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पिछले एक दशक में संघीय ढांचे में राज्यों के लिए अवसर

Under Modi government,states have more space to grow by Chandra Babu Naidu

भारत ने 2014 के बाद से शासन, विकास और संघीय ढांचे के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का अनुभव किया है। पिछले एक दशक में देश ने न केवल आर्थिक और सामाजिक मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति की है, बल्कि केंद्र और राज्यों के संबंधों में भी एक नया संतुलन उभरकर सामने आया है। इस दौर की एक प्रमुख विशेषता यह रही है कि राज्यों को अपनी विकासात्मक प्राथमिकताओं के अनुसार कार्य करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक अवसर और संसाधन प्राप्त हुए हैं।

‘इंडिया फर्स्ट’ से विकास की नई दिशा

हाल के वर्षों में शासन व्यवस्था का केंद्रबिंदु राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना रहा है। इस दृष्टिकोण ने भारत को अनेक चुनौतियों के बीच स्थिरता प्रदान की है और उसे विश्व मंच पर अधिक आत्मविश्वास के साथ स्थापित किया है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, भू-राजनीतिक तनावों और महामारी जैसी परिस्थितियों के बावजूद भारत ने निरंतर विकास की दिशा बनाए रखी है।

आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और आर्थिक एजेंसियों ने भारत को आने वाले वर्षों में वैश्विक विकास का प्रमुख इंजन बताया है। इस उपलब्धि का लाभ केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राज्यों को भी नई संभावनाएँ मिली हैं।

भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा

भारत की विदेश नीति ने हाल के वर्षों में अधिक सक्रिय और आत्मविश्वासी स्वरूप ग्रहण किया है। वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका मजबूत हुई है और देश ने अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत—योग, आयुर्वेद, ध्यान और आध्यात्मिक परंपराएँ—अब विश्व स्तर पर व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त कर चुकी हैं। इसके साथ ही लोकतंत्र, बहुलतावाद और समावेशी विकास के भारतीय अनुभव ने भी वैश्विक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान बनाया है।

कल्याणकारी योजनाओं का व्यापक प्रभाव

विकास के साथ-साथ सरकार ने सामाजिक सुरक्षा और कल्याण पर भी विशेष बल दिया है। अनेक योजनाओं ने सीधे नागरिकों के जीवन में परिवर्तन लाने का प्रयास किया है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

  • जन धन योजना के माध्यम से करोड़ों लोगों को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया।
  • प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) ने पारदर्शिता बढ़ाई और बिचौलियों की भूमिका कम की।
  • उज्ज्वला योजना ने गरीब परिवारों को स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराया।
  • आवास योजनाओं के माध्यम से लाखों परिवारों को पक्के घर मिले।
  • आयुष्मान भारत जैसी पहलों ने स्वास्थ्य सुरक्षा के दायरे का विस्तार किया।
  • स्वच्छता और पेयजल से जुड़ी योजनाओं ने जीवन स्तर में सुधार किया।

इन पहलों का प्रभाव विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित वर्गों पर दिखाई देता है।

डिजिटल परिवर्तन : शासन का नया आधार

भारत की विकास यात्रा में डिजिटल क्रांति एक निर्णायक कारक के रूप में उभरी है। डिजिटल भुगतान, आधार आधारित सेवाएँ और मोबाइल तकनीक ने शासन को अधिक प्रभावी तथा पारदर्शी बनाया है।

डिजिटल अवसंरचना के विस्तार ने:

  • सरकारी सेवाओं तक पहुँच आसान की,
  • भ्रष्टाचार की संभावनाओं को कम किया,
  • वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया,
  • उद्यमिता और नवाचार को नई गति दी।

आज भारत डिजिटल भुगतान और सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में विश्व के अग्रणी देशों में गिना जाता है।

राज्यों को मिली अधिक स्वतंत्रता

भारतीय संघवाद की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विकास की वास्तविक गति राज्यों के माध्यम से ही संभव होती है। पिछले वर्षों में यह धारणा अधिक मजबूत हुई है कि राज्यों को अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार विकास मॉडल अपनाने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।

राज्यों को हुए प्रमुख लाभ

  • आधारभूत ढाँचे के निर्माण में निवेश में वृद्धि।
  • सड़क, रेल, बंदरगाह और हवाई अड्डों जैसी परियोजनाओं का विस्तार।
  • राज्यों के लिए निवेश आकर्षित करने की बेहतर संभावनाएँ।
  • उद्योगों और विनिर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन।
  • कृषि, सेवा क्षेत्र और प्रौद्योगिकी आधारित विकास को बढ़ावा।

इस वातावरण ने राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को भी बढ़ावा दिया है, जिससे बेहतर नीतियों और नवाचारों को प्रोत्साहन मिला है।

सहकारी संघवाद से प्रतिस्पर्धी संघवाद तक

भारत के संघीय ढाँचे में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन यह देखने को मिला है कि अब राज्यों को केवल केंद्र की योजनाओं के क्रियान्वयनकर्ता के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें विकास के साझेदार के रूप में महत्व दिया जाता है।

सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) के साथ-साथ प्रतिस्पर्धी संघवाद (Competitive Federalism) की अवधारणा ने राज्यों को अपनी कार्यक्षमता बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में कार्य करने के लिए प्रेरित किया है।

दक्षिण भारत और आंध्र प्रदेश जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए अवसर

भारत के विभिन्न राज्यों ने अपनी-अपनी विशिष्टताओं के आधार पर विकास के अलग-अलग मॉडल विकसित किए हैं। विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों ने औद्योगिकीकरण, सेवा क्षेत्र, प्रौद्योगिकी और मानव संसाधन विकास में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है।

आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के लिए भी अवसंरचना, बंदरगाह विकास, विनिर्माण, हरित प्रौद्योगिकी, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा उभरते उद्योगों के क्षेत्र में नई संभावनाएँ खुली हैं। यदि इन अवसरों का प्रभावी उपयोग किया जाए, तो राज्य राष्ट्रीय विकास में और अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

आगे की राह

भारत आज ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ आर्थिक विकास, तकनीकी नवाचार, जनसांख्यिकीय लाभांश और वैश्विक अवसर एक साथ उपस्थित हैं। इस परिदृश्य में केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग, नीति-निर्माण में लचीलापन तथा दीर्घकालिक निवेश विकास की कुंजी होंगे।

आने वाले वर्षों में भारत की प्रगति केवल राष्ट्रीय स्तर की उपलब्धियों से नहीं मापी जाएगी, बल्कि इस बात से भी आंकी जाएगी कि विभिन्न राज्य अपने नागरिकों के जीवन में कितना सकारात्मक परिवर्तन ला पाते हैं। यदि वर्तमान गति और सहयोग की भावना बनी रहती है, तो भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में और अधिक मजबूती से आगे बढ़ सकता है।

निष्कर्ष

पिछले दशक का अनुभव यह संकेत देता है कि मजबूत राष्ट्रीय नेतृत्व और सशक्त राज्यों का संयोजन भारत के विकास मॉडल की सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है। आर्थिक वृद्धि, डिजिटल परिवर्तन, कल्याणकारी योजनाएँ और संघीय ढाँचे की नई गतिशीलता मिलकर ऐसे भारत की नींव रख रही हैं, जहाँ राज्यों को विकास के लिए अधिक अवसर, अधिक संसाधन और अधिक भूमिका प्राप्त हो रही है।


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