अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के लिए इसके चार मुख्य आधारभूत स्तंभों राज्य व्यवस्था (State System), शक्ति (Power), संप्रभुता (Sovereignty) और राष्ट्रीय हित (National Interest) तथा इसके ऐतिहासिक विकासक्रम को समझना अनिवार्य है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति: प्रस्तावना एवं आधारभूत ढांचा
अंतरराष्ट्रीय राजनीति को सामान्यतः संप्रभु राज्यों के मध्य उनकी विदेश नीतियों के माध्यम से संचालित होने वाली पारस्परिक क्रियाओं, प्रतिक्रियाओं और अंतरक्रियाओं के रूप में परिभाषित किया जाता है।
- राज्य की केंद्रीय भूमिका: आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में राज्य (State) सर्वाधिक प्राधिकृत एवं प्रभुत्वसंपन्न राजनीतिक संस्था है। यह युद्ध, शांति, कूटनीति और संधियों जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रक्रियाओं के संचालन हेतु अपने सभी घरेलू संसाधनों को संघटित करने की अंतिम शक्ति रखता है।
- व्यवस्था की प्रकृति: वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में लगभग दो सौ संप्रभु राज्य कार्यरत हैं, जो वैश्विक स्तर पर एक अराजक (Anarchic) परंतु परस्पर अंतरनिर्भर व्यवस्था का निर्माण करते हैं।
- विदेश नीति और राष्ट्रीय हित: विदेश नीति राष्ट्र-राज्यों का प्रमुख साधन है। इस साधन का मूल प्रेरक तत्व ‘राष्ट्रीय हित’ (National Interest) होता है। किसी भी राष्ट्र के नीति-निर्माताओं का प्राथमिक लक्ष्य राज्य की सुरक्षा (Security), क्षेत्रीय अखंडता (Territorial Integrity) और आर्थिक संवृद्धि सुनिश्चित करना होता है।

राज्य व्यवस्था (The State System): अर्थ एवं परिभाषा
मानव समाज का संप्रभु राज्यों में संगठित होकर रहना और उनके बीच संबंधों का ताना-बाना बुनना ही ‘राज्य व्यवस्था’ (State System) कहलाता है।
पामर एवं पर्किन्स (Palmer and Perkins) के अनुसार: “राज्य व्यवस्था राजनीतिक जीवन का वह प्रतिमान है जिसमें लोग अलग-अलग संप्रभु राज्यों में संगठित होते हैं और जिन्हें परस्पर सह-अस्तित्व बनाए रखने के लिए प्रबंधन करना पड़ता है।”
गार्नर (J.W. Garner) के विचार: गार्नर के अनुसार, एक पूर्ण राज्य के अस्तित्व के लिए निश्चित भूभाग, व्यक्तियों का समुदाय (जनसंख्या), संगठित सरकार और संप्रभुता का होना अनिवार्य है। प्रत्येक राज्य के पास अपनी आज्ञाओं का पालन करवाने हेतु बाध्यकारी शक्ति (Coercive Power) होती है।
राज्य व्यवस्था के अनिवार्य लक्षण (Corollaries / Features)
पामर और पर्किन्स ने राज्य व्यवस्था के संचालन के लिए तीन अनिवार्य तत्वों का उल्लेख किया है:
- राष्ट्रवाद (Nationalism): यह वह मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक तत्व है जो एक राज्य के लोगों को भावनात्मक एकता के सूत्र में बांधता है और उन्हें अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा हेतु तत्पर करता है।
- संप्रभुता (Sovereignty): राज्य की वह सर्वोच्च एवं असीमित शक्ति जो उसे अन्य सभी मानव संगठनों से पृथक करती है।
- राष्ट्रीय शक्ति (National Power): राज्य की वह सामर्थ्य या बल, जिसके आधार पर वह अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी इच्छा अनुसार कार्य निष्पादित कराता है।
संप्रभुता (Sovereignty): वैचारिक विकास एवं आयाम
संप्रभुता अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का केंद्रीय नियामक सिद्धांत है। इसका तात्पर्य आंतरिक मामलों में राज्य की सर्वोच्च सत्ता तथा बाह्य रूप से अन्य शक्तियों के नियंत्रण से पूर्ण स्वतंत्रता है।
प्रमुख विचारकों का योगदान
- ज्यां बोदां (Jean Bodin, 1530–1596): आधुनिक संप्रभुता सिद्धांत के जनक। इन्होंने संप्रभुता को “नागरिकों और प्रजाजनों पर विधि द्वारा अमर्यादित सर्वोच्च शक्ति” (Supreme power over citizens and subjects, unrestrained by law) के रूप में परिभाषित किया।
- थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes, 1588–1679): हॉब्स ने ‘लेविआथन’ में संप्रभुता को राजा के व्यक्तिगत स्वरूप से स्थानांतरित कर राज्य और सरकार के संस्थागत ढांचे से एकीकृत कर दिया।
- ह्यूगो ग्रेशियस (Hugo Grotius, 1583–1645): अंतरराष्ट्रीय कानून के जनक माने जाने वाले ग्रेशियस के शब्दों में, संप्रभुता “वह शक्ति है जिसके कार्य किसी अन्य की इच्छा अथवा नियंत्रण के अधीन नहीं होते”।
आंतरिक बनाम बाह्य संप्रभुता (Internal vs External Sovereignty)
- आंतरिक संप्रभुता: राज्य के भौगोलिक क्षेत्र के भीतर समस्त व्यक्तियों, संगठनों और संघों पर राज्य का सर्वोच्च, निरंकुश और वैध कानूनी अधिकार।
- बाह्य संप्रभुता: अंतरराष्ट्रीय समुदाय में राज्य की स्वतंत्रता, क्षेत्रीय अखंडता और अनुलंघनीयता की स्वीकार्यता। इसका अभिप्राय है कि कोई भी बाह्य राज्य या संगठन किसी स्वतंत्र राज्य के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
अंतरराष्ट्रीय शक्ति की संरचना (Concept of Power)
हंस मॉरगेन्थाऊ (Hans Morgenthau) के यथार्थवादी दृष्टिकोण के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति मूलतः “शक्ति के लिए संघर्ष” (Struggle for Power) है। शक्ति का अर्थ है दूसरे राज्यों के मस्तिष्क और कार्यों को नियंत्रित तथा प्रभावित करने की क्षमता।
- शक्ति के मूर्त तत्व (Tangible Elements): भौगोलिक आकार, भू-आकृति (Topography), जनसंख्या, प्राकृतिक संसाधन, सैन्य बल एवं तकनीकी विकास।
- शक्ति के अमूर्त तत्व (Intangible Elements): नेतृत्व की गुणवत्ता, राष्ट्रीय चरित्र, नागरिकों और सैन्य बलों का मनोबल (Morale) तथा कूटनीतिक दक्षता।
- शक्ति प्रयोग के साधन: राज्य अपनी शक्ति का प्रदर्शन चार मुख्य माध्यमों से करते हैं अनुनय (Persuasion), पुरस्कार (Rewards), दंड (Punishment), और बल प्रयोग (Force)।
- शक्ति का प्रबंधन: अंतरराष्ट्रीय अराजकता को नियंत्रित करने और युद्ध टालने के लिए राज्य मुख्य रूप से दो पद्धतियों का सहारा लेते हैं शक्ति संतुलन (Balance of Power) और सामूहिक सुरक्षा (Collective Security)।
राज्य व्यवस्था का ऐतिहासिक विकासक्रम (Evolution of the State System)
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अचानक अस्तित्व में नहीं आई, बल्कि सदियों के ऐतिहासिक उतार-चढ़ावों और संधियों के फलस्वरूप विकसित हुई है।
प्राक–वेस्टफेलिया काल (Pre-Westphalian Era)
- प्राचीन नगर–राज्य (City-States): प्राचीन काल में अंतरराष्ट्रीय संबंध लघु नगर-राज्यों तक सीमित थे, जैसे प्राचीन यूनान में एथेंस और स्पार्टा तथा प्राचीन भारत में इंद्रप्रस्थ और हस्तिनापुर।
- साम्राज्यवादी व्यवस्था: कालांतर में रोमन साम्राज्य और अन्य विशाल वंशानुगत साम्राज्यों का विस्तार हुआ, परंतु आधुनिक संप्रभु राष्ट्र-राज्य का विचार अनुपस्थित था।
- मध्यकालीन यूरोप: मध्यकाल में सत्ता दोहरी निष्ठा में विभाजित थी—एक तरफ सामंतवादी शासक थे और दूसरी तरफ कैथोलिक चर्च और पोप का सार्वभौमिक धार्मिक आधिपत्य।
1648 की वेस्टफेलिया शांति संधि (Peace of Westphalia)
1618 से 1648 तक चले तीस वर्षीय युद्ध (Thirty Years’ War) की समाप्ति ‘वेस्टफेलिया की संधि’ द्वारा हुई। यह आधुनिक संप्रभु राज्य व्यवस्था का प्रस्थान बिंदु बनी:
- इसने कैथोलिक चर्च के सार्वभौमिक आधिपत्य को समाप्त कर दिया और यूरोप में सहिष्णुता व संप्रभुता की नींव रखी।
- क्षेत्रीय राज्यों (Territorial States) को अंतरराष्ट्रीय मंच के वैध कर्ता के रूप में मान्यता मिली। केवल संप्रभु राज्यों को ही संधि करने या युद्ध छेड़ने का कानूनी अधिकार प्राप्त हुआ।
- संप्रभु समानता का सिद्धांत (Sovereign Equality): कानूनी विचारक वातेल (Emer de Vattel) ने स्पष्ट किया कि “जिस प्रकार एक बौना भी उतना ही मनुष्य है जितना कि एक दानव, उसी प्रकार एक छोटा गणराज्य भी उतना ही संप्रभु है जितना कि सबसे शक्तिशाली साम्राज्य“।
उट्रेच की संधि (1713) और यूरोपीय संतुलन
वेस्टफेलिया के बाद फ्रांस के लुई चौदहवें ने वर्चस्व स्थापित करने का प्रयास किया। 1713 की उट्रेच संधि (Treaty of Utrecht) ने स्पेन और फ्रांस के एकीकरण पर रोक लगाई तथा प्रशा (Prussia) के उभार के साथ यूरोप में नए संतुलन को जन्म दिया।

1815 की विएना कांग्रेस एवं कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप (Concert of Europe)
नेपोलियन के युद्धों के पश्चात 1815 में विएना कांग्रेस आयोजित हुई। यहाँ से कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप का उदय हुआ:
- यह व्यवस्था ब्रिटेन, फ्रांस, प्रशा, रूस और ऑस्ट्रिया नामक पाँच महाशक्तियों के आधिपत्य पर आधारित थी।
- यह आधुनिक सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था का प्रारंभिक रूप (Prototype) थी, जिसका उद्देश्य यूरोप में यथास्थिति बनाए रखना था।
- 1856 की पेरिस संधि (क्रीमियाई युद्ध के बाद) ने राष्ट्रीय आत्मनिर्णय के विचार को गति दी।
- 1914 (प्रथम विश्व युद्ध) तक इस व्यवस्था में 43 राज्य शामिल हो चुके थे, जिनमें लैटिन अमेरिका, एशिया और अफ्रीका के कुछ राज्य भी शामिल थे।
ऐतिहासिक संधियों और व्यवस्थाओं का तुलनात्मक अध्ययन
| व्यवस्था / संधि | वर्ष | मुख्य उद्देश्य / विशेषता | अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर प्रभाव |
| वेस्टफेलिया की शांति | 1648 | तीस वर्षीय धार्मिक युद्ध की समाप्ति; चर्च के नियंत्रण का अंत। | आधुनिक क्षेत्रीय संप्रभु राष्ट्र-राज्य व्यवस्था की औपचारिक शुरुआत। |
| उट्रेच की संधि | 1713 | फ्रांस के आधिपत्य को सीमित करना; संतुलन की स्थापना। | शक्ति संतुलन (Balance of Power) का व्यावहारिक संस्थागत रूप। |
| विएना कांग्रेस | 1815 | नेपोलियन के बाद व्यवस्था पुनर्स्थापना; ‘कॉन्सर्ट ऑफ यूरोप’ का गठन। | पाँच बड़ी महाशक्तियों द्वारा प्रबंधित आधुनिक सामूहिक सुरक्षा का प्रोटोटाइप। |
| पेरिस की संधि | 1856 | क्रीमियाई युद्ध की समाप्ति; राजनयिक सम्मेलनों का युग। | राष्ट्रीय आत्मनिर्णय (Self-Determination) के सिद्धांत का औपचारिक प्रवेश। |
| लीग ऑफ नेशंस / UN | 1919 / 1945 | वैश्विक शांति, संप्रभु समानता तथा अंतरराष्ट्रीय विवादों का समाधान। | व्यवस्था का सार्वभौमिकरण, वि-औपनिवेशीकरण (Decolonization) का विस्तार। |
समकालीन चुनौतियां: क्या वेस्टफेलियाई व्यवस्था का पतन हो रहा है?
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वि-औपनिवेशीकरण ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति के यूरोपीय संकेंद्रण (Eurocentrism) को समाप्त कर इसे सही अर्थों में वैश्विक बनाया। संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर की धारा 2(1) में संप्रभु समानता और धारा 2(7) में आंतरिक मामलों में अहस्तक्षेप के सिद्धांत को मान्यता दी गई।
वर्तमान वैश्वीकृत युग में संप्रभु राज्य व्यवस्था कई गंभीर संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है:
- अधिराष्ट्रीय संस्थाओं का दबाव: अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक (World Bank) और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसी संस्थाओं की नीतियों और शर्तों ने विकासशील व संप्रभु देशों की आर्थिक नीति-निर्माण की स्वतंत्रता को सीमित किया है।
- बहुराष्ट्रीय निगम (MNCs): कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वार्षिक वित्तीय बजट और आर्थिक पूंजी कई छोटे देशों के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (GNP) से भी अधिक है, जिससे राज्य की बाजार नियंत्रण क्षमता क्षीण हुई है।
- वैश्वीकरण एवं अंतरनिर्भरता: जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, साइबर सुरक्षा और वैश्विक महामारियों जैसी समस्याओं का समाधान कोई भी राज्य अपनी सीमाओं के भीतर संप्रभु रहकर अकेले नहीं कर सकता। इसने राज्यों को क्षेत्रीय व वैश्विक संधियों के सम्मुख झुकने पर बाध्य किया है।
- श्रेणीबद्ध पदानुक्रम (Hierarchical System): सैद्धांतिक रूप से सभी राज्य समान हैं, परंतु यथार्थ में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अत्यधिक पदानुक्रमित है। सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति संपन्न महाशक्तियां और उनकी आर्थिक दादागीरी कमजोर राष्ट्रों की स्वायत्तता को प्रभावित करती है।
निष्कर्ष
वेस्टफेलियाई शांति संधि (1648) से विकसित हुई आधुनिक संप्रभु राज्य व्यवस्था ने सदियों तक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के स्वरूप, शक्ति संतुलन और कूटनीति को दिशा प्रदान की है। बीसवीं सदी में वि-औपनिवेशीकरण और संयुक्त राष्ट्र के उदय ने इसे सार्वभौमिक बनाकर संप्रभु समानता के सिद्धांत को कानूनी रूप से सुदृढ़ किया।
यद्यपि इक्कीसवीं सदी में तीव्र वैश्वीकरण, बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रभाव, अधिराष्ट्रीय संस्थाओं की शर्तों और अंतरराष्ट्रीय अंतरनिर्भरता ने क्लासिकल राज्य संप्रभुता के दायरे को सीमित अवश्य किया है, फिर भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर राज्य आज भी प्राथमिक और सर्वाधिक प्राधिकृत अभिकर्ता (Primary Actor) बना हुआ है।
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