समकालीन विश्व में युद्धों की प्रकृति में एक विचित्र विरोधाभास देखने को मिल रहा है। आधुनिक हथियार प्रणालियां, सूचना तकनीक और कूटनीतिक तंत्र पहले से कहीं अधिक विकसित हो चुके हैं, परंतु इसके बावजूद संघर्षों को निर्णायक रूप से समाप्त करना पहले की तुलना में कठिन होता जा रहा है। अपसाला संघर्ष आंकड़ा कार्यक्रम के अनुसार वर्ष 2025 में सशस्त्र संघर्षों में लगभग ढाई लाख लोगों की मृत्यु हुई और इस वर्ष विश्व में पैंसठ सशस्त्र संघर्ष सक्रिय रहे, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की सर्वाधिक संख्या है। रूस के यूक्रेन पर पूर्ण आक्रमण के चार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी युद्ध किसी राजनीतिक समाधान के बिना जारी है। गाजा में तीन वर्षों के संघर्ष में तिहत्तर हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, फिर भी युद्धविराम अंतर्निहित राजनीतिक और सुरक्षा प्रश्नों को हल नहीं कर सका है और हिंसा निरंतर जारी है। अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर आरंभ किया गया युद्ध छह माह की सीमा पार कर पूरे क्षेत्र में फैल चुका है। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि युद्धों का आरंभ करना जितना सहज हो गया है, उनका समापन उतना ही दुष्कर बनता जा रहा है।
एक पुरानी चेतावनी का पुनः महत्व
वर्ष 1971 में प्रकाशित अपनी पुस्तक में सामरिक विचारक फ्रेड इक्ले ने यह तर्क प्रस्तुत किया था कि युद्ध की समाप्ति सामरिक चिंतन में एक उपेक्षित विषय रहा है। सरकारें युद्ध की तैयारी और उसके संचालन पर अत्यधिक ध्यान देती हैं, परंतु उन राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों पर बहुत कम विचार करती हैं जो युद्ध को समाप्त करने के लिए आवश्यक होती हैं। उनका मानना था कि सैन्य कार्रवाई और राजनीतिक उद्देश्य के बीच का यह विच्छेद संघर्ष बढ़ने के साथ-साथ गहराता जाता है, क्योंकि उद्देश्य बदलते रहते हैं और पहले से दिए गए बलिदानों का भार समझौते को कठिन बनाता जाता है। सैनिक हताहतों और संसाधनों की जो कीमत चुकाई जा चुकी होती है, वह नेतृत्व के लिए पीछे हटना राजनीतिक रूप से असंभव बना देती है।
इक्ले द्वारा बताई गई कठिनाइयां आज भी अस्तित्व में हैं, परंतु वर्तमान समस्या इनसे कहीं आगे बढ़ चुकी है। सरकारों के लिए युद्ध समाप्ति की शर्तें तय करना अब सामरिक सोच की सीमा से परे, एक व्यापक संरचनात्मक चुनौती बन गया है। इसके पीछे तीन समकालीन विकासक्रम विशेष रूप से उत्तरदायी हैं, जिन पर विस्तार से विचार आवश्यक है।
1- पहला विकासक्रम: भूराजनीतिक शक्ति प्रतिस्पर्धा की तीव्रता
अमेरिकी एकध्रुवीय क्षण के धीरे धीरे समाप्त होने के साथ ही भूराजनीतिक शक्ति प्रतिस्र्धा तेज होती जा रही है। इसका परिणाम यह है कि संघर्षों को अब केवल युद्धरत पक्षों के तात्कालिक उद्देश्यों के आधार पर नहीं देखा जाता, अपितु व्यापक शक्ति संतुलन पर उनके प्रभावों के संदर्भ में देखा जाता है। किसी प्रतिद्वंद्वी की सैन्य कठिनाई अब एक ऐसा अवसर बन जाती है, जिसके माध्यम से उसे दुर्बल किया जा सकता है, भले ही बातचीत की गुंजाइश मौजूद हो।
- यूक्रेन के लिए पश्चिमी देशों का समर्थन केवल रूसी आक्रामकता के विरुद्ध सुरक्षा का साधन नहीं है, अपितु रूस पर व्यापक रणनीतिक अवरोध स्थापित करने का माध्यम भी है।
- चीन और रूस, दोनों की ही रुचि ईरान को सहारा देने में है, ताकि अमेरिका को त्वरित सैन्य विजय प्राप्त न हो सके।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य स्वयं युद्धरत पक्षों में सम्मिलित हैं अथवा युद्ध के परिणाम में उनकी प्रत्यक्ष रणनीतिक रुचि है, जिससे संघर्ष विराम की मध्यस्थता में उनकी विश्वसनीयता संदिग्ध बन जाती है।
- शंघाई सहयोग संगठन, ब्रिक्स और जी-20 जैसे बहुपक्षीय मंच भी वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करने में असफल रहे हैं, क्योंकि इनके भीतर भी प्रतिस्पर्धी हितों की टकराहट विद्यमान है।
इस प्रकार युद्ध की समाप्ति अब उन बहुत शक्तियों के प्रतिस्पर्धी हितों की बंदी बन गई है, जिनका सहयोग संघर्ष विराम स्थापित करने के लिए आवश्यक होता है।
2- दूसरा विकासक्रम: निर्णायक विजय की कठिनता और परमाणु विरोधाभास
युद्ध समाप्त करने की सबसे पुरानी विधि, अर्थात एक पक्ष की स्पष्ट और निर्णायक विजय, अब एक गंभीर विरोधी के विरुद्ध कठिन हो चली है। इसके पीछे कई कारण हैं।
अपेक्षाकृत सस्ते और व्यापक रूप से उपलब्ध सैन्य साधनों ने दुर्बल प्रतीत होने वाले प्रतिपक्षियों को भी प्रतिरोध करने की अधिक क्षमता दी है। ड्रोन तकनीक ने यूक्रेन को रूसी क्षेत्र में गहराई तक हमला करने में सक्षम बनाया है, जिसके परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में सैनिक अग्र मोर्चों पर संकेंद्रित हो गए हैं, और परंपरागत रूप से रक्षित क्षेत्र भी अत्यंत संवेदनशील बन गए हैं। कागजी तौर पर अमेरिका और इजरायल के पास ईरान की तुलना में स्पष्ट सैन्य श्रेष्ठता है, परंतु इसने ईरान की उस भू राजनीतिक हैसियत को विस्तृत होने से नहीं रोका, जिसकी स्थापना कठिन है।
परमाणु हथियार इस समीकरण में एक विशेष विरोधाभास उत्पन्न करते हैं। ये बल के अंतिम साधन तो हैं, परंतु उनका स्वामित्व परमाणु सशस्त्र प्रतिपक्षी के विरुद्ध निर्णायक विजय को असाधारण रूप से कठिन बना देता है।
- रूस का परमाणु शस्त्रागार पश्चिमी सैन्य सहायता की मात्रा को सीमित रखने का कार्य करता है।
- वहीं संघर्ष के परमाणु प्रतिरोध की सीमा से नीचे नियंत्रित रहने का भय, बिना किसी उकसावे के भी संघर्ष को अनिश्चित काल तक जारी रखने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है।
- जब दोनों प्रतिपक्षी परमाणु सशस्त्र हों, तो एक निर्णायक टकराव उनके मूल संघर्ष के कारणों को हल किए बिना भी रोका जा सकता है, जिससे लड़ाई थम तो जाती है परंतु समस्या के मूल कारण बने रहते हैं।
इस प्रकार आधुनिक युद्ध में केवल दो पक्षों के हित निर्णायक नहीं होते, बल्कि प्रतिपक्षी के अपने हित और सतत संघर्ष जारी रहने की लागत के आकलन ही अंततः यह निर्धारित करते हैं कि युद्ध कब और किस रूप में समाप्त होगा।
3- तीसरा विकासक्रम: बदलता सूचना परिवेश और सार्वजनिक अपेक्षाएं
तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण विकासक्रम है सूचना परिवेश में हो रहा परिवर्तन, जिसने राजनीतिक समझौते के लिए उपलब्ध स्थान को संकीर्ण कर दिया है। आधुनिक नेतृत्व अब अत्यंत महत्वाकांक्षी उद्देश्यों के प्रचार और प्रतिपक्षी की निंदा के माध्यम से युद्ध हेतु सार्वजनिक समर्थन जुटाता है। जब दोनों पक्ष समझौते अथवा आत्मसमर्पण की आवश्यकता को समझने लगते हैं, तब भी नेतृत्व अपनी ही जनता के मध्य निर्मित उच्च अपेक्षाओं से बंधा हुआ पाया जाता है।
- फर्जी समाचारों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा निर्मित छायाचित्रों तथा वीडियो के प्रसार ने इस समस्या को अधिक जटिल बना दिया है।
- दोनों पक्ष चयनात्मक रूप से युद्धक्षेत्र की सफलताओं को प्रस्तुत करते हैं।
- शत्रु की हानियों को बढ़ाकर दिखाया जाता है।
- विजय के प्रमाण गढ़े भी जाते हैं।

इस प्रकार की परस्पर विरोधी कथाएं जनसामान्य में विजय की आशा को बनाए रख सकती हैं, तब भी जब वास्तविक सैन्य स्थिति उस आशा का समर्थन नहीं करती। परिणामस्वरूप नेतृत्व के लिए अपनी असफलताओं को स्वीकार करना कठिन हो जाता है, विशेष रूप से तब जब वे असफलताएं उनके अपने द्वारा किए गए विजय के दावों के विपरीत हों। इस तरह सफलता की धारणा को नियंत्रित करने की यह लड़ाई स्वयं युद्ध को समाप्त करने में एक बड़ी बाधा बन जाती है।
तीनों विकासक्रमों का परस्पर सुदृढ़ीकरण
ये तीन विकासक्रम एक दूसरे को सुदृढ़ करते हैं और इनका संयुक्त प्रभाव अत्यंत गंभीर है।
जब निर्णायक सैन्य विजय दुर्लभ होती जाती है, तब वार्ता के माध्यम से हुए समझौते का महत्व बढ़ जाता है। परंतु भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा ही ऐसे समझौतों को कठिन बना देती है, क्योंकि प्रतिस्पर्धी हितों वाली शक्तियां साझा भूमि खोजने में असफल रहती हैं। साथ ही जैसे जैसे संघर्ष लंबा खिंचता है, बाह्य हित उसमें और गहराई से जड़ जमा लेते हैं, और सार्वजनिक अपेक्षाएं भी कठोर होती जाती हैं। इस स्थिति में युद्ध के स्पष्ट उद्देश्यों वाला संघर्ष भी एक ऐसे प्रवाह में परिवर्तित हो सकता है, जहां किसी भी पक्ष के लिए सुरक्षित रूप से पीछे हटना अत्यंत कठिन हो जाता है, फिर भी दोनों पक्ष सरलता से समझौते को स्वीकार नहीं कर पाते।
इस स्थिति में इक्ले की चेतावनी और भी अधिक सामयिक बन जाती है। सरकारों को न केवल सैन्य शक्ति के माध्यम से प्राप्त किए जाने वाले उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना आवश्यक है, अपितु सैन्य वास्तविकताओं के आधार पर अपने राजनीतिक उद्देश्यों का पुनर्मूल्यांकन करने की लचीलापन भी बनाए रखना आवश्यक है।
प्रतिबद्धता समस्या और शत्रु का दृष्टिकोण
अंततः यह ध्यान रहना चाहिए कि युद्ध दोनों पक्षों का विषय है, और इसकी समाप्ति केवल एक पक्ष के उद्देश्यों के आधार पर तय नहीं की जा सकती। प्रतिपक्षी के अपने हित होते हैं और निरंतर युद्ध जारी रखने की लागत का अपना आकलन होता है। किसी युद्ध को समाप्त करने के लिए यह समझना आवश्यक है कि प्रतिपक्षी को लड़ाई रोकने हेतु किस बात से राजी किया जा सकता है, जिसे रणनीतिक साहित्य में प्रतिबद्धता समस्या कहा जाता है।
एक ऐसी रणनीति जो प्रतिपक्षी के लिए किसी भी स्वीकार्य निकास मार्ग को नहीं छोड़ती, उसे लड़ाई जारी रखने के लिए हर कारण प्रदान कर देती है। यदि किसी पक्ष के पास समर्पण अथवा विश्वासघात के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प शेष नहीं बचता, तो समझौते की संभावना स्वतः ही समाप्त हो जाती है, भले ही दोनों पक्ष यह पहचानते हों कि किसी न किसी रूप में समझौता आवश्यक है।
निष्कर्ष
समकालीन युद्धों की समाप्ति में आ रही कठिनाई किसी एक कारण का परिणाम नहीं है, अपितु भूराजनीतिक शक्ति प्रतिस्पर्धा, परमाणु प्रतिरोध की जटिलता, और बदलते सूचना परिवेश के परस्पर संयोग का परिणाम है। ये तीनों तत्व मिलकर संघर्षों को अनिश्चित काल तक खिंचने वाला बना देते हैं, जिससे न केवल मानवीय क्षति में वृद्धि होती है, अपितु अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता पर भी गंभीर प्रश्न उठते हैं। ऐसी परिस्थिति में सरकारों के सम्मुख यह आवश्यक हो जाता है कि वे युद्ध आरंभ करने से पहले ही उसकी समाप्ति की परिस्थितियों पर पर्याप्त रणनीतिक विचार करें, अन्यथा संघर्ष स्वयं ही एक ऐसी शक्ति बन जाता है, जिस पर किसी भी पक्ष का नियंत्रण शेष नहीं रह जाता।

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