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अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह जनजातीय परिषद (चुनाव) नियम, 2026

पारंपरिक स्वशासन और लोकतांत्रिक सुधारों के बीच संतुलन

हाल ही में अंडमान एवं निकोबार प्रशासन द्वारा ‘अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह जनजातीय परिषद (मतदाता सूची की तैयारी एवं चुनाव संचालन) नियम, 2026’ का मसौदा प्रस्तुत किया गया है। इसका उद्देश्य जनजातीय परिषदों के लिए एक औपचारिक चुनावी व्यवस्था स्थापित करना है। हालांकि इस प्रस्ताव ने निकोबारी समुदाय के भीतर व्यापक बहस को जन्म दिया है, क्योंकि उन्हें आशंका है कि इससे उनकी पारंपरिक स्वायत्त शासन प्रणाली और सामुदायिक निर्णय लेने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।

  • भारत अपनी सांस्कृतिक, भाषाई और जनजातीय विविधता के लिए विश्वभर में जाना जाता है। देश के विभिन्न भागों में रहने वाले आदिवासी समुदायों ने सदियों से अपनी विशिष्ट परंपराओं, सामाजिक संस्थाओं और स्वशासन प्रणालियों को संरक्षित रखा है।
  • अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह में निवास करने वाला निकोबारी (Nicobarese) समुदाय भी ऐसी ही एक अनुसूचित जनजाति है, जिसकी अपनी पारंपरिक शासन व्यवस्था और सामाजिक संरचना है।

समाचार में क्यों?

  • अंडमान एवं निकोबार प्रशासन ने जनजातीय परिषदों के चुनावों को नियमित और कानूनी रूप देने के लिए नए मसौदा नियम जारी किए हैं। इन नियमों के अंतर्गत मतदाता सूची, निर्वाचन क्षेत्र, नियमित चुनाव, निश्चित कार्यकाल तथा महिला आरक्षण जैसी व्यवस्थाएँ प्रस्तावित की गई हैं।
  • प्रशासन का तर्क है कि इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। वहीं निकोबारी जनजातीय परिषदों का मानना है कि यह व्यवस्था उनकी सर्वसम्मति आधारित पारंपरिक शासन प्रणाली को कमजोर कर सकती है।

निकोबारी समुदाय

  • निकोबारी भारत की मान्यता प्राप्त अनुसूचित जनजातियों (Scheduled Tribes) में से एक हैं। इनकी अनुमानित जनसंख्या लगभग 30,000 है और ये मुख्य रूप से कार निकोबार, कमोर्टा, नानकौरी, टेरेसा, लिटिल निकोबार और ग्रेट निकोबार जैसे द्वीपों पर निवास करते हैं।
  • इनका सामाजिक जीवन सामुदायिक सहयोग, पारिवारिक संबंधों और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर आधारित है। आधुनिक प्रशासनिक संस्थाओं के आगमन के बावजूद इनकी पारंपरिक शासन व्यवस्था आज भी प्रभावी है।

पारंपरिक निकोबारी शासन व्यवस्था

  1. ग्राम परिषद (Village Council): प्रत्येक गाँव में एक ग्राम परिषद होती है जिसका नेतृत्व प्रथम कैप्टन (First Captain) करता है। उसके सहयोग के लिए द्वितीय एवं तृतीय कैप्टन भी होते हैं।
  2. द्वीपीय जनजातीय परिषद (Island Tribal Council): किसी द्वीप के सभी प्रथम कैप्टनों से मिलकर द्वीपीय जनजातीय परिषद बनती है। यही परिषद अपने बीच से मुख्य कैप्टन (Chief Captain) और उप-मुख्य कैप्टन (Vice-Chief Captain) का चयन करती है।
  3. सर्वसम्मति आधारित निर्णय: निकोबारी समाज में निर्णय बहुमत के बजाय सामुदायिक सहमति (Consensus) से लिए जाते हैं। चुनाव तभी कराए जाते हैं जब समुदाय आवश्यक समझे।
  4. तुहेत (Tuhet) प्रणाली: Tuhet निकोबारी समाज की विस्तारित पारिवारिक या रिश्तेदारी आधारित इकाई है। यह केवल सामाजिक संगठन नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन का भी आधार है। नेतृत्व चयन में तुहेत की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

कैप्टन प्रणाली का इतिहास

  • ‘कैप्टन’ शब्द का प्रयोग 16वीं शताब्दी में तब शुरू हुआ जब स्थानीय लोग विदेशी जहाजों से संपर्क के दौरान अपने प्रतिनिधियों को कैप्टन कहने लगे। बाद में ब्रिटिश प्रशासन ने प्रशासनिक सुविधा के लिए इस व्यवस्था को औपचारिक स्वरूप दिया।
  • 1990 के दशक में जनजातीय परिषदों का उच्च स्तरीय ढाँचा विकसित हुआ ताकि समुदाय को सरकारी योजनाओं और विकास कार्यक्रमों से जोड़ा जा सके।

कानूनी आधार

इन परिषदों को समय-समय पर विभिन्न कानूनों के माध्यम से मान्यता मिली है, जैसे;

  • Andaman and Nicobar Islands (Protection of Aboriginal Tribes) Regulation, 1956
  • Nicobar Islands Tribal Council Regulation, 2009

इन कानूनों ने जनजातीय परिषदों को कानूनी पहचान प्रदान की, हालांकि प्रशासन को कुछ परिस्थितियों में हस्तक्षेप का अधिकार भी दिया गया।

मसौदा चुनाव नियम, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ

(1) पाँच वर्षीय निश्चित कार्यकाल: सभी ग्राम परिषदों और द्वीपीय परिषदों के लिए 5 वर्ष का निश्चित कार्यकाल प्रस्तावित है।

उद्देश्य:

  • नियमित चुनाव
  • नेतृत्व में स्पष्टता
  • प्रशासनिक स्थिरता

(2) औपचारिक निर्वाचन प्रक्रिया: मसौदे में निम्न व्यवस्थाएँ प्रस्तावित हैं, निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन, आधिकारिक मतदाता सूची, उम्मीदवारों का नामांकन, नामांकन पत्रों की जाँच, नाम वापसी की प्रक्रिया, निर्धारित चुनाव कार्यक्रम यह व्यवस्था मुख्यभूमि भारत की चुनाव प्रणाली के समान होगी।

(3) प्रतिनिधित्व की नई संरचना

  • प्रत्येक गाँव में 5 से 9 कैप्टनों का चुनाव।
  • ग्रामवासी सीधे मुख्य कैप्टन का चुनाव करेंगे।
  • प्रथम कैप्टन मिलकर उप-मुख्य कैप्टन का चुनाव करेंगे।
  • मुख्य कैप्टन, उप-मुख्य कैप्टन और प्रथम कैप्टन मिलकर द्वीपीय परिषद का गठन करेंगे।

(4) महिलाओं के लिए आरक्षण

  • मसौदे में पहली बार महिलाओं के लिए परिषदों में आरक्षण और नेतृत्व पदों में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने का प्रावधान किया गया है।
  • यह लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

(5) प्रशासनिक वीटो शक्ति

  • यदि परिषद का कोई निर्णय सार्वजनिक व्यवस्था, शांति या प्रशासनिक हितों के विरुद्ध माना जाए, तो जिला प्रशासन (उपायुक्त/सहायक आयुक्त) उसे निरस्त कर सकता है। यही प्रावधान सबसे अधिक विवाद का विषय बना हुआ है।

प्रस्तावित सुधारों के संभावित लाभ

  • लोकतांत्रिक जवाबदेही: नियमित चुनावों से नेतृत्व जनता के प्रति अधिक उत्तरदायी हो सकता है।
  • पारदर्शिता: मतदाता सूची और औपचारिक चुनाव प्रक्रिया से निष्पक्षता बढ़ सकती है।
  • महिलाओं का सशक्तिकरण: आरक्षण के माध्यम से महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी।
  • प्रशासनिक स्पष्टता: निश्चित कार्यकाल और लिखित प्रक्रियाएँ विवादों को कम कर सकती हैं।
  • सरकारी योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन: औपचारिक संस्थाएँ सरकारी विभागों के साथ बेहतर समन्वय स्थापित कर सकती हैं।
  • निकोबारी समुदाय की प्रमुख चिंताएँ
  • पारंपरिक स्वशासन का क्षरण: सदियों पुरानी सर्वसम्मति आधारित व्यवस्था की जगह प्रतिस्पर्धी चुनाव आने से सामाजिक एकता प्रभावित हो सकती है।
  • तुहेत प्रणाली का कमजोर होना: मसौदे में पारंपरिक Tuhet व्यवस्था को पर्याप्त मान्यता नहीं दी गई है।
  • नौकरशाही का बढ़ता प्रभाव: जटिल चुनावी नियम और प्रशासनिक नियंत्रण स्थानीय नेतृत्व को सरकारी प्रक्रियाओं पर निर्भर बना सकते हैं।
  • प्रशासनिक वीटो: जिला प्रशासन को व्यापक वीटो अधिकार मिलने से परिषदों की वास्तविक स्वायत्तता सीमित हो सकती है।

ग्रेट निकोबार विकास परियोजना का संदर्भ

  • कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चुनावी सुधारों को ग्रेट निकोबार विकास परियोजना से जोड़कर देखा जा रहा है और आशंका व्यक्त की जा रही है कि इससे स्थानीय विरोध कमजोर हो सकता है।

संवैधानिक और कानूनी पहलू

  • यद्यपि निकोबारी समुदाय अनुसूचित जनजाति है, परंतु अंडमान एवं निकोबार केंद्र शासित प्रदेश है और यह संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत नहीं आता।
  • इस कारण जनजातीय स्वशासन और संवैधानिक संरक्षण के बीच एक विशेष कानूनी स्थिति उत्पन्न होती है।

PESA अधिनियम से सीख

  • पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक संस्थाओं का सम्मान करते हुए लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण सुनिश्चित करना है।

निकोबारी परिषदों के लिए भी ऐसा हाइब्रिड मॉडल अपनाया जा सकता है जिसमें पारंपरिक Tuhet प्रणाली, महिला आरक्षण, पारदर्शिता, लोकतांत्रिक जवाबदेही और कानूनी मान्यता सभी का संतुलित समावेश हो।

आगे की राह (Way Forward)

  • सुधार लागू करने से पहले समुदाय की वास्तविक भागीदारी और सहमति सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • सुधारों का उद्देश्य पारंपरिक संस्थाओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत बनाना होना चाहिए।
  • एकदम नई व्यवस्था लागू करने के बजाय धीरे-धीरे परिवर्तन किए जाएँ।
  • प्रशासन, जनजातीय परिषदों और स्थानीय समुदायों के बीच निरंतर संवाद आवश्यक है।
  • महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाते समय स्थानीय सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक संदर्भों का सम्मान किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह जनजातीय परिषद (चुनाव) नियम, 2026 भारत में जनजातीय शासन और लोकतांत्रिक सुधारों के बीच संतुलन स्थापित करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। जहाँ एक ओर यह पारदर्शिता, महिला सशक्तिकरण और संस्थागत जवाबदेही को बढ़ावा देता है, वहीं दूसरी ओर यह निकोबारी समुदाय की पारंपरिक Tuhet-आधारित स्वशासन प्रणाली, सामुदायिक सहमति और सांस्कृतिक स्वायत्तता के सामने नई चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करता है।

एक सफल मॉडल वही होगा जो आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों को अपनाते हुए स्थानीय परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और समुदाय की स्वायत्त निर्णय प्रक्रिया का सम्मान करे। केवल प्रशासनिक सुधार पर्याप्त नहीं हैं; जनजातीय समुदाय की सक्रिय भागीदारी, विश्वास और पूर्व-सहमति के साथ ही वास्तविक और टिकाऊ परिवर्तन संभव है।


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