लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका केवल मुकदमों का निपटारा करना नहीं है, बल्कि संविधान के मूल्यों की रक्षा करना भी है। किंतु जब कोई न्यायाधीश अदालत के बाहर किसी सार्वजनिक मंच से ऐसे विषय पर बोलता है जो न्यायालय में विचाराधीन हो, तब यह प्रश्न खड़ा होता है कि न्यायिक अभिव्यक्ति की सीमा कहाँ समाप्त होती है और न्यायिक संयम कहाँ से आरंभ होता है।
जुलाई 2018 में, मुख्य न्यायाधीश बनने से कुछ माह पहले, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने कहा था कि लोकतंत्र को स्वतंत्र पत्रकारों के साथ कभी-कभी “मुखर न्यायाधीशों” (noisy judges) की भी आवश्यकता होती है। आठ वर्ष बाद यही न्यायिक स्वर विवाद का विषय बन गया है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयाँ द्वारा मतदाता सूची से नाम हटाए जाने पर की गई टिप्पणियों ने न्यायिक मर्यादा और विचाराधीन मामलों पर टिप्पणी की बहस को फिर से जीवित कर दिया है।
विवाद की पृष्ठभूमि
न्यायमूर्ति भुइयाँ का वक्तव्य
4 अक्टूबर 2026 को हैदराबाद स्थित नालसार (NALSAR) विधि विश्वविद्यालय में एक मूट कोर्ट प्रतियोगिता के समापन संबोधन में न्यायमूर्ति भुइयाँ ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:
- मताधिकार एक संवैधानिक अधिकार है और संविधान के मूल ढाँचे (basic structure) का अभिन्न अंग है।
- जो प्रक्रिया लाखों लोगों को मताधिकार से वंचित करे, वह स्वभावतः मनमानी है और अनुच्छेद 14 तथा 326 का उल्लंघन करती है।
- अनुच्छेद 326 के साथ “छेड़छाड़ नहीं की जा सकती” और कोई भी न्यायालय सामूहिक मताधिकार-वंचन को उचित नहीं ठहरा सकता।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 22 का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि मृत्यु के मामलों को छोड़कर किसी का नाम हटाने से पहले नोटिस और सुनवाई अनिवार्य है।
आलोचना के स्वर
- पूर्व मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई ने आपत्ति जताई कि न्यायिक मर्यादा किसी पदासीन न्यायाधीश को विचाराधीन (sub judice) मामले पर टिप्पणी की अनुमति नहीं देती।
- दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों एस.एन. ढींगरा और आर.एस. सोढ़ी ने भी ऐसी ही चिंता जताई। न्यायमूर्ति सोढ़ी ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि मताधिकार एक वैधानिक ढाँचे से संचालित होता है।
समर्थन का दृष्टिकोण
अगले ही दिन सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठतम अवर न्यायाधीश (puisne judge) न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने दिल्ली में एक व्याख्यान में कहा कि “निष्पक्षता और उदासीनता एक ही चीज़ नहीं हैं।” न्यायाधीश को निष्पक्ष होना चाहिए, परंतु उसे कानून के मानवीय परिणामों के प्रति संवेदनहीन होने की आवश्यकता नहीं है। यहीं मूल प्रश्न उठता है: एक जागरूक न्यायाधीश और आवश्यकता से अधिक बोल चुके न्यायाधीश के बीच रेखा कहाँ खींची जाए?
भारतीय आचार संहिता क्या कहती है?
इस बहस का आरंभ बिंदु “न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन” (Restatement of Values of Judicial Life) है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने 7 मई 1997 को अंगीकार किया था।
- खंड 1: न्यायाधीश का आचरण ऐसा हो जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता में जनता का विश्वास बना रहे।
- खंड 8: न्यायाधीश न तो सार्वजनिक बहस में उतरेगा, न राजनीतिक विषयों पर और न ही उन मामलों पर अपने विचार व्यक्त करेगा जो न्यायिक निर्णय हेतु लंबित हैं या जिनके आने की संभावना है।
इस संहिता के उल्लंघन पर स्वयं में कोई दंड का प्रावधान नहीं है, किंतु न्यायिक निर्णयों में इसे बार-बार उद्धृत किया गया है और इस पर भरोसा किया गया है।
संदर्भ: जिस समय न्यायमूर्ति भुइयाँ नालसार में बोल रहे थे, उस समय पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़ा मुकदमा सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था। चुनाव आयोग ने न्यायालय को बताया था कि 22 लाख से अधिक हटाए गए मतदाताओं ने नाम बहाली के लिए अपील की है, और संबंधित मामले 5 अक्टूबर को सूचीबद्ध थे। उल्लेखनीय है कि न्यायमूर्ति भुइयाँ ने अपने भाषण में SIR का नाम नहीं लिया और वे उन पीठों का हिस्सा भी नहीं थे।
क्या कोई नई बात कही गई?
यहाँ आलोचना को संतुलित दृष्टि से देखना आवश्यक है। 27 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स बनाम भारत निर्वाचन आयोग मामले में बिहार SIR को वैध ठहराया था। उस निर्णय में न्यायालय ने कहा था:
- मताधिकार संवैधानिक अधिकार है, यद्यपि यह न तो निरपेक्ष है और न ही अनियंत्रित।
- अनुच्छेद 325 और 326 पात्र मतदाताओं को शामिल करने तथा अपात्रों को बाहर करने, दोनों की अपेक्षा करते हैं।
- निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 का नियम 21A किसी नाम को हटाने से पहले नोटिस, जाँच, सुनवाई और तर्कसंगत निर्णय की अपेक्षा करता है।
अतः मताधिकार को संवैधानिक बताने और हटाने से पहले सुनवाई पर बल देने में न्यायमूर्ति भुइयाँ स्थापित न्यायिक आधार पर ही खड़े थे। अधिक विवादास्पद उनका यह कथन था कि लाखों को वंचित करने वाली प्रक्रिया स्वभावतः मनमानी है और कोई न्यायालय इसे स्वीकार नहीं कर सकता। फिर भी यह कथन सशर्त था और इसमें यह निर्णय नहीं दिया गया था कि कोई विशेष SIR ऐसा परिणाम उत्पन्न कर रहा है। असली प्रश्न यह है कि उनके शब्द किसी जीवंत विवाद के उत्तर के कितने निकट पहुँच गए।
अतिरिक्त संदर्भ: मताधिकार की प्रकृति पर भारतीय न्यायशास्त्र में मतभेद रहा है। ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल (1982) और कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में इसे वैधानिक अधिकार माना गया, जबकि पीयूसीएल बनाम भारत संघ (2003) में इसे संवैधानिक अधिकार की श्रेणी में रखा गया। इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण (1975) में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को मूल ढाँचे का भाग माना गया था।
अंतरराष्ट्रीय मानक और उदाहरण
बैंगलोर सिद्धांत
तुलनात्मक मानक कहीं अधिक सटीक सीमा खींचते हैं। बैंगलोर न्यायिक आचरण सिद्धांत (2002), जिन्हें संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) ने 2006 में समर्थन दिया, छह मूल्यों पर आधारित हैं: स्वतंत्रता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, औचित्य, समानता तथा सक्षमता एवं तत्परता।

- इनकी टीका विधिक शिक्षा, न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायालय प्रशासन पर न्यायाधीशों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को मान्यता देती है।
- सिद्धांत 2.4 ऐसी टिप्पणी पर रोक लगाता है जो लंबित या संभावित कार्यवाही के परिणाम को उचित रूप से प्रभावित कर सकती हो।
- सिद्धांत 4 न्यायाधीशों को कानून और न्याय प्रशासन पर लिखने, व्याख्यान देने और पढ़ाने की अनुमति देता है।
अमेरिकी आचार संहिता
अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय की 2023 की आचार संहिता न्यायाधीशों को बोलने, लिखने और पढ़ाने की अनुमति देती है, किंतु लंबित या आसन्न मामलों के गुण-दोष पर टिप्पणी से बचने को कहती है। विद्वत्तापूर्ण या शैक्षिक उद्देश्य से वे मुद्दों का वर्णन कर सकते हैं। यहाँ मूल भेद किसी मुद्दे को समझाने और उसका उत्तर देते प्रतीत होने के बीच है।
ऐतिहासिक प्रसंग
- न्यायमूर्ति एंटोनिन स्कालिया (2003): उन्होंने निष्ठा की शपथ (Pledge of Allegiance) पर निचली अदालत के निर्णय की आलोचना की। वादी ने उनके हटने की माँग की और जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, तो स्कालिया उसमें शामिल नहीं हुए, यद्यपि न्यायालय ने कोई कारण नहीं बताया।
- लेडी हेल (ब्रिटेन, 2016): उन्होंने ब्रेक्सिट मुकदमे के प्रतिस्पर्धी तर्कों की रूपरेखा बताई और फिर यह कहकर रुक गईं कि मामला उनके न्यायालय में आने वाला है, इसलिए वे और कुछ नहीं कहेंगी। बाद में वे मिलर मामले की पीठ में बैठीं।
- न्यायमूर्ति रूथ बेडर गिन्सबर्ग: उन्होंने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की आलोचना कर एक अलग ही सीमा लाँघी और बाद में स्वयं अपनी टिप्पणियों को “अविवेकपूर्ण” माना।
भारतीय व्यवहार
भारतीय परंपरा भी हर सार्वजनिक हस्तक्षेप को अनुचित मानने के विरुद्ध है। मार्च 2024 में नालसार में ही न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने विधेयकों पर स्वीकृति रोकने वाले राज्यपालों की आलोचना की थी, जबकि संबंधित विवाद न्यायालय में लंबित थे। विद्वान जैस्मिन मोरान और क्रिस्टोफर डब्ल्यू. श्मिट भी पक्षपात की आशंका को स्वीकार करते हैं, परंतु न्यायिक मौन को इसका समाधान नहीं मानते।
क्या न्यायमूर्ति भुइयाँ असाधारण रूप से मुखर हैं?
न्यायमूर्ति भुइयाँ असामान्य रूप से दृश्यमान न्यायाधीश हैं। एक सतर्क, खुले स्रोतों पर आधारित अध्ययन के अनुसार 14 जुलाई 2023 को सर्वोच्च न्यायालय में आने के बाद से उनके कम से कम 25 सार्वजनिक कार्यक्रम दर्ज हुए हैं। इस गणना में संस्थागत अभिलेख, बार कार्यक्रम और समकालीन रिपोर्टें शामिल थीं, जबकि अदालती टिप्पणियाँ, आंतरिक कार्यक्रम और केवल निर्धारित भागीदारी वाले आयोजन बाहर रखे गए। कम से कम नौ संबोधनों पर समाचार बने, जिनमें सात 2026 के हैं। यह संख्या न्यूनतम है।
2026 में उनके भाषण अधिक धारदार हुए। उन्होंने:
- न्यायिक स्थानांतरणों में कार्यपालिका के प्रभाव पर प्रश्न उठाया;
- गैरकानूनी गतिविधि (निवारण) अधिनियम (UAPA) के अति-प्रयोग पर चर्चा करते हुए कम दोषसिद्धि दरों का उल्लेख किया;
- प्रतिबंधात्मक जमानत शर्तों की आलोचना की;
- कॉलेजियम निर्णयों में अधिक पारदर्शिता की माँग की;
- खान-पान, कविताओं, विरोध प्रदर्शनों और नारों से उपजे निरर्थक अभियोजनों की आलोचना की।
इनमें से अधिकांश बयान सुर्खियाँ बने, पर मर्यादा को लेकर ऐसा विवाद नहीं हुआ।
दो उल्लेखनीय प्रसंग:
- जब उन्होंने दिल्ली मेट्रो मध्यस्थता पर सर्वोच्च न्यायालय के 2024 के निर्णय की आलोचना की, तो सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा ने इसे “अविवेक” कहा।
- पूर्व न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने असहमति और अपराधीकरण पर जुलाई के उनके भाषण का बचाव किया, परंतु यह चेतावनी भी दी कि पदासीन न्यायाधीशों को संयम बरतना चाहिए क्योंकि ऐसे मुद्दे बाद में उनके सामने आ सकते हैं।
इन मतभेदों से स्पष्ट है कि केवल विवाद होना किसी कथन के अनुचित होने की कसौटी नहीं है।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय का रिकॉर्ड क्या बताता है?
गुवाहाटी उच्च न्यायालय में उनका न्यायिक रिकॉर्ड यह सिखाता है कि भाषणों को निर्णयों का पूर्वानुमान नहीं मानना चाहिए।
- मोनोवारा बेवा बनाम भारत संघ (2017): उनकी पीठ ने विदेशी न्यायाधिकरण के निष्कर्ष को बरकरार रखा और ग्राम पंचायत सचिव के प्रमाणपत्र को एनआरसी संबंध-दस्तावेज़ के रूप में अस्वीकार किया। सर्वोच्च न्यायालय ने बाद में रूपजान बेगम बनाम भारत संघ में इस व्यापक निष्कर्ष को निरस्त कर दिया।
- सिराजुल हक बनाम असम राज्य (2019): सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी पीठ के 2017 के उस निर्णय को पलटा, जिसमें पारिवारिक नाम की भिन्नताओं के कारण नागरिकता दावा खारिज हुआ था।
- मोहम्मद अनुवर हुसैन बनाम भारत संघ (2014): उन्होंने ठोस तर्क और पुष्ट कारणों के अभाव में विदेशी न्यायाधिकरण का आदेश निरस्त किया, मामला पुनर्विचार हेतु लौटाया और याचिकाकर्ता को हिरासत से रिहा करने का आदेश दिया।
इस प्रकार उनके रिकॉर्ड में कठोर और दावेदार-हितैषी, दोनों धाराएँ हैं। नागरिकता, स्वतंत्रता या मताधिकार पर अदालत के बाहर दिए गए वक्तव्य से यह नहीं आँका जा सकता कि वे किसी विधिवत बहस वाले मामले में क्या निर्णय देंगे।
क्या आलोचक सही हैं?
- भारत का पुनर्कथन अमेरिकी संहिता की तुलना में व्यापक भाषा का प्रयोग करता है।
- मताधिकार के संवैधानिक होने और नाम हटाने में प्रक्रियात्मक सुरक्षा के उनके कथन स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप हैं।
- “कोई न्यायालय सामूहिक मताधिकार-वंचन को स्वीकार नहीं कर सकता” वाला वाक्य एक संवैधानिक निष्कर्ष के निकट पहुँचता है, यद्यपि वह सशर्त था और किसी विशेष SIR पर निर्णय नहीं देता था।
- आलोचना तब कमजोर हो जाती है जब उसे इस दावे तक फैला दिया जाए कि पदासीन न्यायाधीशों को संवैधानिक कानून, नागरिक स्वतंत्रता, न्यायिक नियुक्तियों या न्यायालय प्रशासन पर सार्वजनिक चर्चा से बचना चाहिए। भारतीय न्यायाधीश लंबे समय से इस क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय मानक भी इसका मूल्य स्वीकारते हैं।

- यदि वही सटीक प्रश्न प्रस्तुत करने वाला मामला उन्हें सौंपा जाए, तो स्कालिया प्रसंग दिखाता है कि उनके सुनवाई से हटने (recusal) का प्रश्न उठ सकता है।
- अतिरिक्त आयाम: भारत में पक्षपात की आशंका की कसौटी रंजीत ठाकुर बनाम भारत संघ (1987) में स्थापित हुई, जहाँ कहा गया कि निर्णायक कसौटी पक्षकार के मन में पक्षपात की “उचित आशंका” है। साथ ही अनुच्छेद 121 संसद में न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को सीमित करता है, अतः न्यायिक आचरण का नियमन मुख्यतः स्व-नियमन पर टिका है।
निष्कर्ष
न्यायमूर्ति गोगोई का “मुखर न्यायाधीश” और न्यायमूर्ति नाथ का “निष्पक्षता उदासीनता नहीं” वाला सूत्र एक साथ अस्तित्व में रह सकते हैं। उचित कसौटियाँ तीन हैं: भाषण का विषय, निष्कर्ष की विशिष्टता और न्यायिक निर्णय से उसकी निकटता।

न्यायिक अभिव्यक्ति संवैधानिक संवाद को समृद्ध कर सकती है, किंतु व्याख्यान कक्ष को ऐसा न्यायालय नहीं बन जाना चाहिए जो पक्षकारों की सुनवाई से पहले ही फैसला सुना दे।
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