हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य तथा मलक्का और सिंगापुर जलडमरूमध्य यह दर्शाते हैं कि संकीर्ण समुद्री मार्ग किस प्रकार अत्यधिक रणनीतिक महत्व प्राप्त कर सकते हैं। दोनों ही प्रमुख जलमार्गों को जोड़ते हैं और इनमें क्षेत्रीय संप्रभुता तथा अंतरराष्ट्रीय नौवहन से जुड़े परस्पर संबंधित प्रश्न शामिल हैं।
- मलक्का–सिंगापुर का अनुभव दर्शाता है कि संप्रभुता, नौवहन की स्वतंत्रता, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग परस्पर सह-अस्तित्व में रह सकते हैं, यदि इनके लिए परस्पर सहमति से नियम बनाए जाएँ।
- हालाँकि, हॉर्मुज़ अधिक जटिल है क्योंकि यहाँ केंद्रीय विवाद राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य उपस्थिति और भू–राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जुड़ा हुआ है।
समुद्री चोकपॉइंट्स का रणनीतिक महत्व
- मलक्का जलडमरूमध्य मलय प्रायद्वीप और सुमात्रा के बीच लगभग 800 किमी तक फैला है, जबकि लगभग 105 किमी लंबा सिंगापुर जलडमरूमध्य इसे दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है।
- दोनों मिलकर वैश्विक व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग का निर्माण करते हैं।
- इसी प्रकार, हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र से जोड़ता है।
- किसी भी एक मार्ग में व्यवधान से ऊर्जा आपूर्ति, नौवहन लागत, बीमा और वैश्विक बाजार प्रभावित हो सकते हैं।
- इस प्रकार, भौगोलिक स्थिति संकीर्ण समुद्री मार्गों को उनके आकार की तुलना में अत्यधिक भू–राजनीतिक महत्व प्रदान करती है। जब ये मार्ग किसी देश के क्षेत्रीय जल में स्थित हों, तब भी उनकी सुरक्षा एक अंतरराष्ट्रीय चिंता बन जाती है।

अंतरराष्ट्रीय जल से क्षेत्रीय संप्रभुता तक
- मलक्का का अनुभव अप्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय नौवहन से अधिक मजबूत तटीय–राज्य संप्रभुता की ओर संक्रमण को दर्शाता है।
- इंडोनेशिया के 1957 के द्वीपसमूह सिद्धांत (Archipelagic Principle) के तहत उसके द्वीपों को घेरने और जोड़ने वाले जल को इंडोनेशियाई जल घोषित किया गया। इसका एक उद्देश्य क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करना और बाहरी हस्तक्षेप को सीमित करना था।
- बाद में मलेशिया ने 12 समुद्री मील के क्षेत्रीय समुद्र को अपनाया, जबकि सिंगापुर ने नौवहन की सुरक्षा करने वाली व्यवस्थाओं का समर्थन किया।
- चूँकि जलडमरूमध्य के कुछ हिस्सों की चौड़ाई 24 समुद्री मील से कम है, इसलिए तटीय राज्यों के क्षेत्रीय जल एक-दूसरे से मिल जाते हैं और इनके बीच कोई अलग उच्च समुद्री क्षेत्र (High Seas) नहीं बचता।
- इस प्रकार चुनौती यह थी कि राष्ट्रीय संप्रभुता और निर्बाध अंतरराष्ट्रीय नौवहन के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
UNCLOS और पारगमन मार्ग (Transit Passage) पर समझौता
- समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) ने पारगमन मार्ग (Transit Passage) की अवधारणा के माध्यम से एक महत्वपूर्ण समझौता प्रस्तुत किया।
- निर्दोष मार्ग (Innocent Passage) के विपरीत, पारगमन मार्ग जहाजों, जिसमें युद्धपोत भी शामिल हैं, को अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य से निरंतर और शीघ्रता से नौवहन करने की अनुमति देता है।
- इस व्यवस्था ने तटीय राज्यों को अपनी संप्रभुता बनाए रखने की अनुमति दी, जबकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए पूर्वानुमेय और सुनिश्चित नौवहन की सुविधा भी बनी रही।
- इंडोनेशिया ने इस सिद्धांत को कुछ आरक्षणों के साथ स्वीकार किया, जबकि मलेशिया ने पर्यावरण संरक्षण, बीमा और जहाजों की सुरक्षा से संबंधित चिंताओं पर जोर दिया।
- यह अनुभव दर्शाता है कि कानूनी समझौते और पारस्परिक रियायतें परस्पर प्रतिस्पर्धी समुद्री हितों में सामंजस्य स्थापित कर सकती हैं।
तटीय राज्यों और प्रमुख शक्तियों के बीच सहयोग
- इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर ने नौवहन सुरक्षा और समुद्री सुरक्षा के लिए विभिन्न तंत्र विकसित किए।
- जापान ने मलक्का जलडमरूमध्य परिषद (Malacca Strait Council) के माध्यम से सहयोग का समर्थन किया, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत संघ जैसे देशों का भी विश्वसनीय समुद्री पारगमन बनाए रखने में साझा हित था।
- 2007 के सहयोगात्मक तंत्र (Cooperative Mechanism) ने इस दृष्टिकोण को और विस्तारित किया। इसके माध्यम से उपयोगकर्ता देशों, उद्योगों और अन्य हितधारकों को नौवहन सहायता, हाइड्रोग्राफिक सर्वेक्षण और सुरक्षा परियोजनाओं में स्वैच्छिक योगदान देने का अवसर मिला।
- यह व्यवस्था दर्शाती है कि राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा व्यावहारिक हित सहयोग को बढ़ावा दे सकते हैं।
- महत्वपूर्ण रूप से, तटीय राज्यों ने पारगमन मार्ग के अधिकारों का प्रयोग करने वाले जहाजों पर टोल नहीं लगाया।
हॉर्मुज़ अलग क्यों है?
- हॉर्मुज़ में भी ऐसी ही क्षेत्रीय स्थिति दिखाई देती है क्योंकि जलडमरूमध्य के कुछ हिस्सों में ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल एक–दूसरे से मिलते हैं।
- हालाँकि, इसकी राजनीतिक और कानूनी परिस्थितियाँ काफी अलग हैं।
- ईरान ने UNCLOS का अनुमोदन नहीं किया है और उसने 1993 में एक ऐसी आवश्यकता लागू की जिसके तहत विदेशी युद्धपोतों को मार्ग से गुजरने के लिए अनुमति प्राप्त करनी होती है।
- इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हॉर्मुज़ ईरान की सुरक्षा संबंधी चिंताओं तथा बाहरी सैन्य शक्तियों, विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका, के साथ उसके टकराव से निकटता से जुड़ा हुआ है।
- इसलिए केवल नौवहन संबंधी व्यवस्थाएँ उन विवादों को हल नहीं कर सकतीं जिनकी जड़ें संप्रभुता, सैन्य उपस्थिति और रणनीतिक असुरक्षा में हैं।
महाशक्तियों की भूमिका
- मलक्का का अनुभव एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय समुद्री-कानून प्रक्रिया से लाभान्वित हुआ, जिसमें प्रमुख शक्तियाँ UNCLOS के अंतर्गत समझौतों को स्वीकार करने के लिए तैयार थीं।
- इससे नौवहन के लिए अपेक्षाकृत पूर्वानुमेय नियम स्थापित हुए।
- इसके विपरीत, हॉर्मुज़ एक अधिक ध्रुवीकृत भू–राजनीतिक वातावरण में कार्य करता है।
- भले ही ईरान और ओमान जलडमरूमध्य को पुनः खोलने के लिए कोई व्यवस्था स्थापित कर लें, उसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर कर सकती है कि प्रमुख बाहरी शक्तियाँ उसे मान्यता देती हैं और स्वीकार करती हैं या नहीं।
- इसलिए, व्यापक अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति के अभाव में क्षेत्रीय समझौते कमजोर या अस्थिर रह सकते हैं।
हॉर्मुज़ का महत्व
- मलक्का-सिंगापुर का अनुभव हॉर्मुज़ के लिए कई महत्वपूर्ण सबक प्रस्तुत करता है।
- पहला, समुद्री शासन में तटीय राज्यों की केंद्रीय भूमिका बनी रहनी चाहिए।
- दूसरा, संप्रभुता का अर्थ अंतरराष्ट्रीय नौवहन पर असीमित नियंत्रण होना आवश्यक नहीं है।
- तीसरा, स्पष्ट कानूनी नियम वाणिज्यिक और सैन्य जहाजों के लिए अनिश्चितता को कम कर सकते हैं।
- चौथा, नौवहन सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और हाइड्रोग्राफिक सहयोग राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा हितों का निर्माण कर सकते हैं।
अंततः, टिकाऊ व्यवस्थाओं के लिए विश्वास निर्माण और प्रमुख उपयोगकर्ता देशों की भागीदारी आवश्यक है। हालाँकि, मलक्का मॉडल को सीधे हॉर्मुज़ में लागू नहीं किया जा सकता।
- मलक्का की व्यवस्था दीर्घकालिक कानूनी वार्ता और सहयोग के माध्यम से विकसित हुई, जबकि हॉर्मुज़ क्षेत्रीय और वैश्विक सुरक्षा प्रतिस्पर्धा से गहराई से जुड़ा हुआ है।
निष्कर्ष
यह तुलना दर्शाती है कि समुद्री चोकपॉइंट्स का शासन भूगोल, अंतरराष्ट्रीय कानून और भू–राजनीति—तीनों से एक साथ निर्धारित होता है। मलक्का की सफलता वार्ता, कानूनी समझौते, क्षेत्रीय सहयोग और हितधारकों की भागीदारी के माध्यम से संभव हुई।
हॉर्मुज़ के सामने अधिक कठिन चुनौती है क्योंकि इसका शासन ईरान की सुरक्षा संबंधी चिंताओं और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ तनाव से अलग नहीं किया जा सकता। इसलिए, मलक्का–सिंगापुर अनुभव एक रूपरेखा (Framework) प्रदान करता है, न कि तैयार समाधान (Ready-made Solution)।
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