है कि इस जलडमरूमध्य को नियंत्रित करने की क्षमता उन्हें अपनी सामरिक स्थिति मजबूत करने का एक अनूठा अवसर देती है। इसके पीछे मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

  • समुद्री व्यापार को बाधित करने की क्षमता उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सौदेबाजी की शक्ति प्रदान करती है
  • वे सऊदी अरब की होर्मुज विकल्प रणनीति को बेअसर करना चाहते हैं
  • पश्चिमी नौसैनिक बलों के सामने बाब अल मंडब के प्रथम हवाई और अंतरिक्ष रक्षा कवच को सीमित करना उनकी प्राथमिकता है
  • इसके अतिरिक्त हूती आंदोलन 2023 के गाजा युद्ध के बाद से स्वयं को फिलिस्तीनी उद्देश्य के साथ जोड़कर एक क्षेत्रीय वैचारिक पहचान भी स्थापित करता रहा है।
  • इस वैचारिक जुड़ाव ने उसे अरब जनमानस में एक निश्चित सहानुभूति भी दिलाई है, जिससे उसकी घरेलू और क्षेत्रीय वैधता को बल मिला है।

भारत के लिए इस संकट के निहितार्थ

भारत पर इसके प्रभाव को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है:

  • भारत का लगभग साठ प्रतिशत कच्चा तेल आयात खाड़ी क्षेत्र से होता है और इसका अधिकांश भाग होर्मुज और बाब अल मंडब मार्ग से गुजरता है
  • इस मार्ग में लगातार बाधा उत्पन्न होने से भारत को अपने ऊर्जा आयात के मार्गों में विविधता लाने की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस होती है
  • भारतीय नाविकों और व्यापारिक जलपोतों की सुरक्षा एक स्थायी चिंता का विषय बन गई है, जिसके लिए भारतीय नौसेना पहले से ही इस क्षेत्र में सक्रिय गश्त कर रही है

भारत की ऊर्जा नीति में सामरिक पेट्रोलियम भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति मार्गों जैसे चाबहार बंदरगाह की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है

निष्कर्ष

यमन का यह संघर्ष केवल एक क्षेत्रीय गृहयुद्ध नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और महाशक्तियों के बीच चल रहे व्यापक भू-राजनीतिक संघर्ष का एक निर्णायक अंग बन गया है। हूती आंदोलन ने एक छोटे धार्मिक पुनरुत्थानवादी समूह से आरंभ करते हुए एक ऐसी सैन्य और प्रशासनिक शक्ति का रूप ले लिया है जो अब विश्व के दो सर्वाधिक महत्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स में से एक पर सीधा प्रभाव डाल सकती है। आगामी समय में इस संघर्ष का समाधान केवल यमन की आंतरिक राजनीति से नहीं, बल्कि ईरान अमेरिका के व्यापक संबंधों की दिशा से ही निर्धारित होगा।


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