राजनीतिक सिद्धांत में राज्य (State) सबसे केंद्रीय अवधारणाओं में से एक है। राजनीति, सत्ता, कानून, नागरिकता, अधिकार, स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे लगभग सभी प्रश्न किसी न किसी रूप में राज्य की अवधारणा से जुड़े हुए हैं। लेकिन राज्य को सभी राजनीतिक विचारक एक ही दृष्टि से नहीं देखते।
राज्य क्या है?
- सामान्य अर्थ में राज्य एक ऐसी राजनीतिक संस्था है जिसके पास किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाली जनसंख्या पर सर्वोच्च और वैध राजनीतिक सत्ता होती है।
- आधुनिक राज्य की सामान्य विशेषताओं में जनसंख्या, निश्चित भू–भाग, सरकार, संप्रभुता और राजनीतिक वैधता को शामिल किया जाता है।
- लेकिन राजनीतिक सिद्धांत में राज्य को केवल इन संस्थागत विशेषताओं से परिभाषित नहीं किया जाता। असली प्रश्न यह है कि:
राज्य की आवश्यकता क्यों है और उसे व्यक्तियों तथा समाज पर शासन करने का अधिकार कहाँ से प्राप्त होता है? यहीं से राज्य के विभिन्न दृष्टिकोण विकसित होते हैं।
राज्य को समझने के प्रमुख दृष्टिकोण
राज्य की प्रकृति और भूमिका को समझने के लिए राजनीतिक सिद्धांत में कई प्रमुख दृष्टिकोण विकसित हुए हैं। इनमें विशेष रूप से उदारवादी, व्यक्तिवादी, आदर्शवादी, बहुलवादी, मार्क्सवादी, नव–मार्क्सवादी, अभिजनवादी, अराजकतावादी, नारीवादी और उत्तर–आधुनिक दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हैं।
उदारवादी दृष्टिकोण: राज्य व्यक्ति के लिए है
- उदारवादी दृष्टिकोण (Liberal Perspective) राज्य को व्यक्ति की स्वतंत्रता, अधिकारों और सुरक्षा की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में देखता है।
- इस दृष्टिकोण का मूल आधार यह है कि व्यक्ति राज्य से पहले नैतिक रूप से महत्वपूर्ण है। राज्य व्यक्ति के लिए बनाया गया है, न कि व्यक्ति केवल राज्य की सेवा के लिए अस्तित्व में है।
- उदारवादी चिंतन में व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, संपत्ति और समानता जैसे अधिकारों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
- इसलिए राज्य की शक्ति असीमित नहीं होनी चाहिए। राज्य को कानून के अधीन होना चाहिए और उसकी शक्तियों पर संवैधानिक सीमाएँ होनी चाहिए।
- उदारवादी दृष्टिकोण में राज्य का औचित्य मुख्यतः इस बात से जुड़ा है कि वह नागरिकों के अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करता है।
हॉब्स का उदारवादी पूर्वगामी दृष्टिकोण
- थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) को आधुनिक उदारवादी परंपरा का पूर्ण प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता, लेकिन उनकी सामाजिक अनुबंध की धारणा ने आधुनिक राज्य के व्यक्तिवादी औचित्य के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में व्यक्ति असुरक्षा और संघर्ष की स्थिति में रह सकता है। इसलिए व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए एक सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता स्थापित करता है।
- इस दृष्टिकोण में राज्य का प्रमुख उद्देश्य शांति और सुरक्षा है।
हॉब्स के यहाँ राज्य अराजकता से व्यवस्था की ओर जाने का माध्यम है। इसलिए राज्य की शक्ति का औचित्य नागरिकों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
- लॉक का सीमित राज्य
- जॉन लॉक (John Locke) राज्य को व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में देखते हैं।
- लॉक के अनुसार व्यक्ति प्राकृतिक अवस्था में स्वतंत्र और समान है तथा उसके पास जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति जैसे प्राकृतिक अधिकार हैं।
- राजनीतिक समाज की स्थापना इसलिए की जाती है ताकि इन अधिकारों की अधिक प्रभावी सुरक्षा हो सके।
- इसलिए लॉक के राज्य की प्रमुख विशेषता है सीमित सरकार (Limited Government)
राज्य स्वयं कानून से ऊपर नहीं हो सकता। यदि सरकार नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन करती है, तो उसकी वैधता पर प्रश्न उठाया जा सकता है।
लॉक के दृष्टिकोण ने आगे चलकर संवैधानिक सरकार, विधि का शासन, सीमित सरकार और अधिकारों की रक्षा जैसी अवधारणाओं को मजबूत आधार दिया।
उपयोगितावादी दृष्टिकोण: अधिकतम लोगों का अधिकतम हित
- उपयोगितावादी दृष्टिकोण (Utilitarian Perspective) राज्य को उसके परिणामों और सामाजिक उपयोगिता के आधार पर समझता है।
- जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) के लिए किसी राजनीतिक संस्था का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाना चाहिए कि वह समाज में कितनी उपयोगिता और सुख उत्पन्न करती है।
- इस दृष्टिकोण में राज्य का उद्देश्य किसी दैवी या आध्यात्मिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं बल्कि समाज के लिए उपयोगी परिणाम उत्पन्न करना है।
- यदि राज्य कानून और संस्थाओं के माध्यम से अधिकतम लोगों के लिए अधिकतम सुख सुनिश्चित करता है, तो उसकी भूमिका को उचित ठहराया जा सकता है।
- यह दृष्टिकोण राज्य की भूमिका को सामाजिक उपयोगिता और कल्याण से जोड़ता है।
आदर्शवादी दृष्टिकोण: राज्य नैतिक संस्था है
- आदर्शवादी दृष्टिकोण (Idealist Perspective) राज्य को केवल दमन या प्रशासन की संस्था नहीं मानता। इसके अनुसार राज्य मानव जीवन के नैतिक और सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है।
- इस दृष्टिकोण को विशेष रूप से टी. एच. ग्रीन ( H. Green) और हीगल (Hegel) के विचारों से समझा जा सकता है।
- आदर्शवादी विचारकों के अनुसार व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता केवल बाहरी हस्तक्षेप की अनुपस्थिति नहीं है। व्यक्ति अपनी क्षमताओं और नैतिक व्यक्तित्व का विकास सामाजिक संस्थाओं के भीतर करता है।
- इसलिए राज्य ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है जिनमें व्यक्ति अपनी वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त कर सके।
हीगल का राज्य: नैतिक जीवन की अभिव्यक्ति
- हीगल (Hegel) का राज्य संबंधी चिंतन राज्य के आदर्शवादी दृष्टिकोण का सबसे विकसित रूप प्रस्तुत करता है।
- हीगल के लिए राज्य केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं है। राज्य नैतिक जीवन (Ethical Life) की उच्चतर संस्थागत अभिव्यक्ति है।
हीगल के सामाजिक दर्शन में परिवार → नागरिक समाज → राज्य का विकास दिखाई देता है।
- परिवार में व्यक्ति का संबंध भावनात्मक और नैतिक एकता पर आधारित होता है। नागरिक समाज में व्यक्ति अपने निजी और आर्थिक हितों का अनुसरण करता है। राज्य इन व्यक्तिगत और सामूहिक हितों को एक व्यापक नैतिक व्यवस्था में समाहित करता है।
- इसलिए हीगल के लिए उचित राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता का केवल विरोध नहीं करता बल्कि उसे एक उच्चतर सामाजिक और नैतिक रूप प्रदान करता है।
बहुलवादी दृष्टिकोण: राज्य समाज के अनेक समूहों के बीच एक संस्था
- बहुलवादी दृष्टिकोण (Pluralist Perspective) राज्य को समाज से अलग और पूर्णतः स्वतंत्र सत्ता के रूप में नहीं देखता।
- समाज में अनेक समूह होते हैं, जैसे श्रमिक संगठन, व्यावसायिक संगठन, धार्मिक संगठन, पेशेवर संगठन, नागरिक संगठन, हित समूह। इन समूहों के अपने-अपने हित और राजनीतिक प्रभाव होते हैं।
- बहुलवादी विचारकों के अनुसार राजनीतिक सत्ता केवल राज्य के पास केंद्रित नहीं रहती। विभिन्न सामाजिक समूह राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं।
- इस दृष्टिकोण में राज्य विभिन्न सामाजिक हितों के बीच समन्वय और संतुलन स्थापित करने वाली संस्था के रूप में दिखाई दे सकता है।
रॉबर्ट डाहल और बहुलवादी राज्य
- रॉबर्ट डाहल (Robert Dahl) के बहुलवादी दृष्टिकोण में लोकतांत्रिक राजनीति को अनेक समूहों और हितों के बीच प्रतिस्पर्धा के रूप में देखा जाता है।
- इस दृष्टिकोण में किसी एक समूह के पास हमेशा पूर्ण राजनीतिक नियंत्रण नहीं होता। अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग समूह प्रभावशाली हो सकते हैं।
- इसलिए राज्य को एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जाता है जिसमें अनेक हित समूह सत्ता और नीतियों को प्रभावित करते हैं।
- यह दृष्टिकोण विशेष रूप से आधुनिक लोकतंत्र और बहुकेंद्रीय सत्ता (Polycentric Power) को समझने में उपयोगी है।
मार्क्सवादी दृष्टिकोण: राज्य वर्गीय सत्ता का उपकरण
- राज्य की सबसे प्रभावशाली आलोचनात्मक व्याख्याओं में मार्क्सवादी दृष्टिकोण (Marxist Perspective) का विशेष स्थान है।
- कार्ल मार्क्स (Karl Marx) के अनुसार राज्य को समाज की आर्थिक संरचना से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
- समाज में उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण और वर्गीय संबंध राजनीतिक संस्थाओं को प्रभावित करते हैं।
- मार्क्सवादी दृष्टिकोण में राज्य को अक्सर शासक वर्ग के हितों की रक्षा करने वाली राजनीतिक संरचना के रूप में समझा जाता है।
मार्क्स का आधार और अधिरचना का संबंध
- मार्क्सवादी चिंतन में समाज की आर्थिक संरचना (Economic Structure) और राजनीतिक-सामाजिक संस्थाओं के बीच संबंध को समझना महत्वपूर्ण है।
- आर्थिक संरचना में उत्पादन के साधन और उत्पादन संबंध महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि राजनीतिक, कानूनी और वैचारिक संस्थाएँ व्यापक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा होती हैं।
- इसलिए राज्य को केवल स्वतंत्र राजनीतिक संस्था मानने के बजाय उसे आर्थिक और वर्गीय संबंधों के संदर्भ में समझा जाता है।
नव–मार्क्सवादी दृष्टिकोण: राज्य केवल सीधा वर्गीय उपकरण नहीं
- बाद के मार्क्सवादी विचारकों ने राज्य को केवल शासक वर्ग का प्रत्यक्ष उपकरण मानने की सरल व्याख्या को अधिक जटिल बनाया।
- एंतोनियो ग्राम्शी (Antonio Gramsci) ने वर्चस्व (Hegemony) की अवधारणा के माध्यम से समझाया कि प्रभुत्व केवल बल के माध्यम से कायम नहीं रहता। समाज में विचारों, संस्कृति, शिक्षा और संस्थाओं के माध्यम से भी सहमति निर्मित की जाती है।
- इस दृष्टिकोण में राज्य की भूमिका केवल पुलिस और सेना तक सीमित नहीं है। व्यापक राजनीतिक और नागरिक संस्थाएँ सामाजिक सहमति के निर्माण में भूमिका निभाती हैं।
- इस प्रकार राज्य और समाज के संबंध को समझने के लिए बल और सहमति दोनों को देखना आवश्यक है।
ग्राम्शी: राज्य, नागरिक समाज और वर्चस्व
- ग्राम्शी ने राज्य को समझने के लिए राजनीतिक समाज (Political Society) और नागरिक समाज (Civil Society) के बीच संबंध पर बल दिया।
- राजनीतिक समाज में राज्य की औपचारिक संस्थाएँ और coercive mechanisms महत्वपूर्ण होते हैं, जबकि नागरिक समाज में शिक्षा, मीडिया, संस्कृति, धार्मिक संस्थाएँ और अन्य सामाजिक संगठन विचारों और सहमति के निर्माण में भूमिका निभाते हैं।
- इसलिए किसी वर्ग का प्रभुत्व केवल बल के माध्यम से नहीं बल्कि सहमति निर्मित करके भी कायम रह सकता है।
- यहीं ग्राम्शी का वर्चस्व (Hegemony) का विचार राज्य की पारंपरिक मार्क्सवादी समझ को अधिक विस्तृत करता है।
राल्फ मिलिबैंड और निकोस पुलांत्ज़ास
- नव-मार्क्सवादी राज्य सिद्धांत में राल्फ मिलिबैंड (Ralph Miliband) और निकोस पुलांत्ज़ास (Nicos Poulantzas) के बीच राज्य की प्रकृति को लेकर महत्वपूर्ण बहस हुई।
- मिलिबैंड ने राज्य की संस्थाओं और उनमें मौजूद सामाजिक अभिजात वर्ग के माध्यम से वर्गीय संबंधों को समझने पर बल दिया।
- इसके विपरीत पुलांत्ज़ास ने राज्य को केवल किसी विशेष वर्ग के लोगों द्वारा नियंत्रित संस्था के रूप में देखने के बजाय उसे पूँजीवादी सामाजिक संबंधों की संरचना से जोड़कर देखा।
- इस बहस ने यह स्पष्ट किया कि मार्क्सवादी राज्य सिद्धांत के भीतर भी राज्य की प्रकृति को लेकर एकरूपता नहीं है।
अभिजनवादी दृष्टिकोण: राज्य पर सीमित समूहों का प्रभाव
- अभिजनवादी दृष्टिकोण (Elite Perspective) के अनुसार प्रत्येक समाज में सत्ता और निर्णय लेने की क्षमता कुछ सीमित समूहों के हाथों में केंद्रित हो सकती है।
- गाएटानो मोस्का (Gaetano Mosca), विल्फ्रेडो पैरेटो (Vilfredo Pareto) और बाद में सी. राइट मिल्स ( Wright Mills) ने अलग-अलग रूपों में अभिजन और सत्ता की भूमिका का अध्ययन किया।
- मिल्स ने विशेष रूप से आधुनिक अमेरिकी समाज में सत्ता अभिजन (Power Elite) की भूमिका पर चर्चा की।
- इस दृष्टिकोण में लोकतांत्रिक संस्थाओं के अस्तित्व के बावजूद यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि वास्तविक निर्णय लेने की क्षमता किन सामाजिक समूहों के पास है।
इसलिए अभिजनवादी दृष्टिकोण हमें यह पूछने के लिए प्रेरित करता है; क्या राज्य की औपचारिक लोकतांत्रिक संरचना के पीछे वास्तविक सत्ता कुछ सीमित समूहों के पास केंद्रित रहती है?
अराजकतावादी दृष्टिकोण: क्या राज्य आवश्यक है?
- अराजकतावादी दृष्टिकोण (Anarchist Perspective) राज्य की आवश्यकता और वैधता पर ही मूलभूत प्रश्न उठाता है।
- अराजकतावादी विचारकों के अनुसार मनुष्य के सामाजिक सहयोग के लिए राज्य जैसी केंद्रीकृत और coercive authority हमेशा आवश्यक नहीं है।
- यदि समाज स्वैच्छिक सहयोग, पारस्परिक सहायता और विकेंद्रीकृत संस्थाओं के माध्यम से स्वयं को व्यवस्थित कर सकता है, तो राज्य की coercive सत्ता को उचित ठहराने की आवश्यकता पर प्रश्न उठता है।
- विलियम गॉडविन (William Godwin) और पियरे–जोज़ेफ प्रूधों (Pierre-Joseph Proudhon) जैसे विचारकों के चिंतन में इस प्रकार की आलोचना दिखाई देती है।
अराजकतावादी दृष्टिकोण का केंद्रीय प्रश्न है: क्या सामाजिक व्यवस्था राज्य के बिना संभव है?
नारीवादी दृष्टिकोण: क्या राज्य वास्तव में लैंगिक रूप से तटस्थ है?
- नारीवादी दृष्टिकोण (Feminist Perspective) राज्य की पारंपरिक अवधारणा की आलोचना इस आधार पर करता है कि राजनीतिक सिद्धांत ने लंबे समय तक राज्य को एक तटस्थ संस्था के रूप में प्रस्तुत किया, जबकि राज्य की संस्थाएँ ऐतिहासिक रूप से लैंगिक संबंधों से प्रभावित रही हैं।
- नारीवादी विचारक पूछते हैं कि यदि राज्य कानून की दृष्टि से समानता की बात करता है, तो परिवार, श्रम, संपत्ति, विवाह, प्रजनन और देखभाल जैसे क्षेत्रों में मौजूद वास्तविक असमानताओं को कैसे समझा जाए।
- नारीवादी दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उसने निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच पारंपरिक विभाजन पर प्रश्न उठाया।
- राजनीतिक सिद्धांत में लंबे समय तक परिवार को निजी क्षेत्र माना जाता रहा, जबकि नारीवादी विचारकों ने दिखाया कि परिवार के भीतर होने वाली सत्ता, श्रम और लैंगिक असमानताएँ भी राजनीतिक महत्व रखती हैं।
इसी संदर्भ में नारीवादी विचार का प्रसिद्ध तर्क सामने आता है: “व्यक्तिगत भी राजनीतिक है।”
अर्थात परिवार और निजी जीवन की सत्ता-संरचनाएँ भी व्यापक राजनीतिक संरचनाओं से जुड़ी हो सकती हैं।
उत्तर–आधुनिक दृष्टिकोण: राज्य और सत्ता का विकेंद्रीकरण
- उत्तर–आधुनिक दृष्टिकोण (Postmodern Perspective) राज्य को एक एकीकृत और स्थिर सत्ता के रूप में देखने पर प्रश्न उठाता है।
- मिशेल फूको (Michel Foucault) के चिंतन में सत्ता केवल राज्य या सरकार के पास केंद्रित नहीं रहती। सत्ता समाज की अनेक संस्थाओं और संबंधों के माध्यम से संचालित होती है।
- विद्यालय, अस्पताल, जेल, सेना, प्रशासन और अन्य संस्थाएँ लोगों के व्यवहार को नियंत्रित और अनुशासित करने में भूमिका निभा सकती हैं।
इसलिए फूको के दृष्टिकोण में सत्ता को केवल राज्य – नागरिक के संबंध में समझना पर्याप्त नहीं है।
सत्ता समाज के विभिन्न स्तरों पर फैली होती है और ज्ञान, संस्थाओं तथा सामाजिक मानदंडों के माध्यम से भी कार्य करती है।
वेबर: राज्य और वैध हिंसा का एकाधिकार
- मैक्स वेबर (Max Weber) ने आधुनिक राज्य को समझने के लिए अत्यंत प्रभावशाली परिभाषा प्रस्तुत की।
- वेबर के अनुसार आधुनिक राज्य वह मानव समुदाय है जो किसी निश्चित क्षेत्र में वैध भौतिक बल के प्रयोग के एकाधिकार का सफलतापूर्वक दावा करता है।
- यहाँ दो बातें महत्वपूर्ण हैं। पहली, राज्य के पास बल प्रयोग की क्षमता होती है। दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उस बल को वैध (Legitimate) माना जाना आवश्यक है।
वेबर ने राजनीतिक सत्ता की वैधता के तीन प्रमुख प्रकारों की चर्चा की:
- परंपरागत वैधता (Traditional Authority) परंपराओं और स्थापित प्रथाओं पर आधारित होती है।
- करिश्माई वैधता (Charismatic Authority) किसी असाधारण नेता के व्यक्तित्व और अनुयायियों की आस्था पर आधारित होती है।
- कानूनी–तार्किक वैधता (Legal-Rational Authority) कानूनों, नियमों और औपचारिक संस्थाओं पर आधारित होती है।
आधुनिक राज्य मुख्यतः कानूनी-तार्किक authority के आधार पर कार्य करता है।
कल्याणकारी राज्य का दृष्टिकोण
- आधुनिक उदार लोकतंत्र में राज्य की भूमिका केवल कानून और व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रही।
- कल्याणकारी राज्य (Welfare State) का दृष्टिकोण मानता है कि राज्य को सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को कम करने तथा नागरिकों को न्यूनतम सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने में भूमिका निभानी चाहिए।
- इस दृष्टिकोण में राज्य शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार संबंधी नीतियों, गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय जैसे क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाता है।
- इस प्रकार न्यूनतम राज्य की धारणा से आगे बढ़कर राज्य को सामाजिक न्याय और कल्याण का साधन माना जाता है।
नव–उदारवादी दृष्टिकोण: सीमित और सक्षम राज्य
- नव–उदारवादी दृष्टिकोण (Neoliberal Perspective) अत्यधिक विस्तृत राज्य की आलोचना करता है और बाजार तथा व्यक्तिगत पहल को अधिक महत्व देता है।
- इस दृष्टिकोण में राज्य की भूमिका को कई क्षेत्रों में सीमित करने की मांग की जाती है ताकि बाजार-व्यवस्था, प्रतिस्पर्धा और निजी पहल को अधिक स्थान मिल सके।
- हालाँकि इसका अर्थ राज्य की पूर्ण अनुपस्थिति नहीं है। राज्य को कानून, संपत्ति के अधिकार, अनुबंध और बाजार की बुनियादी संस्थागत व्यवस्था सुनिश्चित करने वाली संस्था के रूप में देखा जा सकता है।
इसलिए नव-उदारवाद का प्रश्न यह है कि राज्य को कहाँ हस्तक्षेप करना चाहिए और कहाँ बाजार तथा नागरिक समाज को अधिक स्वतंत्रता देनी चाहिए?
सामुदायिकतावादी दृष्टिकोण
- सामुदायिकतावादी दृष्टिकोण (Communitarian Perspective) अत्यधिक व्यक्तिवादी राज्य की आलोचना करता है।
- इस दृष्टिकोण के अनुसार व्यक्ति केवल स्वतंत्र और स्वायत्त व्यक्ति नहीं है। उसकी पहचान उसके समुदाय, भाषा, संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक संबंधों से भी निर्मित होती है।
- इसलिए राज्य को केवल व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में देखने के बजाय यह भी देखना आवश्यक है कि वह सामुदायिक मूल्यों और सामाजिक एकता के साथ किस प्रकार संबंध स्थापित करता है।
- इस दृष्टिकोण में व्यक्ति और समुदाय के बीच संबंध को राजनीतिक सिद्धांत का महत्वपूर्ण विषय बनाया जाता है।
निष्कर्ष
राज्य को किसी एक निश्चित दृष्टिकोण से समझना राजनीतिक सिद्धांत की जटिलता को सीमित कर देता है। उदारवादी दृष्टिकोण राज्य को अधिकारों और स्वतंत्रता की रक्षा करने वाली संस्था के रूप में देखता है, जबकि हॉब्स सुरक्षा और व्यवस्था को उसकी आवश्यकता का प्रमुख आधार बनाते हैं। लॉक सीमित सरकार और प्राकृतिक अधिकारों पर बल देते हैं, जबकि हीगल राज्य को नैतिक जीवन की उच्चतर अभिव्यक्ति मानते हैं।
दूसरी ओर, मार्क्सवादी दृष्टिकोण राज्य को वर्गीय सत्ता-संबंधों से जोड़ता है, ग्राम्शी राज्य और नागरिक समाज में वर्चस्व तथा सहमति की भूमिका को सामने लाते हैं, जबकि बहुलवादी दृष्टिकोण विभिन्न हित समूहों के बीच सत्ता के वितरण पर बल देता है। अभिजनवादी दृष्टिकोण वास्तविक सत्ता के सीमित समूहों में केंद्रित होने की संभावना को रेखांकित करता है। नारीवादी दृष्टिकोण राज्य की कथित तटस्थता और निजी-सार्वजनिक विभाजन की आलोचना करता है, जबकि उत्तर–आधुनिक दृष्टिकोण सत्ता को राज्य से आगे समाज की विभिन्न संस्थाओं और संबंधों में खोजता है। अराजकतावादी दृष्टिकोण राज्य की आवश्यकता और वैधता को ही चुनौती देता है।
इसलिए राज्य को समझने का सबसे व्यापक तरीका यह है कि उसे केवल सरकार या प्रशासन के रूप में न देखा जाए, बल्कि उसे सत्ता, वैधता, सामाजिक संबंधों, आर्थिक संरचना, अधिकारों, स्वतंत्रता और न्याय के व्यापक संदर्भ में समझा जाए।
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