भारतीय संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है, जिसका निर्माण लगभग तीन वर्षों तक चली संविधान सभा की गहन चर्चाओं, बहसों और विचार-विमर्श के पश्चात् हुआ। संविधान निर्माण का उद्देश्य केवल एक राजनीतिक दस्तावेज तैयार करना नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान व्यक्त आदर्शों सामाजिक न्याय, समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को संवैधानिक स्वरूप प्रदान करना भी था।
- इन्हीं आदर्शों में एक महत्वपूर्ण प्रश्न था? भारतीय समाज के उन वर्गों को न्याय कैसे प्रदान किया जाए जो सदियों से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से वंचित रहे थे। विशेष रूप से अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के उत्थान के लिए संविधान सभा में व्यापक बहस हुई। इसी संदर्भ में आरक्षण (Reservation) की अवधारणा को एक अस्थायी लेकिन आवश्यक उपाय के रूप में स्वीकार किया गया।
संविधान सभा में आरक्षण पर हुई बहस केवल प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं थी, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की समावेशी प्रकृति, सामाजिक न्याय की अवधारणा और ऐतिहासिक अन्याय के परिमार्जन का भी प्रश्न थी।
संविधान सभा और आरक्षण का प्रश्न
- संविधान सभा के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी कि ऐसे समाज का निर्माण कैसे किया जाए जहाँ सभी नागरिकों को समान अवसर प्राप्त हों।
- भारतीय समाज सदियों से जातिगत असमानताओं से ग्रस्त रहा था। तथाकथित “अस्पृश्य” या “दलित” समुदाय सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक शोषण और राजनीतिक उपेक्षा का शिकार रहे थे।
- इस परिस्थिति में यह माना गया कि केवल कानूनी समानता पर्याप्त नहीं होगी। वास्तविक समानता स्थापित करने के लिए विशेष संरक्षण और सकारात्मक भेदभाव (Protective Discrimination) आवश्यक होगा।
जवाहरलाल नेहरू का दृष्टिकोण
संविधान सभा में उद्देश्यों और आदर्शों से संबंधित प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के उत्थान की आवश्यकता पर बल दिया।
उनका मत था कि जिन वर्गों को इतिहास में पर्याप्त अवसर नहीं मिले हैं, उनके लिए विशेष प्रयास किए जाने चाहिए ताकि वे राष्ट्रीय जीवन की मुख्यधारा में शामिल हो सकें।
नेहरू का मानना था कि;
- सामाजिक न्याय लोकतंत्र की आधारशिला है।
- पिछड़े वर्गों को शिक्षा और रोजगार में अवसर प्रदान किए जाने चाहिए।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से उन्हें निर्णय-निर्माण प्रक्रिया में भागीदारी मिलनी चाहिए।
- यह सहायता तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक वे अपने पैरों पर स्वयं खड़े होने में सक्षम न हो जाएँ।
इस प्रकार नेहरू आरक्षण को स्थायी व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक समानता स्थापित करने का एक संक्रमणकालीन साधन मानते थे।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर की चिंताएँ
यद्यपि डॉ. भीमराव अम्बेडकर सामाजिक न्याय के सबसे बड़े समर्थकों में से थे, फिर भी संविधान सभा में उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण आशंकाएँ व्यक्त कीं।
उनका अनुभव था कि भारतीय समाज में जातिगत भेदभाव इतना गहरा है कि केवल संवैधानिक प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे।
अम्बेडकर चाहते थे कि
- दलितों को वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त हो।
- उनके अधिकार केवल कागज़ों तक सीमित न रहें।
- राज्य सामाजिक परिवर्तन की सक्रिय भूमिका निभाए।
- सामाजिक समानता के लिए प्रभावी संवैधानिक सुरक्षा उपाय उपलब्ध हों।
उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक सामाजिक लोकतंत्र स्थापित नहीं हो जाता।
कांग्रेस नेतृत्व और दलित अधिकार
संविधान सभा में कांग्रेस पार्टी के अनेक नेताओं ने अनुसूचित जातियों और अन्य वंचित वर्गों के अधिकारों की रक्षा का समर्थन किया।
उनका मत था कि
- सदियों के सामाजिक उत्पीड़न की भरपाई के लिए विशेष उपाय आवश्यक हैं।
- आरक्षण सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व से दलित समुदायों की आवाज़ शासन व्यवस्था तक पहुँचेगी।
- संविधान को कमजोर वर्गों के अधिकारों का संरक्षक बनना चाहिए।
हालाँकि कुछ सदस्यों ने यह भी प्रश्न उठाया कि क्या केवल आरक्षण से सामाजिक समानता प्राप्त की जा सकती है।
पृथक निर्वाचक मंडल बनाम आरक्षण
संविधान सभा में एक महत्वपूर्ण बहस पृथक निर्वाचक मंडलों (Separate Electorates) और आरक्षित सीटों (Reserved Seats) के बीच हुई।
पृथक निर्वाचक मंडल
इस व्यवस्था में किसी विशेष समुदाय के प्रतिनिधि केवल उसी समुदाय के मतदाताओं द्वारा चुने जाते।
ब्रिटिश काल में यह व्यवस्था कुछ समुदायों के लिए लागू की गई थी।
आरक्षित सीटें
इस व्यवस्था में निर्वाचन क्षेत्र सामान्य रहता है लेकिन कुछ सीटें विशेष वर्गों के लिए आरक्षित होती हैं।
संविधान सभा के अधिकांश सदस्य पृथक निर्वाचक मंडल के विरोधी थे क्योंकि
- इससे राष्ट्रीय एकता कमजोर हो सकती थी।
- समाज में विभाजन की प्रवृत्ति बढ़ सकती थी।
- लोकतांत्रिक समावेशन प्रभावित हो सकता था।
इसलिए अततः आरक्षित सीटों की व्यवस्था को स्वीकार किया गया।
एस. नागप्पा का दृष्टिकोण
संविधान सभा के सदस्य एस. नागप्पा ने अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण का जोरदार समर्थन किया।
उन्होंने तर्क दिया कि
- भारत के मूल निवासियों और प्राचीन समुदायों का लंबे समय तक शोषण हुआ है।
- सामाजिक उत्पीड़न ने उन्हें शिक्षा, रोजगार और राजनीति से दूर रखा।
- जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिलना उनका अधिकार है।
- आरक्षण केवल सुविधा नहीं बल्कि न्याय का प्रश्न है।
उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या और उनके अल्प प्रतिनिधित्व का उल्लेख करते हुए आरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया।
संविधान सभा में अस्पृश्यता (Untouchability) को समाप्त करने का प्रस्ताव व्यापक रूप से स्वीकार किया गया।
यह माना गया कि स्वतंत्र भारत में किसी भी नागरिक को जन्म के आधार पर अपमानित या बहिष्कृत नहीं किया जा सकता।
फलस्वरूप संविधान में
अनुच्छेद 17
अस्पृश्यता को समाप्त घोषित किया गया तथा इसके किसी भी रूप को अपराध माना गया।
यह भारतीय सामाजिक इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम था।
सकारात्मक भेदभाव (Protective Discrimination) की अवधारणा
संविधान निर्माताओं ने महसूस किया कि केवल भेदभाव को निषिद्ध कर देना पर्याप्त नहीं होगा।
इसलिए उन्होंने “सकारात्मक भेदभाव” या “सुरक्षात्मक भेदभाव” की नीति को अपनाया।
इसके अंतर्गत
- शिक्षा में विशेष अवसर
- सरकारी सेवाओं में आरक्षण
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व
- सामाजिक कल्याण योजनाएँ
जैसे उपायों को वैध संवैधानिक आधार प्रदान किया गया।
अम्बेडकर की भूमिका
राजनीतिक विचारकों के अनुसार डॉ. अम्बेडकर की संविधान निर्माण प्रक्रिया में विशेष भूमिका रही।
वे
- प्रारूप समिति (Drafting Committee) के अध्यक्ष थे।
- स्वतंत्र भारत के प्रथम विधि मंत्री थे।
- दलित समाज के प्रमुख नेता थे।
उन्होंने दलितों के अधिकारों की रक्षा हेतु संविधान में अनेक प्रावधान सुनिश्चित किए।
हालाँकि कुछ विद्वानों का मत है कि अम्बेडकर की विशेषज्ञता का उपयोग कांग्रेस नेतृत्व ने किया, जबकि अन्य विद्वान उन्हें संविधान में सामाजिक न्याय की अवधारणा का प्रमुख निर्माता मानते हैं।
अल्पसंख्यक अधिकारों पर सरदार पटेल समिति की रिपोर्ट
आरक्षण संबंधी चर्चा मुख्य रूप से उस रिपोर्ट के इर्द-गिर्द केंद्रित थी जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने प्रस्तुत किया था।
इस रिपोर्ट में विभिन्न अल्पसंख्यक और वंचित समूहों के अधिकारों तथा प्रतिनिधित्व पर विचार किया गया।
पी. एस. देशमुख की आशंका
- पी. एस. देशमुख ने रिपोर्ट का स्वागत किया लेकिन साथ ही चिंता व्यक्त की कि कहीं बहुसंख्यक वर्ग स्वयं उपेक्षित न हो जाए।
- उनकी आशंका थी कि अत्यधिक विशेष प्रावधान सामाजिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
- यह दृष्टिकोण संविधान सभा के भीतर मौजूद विभिन्न विचारधाराओं को दर्शाता है।
जयपाल सिंह और अनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग
आदिवासी नेता जयपाल सिंह तथा अन्य सदस्यों ने मांग की कि
- अनुसूचित जातियों और जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले।
- मंत्रिमंडल में भी उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व हो।
- केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है।
उनका मानना था कि राजनीतिक शक्ति के बिना सामाजिक न्याय अधूरा रहेगा।
आरक्षण की समय सीमा
- संविधान निर्माताओं ने संसद और राज्य विधानसभाओं में आरक्षित सीटों के लिए प्रारंभिक रूप से दस वर्ष की समय सीमा निर्धारित की थी।
- हालाँकि अनुसूचित जाति समुदाय के अनेक सदस्य इससे संतुष्ट नहीं थे, फिर भी उन्होंने राष्ट्रीय सहमति के हित में इसे स्वीकार कर लिया।
बाद में संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से इस अवधि को बार-बार बढ़ाया गया।
भारतीय संविधान : सकारात्मक कार्रवाई का आधार
1950 में लागू भारतीय संविधान आधुनिक भारत में सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) का मूल आधार बना।
इसके अंतर्गत
- अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण
- अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण
- शैक्षणिक अवसरों में विशेष प्रावधान
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व
- सामाजिक न्याय संबंधी नीतियाँ
समय के साथ और अधिक सुदृढ़ हुईं।
प्रस्तावना और सामाजिक न्याय
भारतीय संविधान की प्रस्तावना सामाजिक न्याय की भावना को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है।
यह नागरिकों को प्रदान करने का संकल्प लेती है
सामाजिक न्याय
आर्थिक न्याय
राजनीतिक न्याय
विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता
अवसर और प्रतिष्ठा की समानता
बंधुत्व तथा राष्ट्रीय एकता
यही सिद्धांत आरक्षण नीति की वैचारिक आधारशिला भी बनते हैं।
डॉ. अम्बेडकर की लोकतंत्र संबंधी अवधारणा
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि
“स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को अलग–अलग नहीं देखा जा सकता। यदि इनमें से किसी एक को दूसरे से अलग कर दिया जाए तो लोकतंत्र का उद्देश्य ही नष्ट हो जाएगा।“
उनके अनुसार
- स्वतंत्रता बिना समानता के विशेषाधिकार बन जाती है।
- समानता बिना स्वतंत्रता के दमन का रूप ले सकती है।
- बंधुत्व के बिना दोनों टिकाऊ नहीं हो सकते।
इसी कारण आरक्षण को केवल प्रतिनिधित्व का साधन नहीं बल्कि सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना का माध्यम माना गया।
निष्कर्ष
संविधान सभा में आरक्षण पर हुई बहस भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक चर्चाओं में से एक थी। यह बहस केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों के प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक न्याय, ऐतिहासिक अन्याय के परिमार्जन और समान अवसरों की स्थापना से जुड़ी हुई थी।
संविधान निर्माताओं ने यह स्वीकार किया कि औपचारिक समानता पर्याप्त नहीं है; वास्तविक समानता प्राप्त करने के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप आवश्यक है। इसी सोच के परिणामस्वरूप आरक्षण और सकारात्मक भेदभाव की नीतियों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई।
आज भी आरक्षण पर होने वाली सभी बहसों की जड़ें संविधान सभा की इन्हीं चर्चाओं में निहित हैं, जिन्होंने भारत को एक समावेशी, लोकतांत्रिक और सामाजिक न्याय पर आधारित राष्ट्र बनाने की दिशा प्रदान की।
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