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कोपेनहेगन स्कूल का प्रतिभूतिकरण सिद्धांत

जब कोई सरकार कहती है कि “देश की सुरक्षा ख़तरे में है”, तो उस वाक्य के बाद बहुत कुछ बदल जाता है। संसद में लंबी बहस की जगह तुरंत निर्णय होने लगते हैं, विशेष कानून बनते हैं, बजट बढ़ता है, और कभी-कभी नागरिक अधिकारों पर भी अंकुश लग जाता है। लोग इसे स्वीकार भी कर लेते हैं, क्योंकि प्रश्न “अस्तित्व” का बताया गया है। तो क्या कोई मुद्दा अपने आप में सुरक्षा का मुद्दा होता है, या उसे बोलकर, समझाकर और स्वीकार करवाकर सुरक्षा का मुद्दा बनाया जाता है?

कोपेनहेगन स्कूल (Copenhagen School) का उत्तर है कि सुरक्षा कोई पहले से मौजूद वस्तु नहीं है; वह एक सामाजिक प्रक्रिया है। किसी मुद्दे को “अस्तित्व के लिए ख़तरा” घोषित करके सामान्य राजनीति से ऊपर उठा देने की इस प्रक्रिया को उन्होंने “प्रतिभूतिकरण” (Securitization) कहा। यह सिद्धांत शीत युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सुरक्षा अध्ययन की सबसे प्रभावशाली अवधारणाओं में से एक बन गया। UGC NET राजनीति विज्ञान में अंतरराष्ट्रीय संबंध की इकाई के अंतर्गत “सुरक्षा की नई अवधारणाएँ”, “आलोचनात्मक सुरक्षा अध्ययन” और “रचनावाद” से इसके प्रश्न नियमित रूप से बनते हैं।

कोपेनहेगन स्कूल: पृष्ठभूमि

कोपेनहेगन स्कूल का संबंध डेनमार्क के कोपेनहेगन शांति अनुसंधान संस्थान (Copenhagen Peace Research Institute, COPRI) से है, जिसकी स्थापना 1985 में हुई। 2003 में यह डेनिश इंस्टीट्यूट फ़ॉर इंटरनेशनल स्टडीज़ (DIIS) में विलय हो गया।

इसके तीन प्रमुख विचारक हैं:

  1. ब्रिटिश विद्वान बैरी बुज़ान (Barry Buzan)
  2. डेनिश विद्वान ओले वेवर (Ole Wæver)
  3. डच विद्वान याप डी वाइल्ड (Jaap de Wilde)।

“प्रतिभूतिकरण” शब्द ओले वेवर ने दिया। 1995 में उनका प्रसिद्ध लेख “सिक्योरिटाइज़ेशन एंड डीसिक्योरिटाइज़ेशन” (Securitization and Desecuritization) रॉनी लिप्सचुट्ज़ (Ronnie Lipschutz) द्वारा संपादित पुस्तक “ऑन सिक्योरिटी” (On Security) में प्रकाशित हुआ।

बुज़ान की पुस्तक “पीपल, स्टेट्स एंड फ़ियर” (People, States and Fear, 1983; दूसरा संस्करण 1991) ने सुरक्षा के विस्तार की ज़मीन तैयार की।

इस सिद्धांत का सबसे व्यवस्थित रूप तीनों विचारकों की संयुक्त पुस्तक “सिक्योरिटी: अ न्यू फ़्रेमवर्क फ़ॉर एनालिसिस” (Security: A New Framework for Analysis, 1998) में मिलता है।

रोचक तथ्य यह है कि “कोपेनहेगन स्कूल” नाम इन विचारकों ने स्वयं नहीं रखा। यह नाम आयरिश विद्वान बिल मैकस्वीनी (Bill McSweeney) ने 1996 में इनकी आलोचना करते हुए दिया था।

पारंपरिक सुरक्षा दृष्टि और उसकी सीमाएँ

कोपेनहेगन स्कूल को समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि उससे पहले सुरक्षा को कैसे देखा जाता था। शीत युद्ध के समय सुरक्षा अध्ययन पर यथार्थवाद (Realism) का प्रभुत्व था। इस दृष्टि की मुख्य बातें थीं:

  • सुरक्षा का अर्थ है राज्य की सुरक्षा, यानी राज्य ही “संदर्भ वस्तु” है।
  • ख़तरा मुख्यतः बाहरी और सैन्य होता है, यानी दूसरे राज्य की सेना।
  • सुरक्षा का साधन सैन्य शक्ति, हथियार और गठबंधन हैं।
  • ख़तरे वस्तुगत (Objective) होते हैं: वे हमारी सोच से अलग, वास्तव में मौजूद होते हैं।

1980 और 1990 के दशक में इस दृष्टि पर दो दिशाओं से प्रश्न उठे। एक ओर “विस्तारवादी” (Wideners) विद्वान थे, जो कहते थे कि आर्थिक संकट, पर्यावरण विनाश, महामारी और पहचान के संकट भी सुरक्षा के प्रश्न हैं। दूसरी ओर “पारंपरिकवादी” (Traditionalists) विद्वान, जैसे स्टीफ़न वॉल्ट (Stephen Walt), चेतावनी देते थे कि यदि हर चीज़ को सुरक्षा कहा जाएगा, तो “सुरक्षा” शब्द का अर्थ ही खो जाएगा।

कोपेनहेगन स्कूल ने इस बहस का एक बीच का रास्ता निकाला। उसने सुरक्षा के क्षेत्रों का विस्तार तो स्वीकार किया, पर साथ ही यह स्पष्ट मानदंड भी दिया कि कोई मुद्दा कब सुरक्षा का मुद्दा बनता है। यह मानदंड है: प्रतिभूतिकरण।

प्रतिभूतिकरण क्या है?

कोपेनहेगन स्कूल के अनुसार प्रतिभूतिकरण वह प्रक्रिया है जिसमें किसी मुद्दे को किसी संदर्भ वस्तु के लिए “अस्तित्वगत ख़तरा” (Existential Threat) के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, और इस आधार पर सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर जाकर “असाधारण उपायों” (Extraordinary Measures) को उचित ठहराया जाता है।

सरल शब्दों में, जब कोई नेता कहता है: “यदि हमने अभी यह कदम नहीं उठाया, तो हम बचेंगे ही नहीं; इसलिए सामान्य नियम अभी लागू नहीं हो सकते”, तब वह उस मुद्दे का प्रतिभूतिकरण कर रहा होता है।

राजनीतिक मुद्दों का स्पेक्ट्रम

सुरक्षा एक “वाक्-क्रिया” (Speech Act)

कोपेनहेगन स्कूल की सबसे मौलिक बात यह है कि वह सुरक्षा को एक “वाक्-क्रिया” (Speech Act) मानता है। यह विचार ब्रिटिश भाषा-दार्शनिक जे.एल. ऑस्टिन (J.L. Austin) की पुस्तक “हाउ टू डू थिंग्स विद वर्ड्स” (How to Do Things with Words, 1962) से लिया गया है।

  • ऑस्टिन ने बताया कि कुछ वाक्य केवल किसी बात का वर्णन नहीं करते, बल्कि बोलते ही एक कार्य कर देते हैं। जैसे विवाह में “मैं स्वीकार करता हूँ” कहना, या न्यायाधीश का “मैं तुम्हें दोषी घोषित करता हूँ” कहना। इन वाक्यों को बोलना ही कार्य करना है। ऑस्टिन ने इन्हें “निष्पादक कथन” (Performative Utterance) कहा।
  • वेवर ने इसी विचार को सुरक्षा पर लागू किया। उनके अनुसार “सुरक्षा” शब्द बोलना केवल किसी वास्तविक स्थिति का वर्णन नहीं, बल्कि अपने आप में एक कार्य है। जब कोई अधिकृत व्यक्ति किसी मुद्दे को “सुरक्षा” का प्रश्न घोषित करता है, तो वह उस मुद्दे के साथ व्यवहार का तरीका ही बदल देता है। वेवर का प्रसिद्ध कथन है कि “सुरक्षा” कहकर ही कोई राज्य-प्रतिनिधि किसी विशेष क्षेत्र पर अधिकार का दावा करता है।
  • इसका अर्थ यह है कि सुरक्षा “वस्तुगत” नहीं, बल्कि “अंतर्विषयी” (Intersubjective) है। कोई ख़तरा कितना वास्तविक है, यह कोपेनहेगन स्कूल के लिए मुख्य प्रश्न नहीं है। मुख्य प्रश्न यह है कि उसे ख़तरे के रूप में किसने, कैसे प्रस्तुत किया और लोगों ने उसे स्वीकार किया या नहीं। यही कारण है कि इस सिद्धांत को रचनावाद (Constructivism) के निकट माना जाता है।

प्रतिभूतिकरण के मुख्य घटक

“सिक्योरिटी: अ न्यू फ़्रेमवर्क फ़ॉर एनालिसिस” (1998) में प्रतिभूतिकरण के विश्लेषण के लिए तीन प्रकार की इकाइयाँ बताई गई हैं, और साथ में दो और आवश्यक तत्व।

1. संदर्भ वस्तु (Referent Object)

वह वस्तु जिसके अस्तित्व को ख़तरे में बताया जाता है और जिसे बचाने की बात होती है। पारंपरिक दृष्टि में यह केवल राज्य था, पर कोपेनहेगन स्कूल के अनुसार यह राष्ट्र, धर्म, अर्थव्यवस्था, पर्यावरण या कोई सिद्धांत भी हो सकता है। शर्त केवल इतनी है कि उसके “अस्तित्व” की बात वैध रूप से की जा सके।

2. प्रतिभूतिकारी कर्ता (Securitizing Actor)

वह व्यक्ति या समूह जो किसी मुद्दे को सुरक्षा का प्रश्न घोषित करता है। प्रायः ये सरकार के प्रमुख, मंत्री, राजनीतिक नेता, सेना के अधिकारी, धर्मगुरु या शक्तिशाली दबाव समूह होते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि हर कोई प्रतिभूतिकरण नहीं कर सकता; इसके लिए कर्ता के पास पर्याप्त सामाजिक प्रतिष्ठा और अधिकार होना चाहिए।

3. कार्यात्मक कर्ता (Functional Actor)

वे कर्ता जो न तो संदर्भ वस्तु हैं और न ही प्रतिभूतिकरण करने वाले, पर जो उस क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति को प्रभावित करते हैं। जैसे पर्यावरण के मामले में प्रदूषण फैलाने वाली कंपनी, या ऊर्जा क्षेत्र में कोई बड़ी तेल कंपनी।

4. श्रोता (Audience)

यह प्रतिभूतिकरण का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। केवल “सुरक्षा” कह देना पर्याप्त नहीं है। जिन लोगों को संबोधित किया जा रहा है, उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि वास्तव में अस्तित्वगत ख़तरा है और असाधारण उपाय आवश्यक हैं। लोकतंत्र में यह श्रोता जनता और संसद होते हैं; अन्य व्यवस्थाओं में यह सेना या शासक अभिजन भी हो सकते हैं।

5. असाधारण उपाय (Extraordinary Measures)

प्रतिभूतिकरण का परिणाम यह होता है कि सामान्य नियम-प्रक्रियाओं से बाहर जाकर कार्रवाई करना उचित मान लिया जाता है, जैसे आपातकाल, गोपनीयता, विशेष कानून, बिना लंबी बहस के निर्णय, या नागरिक स्वतंत्रताओं पर अस्थायी रोक।

प्रतिभूतिकारी कदम बनाम सफल प्रतिभूतिकरण

कोपेनहेगन स्कूल एक महत्वपूर्ण अंतर करता है:

  1. प्रतिभूतिकारी कदम (Securitizing Move): जब कोई कर्ता किसी मुद्दे को अस्तित्वगत ख़तरा बताता है। यह केवल एक प्रयास है।
  2. सफल प्रतिभूतिकरण (Successful Securitization): जब श्रोता उस दावे को स्वीकार कर लेता है, और असाधारण उपायों के लिए स्थान बन जाता है।

यानी नेता का भाषण अपने आप में प्रतिभूतिकरण नहीं है। यदि जनता या संसद उस दावे को नकार दे, तो प्रतिभूतिकरण विफल हो जाता है। इसीलिए बुज़ान, वेवर और डी वाइल्ड लिखते हैं कि प्रतिभूतिकरण का निर्णय अंततः श्रोता करता है, कर्ता नहीं।

रोचक बात यह भी है कि असाधारण उपायों का वास्तव में लागू होना आवश्यक नहीं; पर्याप्त यह है कि उनके लिए समर्थन और वैधता बन जाए।

सफलता की सुविधाजनक शर्तें (Facilitating Conditions)

कोई प्रतिभूतिकारी कदम सफल होगा या नहीं, यह कुछ शर्तों पर निर्भर करता है। कोपेनहेगन स्कूल इन्हें दो भागों में बाँटता है:

आंतरिक शर्त (भाषाई-व्याकरणिक):

कथन को “सुरक्षा के व्याकरण” (Grammar of Security) का पालन करना चाहिए। अर्थात् उसमें अस्तित्वगत ख़तरा, “वापसी न हो सकने वाला बिंदु” (Point of No Return) और समाधान का संभावित मार्ग, ये तीनों बातें होनी चाहिए।

बाहरी शर्तें (सामाजिक संदर्भ):

  • कर्ता की सामाजिक पूँजी और अधिकार: प्रधानमंत्री या सेना प्रमुख का कथन किसी आम नागरिक के कथन से अधिक प्रभावी होगा।
  • ख़तरे की विशेषताएँ: जिन चीज़ों को लोग पहले से ख़तरनाक मानते हैं, जैसे टैंक, बम, घातक विषाणु, उनका प्रतिभूतिकरण आसान होता है।

सुरक्षा के पाँच क्षेत्र (Sectors)

कोपेनहेगन स्कूल का दूसरा बड़ा योगदान सुरक्षा का पाँच क्षेत्रों में विस्तार है। यह विचार बुज़ान की “पीपल, स्टेट्स एंड फ़ियर” (1991 संस्करण) में आया और 1998 की पुस्तक में विस्तार से विकसित हुआ।

सामाजिक सुरक्षा (Societal Security)

  1. इन पाँच क्षेत्रों में “सामाजिक सुरक्षा” कोपेनहेगन स्कूल की सबसे विशिष्ट अवधारणा है। इसे ओले वेवर और उनके सहयोगियों ने “आइडेंटिटी, माइग्रेशन एंड द न्यू सिक्योरिटी एजेंडा इन यूरोप” (Identity, Migration and the New Security Agenda in Europe, 1993) में विकसित किया।
  2. राज्य की सुरक्षा का केंद्र “संप्रभुता” है, जबकि समाज की सुरक्षा का केंद्र “पहचान” (Identity) है।
  3. राज्य तब ख़तरे में होता है जब उसकी संप्रभुता छिनती है; समाज तब ख़तरे में होता है जब उसकी पहचान, यानी “हम” की भावना, मिटने लगती है।
  4. यह अवधारणा शीत युद्ध के बाद यूरोप में उभरे जातीय संघर्षों, यूगोस्लाविया के विघटन, और प्रवासन पर हुई बहसों को समझने के लिए विकसित हुई।

विश्लेषण के स्तर

कोपेनहेगन स्कूल सुरक्षा का अध्ययन पाँच स्तरों पर करने का सुझाव देता है:

  • अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था (International System): पूरे विश्व का स्तर।
  • अंतरराष्ट्रीय उप-व्यवस्था (International Subsystem): क्षेत्रीय समूह, जैसे दक्षिण एशिया, यूरोपीय संघ।
  • इकाई (Unit): राज्य, राष्ट्र, बड़े संगठन।
  • उप-इकाई (Subunit): दबाव समूह, नौकरशाही, लॉबी।
  • व्यक्ति (Individual)।

व्यवहार में कोपेनहेगन स्कूल मध्य स्तर, यानी क्षेत्रीय स्तर, को सबसे महत्वपूर्ण मानता है। इसी से आगे चलकर बुज़ान और वेवर ने “रीजन्स एंड पावर्स” (Regions and Powers, 2003) में “क्षेत्रीय सुरक्षा परिसर सिद्धांत” (Regional Security Complex Theory) विकसित किया। इसके अनुसार अधिकांश ख़तरे कम दूरी पर अधिक प्रभावी होते हैं, इसलिए पड़ोसी देशों की सुरक्षा आपस में गहराई से जुड़ी होती है। भारत-पाकिस्तान संबंधों के कारण दक्षिण एशिया इसका प्रमुख उदाहरण माना जाता है।

अप्रतिभूतिकरण (Desecuritization)

  • कोपेनहेगन स्कूल केवल यह नहीं बताता कि मुद्दे सुरक्षा के प्रश्न कैसे बनते हैं; वह यह भी बताता है कि उन्हें वापस सामान्य राजनीति में कैसे लाया जाए। इस उल्टी प्रक्रिया को “अप्रतिभूतिकरण” (Desecuritization) कहा गया।
  • इसके पीछे एक गहरा नैतिक तर्क है। वेवर के अनुसार प्रतिभूतिकरण कोई अच्छी बात नहीं है। जब कोई मुद्दा सुरक्षा का विषय बन जाता है, तो लोकतांत्रिक बहस, पारदर्शिता और जवाबदेही कमज़ोर पड़ जाती है। इसलिए प्रतिभूतिकरण को “सामान्य राजनीति की विफलता” माना जाना चाहिए। वेवर का आदर्श है: “कम सुरक्षा, अधिक राजनीति” (Less Security, More Politics)।
  • दीर्घकाल में लक्ष्य यह होना चाहिए कि मुद्दों को “आपातकाल” की भाषा से निकालकर सामान्य लोकतांत्रिक बहस, समझौते और नीति के दायरे में लाया जाए। शीत युद्ध के अंत में यूरोप में पूर्व-पश्चिम संबंधों का अप्रतिभूतिकरण इसका प्रमुख उदाहरण माना जाता है।
  • बाद में बुज़ान और वेवर ने 2009 के एक लेख में “बृहद-प्रतिभूतिकरण” (Macrosecuritization) की अवधारणा दी। इसमें कई छोटे-छोटे प्रतिभूतिकरण एक बड़े, व्यापक ढाँचे के अंतर्गत जुड़ जाते हैं। शीत युद्ध के समय “साम्यवाद बनाम पूंजीवाद” और 2001 के बाद “आतंक के विरुद्ध वैश्विक युद्ध” (Global War on Terror) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

व्यवहार में प्रतिभूतिकरण: कुछ उदाहरण

  • आतंकवाद: 11 सितंबर 2001 के हमलों के बाद अमेरिका में “आतंक के विरुद्ध युद्ध” की घोषणा हुई, यूएसए पैट्रियट एक्ट (USA PATRIOT Act) पारित हुआ और निगरानी के व्यापक अधिकार दिए गए। यह सफल प्रतिभूतिकरण का शास्त्रीय उदाहरण है।
  • एचआईवी/एड्स: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2000 में प्रस्ताव 1308 पारित करके पहली बार किसी स्वास्थ्य समस्या को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के प्रश्न के रूप में देखा।
  • प्रवासन: यूरोप में शरणार्थियों और प्रवासियों को अक्सर राष्ट्रीय पहचान और सुरक्षा के लिए ख़तरे के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो सामाजिक क्षेत्र के प्रतिभूतिकरण का उदाहरण है।
  • कोविड-19: महामारी के समय विश्वभर में आपातकालीन कानूनों के तहत लॉकडाउन, आवागमन पर रोक और निगरानी जैसे असाधारण उपाय अपनाए गए।
  • जलवायु परिवर्तन: अनेक देश और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे “अस्तित्वगत ख़तरा” कहने लगी हैं, हालाँकि इस पर बहस जारी है कि इसका पूर्ण प्रतिभूतिकरण हुआ है या नहीं।
  • भारत: 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) को देश की “सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती” बताया था, जिसके बाद इसे सुरक्षा नीति के केंद्र में रखा गया। इसी प्रकार भारत में साइबर सुरक्षा, आतंकवाद और सीमा पार से आने वाले ख़तरों के संदर्भ में विशेष कानूनों की बहस को भी प्रतिभूतिकरण के ढाँचे में समझा जा सकता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन

कोपेनहेगन स्कूल जितना प्रभावशाली रहा, उतनी ही इसकी विविध आलोचनाएँ भी हुईं:

  • बिल मैकस्वीनी (Bill McSweeney) ने 1996 में कहा कि यह स्कूल “पहचान” को एक स्थिर और वस्तुगत चीज़ मान लेता है, जबकि पहचान स्वयं बदलती रहती है और राजनीति से बनती है।
  • लीन हैनसेन (Lene Hansen) ने 2000 में “मौन सुरक्षा दुविधा” (Silent Security Dilemma) की बात की। उनके अनुसार यह सिद्धांत केवल उन्हीं ख़तरों को देखता है जिन्हें बोलकर कहा जाता है। जो लोग, विशेषकर महिलाएँ, अपने ख़तरों के बारे में बोल ही नहीं सकते, उनकी असुरक्षा इस सिद्धांत में अदृश्य रह जाती है।
  • क्लेयर विल्किंसन (Claire Wilkinson) ने इसकी यूरोप-केंद्रितता की आलोचना की और कहा कि यह सिद्धांत पश्चिमी उदार लोकतंत्रों को ध्यान में रखकर बना है, जबकि गैर-पश्चिमी समाजों में सुरक्षा की प्रक्रिया अलग ढंग से चलती है।
  • थियरी बाल्ज़ाक (Thierry Balzacq) ने 2005 में कहा कि प्रतिभूतिकरण केवल भाषा का कार्य नहीं है; इसमें संदर्भ, श्रोता की स्थिति और शक्ति संबंधों की भी बड़ी भूमिका होती है। उन्होंने इसका “समाजशास्त्रीय” रूप प्रस्तुत किया।
  • पेरिस स्कूल के दिदिए बिगो (Didier Bigo) का तर्क है कि सुरक्षा अक्सर नाटकीय भाषणों से नहीं, बल्कि नौकरशाही, पुलिस और सुरक्षा विशेषज्ञों के दैनिक कार्यों से चुपचाप बनती है।
  • माइकल विलियम्स (Michael Williams) ने ध्यान दिलाया कि आज टेलीविज़न और सोशल मीडिया के युग में चित्र और वीडियो भी प्रतिभूतिकरण करते हैं, केवल शब्द नहीं।

कुछ आलोचक कहते हैं कि यह सिद्धांत जर्मन विचारक कार्ल श्मिट (Carl Schmitt) के “अपवाद की स्थिति” (State of Exception) और “मित्र-शत्रु” के विचार के बहुत निकट है, जो लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है।

वेल्श स्कूल के केन बूथ (Ken Booth) जैसे विद्वान मानते हैं कि सुरक्षा का लक्ष्य “मुक्ति” (Emancipation) होना चाहिए, और कोपेनहेगन स्कूल की सुरक्षा के प्रति नकारात्मक दृष्टि उचित नहीं।

एक आलोचना यह भी है कि यह सिद्धांत यह बताने में असमर्थ है कि कोई ख़तरा वास्तव में कितना गंभीर है, और इसका श्रोता की “स्वीकृति” को मापने का कोई स्पष्ट तरीका नहीं है।

कोपेनहेगन स्कूल का योगदान

आलोचनाओं के बावजूद इस स्कूल का योगदान बहुत बड़ा है:

  • इसने सुरक्षा अध्ययन को सैन्य और राज्य-केंद्रित दायरे से बाहर निकाला।
  • इसने यथार्थवाद और रचनावाद के बीच एक सेतु बनाया: क्षेत्रीय शक्ति संरचना में यथार्थवादी, और सुरक्षा की प्रक्रिया की समझ में रचनावादी।
  • इसने सुरक्षा के “नाम पर” की जाने वाली राजनीति को देखने की आलोचनात्मक दृष्टि दी, जिससे नागरिक यह पूछ सकें कि किसी मुद्दे को सुरक्षा का प्रश्न क्यों और किसके हित में बनाया जा रहा है।
  • पाँच क्षेत्रों और क्षेत्रीय सुरक्षा परिसर जैसी अवधारणाओं ने तुलनात्मक सुरक्षा अध्ययन को एक व्यवस्थित ढाँचा दिया।

निष्कर्ष

कोपेनहेगन स्कूल का प्रतिभूतिकरण सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि “सुरक्षा” कोई तटस्थ शब्द नहीं है। जब किसी मुद्दे को अस्तित्व के लिए ख़तरा कहा जाता है, तो उसके साथ असाधारण अधिकार, गोपनीयता और त्वरित निर्णय की माँग भी जुड़ जाती है। प्रतिभूतिकारी कर्ता, संदर्भ वस्तु, श्रोता और असाधारण उपाय, इन चार तत्वों के माध्यम से यह सिद्धांत बताता है कि सुरक्षा “होती” नहीं, “बनाई” जाती है।

ओले वेवर का यह संदेश कि “कम सुरक्षा, अधिक राजनीति” लोकतंत्र के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आतंकवाद से महामारी तक और प्रवासन से जलवायु परिवर्तन तक, हर नई चुनौती के साथ यह प्रश्न उठता है कि क्या उसे सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रिया से सुलझाया जा सकता है, या उसे सुरक्षा का प्रश्न बनाना वास्तव में आवश्यक है।


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