21वीं शताब्दी को प्रायः “हिंद–प्रशांत (Indo-Pacific) का युग“ कहा जाता है। आज वैश्विक व्यापार का लगभग 80 प्रतिशत (आयतन के आधार पर) और लगभग 70 प्रतिशत (मूल्य के आधार पर) समुद्री मार्गों से संचालित होता है। ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ (Global Supply Chains), समुद्री संसाधन, ब्लू इकोनॉमी तथा सामरिक प्रतिस्पर्धा इन सभी के केंद्र में महासागर हैं।

समाचार में क्यों?
- हाल के वर्षों में लाल सागर, अदन की खाड़ी, पश्चिम एशिया तथा काला सागर में बढ़ते भू-राजनीतिक संघर्षों ने अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। मिसाइल हमलों, ड्रोन हमलों, समुद्री डकैती, जहाजों की जब्ती तथा समुद्री बारूदी सुरंगों के कारण अनेक व्यापारी जहाजों के साथ भारतीय नाविक भी संकट में फँस गए।
- इन घटनाओं ने यह उजागर किया कि भारतीय नाविक केवल श्रमिक नहीं, बल्कि भारत की समुद्री कूटनीति (Maritime Diplomacy), ऊर्जा सुरक्षा तथा वैश्विक आर्थिक उपस्थिति के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं। इसलिए उनकी सुरक्षा अब केवल श्रम नीति का विषय नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी अभिन्न अंग बन चुकी है।
भारत की बढ़ती समुद्री कार्यशक्ति (India’s Growing Maritime Workforce)
- भारत विश्व के प्रमुख समुद्री मानव संसाधन प्रदाताओं में से एक है। भारतीय नाविक अपनी तकनीकी दक्षता, अंग्रेज़ी भाषा पर पकड़, अनुशासन तथा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण के कारण विश्वभर में अत्यधिक मांग में हैं।
- किन्तु भारतीय नाविकों की कार्यप्रणाली अन्य प्रवासी भारतीयों से भिन्न होती है। वे किसी एक देश में स्थायी रूप से निवास नहीं करते, बल्कि निरंतर विभिन्न समुद्री मार्गों पर संचालित जहाजों में कार्य करते हैं।
उदाहरण के लिए
- नाविक भारतीय हो सकता है,
- जहाज का मालिक किसी अन्य देश का हो सकता है,
- जहाज किसी तीसरे देश में पंजीकृत (Flag State) हो सकता है,
- जहाज का संचालन किसी चौथी कंपनी द्वारा किया जा सकता है,
- तथा उसका माल किसी पाँचवें देश का हो सकता है।
इस प्रकार एक ही जहाज अनेक देशों के कानूनी एवं प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र (Jurisdictions) से जुड़ा होता है। परिणामस्वरूप संकट की स्थिति में यह निर्धारित करना कठिन हो जाता है कि नाविक की सुरक्षा, बचाव अथवा कानूनी सहायता की जिम्मेदारी किसकी होगी।
यही बहु-स्तरीय समुद्री संरचना भारतीय नाविकों की सुरक्षा को अत्यंत जटिल बना देती है।
भारत की विदेश नीति का समुद्री आयाम
- भारत की विदेश नीति में समुद्री दृष्टिकोण कोई नई अवधारणा नहीं है। प्राचीन काल से ही भारत हिंद महासागर के माध्यम से दक्षिण-पूर्व एशिया, अरब, पूर्वी अफ्रीका तथा यूरोप से व्यापारिक एवं सांस्कृतिक संबंध स्थापित करता रहा है। आधुनिक काल में यह समुद्री दृष्टिकोण और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
- भारत ने SAGAR (Security and Growth for All in the Region), Indo-Pacific Oceans Initiative (IPOI), Act East Policy, Blue Economy, तथा Neighbourhood First जैसी पहलों के माध्यम से समुद्री सहयोग को अपनी विदेश नीति का प्रमुख आधार बनाया है।
- किन्तु इन पहलों का वास्तविक उद्देश्य तभी सफल होगा जब भारत समुद्र में कार्यरत अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।

भारतीय नाविकों के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- जटिल न्यायिक अधिकार–क्षेत्र (Complex Jurisdictional Responsibility)
अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में जहाजों का स्वामित्व, पंजीकरण, बीमा तथा संचालन विभिन्न देशों से जुड़ा होता है। इस कारण किसी दुर्घटना, हमले या जहाज के परित्याग (Crew Abandonment) की स्थिति में उत्तरदायित्व निर्धारित करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
जब भारतीय नाविक किसी संकट में फँसते हैं, तब भारतीय दूतावासों को पहले यह पता लगाना पड़ता है कि सहायता की प्राथमिक जिम्मेदारी किस देश अथवा संस्था की है। इस प्रक्रिया में बहुमूल्य समय नष्ट हो जाता है।
- बढ़ते समुद्री सुरक्षा खतरे (Rising Maritime Security Threats)
आज समुद्री क्षेत्र केवल व्यापार का माध्यम नहीं बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुका है।
भारतीय नाविकों को निम्नलिखित खतरों का सामना करना पड़ रहा है;
- मिसाइल हमले
- ड्रोन हमले
- समुद्री डकैती (Piracy)
- बंधक बनाना (Hostage Taking)
- समुद्री बारूदी सुरंगें (Sea Mines)
- सशस्त्र संघर्ष
विशेषकर लाल सागर, अदन की खाड़ी तथा पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि नागरिक नाविक भी आधुनिक युद्धों के अप्रत्यक्ष शिकार बनते जा रहे हैं।
- क्रू परित्याग (Crew Abandonment)
भारत उन देशों में शामिल है जहाँ सर्वाधिक नाविक “Crew Abandonment” की समस्या का सामना करते हैं।
इस स्थिति में जहाज का स्वामी जहाज एवं कर्मचारियों दोनों को छोड़ देता है।
परिणामस्वरूप
- महीनों तक वेतन नहीं मिलता,
- भोजन एवं चिकित्सा सुविधाएँ समाप्त हो जाती हैं,
- पासपोर्ट जब्त कर लिए जाते हैं,
- स्वदेश वापसी (Repatriation) में अत्यधिक विलंब होता है।
यह स्थिति भारतीय नाविकों के मानवाधिकारों एवं गरिमा दोनों के लिए गंभीर चुनौती है।
डिजिटल युग में जहाजों की वास्तविक समय (Real-Time) निगरानी करना तकनीकी रूप से संभव हो गया है। आधुनिक उपग्रह आधारित प्रणालियाँ जहाज की स्थिति (Location), गति (Speed), मार्ग (Route) तथा गंतव्य (Destination) की जानकारी उपलब्ध करा देती हैं। किंतु इन प्रणालियों की सबसे बड़ी सीमा यह है कि वे जहाज पर कार्यरत चालक दल (Crew) की वास्तविक स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं देतीं।
इन सभी के बीच समन्वय स्थापित करने में समय लगता है, जिससे सहायता में विलंब होता है।
- इसीलिए भारत को पारंपरिक “Geographical Diplomacy” से आगे बढ़कर “Maritime Consular Diplomacy” विकसित करनी होगी।
सरकार द्वारा उठाए गए प्रमुख कदम
भारतीय सरकार ने हाल के वर्षों में नाविकों की सुरक्षा को सुदृढ़ करने हेतु अनेक महत्त्वपूर्ण पहलें प्रारम्भ की हैं। ये पहलें इस बात का संकेत हैं कि भारत समुद्री मानव संसाधनों को अपनी विदेश नीति का अभिन्न अंग मानने लगा है।
- Seafarer First Initiative
यह पहल भारतीय नाविकों की सुरक्षा हेतु एक सक्रिय (Proactive) व्यवस्था स्थापित करने का प्रयास है।
इसके प्रमुख घटक हैं;
(i) Seafarer Dashboard: उच्च जोखिम वाले समुद्री क्षेत्रों में कार्यरत भारतीय नाविकों की निगरानी।
(ii) High-Risk Region Monitoring
लाल सागर, पश्चिम एशिया, अदन की खाड़ी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों की निरंतर निगरानी।
(iii) Family Liaison Officers
संकट की स्थिति में नाविकों के परिवारों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखना।
यह पहल पारंपरिक संकट-प्रबंधन मॉडल से आगे बढ़कर पूर्व-सावधानी (Preventive Diplomacy) की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
- महानिदेशालय नौवहन (Directorate General of Shipping) की पहल
DG Shipping ने नाविकों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई प्रशासनिक निर्णय लिए हैं—
- Crew Abandonment से जुड़े जहाजों पर नियुक्ति सीमित करना।
- उच्च जोखिम वाले समुद्री मार्गों पर सावधानी बरतने की सलाह।
- संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से गुजरने वाले जहाजों की निगरानी।
- भर्ती एजेंसियों पर नियंत्रण बढ़ाना।
इन कदमों का उद्देश्य भारतीय नाविकों को अनावश्यक जोखिम से बचाना है।
फिर भी कौन–सी कमियाँ शेष हैं? (Existing Gaps)
सरकारी पहलों के बावजूद वर्तमान व्यवस्था में अनेक संरचनात्मक कमियाँ बनी हुई हैं।
- Maritime Consular Protocol का अभाव
भारत के पास अभी तक ऐसा स्थायी प्रोटोकॉल नहीं है जो यह निर्धारित करे कि संकट की स्थिति में—
- कौन-सी एजेंसी नेतृत्व करेगी?
- किसे सूचना दी जाएगी?
- बचाव अभियान कैसे चलेगा?
- कानूनी सहायता कौन उपलब्ध कराएगा?
- स्वदेश वापसी कैसे सुनिश्चित होगी?
इस प्रकार की स्पष्ट कार्यप्रणाली का अभाव कई बार राहत कार्यों में देरी का कारण बनता है।
- द्विपक्षीय समुद्री समझौतों की सीमाएँ
भारत के अधिकांश समुद्री समझौते निम्न विषयों तक सीमित हैं;
- रोजगार
- प्रशिक्षण
- प्रमाणपत्रों की मान्यता
किन्तु इनमें सामान्यतः निम्न विषयों का अभाव है;
- कानूनी सहायता
- आपातकालीन निकासी
- क्षतिपूर्ति (Compensation)
- कांसुलर पहुँच
- चालक दल की सुरक्षा
- भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव
अनेक नाविकों को यह जानकारी नहीं होती कि;
- जहाज का वास्तविक स्वामी कौन है?
- बीमा वैध है या नहीं?
- जहाज किसी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध (Sanctions) के अधीन तो नहीं?
- पहले कभी Crew Abandonment हुआ है या नहीं?
अपूर्ण जानकारी के आधार पर अनुबंध करने से नाविक भविष्य में गंभीर संकटों का सामना कर सकते हैं।
भारत की विदेश नीति के लिए व्यापक निहितार्थ
भारतीय नाविकों की सुरक्षा केवल मानवीय दायित्व नहीं है, बल्कि यह भारत की विदेश नीति, आर्थिक सुरक्षा और वैश्विक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा हुआ विषय है।
यदि भारत अपने नागरिकों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित करता है, तो
- विश्व में भारत की विश्वसनीयता बढ़ेगी।
- भारतीय नाविकों की मांग और बढ़ेगी।
- समुद्री व्यापार अधिक सुरक्षित होगा।
- भारत की ब्लू इकोनॉमी को गति मिलेगी।
- भारत “Net Security Provider” की भूमिका को और प्रभावी ढंग से निभा सकेगा।
भारत की विदेश नीति क्यों “Look Seaward” होनी चाहिए?
आज विदेश नीति केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गई है। आधुनिक विदेश नीति का उद्देश्य नागरिकों, व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री संसाधनों तथा वैश्विक आर्थिक हितों की सुरक्षा भी है।
भारत के लिए समुद्र का महत्व पाँच प्रमुख आधारों पर समझा जा सकता है;
- आर्थिक आयाम – वैश्विक व्यापार एवं ब्लू इकोनॉमी।
- सामरिक आयाम – हिंद-प्रशांत क्षेत्र एवं समुद्री सुरक्षा।
- कूटनीतिक आयाम – SAGAR, IPOI, Indo-Pacific साझेदारी।
- मानवीय आयाम – भारतीय नाविकों का संरक्षण।
- वैश्विक नेतृत्व – सुरक्षित एवं नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था (Rules-Based Maritime Order) का समर्थन।
इस प्रकार भारतीय नाविकों की सुरक्षा भविष्य की समुद्री कूटनीति का केंद्रीय तत्व बनती जा रही है।
निष्कर्ष
भारत की समुद्री आकांक्षाएँ केवल बंदरगाहों, जहाजों, नौसेना या व्यापारिक गलियारों तक सीमित नहीं हैं। उनकी वास्तविक शक्ति उन 3.2 लाख से अधिक भारतीय नाविकों में निहित है, जो विश्व समुद्री व्यापार को गति प्रदान करते हैं। यदि भारत वास्तव में एक अग्रणी समुद्री शक्ति (Leading Maritime Power) बनना चाहता है, तो उसे अपनी विदेश नीति में “Citizen-Centric Maritime Diplomacy” को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
भविष्य की भारतीय विदेश नीति का मूल मंत्र केवल “Look East” या “Act East” नहीं, बल्कि “Look Seaward” होना चाहिए, जहाँ समुद्री सुरक्षा, मानव सुरक्षा, ब्लू इकोनॉमी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भारतीय नाविकों का सम्मान एकीकृत रूप से भारत की वैश्विक भूमिका को सशक्त बनाएँ। यह दृष्टिकोण न केवल भारत की समुद्री नेतृत्व क्षमता को मजबूत करेगा, बल्कि प्रत्येक भारतीय नाविक के प्रति राष्ट्र की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी को भी सार्थक रूप से पूरा करेगा।
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