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इंडो-पैसिफिक में भारत की “जी माइनस टू” रणनीति

इक्कीसवीं शताब्दी की वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक क्षेत्र इंडो-पैसिफिक बन चुका है। विश्व व्यापार, समुद्री सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा और महाशक्तियों के शक्ति संतुलन का केंद्र आज यही क्षेत्र है। ऐसे समय में भारत की विदेश नीति भी केवल परंपरागत गुटनिरपेक्षता या किसी एक शक्ति के साथ संरेखण तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह बहुस्तरीय और बहुध्रुवीय सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड की यात्रा को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाना चाहिए। यह केवल द्विपक्षीय यात्राओं का क्रम नहीं है, बल्कि भारत की उस नई इंडो-पैसिफिक रणनीति का प्रतीक है इसे विशेषज्ञों के द्वारा “जी माइनस टू” (G Minus Two) की संज्ञा दी गई है। इसका मूल उद्देश्य अमेरिका और चीन के बीच उभरती प्रतिस्पर्धा के बीच एशियाई देशों के लिए अधिक रणनीतिक विकल्प और स्वायत्तता का निर्माण करना है।

“जी माइनस टू” की अवधारणा क्या है?

शीत युद्ध की समाप्ति के बाद लंबे समय तक वैश्विक व्यवस्था अमेरिकी नेतृत्व पर आधारित रही। किंतु पिछले दो दशकों में चीन के तीव्र आर्थिक और सैन्य उदय ने शक्ति संतुलन को बदल दिया है। इसी कारण अनेक विश्लेषकों ने भविष्य की विश्व व्यवस्था को अमेरिका और चीन के संयुक्त प्रभुत्व अर्थात जी-2 के रूप में देखना प्रारंभ किया।

भारत सहित अनेक एशियाई देशों के लिए यह परिकल्पना कभी भी सहज नहीं रही। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समय-समय पर जी-2 जैसी संभावनाओं का उल्लेख तथा उनकी सरकार द्वारा “इंडो-पैसिफिक” शब्दावली के प्रति अपेक्षाकृत कम उत्साह ने इन आशंकाओं को और बल दिया।

इसी पृष्ठभूमि में “जी माइनस टू” की अवधारणा सामने आती है। इसका अर्थ अमेरिका और चीन को अलग-थलग करना नहीं है, बल्कि एशिया के अन्य प्रमुख देशों के बीच सहयोग को इतना सशक्त बनाना है कि क्षेत्रीय व्यवस्था केवल दो महाशक्तियों तक सीमित न रह जाए।

भारत की नई कूटनीतिक दिशा

भारत ने बदलती परिस्थितियों को देखते हुए अपनी विदेश नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन किया है। अब उसका ध्यान केवल वाशिंगटन और बीजिंग के बीच संतुलन बनाने पर नहीं, बल्कि शेष एशिया के साथ व्यापक रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर है।

इसी सोच के अंतर्गत भारत जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का प्रयास कर रहा है। यह दृष्टिकोण इस विचार पर आधारित है कि यदि एशिया के मध्यम और बड़ी अर्थव्यवस्था वाले लोकतांत्रिक देश मिलकर कार्य करें, तो वे क्षेत्रीय स्थिरता और संतुलन को अधिक प्रभावी ढंग से बनाए रख सकते हैं।

जापान और दक्षिण कोरिया की सक्रिय भूमिका

  • हाल के महीनों में जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की भारत यात्राएँ इसी बदलती सोच का संकेत देती हैं।
  • ये दोनों देश अमेरिका के पारंपरिक सहयोगी हैं, किंतु वे भी यह महसूस कर रहे हैं कि केवल अमेरिका पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसलिए वे एशिया के अन्य प्रमुख देशों के साथ अपने आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा संबंधों का विस्तार कर रहे हैं।
  • प्रधानमंत्री मोदी की जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड यात्रा भी इसी व्यापक रणनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा है।

क्या “जी माइनस टू” अमेरिका से दूरी बनाने की रणनीति है?

  • इस अवधारणा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि यह अमेरिका विरोधी नीति नहीं है।
  • अधिकांश एशियाई देश यह स्वीकार करते हैं कि इंडो-पैसिफिक में स्थिर शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अमेरिका की रणनीतिक उपस्थिति अभी भी आवश्यक है। चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति का संतुलन केवल एशियाई देशों के संयुक्त प्रयासों से संभव नहीं है। इसलिए जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड अभी भी अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंधों को मजबूत बनाए हुए हैं।
  • वास्तव में डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से उत्पन्न अनिश्चितता ने इन देशों को अमेरिका से दूर नहीं किया, बल्कि उन्होंने अमेरिकी सुरक्षा ढांचे को और अधिक संस्थागत रूप से मजबूत करने का प्रयास किया है।

भारत और इंडोनेशिया की समान रणनीतिक सोच

  • भारत और इंडोनेशिया लंबे समय तक गुटनिरपेक्ष परंपरा के समर्थक रहे हैं। किंतु चीन की बढ़ती सैन्य सक्रियता ने दोनों देशों की रणनीतिक सोच में परिवर्तन किया है।
  • दोनों देशों ने अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग को पहले की तुलना में अधिक मजबूत बनाया है। इसका अर्थ यह नहीं कि उन्होंने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता त्याग दी है। इसके विपरीत उनकी स्वायत्तता अब अमेरिका से दूरी बनाकर नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए और साथ ही चीन के साथ व्यवहारिक संबंध बनाए रखते हुए विकसित हो रही है।
  • दोनों देश ट्रंप की अप्रत्याशित कूटनीति तथा चीन की आक्रामक नीतियों के बीच संतुलित मार्ग अपनाने का प्रयास कर रहे हैं।

क्या यह चीन को रोकने की नीति है?

यहां यह भी स्पष्ट करना आवश्यक है कि “जी माइनस टू” चीन को रोकने की नीति नहीं है।

  • वास्तविकता यह है कि भारत सहित एशिया का कोई भी प्रमुख देश चीन को अलग-थलग करने की स्थिति में नहीं है। चीन आज एशिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्तियों में से एक है और अधिकांश देशों का प्रमुख व्यापारिक साझेदार भी है।
  • भारत और चीन के बीच वार्षिक व्यापार लगभग 150 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है।
  • दक्षिण कोरिया का चीन के साथ व्यापार लगभग 300 अरब डॉलर है।
  • जापान का चीन के साथ व्यापार भी लगभग 300 अरब डॉलर के आसपास है।
  • ऑस्ट्रेलिया का व्यापार 200 अरब डॉलर से अधिक है।
  • आसियान और चीन के बीच व्यापार एक ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुका है।
  • इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि चीन से पूर्ण आर्थिक अलगाव न तो संभव है और न ही व्यावहारिक।

आर्थिक सहयोग और सुरक्षा का नया संतुलन

  • ट्रंप काल की शुल्क नीतियों तथा वैश्विक व्यापारिक अनिश्चितताओं ने एशियाई देशों को यह महसूस कराया कि क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग को और गहरा करना आवश्यक है।
  • दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग की यात्रा के दौरान रणनीतिक आर्थिक सहयोग पर विशेष बल दिया गया।
  • इसी प्रकार जापान के साथ आर्थिक सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, निवेश और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत बनाने पर सहमति बनी।
  • इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के साथ प्रधानमंत्री मोदी की वार्ताओं में भी आर्थिक लचीलापन, रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा तथा आपूर्ति शृंखला सुदृढ़ीकरण प्रमुख विषय रहने की संभावना व्यक्त की गई है।

“जी माइनस टू” का वास्तविक उद्देश्य

  • यह रणनीति न तो चीन विरोधी सैन्य गठबंधन है और न ही अमेरिकी गठबंधन का विकल्प।
  • इसका वास्तविक उद्देश्य एशिया के प्रमुख औद्योगिक, तकनीकी और समुद्री देशों के बीच सहयोग को मजबूत करना है ताकि भारत सहित सभी देशों की रणनीतिक क्षमता और विकल्पों का विस्तार हो सके।
  • अर्थात यह किसी नए शक्ति गुट का निर्माण नहीं, बल्कि व्यावहारिक क्षेत्रीय साझेदारी का प्रयास है।

भारत को मिलने वाले प्रमुख लाभ

  • जापान भारत को उन्नत विनिर्माण, रक्षा प्रौद्योगिकी और आधारभूत संरचना विकास में सहयोग प्रदान कर सकता है।
  • दक्षिण कोरिया जहाज निर्माण, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स तथा रक्षा उत्पादन में विश्वस्तरीय विशेषज्ञता रखता है।
  • ऑस्ट्रेलिया भारत के लिए महत्वपूर्ण खनिज, समुद्री सुरक्षा तथा पूर्वी हिंद महासागर की स्थिरता का प्रमुख भागीदार बन सकता है।
  • न्यूज़ीलैंड कृषि, उच्च शिक्षा, व्यापार तथा उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है।
  • इन सभी साझेदारियों का संयुक्त प्रभाव भारत की आर्थिक तथा रणनीतिक क्षमता को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा सकता है।

इंडोनेशिया का विशेष महत्व

  • यदि इंडो-पैसिफिक की अवधारणा का भौगोलिक और राजनीतिक केंद्र किसी देश को कहा जाए, तो वह इंडोनेशिया है।
  • यह देश हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के संगम पर स्थित है। इसकी सामरिक स्थिति विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक पर है।
  • भारत और इंडोनेशिया के बीच गहरा आर्थिक एकीकरण तथा मजबूत सुरक्षा सहयोग लंबे समय से क्षेत्रीय व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता रहा है।
  • यदि दोनों देश अपने संबंधों को और व्यापक बनाते हैं, तो इंडो-पैसिफिक की स्थिरता को नया आधार मिल सकता है।

एशिया की सामूहिक शक्ति

यदि भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड को सामूहिक रूप से देखा जाए, तो यह समूह विश्व विनिर्माण, प्रौद्योगिकी, नवाचार, समुद्री परिवहन तथा वैश्विक व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण भाग बनता है।

इन देशों का सहयोग न तो अमेरिका का स्थान ले सकता है और न ही चीन का विकल्प बन सकता है। किंतु यह एशिया को अमेरिका और चीन की द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा से परे अधिक व्यापक रणनीतिक विकल्प अवश्य प्रदान कर सकता है।

यही “जी माइनस टू” की मूल भावना है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती

  • लेखक का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण तर्क यह है कि भारत की सफलता केवल विदेश यात्राओं और शिखर सम्मेलनों पर निर्भर नहीं करेगी।
  • यदि भारत अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है, विनिर्माण क्षमता बढ़ाता है, रक्षा उद्योग का विस्तार करता है, तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करता है तथा घरेलू सुधारों को गति देता है, तभी अन्य एशियाई देश भारत के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करेंगे।
  • अर्थात भारत की वैश्विक भूमिका का निर्धारण केवल अमेरिका और चीन के संबंधों से नहीं होगा, बल्कि उसकी अपनी आर्थिक शक्ति, औद्योगिक क्षमता, तकनीकी प्रगति और रक्षा आत्मनिर्भरता से होगा।

निष्कर्ष

इंडो-पैसिफिक की उभरती भू-राजनीति में भारत एक संतुलनकारी शक्ति के रूप में उभर रहा है। “जी माइनस टू” की अवधारणा इस बात का संकेत है कि एशिया अब केवल अमेरिका और चीन के बीच शक्ति प्रतिस्पर्धा का निष्क्रिय मंच नहीं रहना चाहता। भारत सहित अनेक एशियाई देश अपने सामूहिक सहयोग के माध्यम से ऐसी क्षेत्रीय व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक परस्पर निर्भरता, सुरक्षा सहयोग और बहुध्रुवीय संतुलन एक साथ आगे बढ़ें।

भारत के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी। यदि वह अपने घरेलू आर्थिक एवं रक्षा सुधारों को गति देता है तथा एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यवहारिक साझेदारी को मजबूत करता है, तो वह उभरती एशियाई व्यवस्था के प्रमुख स्तंभों में स्थान प्राप्त कर सकता है। यही इस लेख का केंद्रीय संदेश है और यही भारत की भविष्य की इंडो-पैसिफिक नीति का मूल आधार भी है।

महत्वपूर्ण तथ्य हेतु यह सारणी देखें:


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