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संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ‘शत्रु राज्य’ (Enemy State): जापान इन्हें क्यों हटाना चाहता है?

‘शत्रु राज्य’ (Enemy State) क्या है? और क्यों है?

22 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र को संबोधित करते हुए जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची (Sanae Takaichi) ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर से ‘शत्रु राज्य’ (Enemy State) संबंधी प्रावधानों को हटाने की मांग की। यह मांग ऐसे समय में सामने आई है जब जापान के चीन और रूस के साथ संबंधों में तनाव बढ़ा हुआ है और जापान अपनी रक्षा क्षमताओं को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

‘शत्रु राज्य’ से क्या तात्पर्य है?

  • ‘शत्रु राज्य’ संबंधी प्रावधानों की उत्पत्ति द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) की परिस्थितियों में हुई। द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों (Allied Powers) और धुरी राष्ट्रों (Axis Powers) के बीच संघर्ष हुआ था।
  • धुरी शक्तियों में मुख्य रूप से जर्मनी, इटली और जापान शामिल थे। युद्ध के अंत में मित्र राष्ट्र विजयी हुए और जापान ने सितंबर 1945 में आत्मसमर्पण किया।
  • इसी युद्धोत्तर परिस्थिति में संयुक्त राष्ट्र चार्टर तैयार किया गया, जो 24 अक्टूबर 1945 को प्रभावी हुआ। उस समय मित्र राष्ट्रों ने यह सुनिश्चित करने के लिए कुछ विशेष प्रावधान शामिल किए कि पराजित धुरी शक्तियों में सैन्यवाद या आक्रामक नीतियों का पुनरुत्थान न हो।

‘Enemy State’ का उल्लेख किन अनुच्छेदों में है?

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में ‘Enemy State’ का उल्लेख मुख्यतः अनुच्छेद 53, 77 और 107 में मिलता है।

  1. अनुच्छेद 53
  • अनुच्छेद 53 क्षेत्रीय व्यवस्थाओं (Regional Arrangements) और एजेंसियों द्वारा प्रवर्तनात्मक कार्रवाई से संबंधित है।
  • सामान्यतः क्षेत्रीय संगठन द्वारा किसी राज्य के विरुद्ध प्रवर्तनात्मक कार्रवाई के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की अनुमति आवश्यक होती है। लेकिन इस प्रावधान में ‘शत्रु राज्य’ के संबंध में एक ऐतिहासिक अपवाद रखा गया था।
  • अनुच्छेद 53(2) के अनुसार, ‘शत्रु राज्य’ से आशय ऐसे राज्य से है जो द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान संयुक्त राष्ट्र चार्टर के किसी हस्ताक्षरकर्ता का शत्रु था।
  1. अनुच्छेद 77
  • अनुच्छेद 77 संयुक्त राष्ट्र की न्यासिता व्यवस्था (Trusteeship System) से संबंधित है।
  • इसमें उन क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है जिन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप ‘शत्रु राज्यों’ से अलग किया गया था।
  • न्यासिता व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों के प्रशासन और राजनीतिक विकास की निगरानी करना था, जिनके लोगों ने अभी तक पूर्ण स्वशासन प्राप्त नहीं किया था।

. अनुच्छेद 107

  • अनुच्छेद 107 द्वितीय विश्व युद्ध के संदर्भ में मित्र राष्ट्रों द्वारा धुरी शक्तियों के विरुद्ध की गई कार्रवाइयों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर द्वारा अमान्य होने से बचाता है।
  • सरल शब्दों में, यह प्रावधान मित्र राष्ट्रों द्वारा युद्ध के दौरान या उसके परिणामस्वरूप धुरी शक्तियों के विरुद्ध की गई कार्रवाइयों के लिए एक ऐतिहासिक कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

यह अनुच्छेद सामान्य अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से अलग क्यों दिखाई देता है?

  • यहाँ अनुच्छेद 2(4) को समझना महत्वपूर्ण है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर का अनुच्छेद 2(4) सामान्यतः राज्यों के विरुद्ध बल प्रयोग या बल प्रयोग की धमकी को प्रतिबंधित करता है।
  • लेकिन ‘Enemy State’ संबंधी प्रावधान द्वितीय विश्व युद्ध के तत्कालीन संदर्भ में बनाए गए विशेष प्रावधान थे। इसलिए इन्हें युद्धोत्तर व्यवस्था के ऐतिहासिक अपवाद के रूप में समझा जाता है।
  • हालाँकि, वर्तमान समय में इनका वास्तविक कानूनी उपयोग अत्यंत सीमित या अप्रचलित माना जाता है। यही कारण है कि इन्हें अक्सर ‘obsolete’ या ‘moribund’ provisions कहा जाता है।

जापान इन्हें हटाने की मांग क्यों कर रहा है?

  • जापान का प्रमुख तर्क है कि द्वितीय विश्व युद्ध के लगभग आठ दशक बाद भी चार्टर में जापान को ऐतिहासिक ‘शत्रु राज्य’ की श्रेणी से जोड़ने वाली भाषा वर्तमान अंतरराष्ट्रीय वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं है।
  • जापान 1956 में संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना और युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में उसका राजनीतिक एवं आर्थिक पुनर्समावेश हुआ।
  • इसलिए जापान इन प्रावधानों को वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के संदर्भ में अप्रासंगिक मानता है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1995 में इन धाराओं को ‘obsolete’ माना था।

इसके बाद 2005 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने चार्टर से ‘enemy States’ के संदर्भों को हटाने के समर्थन में प्रस्ताव अपनाया।

लेकिन इन प्रावधानों को वास्तव में चार्टर से हटाया नहीं गया है। इसका प्रमुख कारण चार्टर संशोधन की कठिन प्रक्रिया और सदस्य देशों, विशेषकर सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों के बीच आवश्यक सहमति का अभाव है।

वर्तमान भू-राजनीति में प्रावधानों का उपयोग

इन धाराओं की औपचारिक प्रासंगिकता पर प्रश्न उठने के बावजूद, इनके उल्लेख का उपयोग वर्तमान भू-राजनीतिक विवादों में किया जाता रहा है।

चीन और रूस द्वारा इन प्रावधानों का संदर्भ जापान की बढ़ती रक्षा क्षमताओं की आलोचना तथा जापान के कुछ क्षेत्रीय दावों के संदर्भ में राजनयिक तर्क के रूप में दिया गया है। इस प्रकार, द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़े पुराने प्रावधान वर्तमान शक्ति-राजनीति में कूटनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं।

चार्टर में संशोधन की चुनौती

संयुक्त राष्ट्र चार्टर में संशोधन करना आसान प्रक्रिया नहीं है। संशोधन के लिए:

  • संयुक्त राष्ट्र महासभा में दो-तिहाई बहुमत आवश्यक है।
  • इसके बाद दो-तिहाई सदस्य देशों द्वारा अनुसमर्थन (ratification) आवश्यक होता है।
  • इसमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों (P5) का अनुसमर्थन भी आवश्यक है।

यही कारण है कि चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया व्यापक राजनीतिक सहमति पर निर्भर करती है।

इसके अतिरिक्त, चार्टर में संशोधन की प्रक्रिया शुरू होने पर सुरक्षा परिषद के सुधार, स्थायी सदस्यता के विस्तार और वीटो व्यवस्था जैसे अन्य मुद्दे भी सामने आ सकते हैं।

एक और बड़ी समस्या: UNSC Reform

  • इस मुद्दे का संबंध केवल ‘Enemy State’ clauses से नहीं है।
  • जापान की प्रधानमंत्री ने अपने UNGA भाषण में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के व्यापक सुधार की भी मांग की।
  • उनका तर्क था कि वर्तमान सुरक्षा परिषद की संरचना मुख्यतः 1945 की अंतरराष्ट्रीय शक्ति–संरचना को प्रतिबिंबित करती है, जबकि आज की वैश्विक व्यवस्था काफी बदल चुकी है।
  • जापान सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार के सदस्यों की संख्या बढ़ाने की वकालत करता है।
  • इसलिए ‘Enemy State’ clauses को हटाने का प्रश्न व्यापक UN Reform के प्रश्न से जुड़ जाता है।

2026 में यह मुद्दा दोबारा महत्वपूर्ण क्यों हो गया?

  • यही इस पूरे मुद्दे का सबसे महत्वपूर्ण समकालीन भू–राजनीतिक पहलू है। हालाँकि ये धाराएँ लंबे समय से अप्रचलित मानी जाती हैं, चीन और रूस ने हाल के वर्षों में जापान के संदर्भ में इनका राजनीतिक और कूटनीतिक उल्लेख किया है।
  • चीन का दृष्टिकोण: चीन ने इन प्रावधानों को युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की सुरक्षा से जोड़ते हुए जापान की बढ़ती रक्षा क्षमताओं के संदर्भ में इस्तेमाल किया है।
  • रूस का दृष्टिकोण: रूस ने भी इन प्रावधानों का उल्लेख जापान के साथ अपने क्षेत्रीय विवाद के संदर्भ में किया है। विशेष रूप से दक्षिणी कुरिल द्वीपों (Southern Kuril Islands) पर जापान के दावों को लेकर रूस ने इन ऐतिहासिक प्रावधानों का संदर्भ दिया है। इस प्रकार, भले ही ये धाराएँ व्यावहारिक रूप से अप्रचलित मानी जाती हों, उनका कूटनीतिक और राजनीतिक उपयोग अभी भी संभव है।

भारत के लिए इसका महत्व

‘शत्रु राज्य’ संबंधी धाराओं को हटाने की जापान की मांग संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था में संस्थागत सुधार (UN Reform) के व्यापक प्रश्न से जुड़ती है।

भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद सहित वैश्विक संस्थाओं को 21वीं सदी की भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुरूप अधिक प्रतिनिधिक, वैध और प्रभावी बनाने की मांग करता रहा है।

भारत G4 समूह का सदस्य है, जिसमें भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील शामिल हैं। G4 सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के विस्तार और अधिक प्रतिनिधिक वैश्विक शासन व्यवस्था का समर्थन करता है।

चीन–रूस–जापान के बीच व्यापक भू–राजनीतिक संदर्भ

  • इस मुद्दे को केवल संयुक्त राष्ट्र चार्टर की तकनीकी समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए।
  • इसके पीछे पूर्वी एशिया की बदलती सुरक्षा राजनीति भी महत्वपूर्ण है।
  • जापान अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत कर रहा है। दूसरी ओर, चीन और रूस दोनों जापान की कुछ सुरक्षा नीतियों और रक्षा व्यय में वृद्धि की आलोचना कर रहे हैं।

Indian Express के अनुसार, चीन और जापान के बीच ताइवान, सैन्य गतिविधियों और आर्थिक निर्भरता से जुड़े मुद्दों पर तनाव बढ़ा है। रूस और जापान के बीच भी दक्षिणी कुरिल द्वीपों को लेकर पुराना क्षेत्रीय विवाद मौजूद है।

इसलिए ‘Enemy State’ clauses का मुद्दा 1945 की विरासत और 2026 की भू–राजनीति के बीच संबंध को समझने का एक अच्छा उदाहरण बन जाता है।

 

भारत के लिए महत्व

  • भारत के लिए यह मुद्दा विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत लंबे समय से संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं को 21वीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की मांग करता रहा है।
  • भारत, जापान, जर्मनी और ब्राजील G4 के सदस्य हैं और सुरक्षा परिषद में सुधार तथा अधिक प्रतिनिधिक वैश्विक शासन व्यवस्था के मुद्दे पर सहयोग करते हैं।

इस संदर्भ में ‘Enemy State’ clauses का प्रश्न भारत के लिए तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है:

पहला, संयुक्त राष्ट्र सुधार: यह दिखाता है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर में अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध की राजनीतिक विरासत मौजूद है।

दूसरा, सुरक्षा परिषद सुधार: यह मुद्दा UNSC की संरचना और प्रतिनिधित्व के व्यापक प्रश्न से जुड़ता है।

तीसरा, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था: यह प्रश्न उठाता है कि क्या 1945 में निर्मित संस्थागत ढाँचा आज की बहुध्रुवीय और बदलती वैश्विक शक्ति-संरचना को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित करता है।

Source: IE


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