अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations-IR) के अध्ययन में लंबे समय तक पश्चिमी यूरोप और अमेरिका में विकसित सिद्धांतों का प्रभुत्व रहा है। यथार्थवाद (Realism), उदारवाद (Liberalism), नवयथार्थवाद (Neorealism) और नवउदार संस्थावाद (Neoliberal Institutionalism) जैसे सिद्धांतों ने राज्य, शक्ति, सुरक्षा, सहयोग, युद्ध और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण वैचारिक आधार प्रदान किया है। लेकिन इन सिद्धांतों की प्रमुख अवधारणाएँ और ऐतिहासिक व्याख्याएँ प्रायः यूरोपीय राज्य-व्यवस्था, पश्चिमी आधुनिकता, औद्योगिक विकास, शीत युद्ध और अमेरिका की वैश्विक भूमिका के अनुभवों से प्रभावित रही हैं।
इस स्थिति के कारण एक बुनियादी प्रश्न सामने आता है: क्या यूरोप और अमेरिका के ऐतिहासिक अनुभवों से विकसित सिद्धांत पूरी दुनिया की अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समान रूप से समझा सकते हैं?
- एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों ने उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलनों, गुटनिरपेक्षता, विकास संबंधी असमानताओं, सांस्कृतिक विविधता और बाहरी हस्तक्षेप के विशिष्ट अनुभव प्राप्त किए हैं। इन अनुभवों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति की ऐसी प्रक्रियाओं को जन्म दिया है, जिन्हें केवल पश्चिमी ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
- इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों को पश्चिम-केंद्रित दृष्टिकोण से आगे ले जाकर विभिन्न सभ्यताओं, ऐतिहासिक परंपराओं, राजनीतिक अनुभवों और ज्ञान-परंपराओं को सिद्धांत निर्माण में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया जाता है।
- इस बौद्धिक प्रयास का उद्देश्य पश्चिमी सिद्धांतों को पूरी तरह अस्वीकार करना नहीं, बल्कि उन्हें अन्य समाजों के अनुभवों के साथ संवाद में रखकर अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अधिक समावेशी, बहुलतावादी और वैश्विक समझ विकसित करना है।
प्रमुख विद्वान: Amitav Acharya
उनके विचारों से संबंधित प्रमुख अवधारणा है: Global IR (वैश्विक अंतरराष्ट्रीय संबंध)।
इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन को अधिक समावेशी बनाना तथा विश्व की विभिन्न ऐतिहासिक और बौद्धिक परंपराओं को सिद्धांत निर्माण में उचित स्थान देना है।
पश्चिम–केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
2.1 अंतरराष्ट्रीय संबंधों का पारंपरिक विकास
अंतरराष्ट्रीय संबंध एक स्वतंत्र शैक्षणिक विषय के रूप में विशेष रूप से प्रथम विश्व युद्ध के बाद विकसित हुआ। वर्ष 1919 में वेल्स विश्वविद्यालय, एबरिस्टविथ में अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पहली प्रतिष्ठित अकादमिक चेयर की स्थापना को इस विषय के संस्थागत विकास का महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।
इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध, शीत युद्ध और अमेरिका-सोवियत संघ की प्रतिस्पर्धा ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों के विकास को प्रभावित किया।
| ऐतिहासिक घटना | सिद्धांतों पर प्रभाव |
| 1648 की वेस्टफेलिया संधि | संप्रभु राज्य और राज्य-केंद्रित व्यवस्था की पारंपरिक व्याख्या |
| प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) | आदर्शवाद और सामूहिक सुरक्षा की बहस |
| द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) | यथार्थवाद, शक्ति और राष्ट्रीय हित पर बल |
| शीत युद्ध (लगभग 1947-1991) | नवयथार्थवाद, सुरक्षा प्रतिस्पर्धा और परमाणु प्रतिरोध |
| 1991 के बाद | वैश्वीकरण, उदार संस्थावाद, पहचान, मानदंड और क्षेत्रीय व्यवस्थाओं पर बढ़ता ध्यान |
| 21वीं सदी | चीन का उदय, वैश्विक दक्षिण की भूमिका, बहुध्रुवीयता और Global IR की प्रासंगिकता |
प्रमुख पश्चिम–केंद्रित सिद्धांत और उनकी सीमाएँ
(क) यथार्थवाद (Realism): प्रमुख विद्वान: Hans J. Morgenthau और E. H. Carr
यह दृष्टिकोण शक्ति, राष्ट्रीय हित, प्रतिस्पर्धा और सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्रीय तत्त्व मानता है। इसकी एक संभावित सीमा यह है कि यदि इसे अकेले अपनाया जाए, तो नैतिक मानदंडों, उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलनों, सांस्कृतिक संबंधों और छोटे देशों की रणनीतियों का महत्त्व कम दिखाई दे सकता है।
(ख) नवयथार्थवाद (Neorealism): Kenneth Waltz
यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की अराजक संरचना और राज्यों की स्थिति पर बल देता है। इसकी आलोचना यह है कि संरचनात्मक व्याख्या कभी-कभी स्थानीय इतिहास, औपनिवेशिक विरासत और विभिन्न समाजों की राजनीतिक अवधारणाओं को पर्याप्त महत्त्व नहीं देती।
(ग) उदार संस्थावाद (Liberal Institutionalism): Robert Keohane
यह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, नियमों, पारस्परिक निर्भरता और सहयोग की संभावनाओं को समझाता है। इसकी आलोचना में यह प्रश्न उठता है कि क्या सभी देश इन संस्थाओं में समान प्रभाव रखते हैं तथा क्या संस्थागत नियमों और संसाधनों का वितरण समान है।
(घ) रचनावाद (Constructivism): Alexander Wendt।
यह विचारों, पहचान, सामाजिक मानदंडों और अंतःक्रियाओं की भूमिका को स्वीकार करता है। यह Global IR के साथ संवाद की संभावना रखता है, क्योंकि स्थानीय मानदंड और ऐतिहासिक अनुभव भी अंतरराष्ट्रीय व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
इन सिद्धांतों को गलत या अनुपयोगी घोषित करना Global IR का उद्देश्य नहीं है। उद्देश्य यह जाँचना है कि उनकी व्याख्यात्मक क्षमता कहाँ प्रभावी है, कहाँ सीमित है और अन्य समाजों के अनुभवों से उन्हें किस प्रकार समृद्ध किया जा सकता है।
पश्चिम–केंद्रिकता (Western-centrism) क्या है?
- पश्चिम-केंद्रिकता वह बौद्धिक प्रवृत्ति है जिसमें पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका के ऐतिहासिक अनुभवों, अवधारणाओं, संस्थाओं और ज्ञान-परंपराओं को विश्व राजनीति को समझने का प्रमुख या सामान्य मानक बना दिया जाता है।
- यह केवल पश्चिमी विद्वानों द्वारा सिद्धांत लिखे जाने का प्रश्न नहीं है। इसका संबंध इस बात से है कि किसके अनुभव से सिद्धांत बनते हैं, किसकी अवधारणाओं को सार्वभौमिक माना जाता है और किसके अनुभवों को केवल क्षेत्रीय या अपवादात्मक समझा जाता है।
इसके प्रमुख आयाम हैं:
- ऐतिहासिक पश्चिम-केंद्रिकता: यूरोपीय इतिहास को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के विकास की मुख्य कहानी बनाना।
- वैचारिक पश्चिम-केंद्रिकता: पश्चिमी अवधारणाओं को सार्वभौमिक मानते हुए अन्य राजनीतिक परंपराओं को सीमित या स्थानीय मानना।
- संस्थागत पश्चिम-केंद्रिकता: शोध, प्रकाशन, अकादमिक प्रशिक्षण और सिद्धांत निर्माण में पश्चिमी संस्थानों की असमान प्रभावशाली स्थिति।
- ज्ञान संबंधी पश्चिम-केंद्रिकता: यह मान लेना कि सिद्धांत निर्माण का मुख्य कार्य पश्चिमी अकादमिक केंद्रों में होता है और दूसरे क्षेत्रों का कार्य केवल उनका अनुप्रयोग करना है।
- नीतिगत पश्चिम-केंद्रिकता: पश्चिमी देशों की सुरक्षा प्राथमिकताओं, उदार संस्थाओं या विकास के रास्तों को सभी समाजों के लिए आदर्श मान लेना।
इन प्रवृत्तियों का अर्थ यह नहीं कि पश्चिमी ज्ञान एकसमान है या पश्चिम के भीतर आलोचनात्मक परंपराएँ नहीं हैं। बल्कि पश्चिमी और गैर-पश्चिमी दोनों क्षेत्रों के भीतर विचारों की विविधता को पहचानना आवश्यक है।
पश्चिम–केंद्रिकता के प्रमुख आयाम (Major Dimensions of Western-centrism)
पश्चिम-केंद्रिकता (Western-centrism) का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय राजनीति, इतिहास और ज्ञान को मुख्यतः पश्चिमी यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका के अनुभवों और विचारों के आधार पर समझना। इसकी समस्या पश्चिमी विचारों का अध्ययन करना नहीं है, बल्कि तब उत्पन्न होती है जब पश्चिमी अनुभवों को पूरी दुनिया के लिए सामान्य मानक मान लिया जाता है और एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमेरिका के अनुभवों को अपेक्षाकृत कम महत्त्व दिया जाता है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों (International Relations-IR) में पश्चिम-केंद्रिकता को पाँच प्रमुख आयामों के माध्यम से समझा जा सकता है।

इन पाँचों आयामों के बीच अंतर
| आयाम | मुख्य प्रश्न | उदाहरण |
| ऐतिहासिक | विश्व इतिहास की मुख्य कहानी किसके अनुभवों पर आधारित है? | यूरोपीय इतिहास को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के विकास का प्रमुख आधार बनाना |
| वैचारिक | किन अवधारणाओं को सार्वभौमिक माना जाता है? | यूरोपीय एकीकरण को सभी क्षेत्रीय संगठनों का आदर्श मानना |
| संस्थागत | ज्ञान निर्माण के अवसर और प्रभाव कहाँ केंद्रित हैं? | अकादमिक प्रकाशन और शोध-संसाधनों में असमानता |
| ज्ञान संबंधी | किस ज्ञान को सिद्धांत के योग्य और वैध माना जाता है? | गैर-पश्चिमी परंपराओं को केवल पश्चिमी सिद्धांतों के उदाहरण के रूप में पढ़ना |
| नीतिगत | किसकी नीतियों को आदर्श मानकर दूसरों पर लागू किया जाता है? | सभी देशों के लिए एक ही सुरक्षा या विकास मॉडल की अनुशंसा |
इन पाँचों आयामों का आपस में संबंध है। उदाहरण के लिए, यदि यूरोपीय इतिहास को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मुख्य कहानी बनाया जाता है, तो यूरोपीय अनुभवों से विकसित अवधारणाओं को सार्वभौमिक मानने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। जब यही अवधारणाएँ पाठ्यक्रमों और शोध संस्थानों में प्रमुखता प्राप्त करती हैं, तो संस्थागत तथा ज्ञान संबंधी असमानताएँ भी मजबूत हो सकती हैं। अंततः इन अवधारणाओं के आधार पर बनाई गई नीतियों को अन्य समाजों के लिए आदर्श माना जा सकता है।
क्या पश्चिमी ज्ञान एकसमान है?
- यहाँ एक महत्त्वपूर्ण सावधानी आवश्यक है। पश्चिम-केंद्रिकता की आलोचना का अर्थ यह नहीं है कि पश्चिमी ज्ञान पूरी तरह एकसमान है, या पश्चिमी विद्वानों ने हमेशा एक ही दृष्टिकोण का समर्थन किया है।
- पश्चिमी बौद्धिक परंपराओं के भीतर भी यथार्थवाद, उदारवाद, मार्क्सवाद, नारीवाद, आलोचनात्मक सिद्धांत, उत्तर-औपनिवेशिक अध्ययन और रचनावाद जैसी विभिन्न विचारधाराएँ मौजूद हैं। इनमें से अनेक ने शक्ति, असमानता, साम्राज्यवाद और ज्ञान के प्रभुत्व की आलोचना की है।
- इसी प्रकार, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के भीतर भी राजनीतिक विचारों की विविधता है। इन क्षेत्रों के सभी देश समान हित नहीं रखते और न ही उनकी ऐतिहासिक परंपराएँ एक जैसी हैं।
- इसलिए पश्चिम और गैर-पश्चिम को दो पूर्णतः एकरूप समूहों के रूप में देखना स्वयं एक नई वैचारिक समस्या पैदा कर सकता है।
- पश्चिम-केंद्रिकता की आलोचना का उद्देश्य पश्चिमी ज्ञान को हटाकर किसी एक गैर-पश्चिमी परंपरा को नया सार्वभौमिक मानक बनाना नहीं है। इसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अध्ययन को अधिक समावेशी, तुलनात्मक और आलोचनात्मक बनाना है, ताकि विभिन्न समाजों के ऐतिहासिक अनुभवों तथा बौद्धिक योगदानों के आधार पर बेहतर सिद्धांत विकसित किए जा सकें। यही उद्देश्य अमिताव आचार्य के Global IR दृष्टिकोण से भी जुड़ता है।
वैश्विक दक्षिण (Global South): अवधारणा और अर्थ
- वैश्विक दक्षिण एक व्यापक राजनीतिक, ऐतिहासिक और विश्लेषणात्मक अवधारणा है। इसका संबंध उन देशों और समाजों से है जिनके अनुभव उपनिवेशवाद, आर्थिक असमानता, वैश्विक शासन में सीमित प्रतिनिधित्व, विकास संबंधी चुनौतियों तथा अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संबंधों से प्रभावित रहे हैं।
- इसमें सामान्यतः एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के अनेक देश शामिल किए जाते हैं। हालाँकि, यह कोई कठोर भौगोलिक श्रेणी नहीं है। सभी विकासशील देशों की स्थिति समान नहीं है और न ही इन देशों के हित हमेशा एक-दूसरे से मेल खाते हैं।
वैश्विक दक्षिण के अनुभवों का सैद्धांतिक महत्त्व
- उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद: आधुनिक वैश्विक व्यवस्था में असमानता तथा शक्ति के ऐतिहासिक स्रोतों को समझना।
- राष्ट्रीय मुक्ति: संप्रभुता, आत्मनिर्णय और राजनीतिक स्वतंत्रता की अवधारणाओं को व्यापक करना।
- विकास और निर्भरता: वैश्विक अर्थव्यवस्था में असमान विनिमय, ऋण और संसाधन वितरण की भूमिका समझना।
- रणनीतिक स्वायत्तता: बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा में अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप निर्णय लेने की क्षमता।
- सामूहिक कूटनीति: गुटनिरपेक्ष आंदोलन, G77 और BRICS जैसे मंचों के माध्यम से सामूहिक आवाज उठाना।
- स्थानीय ज्ञान-परंपराएँ: राजनीतिक समुदाय, न्याय, कर्तव्य, शांति, संप्रभुता और अंतरराज्यीय संबंधों की विविध अवधारणाओं का अध्ययन।
अमिताव आचार्य के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय संबंधों को वास्तव में वैश्विक बनाने के लिए दुनिया के उन समाजों की आवाजों, अनुभवों और ज्ञान को शामिल करना आवश्यक है, जिन्हें अनुशासन के मुख्य विमर्श में अपेक्षाकृत कम स्थान मिला है।
अमिताव आचार्य और Global IR का सिद्धांत

Amitav Acharya
प्रमुख वैचारिक योगदान: Global IR, क्षेत्रीय विश्व, बहुलतावाद और Multiplex World
- अमिताव आचार्य अंतरराष्ट्रीय संबंधों को एक अधिक समावेशी अनुशासन के रूप में विकसित करने के प्रमुख समर्थकों में से हैं। उन्होंने विशेष रूप से इस प्रश्न पर ध्यान दिया कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत निर्माण में गैर-पश्चिमी समाजों की ऐतिहासिक परंपराओं, राजनीतिक अनुभवों और बौद्धिक योगदानों को पर्याप्त स्थान क्यों नहीं मिला है।
- उनका महत्त्वपूर्ण लेख Global International Relations (IR) and Regional Worlds: A New Agenda for International Studies वर्ष 2014 में International Studies Quarterly में प्रकाशित हुआ।
- इसमें उन्होंने Global IR को पश्चिम और शेष विश्व के बीच कठोर विभाजन से आगे बढ़कर एक समावेशी अनुशासन विकसित करने के कार्यक्रम के रूप में प्रस्तुत किया।
Global IR का मूल तर्क
आचार्य के दृष्टिकोण को पाँच बुनियादी विचारों के माध्यम से समझा जा सकता है:
- अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इतिहास केवल यूरोप और अमेरिका का इतिहास नहीं है।
- गैर-पश्चिमी समाज केवल अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों के उपभोक्ता नहीं, बल्कि सिद्धांत निर्माण में योगदान देने वाले सक्रिय ज्ञान-निर्माता भी हैं।
- विश्व राजनीति को समझने के लिए वैश्विक इतिहास के साथ क्षेत्रीय इतिहास और स्थानीय अनुभवों का अध्ययन आवश्यक है।
- सार्वभौमिक सिद्धांतों का निर्माण विविध अनुभवों के संवाद से होना चाहिए, न कि किसी एक सभ्यता के अनुभव को सभी पर लागू करके।
- अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण केवल बड़ी शक्तियाँ नहीं करतीं; छोटे राज्य, सामाजिक आंदोलन, उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष, विचार और मानदंड भी इसमें भूमिका निभाते हैं।
Global IR का उद्देश्य
Global IR का उद्देश्य किसी एक राष्ट्रीय या सभ्यतागत सिद्धांत को नया सार्वभौमिक मानक बनाना नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अनेक ऐतिहासिक और बौद्धिक नींवों को पहचानते हुए उनके बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास है।
इसलिए Global IR को केवल Non-Western IR का दूसरा नाम नहीं समझना चाहिए। इसका दायरा व्यापक है: इसमें पश्चिमी और गैर-पश्चिमी दोनों परंपराओं के उपयोगी योगदान शामिल हो सकते हैं, बशर्ते सिद्धांत निर्माण अधिक बहुलतावादी और तुलनात्मक हो।
Global IR के छह प्रमुख आयाम
अमिताव आचार्य ने अपने 2014 के लेख में Global IR के छह प्रमुख आयाम प्रस्तुत किए।

इन छह आयामों का संयुक्त उद्देश्य एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय संबंध विद्या विकसित करना है जो विविधता को स्वीकार करे और फिर भी तुलनात्मक, व्यापक तथा सैद्धांतिक रूप से उपयोगी निष्कर्ष निकाल सके।
संबंधित प्रमुख बौद्धिक धाराएँ: Global IR, Non-Western IR और Postcolonial IR
इन तीनों दृष्टिकोणों का लक्ष्य पश्चिम-केंद्रिकता की सीमाओं पर प्रश्न उठाना है, लेकिन इनके विश्लेषण का केंद्र अलग-अलग है।
| दृष्टिकोण | मुख्य प्रश्न | प्रमुख विशेषता |
| Non-Western IR | गैर-पश्चिमी समाजों के अपने अंतरराष्ट्रीय सिद्धांत और विचार क्या हैं? | स्थानीय ऐतिहासिक एवं बौद्धिक परंपराओं से सिद्धांत निर्माण |
| Postcolonial IR | उपनिवेशवाद और साम्राज्यवादी ज्ञान ने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कैसे आकार दिया? | सत्ता, प्रतिनिधित्व, नस्ल, असमानता और ज्ञान की आलोचना |
| Global IR | विभिन्न समाजों के योगदानों को समावेशी वैश्विक अनुशासन में कैसे जोड़ा जाए? | तुलनात्मक बहुलतावाद और वैश्विक स्तर पर संवाद |
गैर–पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत (Non-Western IR Theory)
इस दृष्टिकोण का उद्देश्य एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य गैर-पश्चिमी समाजों की राजनीतिक परंपराओं तथा ऐतिहासिक अनुभवों से अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत विकसित करना है।
2007 में अमिताव आचार्य और बैरी बुज़ान ने Why Is There No Non-Western International Relations Theory? शीर्षक से एक महत्त्वपूर्ण लेख प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने इस प्रश्न की पड़ताल की कि गैर-पश्चिमी समाजों के समृद्ध राजनीतिक अनुभवों के बावजूद उनकी परंपराएँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मुख्य सिद्धांतों में अपेक्षाकृत कम दिखाई क्यों देती हैं।
इस बहस से तीन प्रमुख प्रश्न निकलते हैं:
- क्या गैर-पश्चिमी समाजों में अंतरराष्ट्रीय संबंधों की स्वतंत्र बौद्धिक परंपराएँ मौजूद रही हैं?
- क्या सिद्धांत निर्माण की संस्थागत और भाषाई संरचनाओं ने कुछ समाजों को अधिक प्रभावशाली बनाया है?
- क्या स्थानीय अनुभवों से विकसित अवधारणाएँ अपने मूल क्षेत्र से बाहर भी व्यापक व्याख्यात्मक क्षमता रख सकती हैं?
उत्तर–औपनिवेशिक अंतरराष्ट्रीय संबंध (Postcolonial IR)
उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिकोण इस बात का अध्ययन करता है कि उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, नस्लीय पदानुक्रम और औपनिवेशिक ज्ञान ने आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को किस प्रकार आकार दिया।
प्रमुख विद्वान:
- Edward Said – ओरिएंटलिज्म और पश्चिम द्वारा पूर्व के प्रतिनिधित्व की आलोचना।
- Frantz Fanon – उपनिवेशवाद, हिंसा और मुक्ति।
- Sankaran Krishna – अंतरराष्ट्रीय संबंधों में उपनिवेशवाद और ऐतिहासिक विस्मृति की आलोचना।
- Geeta Chowdhry तथा Sheila Nair – नारीवादी और उत्तर-औपनिवेशिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों के व्यापक विमर्श में योगदान।
यह दृष्टिकोण पूछता है कि क्या आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को केवल संप्रभु राज्यों के बीच औपचारिक समानता से समझा जा सकता है, जबकि अनेक देशों की सीमाएँ, संस्थाएँ और आर्थिक संरचनाएँ औपनिवेशिक शासन से प्रभावित रही हैं।
क्षेत्रीय उदाहरणों के माध्यम से Global IR की व्याख्या
(क) भारत और दक्षिण एशिया
- कौटिल्य का अर्थशास्त्र, बौद्ध राजनीतिक विचार, अशोक के अभिलेख, महाभारत की राजधर्म एवं शांति संबंधी चर्चाएँ और आधुनिक भारत की गुटनिरपेक्षता तथा रणनीतिक स्वायत्तता की नीतियाँ अध्ययन के संभावित स्रोत हैं।
- इनसे शक्ति, संधि, कूटनीति, नैतिक दायित्व और राजनीतिक निर्णय के संबंधों की जाँच की जा सकती है। किंतु प्राचीन ग्रंथों को सीधे आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांत मानने के बजाय उनके ऐतिहासिक संदर्भ और अवधारणात्मक सीमाओं का परीक्षण आवश्यक है।
(ख) अफ्रीका
- उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष, पैन-अफ्रीकीवाद, अफ्रीकी संघ, क्षेत्रीय शांति स्थापना और औपनिवेशिक सीमाओं की विरासत अंतरराष्ट्रीय राजनीति को समझने के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
- उदाहरण के लिए, अफ्रीकी देशों के बीच सहयोग का अध्ययन केवल यूरोपीय क्षेत्रीय एकीकरण की नकल के रूप में नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद, राज्य निर्माण, संप्रभुता और क्षेत्रीय सुरक्षा के विशिष्ट संदर्भ में किया जा सकता है।
(ग) पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी एशिया
- ASEAN की सहमति-आधारित कूटनीति, क्षेत्रीय संवाद, अनौपचारिक परामर्श और गैर-हस्तक्षेप की परंपरा क्षेत्रीय व्यवस्था के अध्ययन में उपयोगी है।
- चीनी, जापानी, कोरियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई राजनीतिक अनुभवों को भी एक ही सांस्कृतिक श्रेणी में समेटना उचित नहीं है। प्रत्येक परंपरा और व्यवहार का ऐतिहासिक परीक्षण आवश्यक है।
(घ) लैटिन अमेरिका
- निर्भरता सिद्धांत (Dependency Theory), उपनिवेशवाद की आर्थिक विरासत, क्षेत्रीय स्वायत्तता और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की आलोचना वैश्विक अर्थव्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय शक्ति संबंधों को समझने में योगदान देती है।
- यह दृष्टिकोण प्रश्न उठाता है कि औपचारिक राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद भी आर्थिक निर्भरता और असमान वैश्विक संरचनाएँ कैसे बनी रह सकती हैं।
- इन उदाहरणों का महत्त्व केवल क्षेत्रीय जानकारी बढ़ाने में नहीं है। वे यह जाँचने में सहायता करते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों की प्रचलित अवधारणाएँ विभिन्न ऐतिहासिक और संस्थागत संदर्भों में किस प्रकार काम करती हैं और कहाँ उनमें संशोधन की आवश्यकता पड़ती है।
Global IR और Multiplex World Order
अमिताव आचार्य की एक अन्य महत्त्वपूर्ण अवधारणा है Multiplex World (बहुस्तरीय एवं बहु-केंद्रित विश्व)। इसमें विश्व व्यवस्था को ऐसी संरचना के रूप में समझा जाता है जहाँ अनेक शक्तियाँ, क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ, संस्थाएँ और विचार एक साथ प्रभाव डालते हैं।
यहाँ Multiplex का अर्थ केवल बहुध्रुवीयता (Multipolarity) नहीं है।
| बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) | Multiplex World |
| मुख्यतः अनेक शक्तिशाली राज्यों के वितरण पर ध्यान | शक्तियों के साथ संस्थाओं, क्षेत्रों, विचारों और नेटवर्कों पर भी ध्यान |
| प्रमुख प्रश्न: शक्ति के कितने केंद्र हैं? | प्रमुख प्रश्न: वैश्विक व्यवस्था को कौन-कौन और किस प्रकार आकार देते हैं? |
| सैन्य और आर्थिक शक्ति का विशेष महत्त्व | भौतिक शक्ति के साथ मानदंड, क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ और विचार भी महत्त्वपूर्ण |
इस दृष्टिकोण में अमेरिका, चीन, भारत और अन्य शक्तियों के उदय के साथ-साथ ASEAN, अफ्रीकी संघ, BRICS, क्षेत्रीय संस्थाओं और वैश्विक दक्षिण की सामूहिक पहलों को भी अध्ययन का हिस्सा बनाया जाता है।
आचार्य ने Global IR के अंतर्गत क्षेत्रीय व्यवस्थाओं, विविध सभ्यताओं के पारस्परिक संपर्क और पश्चिम से परे वैश्विक व्यवस्था की संभावनाओं पर विशेष बल दिया है।
Multiplex World की विशेषताएँ
- शक्ति का अपेक्षाकृत व्यापक वितरण।
- क्षेत्रीय संस्थाओं और व्यवस्थाओं की सक्रिय भूमिका।
- वैश्विक शासन में अनेक प्रकार के राज्य एवं गैर-राज्य अभिकर्ताओं का योगदान।
- विचारों और मानदंडों का विभिन्न क्षेत्रों के बीच दोतरफा प्रसार।
- सहयोग, प्रतिस्पर्धा और पारस्परिक सीखने की अनेक प्रक्रियाएँ।
- एकल वैश्विक मॉडल के स्थान पर विविध व्यवस्थाओं का सह-अस्तित्व।
ध्यान रहे कि Multiplex World कोई ऐसा स्थापित तथ्य नहीं है कि दुनिया में सभी शक्तियाँ समान हो चुकी हैं। यह वैश्विक व्यवस्था की संभावित संरचना को समझने वाला एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण है।
- भारत के संदर्भ में Global IR की प्रासंगिकता
भारत का ऐतिहासिक अनुभव Global IR के अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखता है, क्योंकि इसमें प्राचीन राजनीतिक विचार, औपनिवेशिक शासन, राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, गुटनिरपेक्षता, विकास संबंधी चुनौतियाँ और समकालीन वैश्विक कूटनीति शामिल हैं।
भारत को केवल एक उभरती हुई शक्ति के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी आवश्यक है कि भारत अपनी विदेश नीति में ऐतिहासिक अनुभवों, राष्ट्रीय हितों, राजनीतिक विचारों और वैश्विक संस्थाओं के बीच किस प्रकार संबंध स्थापित करता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र राज्य, शक्ति, संधि, कूटनीति, सुरक्षा और राजनीतिक निर्णय का अध्ययन करने के लिए महत्त्वपूर्ण प्राथमिक स्रोत है। महाभारत के शांति पर्व तथा रामायण के कुछ प्रसंगों में भी राजधर्म, परामर्श, संघर्ष-नियंत्रण और वार्ता से जुड़े विचार मिलते हैं।
Global IR की दृष्टि से इन ग्रंथों का उपयोग इस प्रश्न की जाँच के लिए किया जा सकता है कि क्या इनमें निहित अवधारणाएँ आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों की कुछ समस्याओं को नए ढंग से समझने में सहायता करती हैं।
BRICS, G20, भारत-आसियान सहयोग, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन तथा विकासशील देशों के साथ भारत की साझेदारियाँ यह समझने के लिए उपयोगी उदाहरण हैं कि देश वैश्विक संस्थाओं और क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के भीतर अपने हितों को किस प्रकार आगे बढ़ाते हैं।
इन पहलों का मूल्यांकन केवल पश्चिम-विरोध के रूप में नहीं, बल्कि सहयोग, प्रतिस्पर्धा, संस्थागत सुधार और राष्ट्रीय हितों के विविध संयोजनों के रूप में करना चाहिए।
Global IR और अन्य प्रमुख सिद्धांतकार
Global IR को बेहतर ढंग से समझने के लिए उन विद्वानों को भी जानना आवश्यक है जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पश्चिम-केंद्रिकता, वैश्विक असमानता, गैर-पश्चिमी अनुभवों तथा ज्ञान निर्माण की समस्याओं पर कार्य किया है।
| विद्वान | प्रमुख योगदान | Global IR से संबंध |
| Amitav Acharya | Global IR, क्षेत्रीय विश्व, Multiplex World | समावेशी वैश्विक सिद्धांत निर्माण |
| Barry Buzan | अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सिद्धांत, क्षेत्रीय सुरक्षा परिसर | गैर-पश्चिमी सिद्धांतों और वैश्विक अनुशासन पर बहस |
| Mohammed Ayoob | Subaltern Realism | विकासशील देशों की सुरक्षा संबंधी विशिष्ट समस्याएँ |
| Edward Said | Orientalism | ज्ञान, प्रतिनिधित्व और पश्चिमी प्रभुत्व की आलोचना |
| Raúl Prebisch | केंद्र-परिधि और आर्थिक असमानता | वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक असमानता |
| Samir Amin | निर्भरता, असमान विकास और विश्व-व्यवस्था की आलोचना | वैश्विक आर्थिक शक्ति-संबंध |
| Arlene B. Tickner | अंतरराष्ट्रीय संबंधों में क्षेत्रीय ज्ञान और ज्ञान-उत्पादन की राजनीति | लैटिन अमेरिकी एवं गैर-पश्चिमी बौद्धिक योगदान |
| Qin Yaqing | संबंधात्मक सिद्धांत (Relational Theory) | संबंधों, प्रक्रियाओं और अंतःक्रियाओं पर बल |
इन सभी विद्वानों को Global IR का प्रत्यक्ष समर्थक या एक ही सिद्धांत का प्रतिनिधि नहीं माना जाना चाहिए। इनके विचार अलग-अलग बौद्धिक परंपराओं से आते हैं, लेकिन इनके अध्ययन Global IR की व्यापक बहस को समझने में उपयोगी हैं।
निष्कर्ष
पश्चिम-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों से आगे बढ़ने का अर्थ केवल एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के उदाहरणों को पाठ्यक्रम में जोड़ देना नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य यह पुनर्विचार करना है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का इतिहास कैसे लिखा जाता है, सिद्धांत किस प्रकार विकसित किए जाते हैं और किन समाजों के अनुभवों को सार्वभौमिक ज्ञान के निर्माण में स्थान मिलता है। अमिताव आचार्य का Global IR इस बहस में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है। यह पश्चिम और शेष विश्व के बीच कठोर विभाजन के बजाय विविध बौद्धिक परंपराओं के संवाद, विश्व इतिहास की व्यापक समझ, क्षेत्रीय व्यवस्थाओं के अध्ययन और विभिन्न प्रकार के राजनीतिक कर्तृत्व की पहचान पर बल देता है।
इस दृष्टिकोण के अंतर्गत भारत की कूटनीतिक परंपराओं, अफ्रीका के उपनिवेशवाद-विरोधी अनुभवों, लैटिन अमेरिका के निर्भरता संबंधी विचारों तथा एशिया की क्षेत्रीय व्यवस्थाओं का अध्ययन अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांतों को अधिक व्यापक बना सकता है। लेकिन इसके लिए प्रत्येक परंपरा का आलोचनात्मक परीक्षण, ऐतिहासिक संदर्भों की स्पष्टता और तुलनात्मक शोध आवश्यक है। अंततः Global IR का मूल संदेश है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सिद्धांत किसी एक क्षेत्र के अनुभवों तक सीमित नहीं होना चाहिए; उसे विविध समाजों के अनुभवों से सीखते हुए व्यापक व्याख्यात्मक क्षमता विकसित करनी चाहिए।
प्रमुख अकादमिक संदर्भ
- Acharya, A. (2014). Global international relations (IR) and regional worlds: A new agenda for international studies. International Studies Quarterly, 58(4), 647-659. https://doi.org/10.1111/isqu.12171
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