कैबिनेट सचिव द्वारा प्रशासनिक सुधार 3.0 (Administrative Reforms 3.0) की घोषणा ने भारत में सुशासन और संस्थागत दक्षता (Institutional Efficiency) को लेकर बहस को फिर से तेज कर दिया है।
भारत सरकार ने व्यापार सुगमता (Ease of Doing Business-EoDB), नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा प्रशासन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अनेक पहलें की हैं। इसके बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में कई समस्याएँ बनी हुई हैं, जैसे नौकरशाही संबंधी बाधाएँ, कंपनियों की कम गतिशीलता और आर्थिक विकास में असमानता।
- पहले किए गए सुधारों का सीमित प्रभाव केवल नियमों की कमियों या प्रशासनिक अक्षमता के कारण नहीं है, बल्कि इसके पीछे राजनीतिक अर्थव्यवस्था (Political Economy) और शासन के प्रति सरकार के दृष्टिकोण से जुड़ी गहरी संरचनात्मक समस्याएँ भी हैं।
- इसलिए प्रशासनिक सुधारों का उद्देश्य केवल नियमों और प्रक्रियाओं में बदलाव करना नहीं होना चाहिए, बल्कि उन संस्थागत परिस्थितियों और वैचारिक आधारों में भी परिवर्तन करना चाहिए जिनके अंतर्गत प्रशासन कार्य करता है।
भारत के कारोबारी वातावरण की संरचनात्मक कमजोरियाँ (Structural Weaknesses in India’s Business Environment)
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2025–26 में कारोबारी वातावरण से संबंधित कई चुनौतियों को रेखांकित किया गया है।
प्रमुख समस्याएँ निम्नलिखित हैं:
(क) नियामकीय बोझ (Regulatory Burden)
- भारतीय कंपनियों को सीमा शुल्क संबंधी प्रक्रियाओं में कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धियों की तुलना में अधिक देरी का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, कंपनियों के वरिष्ठ प्रबंधन का काफी समय नियामकीय नियमों के अनुपालन में व्यतीत होता है।
- इससे उत्पादन, नवाचार, निवेश और व्यावसायिक विस्तार के लिए उपलब्ध समय तथा संसाधन कम हो जाते हैं।
(ख) कंपनियों की कम गतिशीलता (Low Firm Dynamism)
- भारत में नई कंपनियों के प्रवेश और पुरानी कंपनियों के बाजार से बाहर निकलने की दर तुलनात्मक अर्थव्यवस्थाओं की अपेक्षा कम बताई गई है।
- प्रस्तुत लेख के अनुसार, भारत में कंपनियों के प्रवेश और निकास की दर 1% से कम है, जबकि कुछ तुलनीय अर्थव्यवस्थाओं में यह 8–13% है।
- कम व्यावसायिक गतिशीलता का अर्थ है कि नई कंपनियों के प्रवेश, प्रतिस्पर्धा और कम उत्पादक कंपनियों के बाहर निकलने की प्रक्रिया पर्याप्त रूप से सक्रिय नहीं है। इससे संसाधनों का अधिक उत्पादक क्षेत्रों में स्थानांतरण बाधित हो सकता है।
(ग) निष्क्रिय या जॉम्बी कंपनियाँ (Zombie Firms)
- जॉम्बी कंपनियाँ ऐसी कंपनियाँ होती हैं जो लंबे समय तक अपने परिचालन से उत्पन्न आय के आधार पर ऋण संबंधी दायित्वों को पूरा करने में कठिनाई अनुभव करती हैं और सामान्यतः कम उत्पादकता के बावजूद बाजार में बनी रहती हैं।
- प्रस्तुत लेख के अनुसार, लगभग 15% कंपनियाँ इस श्रेणी में आती हैं। ऐसी कंपनियों का बने रहना पूँजी और अन्य संसाधनों के कुशल आवंटन को कमजोर कर सकता है।
(घ) लाभ–प्राप्ति की राजनीति (Rent-seeking Behaviour)
लाभ-प्राप्ति की राजनीति से आशय ऐसी गतिविधियों से है जिनमें कंपनियाँ उत्पादकता, नवाचार और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के बजाय राजनीतिक संपर्कों, विशेष रियायतों या नियामकीय प्रक्रियाओं का लाभ उठाकर आर्थिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करती हैं।
इसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रवृत्तियाँ शामिल हो सकती हैं:
- नियामकीय नियमों में मौजूद कमियों का लाभ उठाना।
- संरक्षण प्राप्त लाभ-सीमाओं को बनाए रखना।
- विशेष कंपनियों को लक्षित रियायतें प्रदान करना।
- प्रतिस्पर्धा और उत्पादकता की तुलना में राजनीतिक संरक्षण पर अधिक निर्भर रहना।
मुख्य चिंता: राजनीतिक संरक्षण, अनुचित लाभ-प्राप्ति और कुछ व्यावसायिक समूहों को प्राथमिकता दिए जाने की धारणा निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को कमजोर करती है। इससे प्रशासनिक सुधारों की प्रभावशीलता भी सीमित हो जाती है।
व्यापार सुगमता संबंधी पूर्ववर्ती सुधारों की सीमाएँ (Limitations of Earlier EoDB Reforms)
भारत सरकार ने व्यापार सुगमता बढ़ाने और नियामकीय प्रक्रियाओं को सरल बनाने के लिए कई औपचारिक सुधार किए हैं।
प्रमुख सुधार
- कर सुधार (Tax Reforms): कर प्रणाली के कुछ हिस्सों का एकीकरण और सरलीकरण।
- श्रम सुधार (Labour Reforms): विभिन्न श्रम कानूनों को चार श्रम संहिताओं (Labour Codes) में समेकित करने की पहल।
- कॉरपोरेट सुधार (Corporate Reforms): कंपनियों के पंजीकरण की प्रक्रियाओं को सरल बनाना।
- अपराधमुक्तिकरण (Decriminalisation): कई छोटे नियामकीय उल्लंघनों के लिए आपराधिक दंड समाप्त करना।
- पर्यावरणीय नियमन (Environmental Regulations): अनुपालन संबंधी आवश्यकताओं को सरल बनाने के उद्देश्य से बदलाव।
हालाँकि, इन सुधारों के साथ कुछ नई जटिलताएँ भी सामने आई हैं।
- गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों (Quality Control Orders—QCOs) में अस्पष्टता और बार-बार बदलाव।
- कर प्रवर्तन में अनिश्चितता और असंगति।
- पूर्वव्यापी कराधान (Retrospective Taxation) को लेकर चिंताएँ।
- व्यवसायों और आम नागरिकों को प्रभावित करने वाले विस्तृत नियामकीय प्रावधानों का विस्तार।
इस प्रकार, नियमों का औपचारिक सरलीकरण आवश्यक रूप से अनुपालन को आसान नहीं बनाता और न ही संस्थागत दक्षता में स्वतः वृद्धि करता है।
यह विरोधाभास सरकार के उस घोषित दृष्टिकोण के विपरीत है जिसमें “अधिकतम सरकार, न्यूनतम शासन” (Maximum Government, Minimum Governance) के बजाय न्यूनतम अनावश्यक हस्तक्षेप और प्रभावी प्रशासन पर जोर दिया जाता है।
प्रशासनिक सुधार आयोग 1 और 2 प्रभावी परिणाम क्यों नहीं दे सके?
भारत में प्रशासनिक सुधार आयोग (Administrative Reforms Commission-ARC) के पहले और दूसरे प्रयासों का उद्देश्य प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक जवाबदेह, पारदर्शी और प्रभावी बनाना था। फिर भी, केवल प्रक्रियाओं और नियमों में बदलाव से प्रशासनिक व्यवस्था की मूल समस्याएँ दूर नहीं हो सकीं।
(क) लाभ–प्राप्ति की राजनीतिक अर्थव्यवस्था (Political Economy of Rent-seeking)
- आर्थिक लाभ और संसाधनों के वितरण को केवल केंद्रीकृत कर देने से लाभ-प्राप्ति की प्रवृत्ति समाप्त नहीं होती।
- सरकार के विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाले अनेक व्यक्ति और समूह अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके विशेष लाभ प्राप्त करने का प्रयास कर सकते हैं। डिजिटल शासन व्यवस्था होने के बावजूद अनौपचारिक नेटवर्क और विवेकाधीन हस्तक्षेपों के माध्यम से नियमों को दरकिनार किया जा सकता है।
- राजनीतिक प्रभाव के कारण प्रतिस्पर्धा, जवाबदेही और बाजार अनुशासन कमजोर हो सकते हैं।

(ख) नियमों में बदलाव को संस्थागत सुधार समझने की समस्या
- नियमों में बदलाव और संस्थागत सुधार दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।
- प्रक्रियागत सुधार (Procedural Reforms) का उद्देश्य नियमों, दस्तावेजों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाना है।
- इसके विपरीत, संस्थागत सुधार (Institutional Reforms) का उद्देश्य उन संस्थाओं की कार्य-संस्कृति, जवाबदेही, प्रोत्साहन संरचना और नियमों को लागू करने की क्षमता में बदलाव लाना है।
- यदि नियम सरल हो जाएँ, लेकिन उन्हें लागू करने वाली संस्थाओं का व्यवहार और कार्यप्रणाली न बदलें, तो अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होते।
- चीन का अनुभव यह समझने में उपयोगी है कि आर्थिक गतिशीलता केवल औपचारिक नीतियों पर नहीं, बल्कि व्यापक संस्थागत वातावरण पर भी निर्भर करती है।
- इसलिए सुधारों की सफलता को केवल संशोधित नियमों या सरल प्रक्रियाओं की संख्या से नहीं मापना चाहिए। यह देखना भी आवश्यक है कि नागरिकों और व्यवसायों को वास्तविक जीवन में कितना लाभ मिला है।
(ग) मानव संसाधन एवं नौकरशाही संबंधी चुनौतियाँ (Human Resource and Bureaucratic Challenges)
प्रशासनिक अधिकारियों के दृष्टिकोण, कार्यशैली और प्रशासन के प्रति उनकी प्राथमिकताओं में अंतर मानव संसाधन प्रबंधन की चुनौतियों को दर्शाता है।
प्रशासनिक सुधारों में निम्नलिखित पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है:
- नौकरशाही की कार्य-संस्कृति में सुधार।
- अधिकारियों के लिए उचित प्रोत्साहन और जवाबदेही सुनिश्चित करना।
- प्रशासनिक क्षमता निर्माण (Capacity Building)।
- निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना।
- नागरिकों के प्रति उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवहार को प्रोत्साहित करना।
अतः प्रशासनिक सुधारों को केवल प्रक्रियाओं तक सीमित न रखकर मानव संसाधन प्रबंधन और संस्थागत व्यवहार में भी बदलाव लाना चाहिए।
प्रभावी शासन के तीन आधारभूत सिद्धांत (Three Foundational Principles for Effective Governance)
(क) नागरिकों पर प्रारंभिक विश्वास (Presumptive Trust in Citizens)
- सुशासन के लिए नागरिकों को ऐसे स्वतंत्र और सक्षम व्यक्तियों के रूप में देखना आवश्यक है जो अपने मामलों का प्रबंधन कर सकते हैं।
- जब प्रशासन प्रत्येक नागरिक को संभावित नियम-उल्लंघनकर्ता मानकर अत्यधिक दस्तावेज, प्रमाण और अनुपालन की शर्तें लागू करता है, तो इससे प्रशासनिक लागत बढ़ती है और अधिकारियों के विवेकाधीन हस्तक्षेप की संभावना भी बढ़ सकती है।
- इसलिए शासन को अविश्वास-आधारित नियमन के स्थान पर विश्वास-आधारित नियमन की ओर बढ़ना चाहिए।
- इस दृष्टिकोण के अंतर्गत सामान्य परिस्थितियों में नागरिकों और व्यवसायों को काम करने की स्वतंत्रता दी जाती है तथा प्रमाणित उल्लंघनों के मामलों में आवश्यक कार्रवाई की जाती है।

(ख) शासन का विकेंद्रीकरण (Decentralisation of Governance)
- विकेंद्रीकरण का अर्थ निर्णय लेने और प्रशासनिक अधिकारों को उपयुक्त स्तरों तक हस्तांतरित करना है।
- अत्यधिक केंद्रीकरण से स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप निर्णय लेना कठिन हो सकता है। इससे स्थानीय जवाबदेही, प्रशासनिक उत्तरदायित्व और समस्याओं के त्वरित समाधान की क्षमता प्रभावित होती है।
- भारत में 73वें और 74वें संविधान संशोधनों का उद्देश्य क्रमशः पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय स्थानीय निकायों को संवैधानिक आधार प्रदान करना था।
प्रभावी विकेंद्रीकरण के लिए इन संस्थाओं को निम्नलिखित तीन प्रकार के संसाधन एवं अधिकार वास्तविक रूप से उपलब्ध कराने आवश्यक हैं:
- कार्य (Functions): स्थानीय विषयों पर जिम्मेदारियाँ और कार्य करने के अधिकार।
- वित्त (Funds): योजनाओं के संचालन के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन।
- कर्मचारी (Functionaries): कार्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक मानव संसाधन।
राज्यों और स्थानीय सरकारों को अधिक स्वायत्तता प्रदान करने से सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism), सहभागी शासन (Participatory Governance) और स्थानीय स्तर पर जवाबदेही को मजबूत किया जा सकता है।
(ग) अनावश्यक निगरानी और नियंत्रण को कम करना (Minimise Unnecessary Surveillance and Control)
- अत्यधिक निगरानी और नियामकीय नियंत्रण व्यवसायों की अनुपालन लागत बढ़ा सकते हैं तथा उद्यमशीलता और नवाचार को हतोत्साहित कर सकते हैं।
- सूचना एकत्र करने और निगरानी का विस्तार हमेशा बेहतर शासन सुनिश्चित नहीं करता। यदि इनका उपयोग अत्यधिक विवेकाधीन हस्तक्षेप के लिए किया जाता है, तो नागरिकों और व्यवसायों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
- इसलिए राज्य को वैध नियमन और अनावश्यक हस्तक्षेप के बीच स्पष्ट अंतर करना चाहिए। आवश्यक नियमन का उद्देश्य सार्वजनिक हित, सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि नागरिकों की प्रत्येक गतिविधि को नियंत्रित करना।
निष्कर्ष (Conclusion)
भारत के सामने मुख्य चुनौती प्रशासनिक सुधारों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि औपचारिक नीतिगत बदलावों और उनके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच मौजूद अंतर है।
मिशन-मोड में नीतियों के क्रियान्वयन से राजमार्ग निर्माण और औद्योगिक नीति के कुछ क्षेत्रों में उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त हुए हैं। हालाँकि, इन उपलब्धियों से व्यापक संस्थागत सुधारों की आवश्यकता समाप्त नहीं हो जाती।
प्रशासनिक सुधार 3.0 का उद्देश्य केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाना नहीं, बल्कि राज्य की संस्थाओं, प्रोत्साहन संरचनाओं और शासन-दर्शन में सुधार करना होना चाहिए।
इसके लिए भारत को ऊपर से नीचे की ओर लागू किए जाने वाले प्रक्रियागत बदलावों से आगे बढ़कर संरचनात्मक एवं संस्थागत परिवर्तन की दिशा में काम करना होगा। यही परिवर्तन अधिक गतिशील अर्थव्यवस्था, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा और उत्तरदायी शासन की स्थापना में सहायता कर सकते हैं।
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