अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को वैश्विक शांति और सुरक्षा बनाए रखने वाली सबसे महत्वपूर्ण संस्था माना जाता है। लेकिन इसकी निर्णय प्रक्रिया में वीटो शक्ति लंबे समय से बहस का विषय रही है।
एक ओर वीटो को बड़ी शक्तियों के बीच सहमति बनाए रखने और संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत स्थिरता का साधन माना जाता है, वहीं दूसरी ओर इसे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की कमी और निर्णय प्रक्रिया में गतिरोध का प्रमुख कारण भी माना जाता है।
सितंबर 2026 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान UNSC की वीटो व्यवस्था में सुधार को लेकर चर्चा हुई। इसी संदर्भ में भारत ने समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप तत्काल और समयबद्ध सुरक्षा परिषद सुधार की आवश्यकता दोहराई। रूस ने भी इस दौरान भारत की UNSC में स्थायी सदस्यता के समर्थन को दोहराया।
वीटो शक्ति क्या है?
- वीटो का अर्थ सामान्य रूप से किसी निर्णय को रोकने की शक्ति से है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ‘वीटो’ शब्द का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं मिलता, बल्कि इसकी व्यवस्था अनुच्छेद 27(3) से निकलती है।
- इसके अनुसार गैर-प्रक्रियात्मक मामलों में सुरक्षा परिषद का निर्णय लेने के लिए नौ सदस्यों के सकारात्मक मत के साथ सभी स्थायी सदस्यों की सहमति आवश्यक होती है।
- इसलिए पाँच स्थायी सदस्यों में से किसी एक का नकारात्मक मत प्रस्ताव को पारित होने से रोक सकता है।
सुरक्षा परिषद में सदस्य

वीटो शक्ति को समाप्त करने के पक्ष में तर्क
- वीटो व्यवस्था की आलोचना का सबसे प्रमुख आधार इसका लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर सभी सदस्य देशों की संप्रभु समानता की बात करता है, लेकिन सुरक्षा परिषद की निर्णय प्रक्रिया में पाँच देशों को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त है जो अन्य सदस्य देशों के पास नहीं है। इस कारण आलोचक इसे संयुक्त राष्ट्र की लोकतांत्रिक भावना और उसकी संस्थागत संरचना के बीच मौजूद विरोधाभास के रूप में देखते हैं।
- दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा संस्थागत गतिरोध है। गंभीर अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान किसी प्रस्ताव पर व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन होने के बावजूद एक स्थायी सदस्य का वीटो उसे रोक सकता है। स्रोत के अनुसार 2011 से 2023 के बीच सीरिया से संबंधित अनेक प्रस्ताव वीटो के कारण आगे नहीं बढ़ सके। इससे यह प्रश्न उठता है कि यदि सुरक्षा परिषद किसी बड़े मानवीय संकट में सामूहिक कार्रवाई करने में असमर्थ हो जाए, तो उसकी प्रभावशीलता कितनी रह जाती है।
- वीटो के संदर्भ में जवाबदेही का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। आलोचकों के अनुसार कभी-कभी स्थायी सदस्य अपने या अपने रणनीतिक सहयोगियों से संबंधित मामलों में वीटो का इस्तेमाल करते हैं। स्रोत में गाजा और यूक्रेन से संबंधित उदाहरणों का उल्लेख इसी संदर्भ में किया गया है। 1945 से 2025 के बीच UNSC में वीटो का इस्तेमाल 320 बार किया गया, जिनमें सोवियत संघ/रूस और अमेरिका का बड़ा हिस्सा रहा।
- इसके अतिरिक्त, वर्तमान वीटो व्यवस्था को 1945 की शक्ति–संरचना की विरासत के रूप में देखा जाता है। आज वैश्विक राजनीति में एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका की भूमिका पहले की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान जैसे देश भी UNSC की संरचना को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की मांग करते हैं। अफ्रीकी देशों की मांग को Ezulwini Consensus के माध्यम से भी व्यक्त किया गया है।

फिर वीटो समाप्त करने का विरोध क्यों होता है?
- वीटो समाप्त करने के पक्ष में तर्क जितने महत्वपूर्ण हैं, उसके विरुद्ध दिए जाने वाले तर्क भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की वास्तविक कार्यप्रणाली को समझने के लिए आवश्यक हैं।
- पहला तर्क यह है कि वीटो बड़ी शक्तियों को संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के भीतर बनाए रखने का एक सुरक्षा तंत्र (Safety Valve) है। राष्ट्र संघ (League of Nations) के अनुभव से यह तर्क निकाला जाता है कि यदि किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के निर्णय किसी बड़ी शक्ति के मूलभूत हितों के विरुद्ध जाएँ, तो वह संस्था से अलग होकर उसकी प्रभावशीलता को कमजोर कर सकती है। इसलिए वीटो के समर्थक मानते हैं कि बड़ी शक्तियों की सहमति के बिना वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था को बनाए रखना कठिन हो सकता है।
- दूसरी बड़ी समस्या संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 108 से जुड़ी है। चार्टर में संशोधन के लिए महासभा के दो-तिहाई सदस्यों की स्वीकृति के साथ सभी पाँच स्थायी सदस्यों की पुष्टि आवश्यक है। इसका अर्थ है कि मौजूदा P5 की सहमति के बिना उनकी वीटो शक्ति को पूरी तरह समाप्त करना कानूनी रूप से अत्यंत कठिन है।
- एक अन्य तर्क यह है कि यदि नए स्थायी सदस्यों को भी वीटो दिया जाता है, तो निर्णयों को रोकने वाले देशों की संख्या बढ़ जाएगी। Uniting for Consensus Group, जिसे अक्सर “Coffee Club” कहा जाता है, स्थायी सदस्यता के विस्तार और विशेष रूप से नए वीटो अधिकारों को लेकर आपत्ति उठाता रहा है। उसके दृष्टिकोण से इससे सुरक्षा परिषद में गतिरोध की संभावना बढ़ सकती है।
वीटो सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय पहल
- वीटो व्यवस्था में सुधार के लिए कई पहल की गई हैं। इनका उद्देश्य हमेशा वीटो को पूरी तरह समाप्त करना नहीं रहा है; कुछ पहल वीटो के जिम्मेदार और पारदर्शी उपयोग पर केंद्रित हैं।
फ्रांसीसी–मेक्सिकन पहल
- 2015 में फ्रांस और मैक्सिको ने एक पहल शुरू की, जिसके तहत स्थायी सदस्यों से अपेक्षा की गई कि वे नरसंहार, मानवता के विरुद्ध अपराध और बड़े पैमाने के युद्ध अपराधों जैसी परिस्थितियों में स्वेच्छा से वीटो का प्रयोग न करें। यह पहल कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यवस्था के बजाय राजनीतिक प्रतिबद्धता पर आधारित है।
लिकटेंस्टीन पहल
- 2022 में UNGA Resolution 76/262 के माध्यम से एक महत्वपूर्ण व्यवस्था सामने आई। इसके तहत UNSC में वीटो का इस्तेमाल होने के बाद महासभा को 10 कार्यदिवसों के भीतर औपचारिक बैठक बुलानी होती है। इसका उद्देश्य वीटो के प्रयोग को अधिक पारदर्शी और राजनीतिक रूप से जवाबदेह बनाना है।
- इस व्यवस्था का महत्व यह है कि वीटो लगने के बाद विषय पूरी तरह बंद नहीं हो जाता। महासभा में वीटो देने वाले स्थायी सदस्य को अपने निर्णय की व्याख्या करनी पड़ती है।
- ACT Code of Conduct
- Accountability, Coherence and Transparency (ACT) Group ने भी एक आचार-संहिता का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि UNSC के सदस्य उन प्रस्तावों के विरुद्ध मतदान न करें जिनका उद्देश्य बड़े पैमाने के अत्याचारों को रोकना या समाप्त करना है।
- UNSC सुधार पर भारत का दृष्टिकोण
- भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की मांग करता रहा है। भारत के लिए यह केवल स्थायी सदस्यता प्राप्त करने का प्रश्न नहीं है, बल्कि वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और समावेशी बनाने का विषय भी है।
- भारत दो–स्तरीय स्थायी सदस्यता व्यवस्था का समर्थन नहीं करता, जिसमें कुछ नए देशों को स्थायी सदस्य तो बनाया जाए लेकिन उन्हें वीटो का अधिकार न मिले। भारत का तर्क है कि यदि वीटो व्यवस्था बनी रहती है, तो नए स्थायी सदस्यों को भी समान अधिकार मिलना चाहिए।
- हालाँकि, भारत और G4 ने एक व्यावहारिक समझौते का प्रस्ताव भी रखा है। इसके तहत नए स्थायी सदस्य 15 वर्षों तक वीटो का स्वैच्छिक उपयोग न करने पर सहमत हो सकते हैं। इसके बाद महासभा इस व्यवस्था की समीक्षा कर सकती है।
- यह प्रस्ताव भारत की कूटनीतिक रणनीति में एक महत्वपूर्ण तत्व को दर्शाता है, सैद्धांतिक समानता की मांग के साथ–साथ व्यावहारिक समझौते की संभावना को बनाए रखना।
- भारत UNSC सुधार को Global South और अफ्रीकी प्रतिनिधित्व से भी जोड़ता है। भारत Ezulwini Consensus के तहत अफ्रीकी देशों की स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकार की मांग का समर्थन करता है, यदि वीटो व्यवस्था भविष्य में भी कायम रहती है। साथ ही भारत 69 Group और G4 के साथ मिलकर व्यापक UNSC सुधार के लिए समर्थन जुटाने का प्रयास करता है।
- UNSC वीटो व्यवस्था में सुधार का रास्ता क्या हो सकता है?
- वीटो सुधार के प्रश्न का कोई सरल समाधान नहीं है। एक संभावित रास्ता स्वैच्छिक संयम (Voluntary Restraint) को मजबूत करना हो सकता है, विशेषकर बड़े मानवीय संकटों और अत्याचारों के मामलों में। फ्रांसीसी-मेक्सिकन पहल इसी दिशा में महत्वपूर्ण उदाहरण है।
- दूसरा रास्ता वीटो के बाद महासभा की भूमिका को मजबूत करना है। लिकटेंस्टीन पहल के तहत होने वाली बहसों को मानवीय सहायता, स्वतंत्र जांच और अन्य बहुपक्षीय कार्रवाइयों से जोड़ा जा सकता है।
- तीसरा रास्ता सुरक्षा परिषद की सदस्यता के विस्तार से जुड़ा है। इसके लिए Intergovernmental Negotiations (IGN) को अधिक ठोस और एकल पाठ (Single Text) आधारित बनाया जा सकता है। G4 जैसे देशों को स्थायी सदस्यता देने और नए सदस्यों के लिए दीर्घकालिक वीटो-निरोध जैसे समझौते संभावित मध्य मार्ग प्रस्तुत कर सकते हैं।

निष्कर्ष
UNSC वीटो की बहस को केवल “वीटो रहे या समाप्त हो” के प्रश्न तक सीमित करना उचित नहीं होगा। वास्तव में इसके केंद्र में तीन बड़े प्रश्न हैं; प्रभावशीलता, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही।
यदि वीटो पूरी तरह समाप्त कर दिया जाता है, तो बड़ी शक्तियों की संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में भागीदारी और सहमति से जुड़े प्रश्न सामने आ सकते हैं। दूसरी ओर, यदि वर्तमान व्यवस्था बिना सुधार के जारी रहती है, तो सुरक्षा परिषद की प्रतिनिधित्वात्मक वैधता और संकट के समय उसकी निर्णय क्षमता पर प्रश्न उठते रहेंगे। स्रोत भी इसी संतुलन को प्रभावशीलता, प्रतिनिधित्व और जवाबदेही के तीन उद्देश्यों के रूप में रेखांकित करता है।
भारत के संदर्भ में इसलिए UNSC सुधार का प्रश्न केवल स्थायी सीट तक सीमित नहीं है। यह बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना, Global South के प्रतिनिधित्व, अफ्रीकी आवाज, बहुपक्षवाद और वैश्विक संस्थाओं की वैधता से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
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