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निगरानी पूंजीवाद (Surveillance Capitalism) : शोशाना ज़ुबॉफ़

सुबह उठते ही हम मोबाइल देखते हैं। कौन-सी खबर कितनी देर पढ़ी, किस वीडियो को आगे बढ़ाया, रास्ते में कहाँ रुके, रात को कितने बजे सोए, यह सब कहीं न कहीं दर्ज हो रहा है। हम इसे सुविधा मानते हैं: मुफ़्त सर्च इंजन, मुफ़्त ईमेल, मुफ़्त सोशल मीडिया। किंतु एक पुरानी कहावत है कि यदि कोई वस्तु मुफ़्त मिल रही है, तो संभव है कि आप स्वयं ही उत्पाद हों। अमेरिकी विदुषी शोशाना ज़ुबॉफ़ (Shoshana Zuboff) इस कहावत से भी एक कदम आगे जाती हैं। उनके अनुसार हम उत्पाद भी नहीं हैं; हम तो वह कच्चा माल हैं जिससे उत्पाद बनाए जाते हैं।

यह लेख दो भागों में है। पहले भाग में ज़ुबॉफ़ के सिद्धांत की मूल अवधारणाओं को सरल ढंग से समझा गया है। दूसरे भाग में बेंथम के पैनॉप्टिकॉन से लेकर फूको, डेल्यूज़ और ब्यंग-चुल हान तक निगरानी के राजनीतिक सिद्धांत की परंपरा से इसकी तुलना की गई है।

शोशाना ज़ुबॉफ़: परिचय

  • शोशाना ज़ुबॉफ़ का जन्म 1951 में अमेरिका में हुआ। वे हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल (Harvard Business School) में प्रोफ़ेसर रहीं और अब वहाँ की प्रोफ़ेसर एमेरिटा हैं।
  • उनकी पहली प्रसिद्ध पुस्तक “इन द एज ऑफ़ द स्मार्ट मशीन” (In the Age of the Smart Machine, 1988) थी, जिसमें उन्होंने कार्यस्थल पर कंप्यूटर के प्रभाव का अध्ययन किया।
  • दूसरी पुस्तक “द सपोर्ट इकॉनमी” (The Support Economy, 2002) उन्होंने जेम्स मैक्समिन (James Maxmin) के साथ लिखी।

“निगरानी पूंजीवाद” शब्द का व्यवस्थित प्रयोग उन्होंने 2015 के शोध-लेख “बिग अदर: सर्विलांस कैपिटलिज़्म एंड द प्रॉस्पेक्ट्स ऑफ़ एन इन्फ़ॉर्मेशन सिविलाइज़ेशन” (Big Other: Surveillance Capitalism and the Prospects of an Information Civilization) में किया।

  • 2019 में प्रकाशित पुस्तक “द एज ऑफ़ सर्विलांस कैपिटलिज़्म: द फ़ाइट फ़ॉर अ ह्यूमन फ़्यूचर एट द न्यू फ़्रंटियर ऑफ़ पावर” ने इस विचार को विश्वभर में चर्चित कर दिया।

भाग 1: निगरानी पूंजीवाद का सिद्धांत

निगरानी पूंजीवाद क्या है?

ज़ुबॉफ़ अपनी पुस्तक की शुरुआत ही परिभाषा से करती हैं। उनके अनुसार निगरानी पूंजीवाद एक नई आर्थिक व्यवस्था है, जो मानव अनुभव को छिपे हुए व्यावसायिक कार्यों, अर्थात् निष्कर्षण (Extraction), पूर्वानुमान (Prediction) और बिक्री (Sales), के लिए मुफ़्त कच्चे माल के रूप में अपना लेती है।

इस परिभाषा के तीन शब्द ध्यान देने योग्य हैं:

  • मानव अनुभव: हमारी खोज, बातचीत, चाल-ढाल, आवाज़, चेहरा, भावनाएँ, सब कुछ।
  • मुफ़्त कच्चा माल: कंपनियाँ इसके लिए कोई मूल्य नहीं चुकातीं और प्रायः हमसे वास्तविक अनुमति भी नहीं लेतीं।
  • छिपे हुए कार्य: यह पूरी प्रक्रिया उपयोगकर्ता की जानकारी से बाहर, पर्दे के पीछे चलती है।

औद्योगिक पूंजीवाद प्रकृति को कच्चा माल मानता था; निगरानी पूंजीवाद मनुष्य के निजी जीवन को कच्चा माल मानता है। यही इस सिद्धांत का मूल अंतर है।

कहानी की शुरुआत: गूगल और “व्यवहारगत अधिशेष”

ज़ुबॉफ़ के अनुसार निगरानी पूंजीवाद का जन्म गूगल (Google) में हुआ। शुरुआती वर्षों में गूगल उपयोगकर्ताओं की खोज से बचे हुए डेटा, जैसे शब्दों की वर्तनी, क्लिक का पैटर्न और खोज में लगा समय, का उपयोग केवल अपनी सेवा को बेहतर बनाने में करता था। ज़ुबॉफ़ इसे “व्यवहारगत मूल्य पुनर्निवेश चक्र” (Behavioral Value Reinvestment Cycle) कहती हैं: उपयोगकर्ता से डेटा लिया गया और उसी के लाभ के लिए लौटा दिया गया।

सन् 2000-2001 के डॉट-कॉम संकट (Dot-com Crash) के समय निवेशकों का दबाव बढ़ा और गूगल को मुनाफ़े का रास्ता चाहिए था। तब कंपनी ने पाया कि सेवा सुधारने के बाद भी बहुत-सा डेटा बच जाता है। इसी बचे हुए डेटा से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन व्यक्ति किस विज्ञापन पर क्लिक करेगा। ज़ुबॉफ़ ने इस अतिरिक्त डेटा को “व्यवहारगत अधिशेष” (Behavioral Surplus) कहा।

यह शब्द कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के “अधिशेष मूल्य” (Surplus Value) की याद दिलाता है। मार्क्स के लिए मज़दूर के श्रम का वह भाग जिसका भुगतान नहीं होता, पूंजीपति का मुनाफ़ा बनता है। ज़ुबॉफ़ के लिए हमारे व्यवहार का वह भाग जो सेवा के लिए आवश्यक नहीं, कंपनी का मुनाफ़ा बनता है। गूगल के विज्ञापन कार्यक्रम एडवर्ड्स (AdWords) की सफलता ने इस मॉडल को सिद्ध कर दिया, और बाद में फ़ेसबुक (Facebook) तथा अन्य कंपनियों ने इसे अपना लिया। ज़ुबॉफ़ गूगल को इस व्यवस्था का अग्रदूत और फ़ेसबुक को उसका तेज़ अनुयायी मानती हैं।

पूर्वानुमान उत्पाद और व्यवहारगत भविष्य बाज़ार

व्यवहारगत अधिशेष को मशीन लर्निंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की “मशीनी बुद्धि” (Machine Intelligence) में डाला जाता है। इससे जो निकलता है, उसे ज़ुबॉफ़ “पूर्वानुमान उत्पाद” (Prediction Products) कहती हैं। ये उत्पाद बताते हैं कि हम अभी, जल्द ही और आगे चलकर क्या करेंगे, क्या खरीदेंगे, किसे वोट देंगे।

इन पूर्वानुमानों को एक नए प्रकार के बाज़ार में बेचा जाता है, जिसे ज़ुबॉफ़ “व्यवहारगत भविष्य बाज़ार” (Behavioral Futures Markets) कहती हैं। यहाँ खरीदार हम नहीं हैं, बल्कि विज्ञापनदाता, बीमा कंपनियाँ, राजनीतिक सलाहकार और अन्य व्यवसाय हैं, जो हमारे भविष्य के व्यवहार पर दाँव लगाते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया को एक सरल क्रम में समझा जा सकता है:

मानव अनुभव → डेटा के रूप में दर्ज होना → व्यवहारगत अधिशेष → मशीनी बुद्धि → पूर्वानुमान उत्पाद → व्यवहारगत भविष्य बाज़ार → मुनाफ़ा।

ज़ुबॉफ़ का प्रसिद्ध कथन इसी को स्पष्ट करता है: हम निगरानी पूंजीवाद के ग्राहक नहीं हैं; हम उसके कच्चे माल के स्रोत हैं।

निगरानी पूंजीवाद के नियम: दो अनिवार्यताएँ

ज़ुबॉफ़ बताती हैं कि इस व्यवस्था को आगे बढ़ाने वाले दो आंतरिक दबाव हैं।

1. निष्कर्षण अनिवार्यता (Extraction Imperative)

पूर्वानुमान जितने सटीक होंगे, उतना अधिक मुनाफ़ा होगा, और सटीकता के लिए अधिक डेटा चाहिए। इसलिए कंपनियाँ लगातार अधिक से अधिक डेटा जुटाने का प्रयास करती हैं। इसे वे “पैमाने की अर्थव्यवस्था” (Economies of Scale) कहती हैं।

2. पूर्वानुमान अनिवार्यता (Prediction Imperative)

केवल अधिक डेटा काफ़ी नहीं; उसमें विविधता भी चाहिए। इसलिए निगरानी ऑनलाइन दुनिया से निकलकर वास्तविक दुनिया में पहुँचती है: स्मार्ट घड़ी, स्मार्ट स्पीकर, कार, घर के उपकरण और शहर तक। इसे “विस्तार की अर्थव्यवस्था” (Economies of Scope) कहा गया।

इसके बाद सबसे गंभीर चरण आता है, जिसे ज़ुबॉफ़ “क्रिया की अर्थव्यवस्था” (Economies of Action) कहती हैं। सबसे सटीक पूर्वानुमान वह है जिसमें व्यवहार को पहले ही बदल दिया जाए। यानी कंपनियाँ केवल यह नहीं जानना चाहतीं कि आप क्या करेंगे; वे चाहती हैं कि आप वही करें जिससे उनका मुनाफ़ा बढ़े।

व्यवहार में परिवर्तन के साधन

ज़ुबॉफ़ के अनुसार व्यवहार बदलने के तीन तरीके हैं:

  • ट्यूनिंग (Tuning): छोटे संकेतों, नोटिफ़िकेशन और सुझावों से व्यक्ति को एक दिशा में धकेलना। व्यवहारगत अर्थशास्त्र में इसे “नज” (Nudge) भी कहते हैं।
  • हर्डिंग (Herding): व्यक्ति के आसपास का वातावरण इस प्रकार बदलना कि उसके पास कुछ ही विकल्प बचें।
  • कंडीशनिंग (Conditioning): पुरस्कार और दंड से आदत डालना, जैसे लाइक, बैज और स्ट्रीक।

ज़ुबॉफ़ इसके तीन उदाहरण देती हैं:

  • फ़ेसबुक का 2010 का प्रयोग, जिसमें अमेरिकी कांग्रेस चुनाव के दिन लगभग छह करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं को “मैंने वोट दिया” संदेश दिखाकर मतदान पर प्रभाव डाला गया।
  • फ़ेसबुक का “भावनात्मक संक्रमण” (Emotional Contagion) प्रयोग, जो 2014 में प्रकाशित हुआ। इसमें न्यूज़ फ़ीड बदलकर उपयोगकर्ताओं की भावनाओं को प्रभावित किया गया।
  • 2016 का मोबाइल खेल “पोकेमॉन गो” (Pokémon Go), जिसमें खिलाड़ियों को उन दुकानों और रेस्तराँ तक ले जाया गया जिन्होंने इसके लिए भुगतान किया था। ज़ुबॉफ़ के लिए यह “क्रिया की अर्थव्यवस्था” का जीवंत उदाहरण है।

कब्ज़े का चक्र (Dispossession Cycle)

निगरानी पूंजीवाद आगे कैसे बढ़ता है? ज़ुबॉफ़ चार चरण बताती हैं:

  • घुसपैठ (Incursion): बिना पूछे किसी नए क्षेत्र में प्रवेश, जैसे गलियों की तस्वीरें लेना।
  • आदत (Habituation): विरोध होता है, पर मुक़दमे और जाँच में वर्षों लग जाते हैं, तब तक लोग इसके आदी हो जाते हैं।
  • अनुकूलन (Adaptation): दबाव बढ़ने पर कंपनी दिखावटी सुधार करती है।
  • पुनर्निर्देशन (Redirection): नए नाम और नए तरीके से वही काम फिर शुरू हो जाता है।

उपकरणवादी सत्ता और “बिग अदर”

ज़ुबॉफ़ के सिद्धांत का सबसे राजनीतिक पक्ष “उपकरणवादी सत्ता” (Instrumentarian Power) की अवधारणा है। इसका अर्थ है वह सत्ता जो मानव व्यवहार को जानकर, मापकर और उसमें बदलाव करके दूसरों के लक्ष्यों के लिए उसका उपयोग करती है।

इस सत्ता का साधन एक सर्वव्यापी डिजिटल ढाँचा है, जिसे ज़ुबॉफ़ “बिग अदर” (Big Other) कहती हैं। यह नाम जॉर्ज ऑरवेल (George Orwell) के उपन्यास “नाइनटीन एटी-फ़ोर” (1984) के “बिग ब्रदर” (Big Brother) की ओर संकेत करता है, पर दोनों में बड़ा अंतर है:

ज़ुबॉफ़ कहती हैं कि अधिनायकवाद व्यक्ति की आत्मा को बदलना चाहता था; उपकरणवाद को आपकी आत्मा से कोई मतलब नहीं, उसे केवल आपका व्यवहार चाहिए। वे इसे “रेडिकल इनडिफ़रेंस” (Radical Indifference), यानी गहरी उदासीनता कहती हैं: कंपनी को इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि सामग्री सच है या झूठ, जब तक लोग उसे देखते रहें।

अधिनायकवाद की समझ के लिए ज़ुबॉफ़ हन्ना आरेंट (Hannah Arendt) का सहारा लेती हैं, और उपकरणवाद की वैचारिक जड़ें वे मनोवैज्ञानिक बी.एफ. स्किनर (B.F. Skinner) के “आमूल व्यवहारवाद” (Radical Behaviorism) में खोजती हैं। स्किनर ने “वाल्डेन टू” (Walden Two, 1948) और “बियॉन्ड फ़्रीडम एंड डिग्निटी” (Beyond Freedom and Dignity, 1971) में ऐसे समाज की कल्पना की थी जहाँ व्यवहार को वैज्ञानिक ढंग से नियंत्रित किया जाए। ज़ुबॉफ़ के अनुसार आज की टेक कंपनियाँ इसी सपने को डिजिटल रूप में साकार कर रही हैं। वे एमआईटी के एलेक्स पेंटलैंड (Alex Pentland) की “सामाजिक भौतिकी” (Social Physics) को भी इसी सोच का उदाहरण मानती हैं।

 

मानव स्वतंत्रता पर ख़तरा: दो नए अधिकार

ज़ुबॉफ़ के अनुसार निगरानी पूंजीवाद हमसे दो बुनियादी अधिकार छीन रहा है:

  • “भविष्य काल का अधिकार” (Right to the Future Tense): अपने भविष्य की कल्पना करने, वादा करने और अपनी इच्छा से निर्णय लेने का अधिकार। जब हमारा भविष्य पहले से अनुमानित और निर्देशित हो, तो स्वतंत्र इच्छा (Free Will) का अर्थ ही खो जाता है।
  • “शरण का अधिकार” (Right to Sanctuary): एक ऐसा निजी स्थान जहाँ कोई देख न रहा हो। स्मार्ट घर और स्मार्ट उपकरणों ने घर की चारदीवारी को भी निगरानी का क्षेत्र बना दिया है।

समाज में ज्ञान का विभाजन

ज़ुबॉफ़ का एक और महत्वपूर्ण विचार “समाज में ज्ञान का विभाजन” (Division of Learning in Society) है। औद्योगिक युग में “श्रम विभाजन” (Division of Labour) प्रमुख था, जिस पर एमिल दुर्खीम (Émile Durkheim) ने लिखा था। डिजिटल युग में असली सवाल ज्ञान का है। ज़ुबॉफ़ तीन प्रश्न पूछती हैं:

  1. कौन जानता है? (Who knows?)
  2. कौन निर्णय करता है? (Who decides?)
  3. कौन तय करता है कि कौन निर्णय करेगा? (Who decides who decides?)

आज इन तीनों प्रश्नों का उत्तर कुछ गिनी-चुनी टेक कंपनियाँ हैं। वे हमारे बारे में बहुत कुछ जानती हैं, जबकि हम उनके बारे में लगभग कुछ नहीं जानते। इसे ज़ुबॉफ़ “ज्ञानमीमांसीय असमानता” (Epistemic Inequality) कहती हैं। 2021 में न्यूयॉर्क टाइम्स में प्रकाशित लेख “द कू वी आर नॉट टॉकिंग अबाउट” (The Coup We Are Not Talking About) में उन्होंने इसे “ज्ञानमीमांसीय तख्तापलट” (Epistemic Coup) कहा, अर्थात् लोकतांत्रिक समाज से ज्ञान की सत्ता का चुपचाप छिन जाना।

कार्ल पोलान्यी से संबंध

ज़ुबॉफ़ का तर्क कार्ल पोलान्यी (Karl Polanyi) की पुस्तक “द ग्रेट ट्रांसफ़ॉर्मेशन” (The Great Transformation, 1944) से जुड़ता है। पोलान्यी ने कहा था कि बाज़ार अर्थव्यवस्था ने भूमि, श्रम और मुद्रा को “कल्पित वस्तु” (Fictitious Commodities) बना दिया, जबकि ये बिकने के लिए बनी ही नहीं थीं। ज़ुबॉफ़ के अनुसार निगरानी पूंजीवाद ने इसमें चौथी कल्पित वस्तु जोड़ दी है: मानव अनुभव। जिस प्रकार पोलान्यी के समय समाज ने श्रम कानूनों से बाज़ार पर लगाम लगाई, उसी प्रकार आज लोकतांत्रिक कानूनों से निगरानी पूंजीवाद पर लगाम लगानी होगी।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

  • एवगेनी मोरोज़ोव (Evgeny Morozov) ने 2019 में अपनी समीक्षा “कैपिटलिज़्म्स न्यू क्लोद्स” (Capitalism’s New Clothes) में कहा कि ज़ुबॉफ़ समस्या को केवल “बुरे पूंजीवाद” तक सीमित करती हैं, जबकि असली समस्या स्वयं पूंजीवाद का तर्क है।
  • मार्क्सवादी विद्वानों का तर्क है कि ज़ुबॉफ़ श्रम और वर्ग संघर्ष की उपेक्षा करती हैं, और उनका समाधान अधिक “ज़िम्मेदार पूंजीवाद” की ओर लौटना भर है।
  • कोरी डॉक्टोरो (Cory Doctorow) ने “हाउ टू डिस्ट्रॉय सर्विलांस कैपिटलिज़्म” (How to Destroy Surveillance Capitalism, 2020) में कहा कि ज़ुबॉफ़ कंपनियों की मन बदलने की क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर बताती हैं; असली समस्या एकाधिकार (Monopoly) है, जिसका उपचार प्रतिस्पर्धा कानून है।
  • कुछ आलोचक कहते हैं कि ज़ुबॉफ़ राज्य द्वारा की जाने वाली निगरानी, जैसे एडवर्ड स्नोडेन (Edward Snowden) द्वारा उजागर अमेरिकी एनएसए कार्यक्रम, को अपेक्षाकृत कम महत्व देती हैं।
  • पुस्तक का केंद्र अमेरिका है; चीन जैसे देशों में राज्य और कंपनियों की मिली-जुली निगरानी इसके ढाँचे में पूरी तरह नहीं आती।
  • फिर भी इस सिद्धांत का योगदान निर्विवाद है: इसने डिजिटल अर्थव्यवस्था को सत्ता और लोकतंत्र के प्रश्न से जोड़ा, और एक ऐसी शब्दावली दी जिससे आम नागरिक भी इस छिपी प्रक्रिया को समझ सके।

भाग 2: तुलनात्मक अध्ययन

निगरानी कोई नया विषय नहीं है। राजनीतिक चिंतन में इस पर दो सौ वर्षों से अधिक समय से विचार होता रहा है। ज़ुबॉफ़ को ठीक से समझने के लिए इस परंपरा को देखना आवश्यक है।

जेरेमी बेंथम: पैनॉप्टिकॉन

उपयोगितावादी विचारक जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) ने 1791 में “पैनॉप्टिकॉन” (Panopticon) नामक जेल की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसमें कैदियों की कोठरियाँ गोलाई में बनी होती हैं और बीच में एक ऊँचा निगरानी मीनार होता है। मीनार से हर कोठरी दिखती है, पर कैदी यह नहीं देख सकता कि मीनार में कोई है या नहीं। परिणाम यह होता है कि कैदी हर समय यह मानकर चलता है कि उसे देखा जा रहा है, और स्वयं ही अनुशासित हो जाता है। बेंथम ने इसे “मन पर मन की सत्ता प्राप्त करने का नया तरीका” कहा।

जॉर्ज ऑरवेल: बिग ब्रदर

जॉर्ज ऑरवेल ने उपन्यास “नाइनटीन एटी-फ़ोर” (1949) में एक ऐसे अधिनायकवादी राज्य का चित्रण किया जहाँ “बिग ब्रदर इज़ वॉचिंग यू” (Big Brother is watching you) का नारा हर ओर लिखा है। यहाँ निगरानी राज्य करता है, और उसका उद्देश्य विचारों पर नियंत्रण है, यहाँ तक कि भाषा को बदलकर (“न्यूस्पीक”, Newspeak) सोचने की क्षमता को ही सीमित करना। बीसवीं सदी में निगरानी की समझ लंबे समय तक इसी छवि से बनी रही।

मिशेल फूको: अनुशासनात्मक समाज

फ़्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको (Michel Foucault) ने “डिसिप्लिन एंड पनिश” (Discipline and Punish, 1975) में पैनॉप्टिकॉन को आधुनिक समाज का प्रतीक बना दिया। उनके अनुसार केवल जेल ही नहीं, बल्कि स्कूल, अस्पताल, सेना और कारखाने भी इसी सिद्धांत पर चलते हैं। इसे उन्होंने “पैनॉप्टिसिज़्म” (Panopticism) कहा।

फूको की मुख्य बातें:

  • आधुनिक सत्ता दंड और हिंसा से कम, निगरानी और अनुशासन से अधिक चलती है। इसे “अनुशासनात्मक सत्ता” (Disciplinary Power) कहा गया।
  • सत्ता केवल रोकती नहीं, बल्कि “आज्ञाकारी शरीर” (Docile Bodies) और “सामान्य” व्यक्ति का निर्माण भी करती है।
  • सत्ता और ज्ञान आपस में जुड़े हैं (Power/Knowledge): जो जानता है, वही नियंत्रित करता है।
  • बाद में फूको ने “जैव-सत्ता” (Biopower) की अवधारणा दी, जिसमें राज्य पूरी आबादी के स्वास्थ्य, जन्म और मृत्यु को नियंत्रित करता है।
  • ज़ुबॉफ़ और फूको दोनों सत्ता और ज्ञान के संबंध पर बल देते हैं, पर फूको की निगरानी संस्थाओं की दीवारों के भीतर होती है, जबकि ज़ुबॉफ़ की निगरानी हर जगह है।

जील डेल्यूज़: नियंत्रण समाज

फ़्रांसीसी दार्शनिक जील डेल्यूज़ (Gilles Deleuze) ने 1990 के छोटे पर प्रसिद्ध निबंध “पोस्टस्क्रिप्ट ऑन द सोसाइटीज़ ऑफ़ कंट्रोल” (Postscript on the Societies of Control) में कहा कि फूको का अनुशासनात्मक समाज अब समाप्त हो रहा है और उसकी जगह “नियंत्रण समाज” (Society of Control) ले रहा है।

  • अनुशासनात्मक समाज में व्यक्ति एक बंद संस्था से दूसरी में जाता था: परिवार से स्कूल, स्कूल से कारखाना।
  • नियंत्रण समाज में दीवारें नहीं हैं; नियंत्रण लगातार और हर जगह चलता है, पासवर्ड, कोड और डेटा के माध्यम से।
  • व्यक्ति अब “इंडिविजुअल” (Individual) नहीं, बल्कि “डिविजुअल” (Dividual) बन जाता है, अर्थात् डेटा के टुकड़ों में बँटा हुआ।
  • डेल्यूज़ का यह विचार ज़ुबॉफ़ के निगरानी पूंजीवाद का सबसे निकट पूर्वज माना जाता है, क्योंकि दोनों में निगरानी खुली, लगातार और डेटा आधारित है।

निगरानी अध्ययन: लायन, हैगर्टी-एरिक्सन और मैथिसन

  • थॉमस मैथिसन (Thomas Mathiesen) ने 1997 में “सिनॉप्टिकॉन” (Synopticon) की अवधारणा दी: पैनॉप्टिकॉन में थोड़े लोग बहुतों को देखते हैं, जबकि मीडिया युग में बहुत लोग थोड़े लोगों (सेलिब्रिटी) को देखते हैं।
  • केविन हैगर्टी (Kevin Haggerty) और रिचर्ड एरिक्सन (Richard Ericson) ने 2000 में “निगरानी समुच्चय” (Surveillant Assemblage) की बात की, जिसमें अलग-अलग स्रोतों से डेटा जुड़कर व्यक्ति का “डेटा प्रतिरूप” (Data Double) बनता है।
  • डेविड लायन (David Lyon) को “निगरानी अध्ययन” (Surveillance Studies) का प्रमुख विद्वान माना जाता है। ज़िग्मुंट बाउमन (Zygmunt Bauman) के साथ उन्होंने “लिक्विड सर्विलांस” (Liquid Surveillance, 2013) लिखी, और “द कल्चर ऑफ़ सर्विलांस” (The Culture of Surveillance, 2018) में बताया कि आज लोग स्वयं अपनी निगरानी में भाग लेते हैं।

ब्यंग-चुल हान: मनोराजनीति

दक्षिण कोरियाई मूल के जर्मन दार्शनिक ब्यंग-चुल हान (Byung-Chul Han) ने “साइकोपॉलिटिक्स” (Psychopolitics, अंग्रेज़ी 2017) में कहा कि आज की सत्ता “मैत्रीपूर्ण” और “स्मार्ट” है। वह मना नहीं करती, बल्कि प्रेरित करती है। लोग किसी दबाव में नहीं, बल्कि अपनी इच्छा से अपनी निजी जानकारी साझा करते हैं। हान के अनुसार व्यक्ति आज स्वयं का शोषण करता है और उसे स्वतंत्रता समझता है। फूको की “जैव-राजनीति” अब “मनोराजनीति” बन गई है, जो शरीर के बजाय मन को लक्ष्य बनाती है।

ज़ुबॉफ़ की विशिष्टता

इस परंपरा में ज़ुबॉफ़ का स्थान तीन कारणों से अलग है:

  • निगरानी का संचालक: पहले के विचारकों में निगरानी मुख्यतः राज्य या संस्थाएँ करती थीं; ज़ुबॉफ़ के अनुसार आज सबसे बड़ी निगरानी करने वाली शक्ति बाज़ार है।
  • निगरानी का उद्देश्य: पहले लक्ष्य अनुशासन या आज्ञापालन था; अब लक्ष्य मुनाफ़ा है। अनुशासन अब साधन है, साध्य नहीं।
  • निगरानी का स्वरूप: पैनॉप्टिकॉन में व्यक्ति जानता था कि उसे देखा जा रहा है, इसलिए वह स्वयं को सुधारता था। निगरानी पूंजीवाद में देखने वाला अदृश्य है और लक्ष्य यह है कि व्यक्ति को पता ही न चले कि उसके व्यवहार को बदला जा रहा है।

संक्षेप में, बेंथम और फूको का प्रश्न था “व्यक्ति को अनुशासित कैसे करें?”, ऑरवेल का प्रश्न था “व्यक्ति के विचार को कैसे नियंत्रित करें?”, और ज़ुबॉफ़ के अनुसार आज की कंपनियों का प्रश्न है “व्यक्ति के व्यवहार से मुनाफ़ा कैसे कमाएँ?”

डिजिटल पूंजीवाद की अन्य व्याख्याएँ

ज़ुबॉफ़ के समकालीन कुछ और विचारक भी इसी विषय पर अलग दृष्टि रखते हैं:

  • निक श्रनिसेक (Nick Srnicek), “प्लेटफ़ॉर्म कैपिटलिज़्म” (Platform Capitalism, 2016): डेटा आज का नया कच्चा माल है, और प्लेटफ़ॉर्म वह ढाँचा है जिस पर नई अर्थव्यवस्था खड़ी है। श्रनिसेक का दृष्टिकोण ज़ुबॉफ़ से अधिक मार्क्सवादी है।
  • निक कूल्ड्री (Nick Couldry) और यूलिसेस मेजियास (Ulises Mejias), “द कॉस्ट्स ऑफ़ कनेक्शन” (The Costs of Connection, 2019): इन्होंने “डेटा उपनिवेशवाद” (Data Colonialism) की अवधारणा दी, जिसके अनुसार जैसे उपनिवेशवाद ने भूमि और संसाधनों पर कब्ज़ा किया, वैसे ही आज मानव जीवन पर कब्ज़ा हो रहा है।
  • युवाल नोआ हरारी (Yuval Noah Harari) ने “डेटावाद” (Dataism) को एक नए धर्म के रूप में देखा है, जिसमें डेटा प्रवाह को सर्वोच्च मूल्य माना जाता है।

भारतीय संदर्भ

भारत आज विश्व के सबसे बड़े डिजिटल बाज़ारों में से एक है, इसलिए यह बहस हमारे लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण है:

  • न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (2017) में सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने निजता को अनुच्छेद 21 के अंतर्गत मौलिक अधिकार माना। निर्णय में “सूचनात्मक निजता” (Informational Privacy) पर भी विचार किया गया।
  • डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 (Digital Personal Data Protection Act) सहमति, उद्देश्य की सीमा और डेटा प्रत्ययी (Data Fiduciary) की ज़िम्मेदारी जैसे सिद्धांत लाता है, जो ज़ुबॉफ़ की चिंताओं का एक कानूनी उत्तर है।
  • आधार, पेगासस प्रकरण और सोशल मीडिया पर चुनावी विज्ञापनों से जुड़ी बहसें दिखाती हैं कि भारत में निगरानी का प्रश्न राज्य और बाज़ार, दोनों से जुड़ा है।
  • यूरोपीय संघ का सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन (GDPR, 2018) इस दिशा में विश्व का सबसे चर्चित कानून है, जिसका प्रभाव भारत सहित कई देशों के कानूनों पर दिखता है।

निष्कर्ष

शोशाना ज़ुबॉफ़ का निगरानी पूंजीवाद सिद्धांत हमें बताता है कि डिजिटल तकनीक तटस्थ नहीं है। उसके पीछे एक आर्थिक तर्क काम करता है, जो मानव अनुभव को कच्चा माल, व्यवहार को पूर्वानुमान उत्पाद और भविष्य को बाज़ार की वस्तु बना देता है। बेंथम के पैनॉप्टिकॉन से फूको के अनुशासन, डेल्यूज़ के नियंत्रण और हान की मनोराजनीति तक जो यात्रा दिखाई देती है, ज़ुबॉफ़ उसमें एक नया अध्याय जोड़ती हैं: निगरानी अब मुख्यतः राज्य की नहीं, बाज़ार की शक्ति है, और उसका लक्ष्य अनुशासन नहीं, मुनाफ़ा है।

आलोचक भले कहें कि ज़ुबॉफ़ पूंजीवाद की जड़ तक नहीं जातीं या कंपनियों की शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर बताती हैं, फिर भी उन्होंने लोकतंत्र के सामने एक बुनियादी प्रश्न रखा है: “कौन जानता है, कौन निर्णय करता है, और कौन तय करता है कि कौन निर्णय करेगा?” इस प्रश्न का लोकतांत्रिक उत्तर ही तय करेगा कि डिजिटल युग में मनुष्य स्वतंत्र नागरिक रहेगा या केवल डेटा का स्रोत।

PYQ-आधारित परीक्षा तथ्य

UGC NET और अन्य परीक्षाओं में इन विषयों पर बार-बार प्रश्न बनते रहे हैं। नीचे दिए गए तथ्य उन्हीं प्रवृत्तियों पर आधारित हैं:

  • “Capitalism, Socialism and Democracy” का प्रकाशन वर्ष 1942 है।
  • शुम्पीटर ने लोकतंत्र को “पद्धति” (Method) कहा, साध्य नहीं।
  • परिभाषा: जनता के वोट के लिए प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष द्वारा निर्णय लेने की शक्ति प्राप्त करना; यह शुम्पीटर की परिभाषा है।
  • शुम्पीटर ने ग्रंथ के अध्याय 21 में शास्त्रीय सिद्धांत की आलोचना की और अध्याय 22 में “Another Theory of Democracy” दी।
  • “सृजनात्मक विनाश” (Creative Destruction) शुम्पीटर की अवधारणा है।
  • “निर्मित इच्छा” (Manufactured Will) और “राजनीतिक बैक-सीट ड्राइविंग” शुम्पीटर से जुड़े पद हैं।
  • शुम्पीटर के अनुसार पूंजीवाद अपनी सफलता के कारण समाप्त होगा, विफलता के कारण नहीं।
  • डेविड हेल्ड ने वेबर और शुम्पीटर के मॉडल को “Competitive Elitist Democracy” कहा।
  • सी.बी. मैकफर्सन के चार मॉडल: संरक्षणात्मक, विकासात्मक, संतुलन (Equilibrium) और सहभागी। शुम्पीटर का मॉडल “संतुलन लोकतंत्र” है।
  • “The Theory of Democratic Elitism: A Critique” (1967) के लेखक पीटर बैकरक हैं।
  • “Participation and Democratic Theory” (1970) के लेखक कैरोल पेटमैन हैं।
  • “अल्पतंत्र का लौह नियम” रॉबर्ट मिशेल्स ने दिया।
  • “अभिजनों का परिभ्रमण” और “शेर-लोमड़ी” पैरेटो से संबंधित हैं।
  • “शासक वर्ग” (Ruling Class / Political Class) की अवधारणा मोस्का की है।
  • “The Power Elite” (1956) सी. राइट मिल्स की कृति है।
  • “सामान्य इच्छा” और “सबकी इच्छा” का भेद रूसो ने “The Social Contract” (1762) में किया।
  • “बहुमत का अत्याचार” की चिंता जे.एस. मिल और टॉकविल दोनों से जुड़ी है।
  • हंटिंगटन ने “The Third Wave” (1991) में शुम्पीटर की न्यूनतम परिभाषा अपनाई।
  • एंथनी डाउन्स की “An Economic Theory of Democracy” (1957) शुम्पीटर के बाज़ार सादृश्य का विस्तार है।
  • “Plebiscitary Leadership Democracy” मैक्स वेबर की अवधारणा है।

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Global IR (वैश्विक अंतरराष्ट्रीय संबंध)