23 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की दो न्यायाधीशों की पीठ ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की वैधता वाली याचिकाओं पर खंडित फैसला सुनाया। खास बात यह रही कि दोनों जजों में मतभेद कानून की खूबियों-खामियों पर नहीं था। मतभेद इस बात पर था कि इस मामले को दो जजों की पीठ सुन भी सकती है या नहीं। इसी से एक बड़ा सवाल उठता है कि जिस अदालत को संविधान का संरक्षक माना गया, उसकी अपनी बनावट क्या संवैधानिक प्रश्नों के निपटारे में बाधा बन रही है?
पृष्ठभूमि: चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का ढाँचा
अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023): पाँच जजों की संविधान पीठ ने संसद द्वारा कानून बनने तक एक अंतरिम व्यवस्था दी। इसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की समिति की सिफारिश पर नियुक्ति होनी थी।
दिसंबर 2023 का कानून: संसद ने नया कानून बनाया। इसमें चयन समिति के सदस्य हैं प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री। यानी CJI की जगह एक मंत्री आ गया।
याचिकाएँ: इस कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता 2024 की शुरुआत में ही अदालत पहुँच गए थे।
संवैधानिक आधार अनुच्छेद 324 है, जो चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन और निगरानी की शक्ति देता है। इसके खंड (2) के अनुसार आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति संसद द्वारा बनाए कानून के अधीन करते हैं। असली विवाद यही रहा कि संसद के कानून की ताकत कितनी है और अदालत के पुराने फैसले की कितनी।
केंद्र सरकार का बदला हुआ रुख
सुनवाई मई में शुरू हुई थी। बीच सुनवाई में केंद्र सरकार ने अपना पक्ष बदल लिया और कहा कि इस मामले में संविधान की व्याख्या का “सारवान प्रश्न” (substantial question of law) जुड़ा है। इसलिए अनुच्छेद 145(3) के तहत इसे कम से कम पाँच जजों की पीठ सुने। दिलचस्प बात यह थी कि यह दलील सरकार के जवाबी हलफनामे में कहीं नहीं थी।
दोनों जजों की अलग-अलग राय
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता:
उन्होंने पाँच जजों की पीठ की माँग ठुकरा दी।
उनके अनुसार अनुच्छेद 145(3) सिर्फ यह कहता है कि संविधान की व्याख्या वाले सारवान प्रश्न को कम से कम पाँच जज सुनें। यह नहीं पूछता कि मामला कितना महत्वपूर्ण है या कानून नया है या पुराना।
1959 के जम्मू-कश्मीर राज्य बनाम ठाकुर गंगा सिंह मामले में अदालत कह चुकी थी कि व्याख्या का प्रश्न तभी उठता है जब किसी प्रावधान के दो या अधिक अर्थ सुझाए जाएँ।
जब पक्षकार किसी प्रावधान के सही अर्थ पर सहमत हों और उस पर कोई प्रश्न ही न उठाएँ, तो उसे संविधान की व्याख्या का मामला नहीं माना जा सकता। यही तर्क तीन जजों की पीठ ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ (2003) में अनुच्छेद 145(3) पर भी लागू किया था।
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा:
उन्होंने केंद्र की बात मान ली।
उनका तर्क था कि 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता पर अब तक सुप्रीम कोर्ट का कोई अधिकृत फैसला नहीं है। इसलिए मामला कम से कम पाँच जजों की पीठ को जाना चाहिए।
सामान्य नियम यह है कि दो जजों की पीठ में मतभेद हो तो मामला तीन जजों की पीठ के पास जाता है। लेकिन दोनों जजों ने माना कि यह तय करने में कि कौन सही है, और समय लगेगा। इसलिए उन्होंने कागजात मुख्य न्यायाधीश को सौंप दिए और संविधान पीठ बनाने पर विचार करने का अनुरोध किया। नतीजा यह कि याचिकाकर्ताओं को फिर इंतजार करना होगा।
अनूप बरनवाल का वास्तविक संदेश
अनूप बरनवाल में दो बातें तय हुई थीं।
- CJI को चयन समिति में रखना एक अस्थायी इंतजाम था, जो संसद के कानून बनने तक चलना था। इस हद तक केंद्र का यह कहना सही हो सकता है कि समिति में CJI की जगह संवैधानिक रूप से अटल नहीं है।
- उसी फैसले ने अनुच्छेद 324 की व्याख्या करते हुए कहा था कि निर्वाचन आयोग में नियुक्तियाँ कार्यपालिका के अकेले नियंत्रण से मुक्त होनी चाहिए। यह कानून की स्पष्ट घोषणा थी, जो अनुच्छेद 141 के तहत हर अदालत पर बाध्यकारी है।
- इसलिए न्यायमूर्ति दत्ता का निष्कर्ष था कि जिस समिति में तीन में से दो वोट कार्यपालिका के हों, वह इस कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं, यह तो तय हो चुके नियम को नए कानून पर लगाने का साधारण काम है। उसके लिए नई संविधान पीठ जरूरी नहीं।
“पहली बार” वाले तर्क की खामी
न्यायमूर्ति शर्मा के तर्क में एक व्यावहारिक कमजोरी है। हर नए कानून को चुनौती किसी न किसी अर्थ में अपनी तरह की पहली होती है। इस तर्क पर चलें तो दो जजों की पीठ ये ऐतिहासिक फैसले कभी दे ही न पाती:
- श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015): सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A रद्द की गई।
- नालसा बनाम भारत संघ (2014): ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के स्व-पहचाने लिंग का अधिकार मान्य हुआ।
दोनों मामलों में संविधान और उसकी गारंटियों का गहरा विश्लेषण हुआ, फिर भी वे दो जजों की पीठों ने तय किए।
देरी की पुरानी बीमारी
दोनों जजों के संयुक्त आदेश में माना गया कि इस प्रकार की देरी एक पुराना रोग है। लेख इसके उदाहरण देता है:
- अनूप बरनवाल की याचिका 2015 में दायर हुई, 2018 में संविधान पीठ को भेजी गई और फैसला 2023 में आया।
- उत्तर प्रदेश राज्य बनाम जय बीर सिंह में “उद्योग” की परिभाषा तय करने का संदर्भ 2002 से 15 साल निष्क्रिय पड़ा रहा। फिर नौ जजों की पीठ बनने में नौ साल और लग गए।
- जजों ने स्वयं ऐसी देरी को “संस्थागत शर्मिंदगी” कहा है।
देरी के घातक परिणाम
देरी का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि अदालत के सामने fait accompli (किया जा चुका काम) की स्थिति बन जाती है। मौजूदा मामले में जब तक फैसला आएगा, नए कानून से नियुक्त आयुक्त कई राज्यों के चुनाव और शायद एक से अधिक आम चुनाव करवा चुके होंगे। तब किसी नियुक्ति को अवैध ठहराना भी लगभग बेमानी हो जाएगा।
अदालत की असली समस्या: ढाँचे की उलटबाँसी
शुरुआती कल्पना:
- जनवरी 1950 में जब सुप्रीम कोर्ट बैठा, उसमें छह जज थे, जबकि स्वीकृत संख्या आठ थी।
- अनुच्छेद 145(3) में पाँच जजों की न्यूनतम शर्त इसी सोच से रखी गई थी कि अदालत ज्यादातर मामलों में एक साथ बैठकर संविधान की व्याख्या करेगी।
आज की स्थिति:
- अदालत में स्वीकृत जजों की संख्या 38 है।
- कामकाज प्रायः दो जजों की पीठों में होता है, और ज्यादातर समय विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) में जाता है।
- संविधान पीठ तभी बनती है जब CJI रोजमर्रा के इस बोझ से कम से कम पाँच जज निकाल सकें।
- विद्वान निक रॉबिन्सन के शब्दों में, यह एक अदालत नहीं, बल्कि कई अदालतें हैं और हर पीठ अपनी आवाज में बोलती है।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट संविधान के प्रहरी से अधिक अपीलों की अदालत बन गया है। लेखक इसे उलटाव कहता है, जिसे तुरंत सुधारना जरूरी है। नहीं तो गणतंत्र के सबसे गंभीर सवालों के उत्तर तब आएँगे जब उनका कोई मतलब नहीं रह जाएगा।
सुधार के सुझाव: स्थायी संविधान पीठ
संयुक्त आदेश में जजों ने CJI से स्थायी संविधान पीठ की संभावना टटोलने को कहा है, जो केवल शुद्ध संवैधानिक प्रश्न सुने। यह विचार नया नहीं है। विधि आयोग ने 2009 की अपनी 229वीं रिपोर्ट में दिल्ली में संविधान पीठ और देश के अलग-अलग क्षेत्रों में साधारण अपीलें सुनने वाली पीठों का प्रस्ताव दिया था। इस दिशा में लेख ये बातें सामने रखता है:
- ऐसी पीठ के लिए संविधान संशोधन जरूरी नहीं। CJI “मास्टर ऑफ द रोस्टर” हैं और कल ही ऐसी पीठ बना सकते हैं।
- पर दिक्कत यह है कि 38 जजों की अदालत में कौन किस पीठ में बैठे, यह तय करने की शक्ति केवल प्रशासनिक नहीं है। यह नतीजों को आकार दे सकती है और देती भी है। इसलिए सवाल उठता है कि यह शक्ति एक ही पद में केंद्रित रहे या नहीं।
- स्थायी पीठ पर भरोसा तभी बनेगा जब उसका गठन पारदर्शी, पहले से तय और स्पष्ट नियमों वाली प्रक्रिया से हो।
पूर्व-निर्णय के सिद्धांत की चुनौती
भारतीय कानूनी व्यवस्था stare decisis यानी पहले तय हो चुकी बात पर टिके रहने के सिद्धांत पर खड़ी मानी जाती है। लेकिन लेख के अनुसार इस पर भरोसा करने के कारण कम हैं कि पीठें, चाहे जितनी बड़ी हों, पुराने फैसलों का हमेशा सम्मान करेंगी। मौजूदा मामला इसका उदाहरण है, जहाँ दो जजों की (भले खंडित) पीठ ने पाँच जजों की पीठ द्वारा तय सिद्धांत को लागू करने से ही कन्नी काट ली और मामला सिर्फ इसलिए संविधान पीठ को भेज दिया कि कानून नया है।
अतिरिक्त आयाम:
1. संवैधानिक प्रावधान
- अनुच्छेद 124: सुप्रीम कोर्ट की स्थापना। संसद ने जजों की संख्या कानून बनाकर समय-समय पर बढ़ाई है। 2019 में यह 34 (CJI सहित) हुई थी, जिसे अब लेख 38 बताता है।
- अनुच्छेद 141: सुप्रीम कोर्ट का कानून भारत के सभी न्यायालयों पर बाध्यकारी है।
- अनुच्छेद 143: राष्ट्रपति सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर अदालत से परामर्श माँग सकते हैं।
अनुच्छेद 130: सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में बैठेगा, पर CJI राष्ट्रपति की मंजूरी से कहीं और भी बैठक तय कर सकते हैं। क्षेत्रीय पीठों की बहस का यही संवैधानिक आधार है।
2. मास्टर ऑफ द रोस्टर
यह अवधारणा राजस्थान राज्य बनाम प्रकाश चंद (1998) में स्थापित हुई और शांति भूषण बनाम भारत का सर्वोच्च न्यायालय (2018) में दोहराई गई। इसके तहत पीठों का गठन और मामलों का आवंटन CJI का विशेषाधिकार है।
3. मूल ढाँचे का संदर्भ
केशवानंद भारती (1973) का फैसला 13 जजों की पीठ ने दिया था। इससे साफ है कि संविधान की बुनियादी व्याख्या के लिए बड़ी पीठें कितनी निर्णायक होती हैं, जबकि आज ऐसी पीठें बड़ी मुश्किल से बन पाती हैं।
4. चुनाव आयोग की स्वतंत्रता
मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी है, पर अन्य आयुक्तों को सिर्फ मुख्य आयुक्त की सिफारिश पर हटाया जा सकता है। चयन समिति में कार्यपालिका का बहुमत इसी स्वतंत्रता की बहस को और तीखा करता है।
आलोचनात्मक मूल्यांकन
पक्ष में तर्क:
- संविधान की व्याख्या वाले प्रश्न बड़ी पीठ को सौंपना सावधानी का रास्ता है।
- संसद के बनाए कानून पर विचार में अधिक न्यायाधीशों की राय से वैधता बढ़ती है।
विपक्ष में तर्क:
- अनुच्छेद 145(3) की शर्त जब पूरी न हो, तब भी पाँच जजों के पास भेजना देरी और अनिश्चितता बढ़ाता है।
- चुनाव आयोग जैसी संस्था की नियुक्ति पर लंबे समय तक अस्पष्टता लोकतंत्र की साख को नुकसान पहुँचाती है।
आगे की राह
- स्थायी संविधान पीठ का गठन, जिसमें जजों का चयन पारदर्शी और नियम-आधारित हो।
- पीठ गठन और रोस्टर के लिए स्पष्ट, सार्वजनिक मानदंड, ताकि CJI की शक्ति पर सवाल न उठे।
- संविधान पीठ के संदर्भों के लिए समय-सीमा तय करना।
- विधि आयोग की 229वीं रिपोर्ट जैसे सुझावों पर गंभीर विचार।
- पूर्व-निर्णयों के पालन को लेकर अदालत के भीतर अनुशासन।
निष्कर्ष
यह मामला चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में तो है ही, उससे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट के अपने ढाँचे के बारे में है। जब अदालत का अधिकांश समय अपीलों में जाता है और संविधान पीठें दुर्लभ हो जाती हैं, तब संवैधानिक प्रश्न सालों लटके रहते हैं और तब तक कई चुनाव हो चुके होते हैं। सुधार की शुरुआत स्थायी संविधान पीठ जैसे कदम से हो सकती है, बशर्ते उसका गठन पारदर्शी हो और अदालत पुराने फैसलों का पालन करे।
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