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आर्कटिक सुरक्षा समझौता

अमेरिका-डेनमार्क-ग्रीनलैंड त्रिपक्षीय समझौता

अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच हुआ नया सुरक्षा समझौता आर्कटिक क्षेत्र में रणनीतिक संतुलन में एक महत्वपूर्ण, यद्यपि असहज करने वाला, समायोजन है। यह समझौता ग्रीनलैंड की संवैधानिक स्थिति में बदलाव किए बिना अथवा संप्रभुता हस्तांतरित किए बिना अमेरिका की सैन्य और निवेश जांच भूमिका का विस्तार करता है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पिछले सप्ताह इसकी घोषणा के साथ ही असाधारण तनाव के महीनों का अंत हुआ, जो उनके इस दोहराए गए प्रस्ताव से उपजा था कि वाशिंगटन को ग्रीनलैंड को अधिग्रहीत कर लेना चाहिए अथवा कब्जा कर लेना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र महासभा में औपचारिक हस्ताक्षर की अपेक्षा है, जो संसदीय अनुसमर्थन के अधीन होगा।

समझौते का सार

राष्ट्रपति ट्रंप ने इस व्यवस्था को अमेरिका के लिए स्थायी नियंत्रण देने वाला बताया है और इसे एक “अनंत जीवन समझौता” (Infinite Life Agreement) की संज्ञा दी है, साथ ही यह जोर देते हुए कि यह अमेरिका के लिए बिना किसी लागत के प्राप्त हुआ है। रिपोर्ट किए गए प्रावधान द्वीप पर अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को पर्याप्त रूप से सुदृढ़ करने की दिशा में इशारा करते हैं।

प्रमुख प्रावधान

  • वाशिंगटन को अतिरिक्त सैन्य अड्डे विकसित करने का अधिकार मिलेगा
  • स्थायी पहुंच बनाए रखने और आधार व अतिप्रवाह विशेषाधिकार (basing and overflight privileges) के प्रयोग का अधिकार शामिल है

यह समझौता समान रूप से इस बात को भी स्पष्ट करता है कि उसे किस चीज को रोकना है, अर्थात रूस और चीन जैसे गैर नाटो राष्ट्रों को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे स्थापित करने अथवा सैन्य उपस्थिति बनाए रखने से रोकना

संवेदनशील निवेशों के लिए अमेरिकी अनुमोदन आवश्यक होगा

यह समझौता मौजूदा ढांचे पर आधारित है। अमेरिका पहले से ही 1951 ग्रीनलैंड रक्षा समझौते के अंतर्गत पिटुफिक अंतरिक्ष आधार (Pituffik Space Base) संचालित करता है, जो वाशिंगटन को व्यापक और खुले सिरे वाले अधिकार प्रदान करता है। नई व्यवस्था इसलिए वास्तव में मौजूदा ढांचे का विस्तार है, न कि इसकी संस्थागत नींव, जो इस रणनीतिक पदचिह्न को संस्थागत करती है और संभावित रूप से व्यापक बनाती है।

समझौता क्या रोकता है

यह समझौता जितना उपलब्ध कराने के लिए है उतना ही रोकने के लिए भी महत्वपूर्ण है। गैर नाटो राष्ट्र, विशेष रूप से रूस और चीन, को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे स्थापित करने अथवा सैन्य उपस्थिति बनाए रखने से प्रतिबंधित किया जाएगा, जबकि संवेदनशील निवेशों के लिए अमेरिकी अनुमोदन आवश्यक होगा।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड के दृष्टिकोण से समझौता:

डेनमार्क के लिए रेड लाइन्स:

डेनमार्क के लिए यह रेड लाइन निर्णायक है। कोपेनहेगन ने राजशाही के क्षेत्रीय अखंडता के साथ टकराव की संभावना को टाला है। इसके नेताओं ने सत्ता प्रयोग के विरुद्ध चेतावनी दी थी कि इससे गठबंधन की नींव ही हिल जाएगी। इस व्यवस्था में लाल रेखाएं स्पष्ट रूप से बरकरार रखी गई हैं:

  • डेनिश संप्रभुता अक्षुण्ण रहेगी
  • ग्रीनलैंड साम्राज्य की क्षेत्रीय अखंडता की पुनः पुष्टि की गई है
  • ग्रीनलैंडवासियों का आत्मनिर्णय का अधिकार सुरक्षित है
  • क्षेत्र अथवा स्वामित्व का कोई हस्तांतरण नहीं होगा

डेनमार्क के लिए लाभ और लागत

डेनमार्क के लिए स्पष्ट लाभ भी हैं। आर्कटिक में अमेरिका की अधिक सैन्य संलग्नता उस समय डेनमार्क की रक्षा को मजबूत कर सकती है जब स्वयं डेनमार्क रक्षा व्यय और क्षेत्रीय विस्तार बढ़ा रहा है। विस्तारित अमेरिकी गतिविधि आर्थिक अवसर भी उत्पन्न कर सकती है।

लेकिन यह व्यवस्था लागत के साथ भी आती है। कोपेनहेगन और नुक (ग्रीनलैंड की राजधानी) के पास विदेशी निवेश की कुछ श्रेणियों में गतिशीलता की गुंजाइश कम होगी, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां वाशिंगटन यह निर्धारित करता है कि चीनी अथवा रूसी संलिप्तता एक रणनीतिक जोखिम पैदा करती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि महीनों के राजनीतिक दबाव ने अविश्वास की एक ऐसी विरासत छोड़ दी है जिसे अकेला समझौता आसानी से नहीं मिटा सकता।

ग्रीनलैंड की संवेदनशील स्थिति

ग्रीनलैंड की स्थिति विशेष रूप से नाजुक है। लगभग 56,000 की आबादी वाले इस द्वीप के पास असाधारण सामरिक भूगोल है, परंतु सीमित राजनीतिक और आर्थिक क्षमता है। इसकी भूराजनीतिक स्थिति मिसाइल चेतावनी, उत्तरी अटलांटिक समुद्री मार्गों और उभरते आर्कटिक शिपिंग मार्गों के लिए महत्वपूर्ण है, जबकि इसके खनिज संसाधन इसके रणनीतिक मूल्य को एक आर्थिक आयाम भी जोड़ते हैं।

समझौते पर ग्रीनलैंडवासियों की प्रतिक्रिया मिश्रित रही है। विसंकट (de-escalation) पर राहत की भावना निरंतर बनी हुई है, परंतु साथ ही एक बहुत बड़ी अमेरिकी भूमिका के दीर्घकालिक परिणामों को लेकर चिंता भी बनी हुई है।

यूरोपीय आयाम

  • इस प्रकरण के व्यापक निहितार्थ भी हैं। इस घटनाक्रम ने नाटो के भीतर एक अप्रत्याशित भेद्यता उजागर कर दी है।
  • ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दबाव ने अन्य यूरोपीय सरकारों को एक असाधारण परिदृश्य पर विचार करने के लिए मजबूर किया, जिसमें एक नाटो सहयोगी का क्षेत्र स्वयं नाटो की अग्रणी शक्ति द्वारा जोरदार अधिग्रहण का विषय बन गया।
  • यह समझौता डेनमार्क को इस विवाद से एक कूटनीतिक राहत का मार्ग प्रदान करता है।
  • नाटो अब उत्तरी और उत्तरी अटलांटिक की रक्षा को मजबूत करने के अधिक पारंपरिक उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित कर सकता है। परंतु इस प्रकरण से उपजा विश्वास संकट तात्कालिक विवाद से कहीं अधिक समय तक टिकने की संभावना है।
  • यूरोपीय सरकारें पहले से ही अपनी रक्षा क्षमताओं और रणनीतिक स्वायत्तता की ओर आगे बढ़ रही थीं, और ग्रीनलैंड संकट ने उन प्रयासों के पीछे के तर्क को और सुदृढ़ किया है।
  • इस प्रकार, यह समझौता विरोधाभासी रूप से नाटो के उत्तरी हिस्से को मजबूत करता है और साथ ही गठबंधन के भीतर की राजनीतिक भेद्यता को भी रेखांकित करता है।
  • यह यह भी प्रदर्शित करता है कि विस्तारित अमेरिकी पहुंच और निवेश जांच तंत्र संबंधों को कम करने का एक साधन बन सकते हैं, लेकिन इसमें यह जोखिम भी है कि सहयोगियों के क्षेत्रीय हित एक व्यापक वार्ता में सौदेबाजी के साधन बन जाएं।

आर्कटिक की बदलती भू राजनीति

आर्कटिक का बढ़ता रणनीतिक महत्व

  • आर्कटिक अब केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं रहा, बल्कि सैन्य पहुंच, महत्वपूर्ण खनिजों, बुनियादी ढांचे और रणनीतिक प्रभाव पर होने वाली प्रतिस्पर्धा का एक केंद्रीय क्षेत्र बनता जा रहा है।
  • जलवायु परिवर्तन इस प्रतिस्पर्धा को और तीव्र कर रहा है। जैसे जैसे आर्कटिक अधिक सुलभ होता जा रहा है, इसके समुद्री मार्ग, संसाधन और सैन्य भूगोल अधिक रणनीतिक महत्व प्राप्त कर रहे हैं। ग्रीनलैंड इन प्रवृत्तियों के प्रतिच्छेदन बिंदु पर स्थित है।
  • ग्रीनलैंड का महत्व इस बात से कम नहीं होगा कि सत्ता किसके हाथ में है, चाहे वह वाशिंगटन हो, कोपेनहेगन हो अथवा नुक (ग्रीनलैंड की राजधानी)।
  • इसकी भौगोलिक स्थिति और भूवैज्ञानिक धन, जिसमें दुर्लभ मृदा तत्व (rare earth elements) शामिल हैं, ने पश्चिमी सरकारों द्वारा चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने के प्रयासों के मध्य इसे अतिरिक्त महत्व दिया है।

दुर्लभ मृदा तत्वों और खनिजों का महत्व

  • चीन वर्तमान में दुर्लभ मृदा प्रसंस्करण में वैश्विक प्रभुत्व रखता है, जिससे पश्चिमी देशों के लिए वैकल्पिक स्रोत खोजना रणनीतिक रूप से आवश्यक हो गया है।
  • ग्रीनलैंड के अनदोहित खनिज भंडार, जिनमें दुर्लभ मृदा तत्वों के अतिरिक्त यूरेनियम और अन्य महत्वपूर्ण खनिज शामिल हैं, इसे आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण की दृष्टि से अत्यंत आकर्षक बनाते हैं।
  • यह प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य पहुंच तक सीमित नहीं है, यह बुनियादी ढांचे, महत्वपूर्ण खनिजों और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण के बारे में भी है।

समझौते का व्यापक महत्व

यह समझौता जितना रोकने के लिए महत्वपूर्ण है उतना ही उपलब्ध कराने के लिए भी। गैर नाटो राष्ट्र, विशेष रूप से रूस और चीन को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे स्थापित करने अथवा सैन्य उपस्थिति बनाए रखने से रोका जाएगा, जबकि संवेदनशील निवेशों के लिए अमेरिकी अनुमोदन की आवश्यकता होगी।

डी एस्केलेशन तंत्र के रूप में समझौता

इस समझौते को ग्रीनलैंड के रणनीतिक संदर्भ के पुनर्गठन के रूप में समझा जाना चाहिए। ट्रंप को अमेरिका के लिए व्यापक सैन्य लाभ और स्थायी सुरक्षा भूमिका प्राप्त हुई है। यह समझौता संकट को कम करने के लिए एक तंत्र प्रदान करता है, परंतु यह उन जोखिमों को भी उजागर करता है जो तब उत्पन्न होते हैं जब किसी सहयोगी के क्षेत्रीय हित एक व्यापक रणनीतिक सौदेबाजी के साधन बन जाते हैं।

निष्कर्ष

आर्कटिक की दीर्घकालिक स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई सैन्य पहुंच और निवेश जांच तंत्र किस प्रकार से क्रियान्वित किए जाते हैं, और क्या डेनमार्क तथा ग्रीनलैंड यह निष्कर्ष निकालते हैं कि उनकी संप्रभुता इस समझौते से मजबूत हुई है अथवा क्रमिक रूप से सीमित होती जा रही है। ग्रीनलैंड का दीर्घकालिक महत्व पारगत्लांटिक व्यवस्था की सहनशीलता की एक कसौटी बना रहेगा।

भारत जैसे उभरते हुए राष्ट्रों के लिए यह प्रकरण एक महत्वपूर्ण शिक्षा प्रस्तुत करता है। बड़ी शक्ति प्रतिस्पर्धा अब पारंपरिक भूराजनीतिक केंद्रों तक सीमित नहीं रह गई है, अपितु आर्कटिक जैसे परिधीय क्षेत्रों तक फैल रही है, जो वैश्विक भूराजनीति के मुख्य धारा में सम्मिलित होते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा सुरक्षा और तकनीकी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक रणनीतिक निहितार्थ रखती है।


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