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अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संरचनात्मक मार्क्सवाद

(Structural Marxism in International Relations)

संरचनात्मक मार्क्सवाद को समझने के लिए सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि यह मार्क्सवाद को केवल आर्थिक असमानता या पूँजीपति और श्रमिक के बीच संघर्ष के रूप में नहीं देखता, बल्कि समाज और राजनीति के पीछे काम करने वाली गहरी सामाजिक संरचनाओं का अध्ययन करता है। इसका मूल प्रश्न यह है कि मनुष्य, राज्य और राजनीतिक संस्थाएँ जिस प्रकार व्यवहार करती हैं, क्या उनका व्यवहार केवल उनके व्यक्तिगत निर्णयों का परिणाम है, या उनके पीछे ऐसी संरचनाएँ भी मौजूद हैं जो उनके विकल्पों, हितों और निर्णयों को पहले से प्रभावित करती हैं। संरचनात्मक मार्क्सवाद का उत्तर है कि व्यक्ति और राज्य निश्चित रूप से निर्णय लेते हैं, लेकिन वे निर्णय हमेशा किसी व्यापक आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक संरचना के भीतर लिए जाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में इसका अर्थ यह है कि यदि हम किसी राज्य की विदेश नीति, किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते या दो देशों के बीच आर्थिक संबंधों को समझना चाहते हैं, तो केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि संबंधित सरकार ने क्या निर्णय लिया। हमें यह भी देखना होगा कि उस निर्णय के पीछे वैश्विक पूँजीवाद, आर्थिक निर्भरता, वर्गीय हित, उत्पादन संबंध, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, विचारधारा और शक्ति का असमान वितरण किस प्रकार काम कर रहे हैं। इसलिए संरचनात्मक मार्क्सवाद अंतरराष्ट्रीय राजनीति की सतह के पीछे मौजूद उन संबंधों को समझने का प्रयास करता है जो दिखाई तो नहीं देते, लेकिन राजनीतिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं।

संरचनात्मक मार्क्सवाद की बुनियादी धारणा

  • मार्क्सवादी चिंतन में समाज को समझने के लिए उत्पादन और आर्थिक संबंधों को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उत्पादन करता है और उत्पादन की प्रक्रिया में दूसरे मनुष्यों के साथ विशेष प्रकार के संबंध स्थापित करता है। उदाहरण के लिए पूँजीवादी समाज में एक ओर उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण रखने वाला पूँजीपति वर्ग होता है और दूसरी ओर ऐसे श्रमिक होते हैं जिनके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व नहीं होता और जिन्हें अपनी श्रम-शक्ति बेचकर जीविका अर्जित करनी पड़ती है।
  • संरचनात्मक मार्क्सवाद इसी आर्थिक संबंध को एक व्यापक संरचना के रूप में देखता है। उसका तर्क यह है कि समाज में केवल आर्थिक संबंध ही महत्वपूर्ण नहीं होते, बल्कि राज्य, कानून, शिक्षा, संस्कृति, मीडिया, विचारधारा और राजनीतिक संस्थाएँ भी उस सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने और पुनरुत्पादित करने में भूमिका निभाती हैं। इसलिए यदि हम पूँजीवादी समाज को समझना चाहते हैं, तो केवल बाजार या पूँजी के स्वामित्व का अध्ययन पर्याप्त नहीं होगा। हमें यह भी देखना होगा कि कानून निजी संपत्ति की रक्षा कैसे करता है, शिक्षा लोगों में किन मूल्यों को स्थापित करती है, मीडिया किस प्रकार सामाजिक वास्तविकता को प्रस्तुत करता है और राज्य किस प्रकार विभिन्न सामाजिक हितों के बीच संबंधों को व्यवस्थित करता है।

यहीं से संरचनात्मक मार्क्सवाद पारंपरिक आर्थिक नियतिवाद से अलग दिखाई देता है।

आधार और अधिरचना (Base and Superstructure)

  • मार्क्सवादी चिंतन की सबसे प्रसिद्ध अवधारणाओं में आधार (Base) और अधिरचना (Superstructure) का संबंध है। आधार से मुख्यतः समाज की आर्थिक संरचना का संकेत मिलता है। इसमें उत्पादन के साधन, श्रम, तकनीक, संपत्ति संबंध और उत्पादन संबंध शामिल होते हैं। दूसरी ओर अधिरचना में राज्य, कानून, राजनीति, संस्कृति, शिक्षा, धर्म, विचारधारा और अन्य संस्थागत व्यवस्थाएँ आती हैं।
  • इसे केवल इस प्रकार समझना उचित नहीं होगा कि आर्थिक आधार सब कुछ निर्धारित करता है और राजनीति तथा संस्कृति केवल उसकी प्रतिछाया हैं। संरचनात्मक मार्क्सवाद इस संबंध को कहीं अधिक जटिल मानता है। आर्थिक संरचना राजनीतिक और वैचारिक संरचनाओं को प्रभावित करती है, लेकिन राजनीतिक और वैचारिक संरचनाएँ भी आर्थिक व्यवस्था को बनाए रखने में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
  • उदाहरण के लिए, पूँजीवादी व्यवस्था में निजी संपत्ति केवल इसलिए सुरक्षित नहीं रहती कि पूँजीपति उसके मालिक हैं। राज्य का कानून निजी संपत्ति को कानूनी मान्यता देता है, न्यायिक व्यवस्था उसके अधिकारों की रक्षा करती है और राजनीतिक संस्थाएँ ऐसी नीतियाँ बना सकती हैं जो बाजार व्यवस्था को स्थिर बनाएँ। इसी प्रकार शिक्षा और सामाजिक विचारधारा लोगों में निजी संपत्ति, प्रतियोगिता, सफलता और व्यक्तिगत उपलब्धि से जुड़े कुछ विशेष विचारों को सामान्य और स्वाभाविक बना सकती हैं।

इसलिए संरचनात्मक मार्क्सवाद में आधार और अधिरचना के बीच संबंध को एकतरफा कारणपरिणाम संबंध के बजाय पारस्परिक और जटिल संबंध के रूप में समझना अधिक उपयुक्त है।

सामाजिक संरचना और व्यक्ति का व्यवहार

  • संरचनात्मक मार्क्सवाद का एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या व्यक्ति वास्तव में पूरी तरह स्वतंत्र होकर निर्णय लेता है। सामान्य दृष्टिकोण से हम कह सकते हैं कि व्यक्ति अपनी पसंद के अनुसार नौकरी चुनता है, शिक्षा प्राप्त करता है, राजनीतिक विचार बनाता है और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करता है। लेकिन संरचनात्मक मार्क्सवाद इस व्यक्तिगत निर्णय के पीछे मौजूद परिस्थितियों को भी देखता है।
  • मान लीजिए कोई व्यक्ति मजदूरी पर काम करता है। पहली दृष्टि में यह उसका व्यक्तिगत निर्णय दिखाई देता है। लेकिन संरचनात्मक दृष्टिकोण पूछेगा कि उसके पास उत्पादन के साधनों का स्वामित्व क्यों नहीं है, वह अपनी श्रम-शक्ति बेचने के लिए क्यों बाध्य है, मजदूरी और रोजगार की संरचना कैसे निर्धारित होती है और पूँजी तथा श्रम के बीच शक्ति का संबंध कैसा है। इस प्रकार व्यक्तिगत निर्णय के पीछे एक व्यापक सामाजिक और आर्थिक संरचना दिखाई देने लगती है।
  • यही बात अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी लागू की जा सकती है। किसी राज्य का नेता किसी विशेष विदेश नीति का चुनाव करता है, लेकिन उस नेता के सामने उपलब्ध विकल्प आर्थिक संसाधनों, सैन्य क्षमता, अंतरराष्ट्रीय बाजार, व्यापारिक निर्भरता, घरेलू वर्गीय हितों और वैश्विक संस्थागत संरचनाओं से प्रभावित हो सकते हैं।

ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism)

  • संरचनात्मक मार्क्सवाद को समझने के लिए ऐतिहासिक भौतिकवाद की अवधारणा को समझना बहुत आवश्यक है। ऐतिहासिक भौतिकवाद का मूल विचार यह है कि समाज का विकास केवल महान विचारों या महान व्यक्तियों की इच्छा से नहीं होता। समाज की भौतिक परिस्थितियाँ, उत्पादन की शक्तियाँ और उत्पादन संबंध सामाजिक परिवर्तन की दिशा को गहराई से प्रभावित करते हैं।
  • जब किसी समाज की उत्पादन शक्तियाँ विकसित होती हैं लेकिन पुराने उत्पादन संबंध उनके विकास में बाधा बनने लगते हैं, तब सामाजिक विरोधाभास उत्पन्न होता है। ये विरोधाभास सामाजिक संघर्षों को जन्म दे सकते हैं और अंततः सामाजिक परिवर्तन की परिस्थितियाँ पैदा कर सकते हैं।
  • उदाहरण के लिए यदि किसी आर्थिक व्यवस्था में नई तकनीक और उत्पादन की नई शक्तियाँ विकसित हो जाती हैं, लेकिन सामाजिक और संपत्ति संबंध पुराने बने रहते हैं, तो दोनों के बीच तनाव पैदा हो सकता है। मार्क्सवादी दृष्टिकोण इसी प्रकार के विरोधाभासों को ऐतिहासिक परिवर्तन को समझने के लिए महत्वपूर्ण मानता है।
  • इसका अर्थ यह नहीं है कि हर सामाजिक परिवर्तन स्वतः आर्थिक कारणों से हो जाता है। बल्कि यह समझना आवश्यक है कि भौतिक परिस्थितियाँ परिवर्तन की संरचनात्मक पृष्ठभूमि तैयार करती हैं, जबकि राजनीतिक संघर्ष, विचारधारा और मानवीय क्रिया उस परिवर्तन की दिशा को प्रभावित कर सकती हैं।

विरोधाभास और सामाजिक परिवर्तन

  • संरचनात्मक मार्क्सवाद में विरोधाभास (Contradiction) केवल समस्या या असहमति नहीं है। यह उस आंतरिक तनाव को दर्शाता है जो किसी सामाजिक व्यवस्था के भीतर मौजूद होता है।
  • पूँजीवाद में पूँजी और श्रम का संबंध इसका प्रमुख उदाहरण है। पूँजीपति के लिए उत्पादन का उद्देश्य लाभ को अधिकतम करना हो सकता है, जबकि श्रमिक बेहतर मजदूरी, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियाँ और सामाजिक सुरक्षा चाहता है। दोनों उत्पादन प्रक्रिया में एक-दूसरे पर निर्भर हैं, लेकिन उनके हित पूरी तरह समान नहीं हैं। इस प्रकार पूँजीवाद अपने भीतर ही ऐसे विरोधाभास उत्पन्न करता है जो वर्ग-संघर्ष को जन्म दे सकते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी इसी प्रकार के विरोधाभास दिखाई दे सकते हैं। उदाहरण के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था एक ओर देशों को व्यापार और निवेश के माध्यम से जोड़ती है, लेकिन दूसरी ओर आर्थिक असमानता और निर्भरता भी उत्पन्न कर सकती है। वैश्विक बाजार सभी राज्यों को एक ही प्रकार की शक्ति प्रदान नहीं करता। कुछ राज्य पूँजी, तकनीक और वित्त पर अधिक नियंत्रण रखते हैं, जबकि दूसरे राज्य संसाधन, श्रम या बाजार के रूप में अधिक निर्भर हो सकते हैं।

संरचना और मानवीय अभिकरण (Structure and Agency)

  • संरचनात्मक मार्क्सवाद के सामने एक महत्वपूर्ण सैद्धांतिक प्रश्न है कि यदि संरचनाएँ व्यक्ति और राज्य के व्यवहार को प्रभावित करती हैं, तो फिर मानवीय अभिकरण (Agency) का क्या महत्व है?
  • यदि हम बहुत अधिक संरचनात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ, तो ऐसा लग सकता है कि व्यक्ति केवल संरचनाओं के हाथों में कठपुतली है। लेकिन यह संरचनात्मक मार्क्सवाद की पूर्ण समझ नहीं है। व्यक्ति संरचना के भीतर कार्य करता है, लेकिन उसकी क्रिया संरचना को बनाए भी रख सकती है और बदल भी सकती है।
  • उदाहरण के लिए श्रमिक किसी मौजूदा आर्थिक व्यवस्था में काम करता है और उस व्यवस्था को अपने श्रम के माध्यम से पुनरुत्पादित करता है। लेकिन वही श्रमिक यदि सामूहिक संगठन बनाकर बेहतर मजदूरी, अधिकार या श्रम कानूनों की मांग करता है, तो वह मौजूदा संरचना को चुनौती भी दे सकता है।
  • इसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई राज्य मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के भीतर काम करता है, लेकिन वह अपनी विदेश नीति के माध्यम से उस व्यवस्था में परिवर्तन की मांग भी कर सकता है। इसलिए संरचना और अभिकरण का संबंध परस्पर प्रभाव वाला संबंध है।

लुई अल्थुसर (Louis Althusser)

  • संरचनात्मक मार्क्सवाद के विकास में लुई अल्थुसर का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने मार्क्सवाद की ऐसी व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया जिसमें समाज को केवल आर्थिक कारणों से समझने के बजाय विभिन्न संरचनाओं के बीच संबंधों को समझा जाए।
  • उनकी महत्वपूर्ण अवधारणा अतिनिर्धारण (Overdetermination) है। इसका अर्थ है कि किसी ऐतिहासिक या राजनीतिक घटना का केवल एक कारण नहीं होता। अनेक अलग-अलग संरचनाएँ और परिस्थितियाँ मिलकर किसी घटना को जन्म दे सकती हैं।
  • मान लीजिए किसी देश में राजनीतिक संकट पैदा होता है। उसे केवल आर्थिक मंदी से समझना पर्याप्त नहीं होगा। उसके पीछे आर्थिक संकट के साथ-साथ राजनीतिक संस्थाओं की कमजोरी, वर्ग-संघर्ष, वैचारिक संघर्ष, सामाजिक असंतोष और ऐतिहासिक परिस्थितियाँ भी काम कर सकती हैं। इसलिए किसी घटना का विश्लेषण करते समय हमें उसके अनेक कारणों और संरचनात्मक संबंधों को एक साथ देखना चाहिए।

विचारधारात्मक राज्य तंत्र (Ideological State Apparatuses)

  • अल्थुसर की दूसरी महत्वपूर्ण अवधारणा विचारधारात्मक राज्य तंत्र है। उनका तर्क था कि राज्य केवल पुलिस, सेना और कानून जैसी दमनकारी संस्थाओं के माध्यम से ही व्यवस्था को बनाए नहीं रखता। समाज में विचारधारा का प्रसार करने वाली संस्थाएँ भी व्यवस्था के पुनरुत्पादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
  • परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ, मीडिया और सांस्कृतिक संस्थाएँ व्यक्ति को समाज के प्रचलित मूल्यों और मान्यताओं से परिचित कराती हैं। इस प्रक्रिया में व्यक्ति कई बार उन सामाजिक संबंधों को स्वाभाविक और सामान्य मानने लगता है जो वास्तव में ऐतिहासिक रूप से निर्मित होते हैं।
  • यही बात अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भी महत्वपूर्ण है। वैश्विक व्यवस्था केवल सैन्य शक्ति और आर्थिक शक्ति के माध्यम से नहीं चलती। कुछ विचारों को ‘सामान्य’, ‘तार्किक’ या ‘स्वाभाविक’ बनाकर भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को स्थिर रखा जा सकता है। इसलिए विचारधारा अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संबंधों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है।

निकोस पॉलांट्ज़ास (Nicos Poulantzas)

  • निकोस पॉलांट्ज़ास ने राज्य और वर्ग-संबंधों के अध्ययन को आगे बढ़ाया। उनके लिए राज्य को केवल पूँजीपति वर्ग का सीधा उपकरण मानना पर्याप्त नहीं था। राज्य स्वयं सामाजिक संबंधों और वर्गीय शक्तियों के संघर्ष का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है।
  • इस दृष्टिकोण में राज्य के भीतर विभिन्न वर्गीय और सामाजिक शक्तियों के बीच संघर्ष दिखाई देता है। राज्य विभिन्न हितों के बीच संतुलन बनाने, समझौता कराने और सामाजिक व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने की कोशिश कर सकता है।
  • इसलिए यदि किसी राज्य की विदेश नीति को संरचनात्मक मार्क्सवादी दृष्टिकोण से समझना है, तो केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी देखना होगा कि राज्य के भीतर किन सामाजिक वर्गों, आर्थिक समूहों और राजनीतिक शक्तियों के हित विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं।

एंटोनियो ग्राम्शी और सांस्कृतिक वर्चस्व (Cultural Hegemony)

  • एंटोनियो ग्राम्शी का विचार अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संरचनात्मक और नव-मार्क्सवादी चिंतन के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ग्राम्शी ने यह समझाने का प्रयास किया कि शासक वर्ग केवल बल के माध्यम से अपना प्रभुत्व कायम नहीं रखता। वह अपनी विचारधारा को समाज में इस प्रकार स्थापित कर सकता है कि वह सामान्य और स्वाभाविक समझ का रूप ले ले।
  • उदाहरण के लिए यदि समाज के अधिकांश लोग किसी विशेष आर्थिक या राजनीतिक व्यवस्था को ‘स्वाभाविक’, ‘एकमात्र संभव’ या ‘सामान्य’ मानने लगें, तो उस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए लगातार बल प्रयोग की आवश्यकता नहीं रहती। लोग स्वयं उस व्यवस्था के नियमों और मूल्यों को स्वीकार करने लगते हैं। यही वर्चस्व (Hegemony) की अवधारणा है।
  • अंतरराष्ट्रीय संबंधों में इसका विस्तार करते हुए यह पूछा जा सकता है कि वैश्विक व्यवस्था में कुछ शक्तिशाली विचार किस प्रकार सार्वभौमिक या सामान्य मान लिए जाते हैं। इस प्रकार ग्राम्शी का विचार यह समझने में मदद करता है कि वैश्विक सत्ता केवल भौतिक शक्ति से नहीं, बल्कि सहमति और विचारधारा से भी संचालित होती है।

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संरचनात्मक मार्क्सवाद का प्रयोग

  • अंतरराष्ट्रीय संबंधों में संरचनात्मक मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि यह अंतरराष्ट्रीय राजनीति को केवल राज्यों के बीच संबंधों के रूप में देखने से इनकार करता है। इसके बजाय यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को एक व्यापक वैश्विक सामाजिक और आर्थिक संरचना के रूप में देखता है।
  • यथार्थवाद जहाँ राज्य की सुरक्षा, शक्ति और राष्ट्रीय हित पर बल देता है, वहीं संरचनात्मक मार्क्सवाद पूछता है कि राज्य स्वयं किस सामाजिक और आर्थिक संरचना के भीतर काम कर रहा है। किसी राज्य की विदेश नीति पर घरेलू वर्ग-संबंधों, पूँजी के हितों, वैश्विक बाजार और आर्थिक निर्भरता का क्या प्रभाव है—ये प्रश्न इस दृष्टिकोण के लिए अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
  • उदाहरण के लिए यदि कोई विकासशील देश किसी शक्तिशाली आर्थिक देश के साथ व्यापार समझौता करता है, तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि दोनों देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर समझौता किया। संरचनात्मक मार्क्सवादी यह भी पूछेगा कि इस समझौते से किस आर्थिक वर्ग को लाभ प्राप्त होगा, किस वर्ग पर लागत पड़ेगी, पूँजी और तकनीक का नियंत्रण किसके पास है तथा क्या यह समझौता आर्थिक निर्भरता को कम करता है या उसे और मजबूत करता है।

वैश्विक पूँजीवाद (Global Capitalism)

  • संरचनात्मक मार्क्सवादी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में वैश्विक पूँजीवाद को केंद्रीय स्थान देता है। आधुनिक विश्व में राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। पूँजी निवेश, व्यापार, तकनीक, वित्त, उत्पादन और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं ने राज्यों को एक-दूसरे पर निर्भर बनाया है।
  • लेकिन यह निर्भरता समान नहीं है। सभी राज्यों के पास समान आर्थिक संसाधन, तकनीकी क्षमता या वैश्विक वित्त पर समान नियंत्रण नहीं है। इसलिए वैश्विक पूँजीवादी व्यवस्था में शक्ति का वितरण भी असमान रहता है।
  • संरचनात्मक मार्क्सवाद इस असमानता को केवल अलग-अलग राज्यों की घरेलू कमजोरी का परिणाम नहीं मानता। वह यह देखता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था स्वयं किस प्रकार असमान संबंधों को पुनरुत्पादित करती है।
  • यही कारण है कि संरचनात्मक मार्क्सवादी विश्लेषण में वैश्विक पूँजीवाद और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संबंधों को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

साम्राज्यवाद का संरचनात्मक विश्लेषण

  • मार्क्सवादी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में साम्राज्यवाद का अर्थ केवल किसी दूसरे देश पर सैन्य कब्जा करना नहीं है। आधुनिक परिस्थितियों में आर्थिक और वित्तीय संबंध भी प्रभुत्व का माध्यम बन सकते हैं।
  • यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था किसी शक्तिशाली देश की पूँजी, तकनीक, बाजार या वित्तीय संस्थाओं पर अत्यधिक निर्भर हो जाती है, तो औपचारिक राजनीतिक स्वतंत्रता के बावजूद उसके नीति-विकल्प सीमित हो सकते हैं।
  • इसलिए संरचनात्मक मार्क्सवाद यह प्रश्न उठाता है कि क्या राजनीतिक संप्रभुता के साथ वास्तविक आर्थिक स्वायत्तता भी मौजूद है?
  • यही प्रश्न विकासशील देशों की विदेश नीति को समझने में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है।

संरचनात्मक मार्क्सवाद और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ

  • संरचनात्मक मार्क्सवादी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को पूरी तरह निष्पक्ष और तटस्थ संस्थाएँ मानकर उनका अध्ययन नहीं करता। वह यह पूछता है कि इन संस्थाओं की संरचना किस प्रकार बनी है और निर्णय लेने की वास्तविक शक्ति किन राज्यों या आर्थिक शक्तियों के पास है।
  • इस दृष्टिकोण से अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का अध्ययन करते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि संस्था क्या कार्य करती है। यह भी देखना आवश्यक है कि उस संस्था के नियम किसने बनाए, नियमों से किसे लाभ मिलता है, निर्णय लेने की शक्ति का वितरण कैसा है और कमजोर राज्यों के लिए उपलब्ध विकल्प कितने सीमित हैं।

यहीं से संरचनात्मक मार्क्सवाद का शक्ति के संरचनात्मक वितरण पर जोर स्पष्ट होता है।

संरचनात्मक मार्क्सवाद की आलोचनाएँ

  • संरचनात्मक मार्क्सवाद की पहली बड़ी आलोचना यह है कि यह कभी-कभी संरचनाओं को इतना अधिक महत्व देता है कि व्यक्ति और राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका कम दिखाई देने लगती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक ही प्रकार की आर्थिक परिस्थिति में अलग-अलग नेता अलग-अलग नीतियाँ अपना सकते हैं। इसलिए केवल संरचना के आधार पर राज्य के व्यवहार की पूरी व्याख्या करना कठिन हो सकता है।
  • दूसरी आलोचना यह है कि आर्थिक संरचना पर अत्यधिक ध्यान देने से संस्कृति, पहचान, राष्ट्रवाद, धर्म और ऐतिहासिक स्मृति जैसे तत्वों की भूमिका कम आंकी जा सकती है। जबकि वास्तविक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ये सभी तत्व विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों को प्रभावित कर सकते हैं।
  • तीसरी आलोचना वैश्वीकरण से संबंधित है। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल पारंपरिक पूँजीपति और श्रमिक संबंधों तक सीमित नहीं है। बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, वैश्विक वित्तीय बाजार, डिजिटल पूँजी, तकनीकी कंपनियाँ, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ एक-दूसरे से अत्यंत जटिल रूप से जुड़ी हुई हैं। इसलिए आधुनिक वैश्विक व्यवस्था को समझने के लिए पारंपरिक मार्क्सवादी श्रेणियों को नए संदर्भों के साथ विकसित करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

मार्क्स ने हमें यह समझने का आधार दिया कि आर्थिक उत्पादन और वर्गसंबंध समाज की संरचना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बाद संरचनात्मक मार्क्सवाद ने इस विचार को और जटिल बनाया और कहा कि समाज केवल अर्थव्यवस्था से संचालित नहीं होता। राज्य, कानून, विचारधारा, संस्कृति और राजनीतिक संस्थाएँ भी सामाजिक संबंधों के पुनरुत्पादन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।

अल्थुसर ने इस जटिलता को संरचना, अतिनिर्धारण और विचारधारात्मक राज्य तंत्र के माध्यम से समझाया। पॉलांट्ज़ास ने राज्य को वर्ग-संबंधों और सामाजिक शक्तियों के संघर्ष के संदर्भ में समझाया। ग्राम्शी ने यह दिखाया कि सत्ता केवल दमन के माध्यम से नहीं, बल्कि सहमति और सांस्कृतिक वर्चस्व के माध्यम से भी कायम रहती है।

जब इन विचारों को अंतरराष्ट्रीय संबंधों में लागू किया जाता है, तो हमारा ध्यान केवल राज्य, युद्ध और सैन्य शक्ति से हटकर वैश्विक पूँजीवाद, वर्गीय हितों, आर्थिक निर्भरता, साम्राज्यवाद, वैचारिक वर्चस्व और अंतरराष्ट्रीय संस्थागत संरचनाओं की ओर जाता है। इसलिए संरचनात्मक मार्क्सवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि राज्य क्या कर रहा है?’, बल्कि यह है कि राज्य के उस व्यवहार को संभव और सीमित करने वाली आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक संरचनाएँ कौनसी हैं?’ यही प्रश्न संरचनात्मक मार्क्सवाद को अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन में एक विशिष्ट और आलोचनात्मक दृष्टिकोण बनाता है।


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