प्रत्येक वर्ष 31 अक्टूबर को देश सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाता है। रियासतों के एकीकरण में उनके अविस्मरणीय योगदान के कारण उन्हें ‘लौह पुरुष’ कहा जाता है। किंतु बहुत कम लोग यह जानते हैं कि उनकी जयंती से ठीक दो दिन पूर्व, 29 अक्टूबर 1951 को अखिल भारतीय सेवा अधिनियम अस्तित्व में आया था। इसी अधिनियम ने भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा की वैधानिक आधारशिला रखी तथा आगे चलकर 1966 में भारतीय वन सेवा का गठन हुआ। इसी कारण सरदार पटेल को अखिल भारतीय सेवाओं का शिल्पकार और जनक माना जाता है।
पटेल ने 21 अप्रैल 1947 को दिल्ली के मेटकाफ हाउस में प्रशिक्षु अधिकारियों को संबोधित करते हुए लोकसेवाओं को देश का ‘स्टील फ्रेम’ कहा था। इसी स्मृति में प्रतिवर्ष 21 अप्रैल को सिविल सेवा दिवस मनाया जाता है। संविधान सभा में भी उन्होंने दृढ़ता से कहा था कि एक निष्पक्ष, निर्भीक और सक्षम अखिल भारतीय सेवा के बिना संघ की एकता अक्षुण्ण नहीं रह सकती।
अमृतकाल और विकसित भारत @2047 में लोकसेवाओं की भूमिका
आज राष्ट्र अमृतकाल में है और विकसित भारत @2047 का लक्ष्य उसके सामने है। इस संकल्प की सिद्धि में लोकसेवाओं को दोहरी रणनीति के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी:
आत्मनिर्भरता का लक्ष्य
- ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ की भावना, जिसे ‘सबका प्रयास’ के माध्यम से साकार किया जाना है
- इस पृष्ठभूमि में यह समझना उपयोगी है कि स्वतंत्रता के बाद से राष्ट्र-निर्माण की यात्रा में लोकसेवाओं ने किन-किन मोर्चों पर योगदान दिया है।
संवैधानिक आधार: एक संक्षिप्त दृष्टि
- अनुच्छेद 312: यदि राज्यसभा उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से संकल्प पारित करे, तो संसद नई अखिल भारतीय सेवा का सृजन कर सकती है। अनुच्छेद 312(2) के अंतर्गत IAS और IPS को संसद द्वारा सृजित सेवाएँ माना गया है।
- अनुच्छेद 311: लोकसेवकों को मनमानी पदच्युति से संरक्षण प्रदान करता है, जो उनकी निष्पक्षता और निर्भीकता का आधार है।
अखिल भारतीय सेवाओं की विशेषता यह है कि भर्ती केंद्र करता है, जबकि अधिकारी राज्यों में सेवा देते हैं। यह व्यवस्था सहकारी संघवाद की एक जीवंत कड़ी है।
हरित क्रांति: खाद्य आत्मनिर्भरता में प्रशासनिक योगदान
स्वतंत्रता के बाद भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में जो आत्मनिर्भरता प्राप्त की, उसका मूल श्रेय 1960 के दशक में आरंभ हुई हरित क्रांति के सफल क्रियान्वयन को जाता है। इस पहल में आधुनिक तकनीकों को व्यापक रूप से अपनाया गया, जिनमें प्रमुख थे:
- उच्च उपज देने वाली किस्में (HYV)
- रासायनिक उर्वरक
- सिंचाई सुविधाओं का विस्तार
निस्संदेह हमारे कृषि वैज्ञानिकों ने देश की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्नत किस्में और उपयुक्त तकनीकें विकसित कीं, परंतु इनका व्यापक प्रसार इसलिए संभव हो सका क्योंकि जमीनी स्तर पर विस्तार तंत्र (extension machinery) ने कुशलता से काम किया। ग्राम सेवक और प्रखंड विकास तंत्र, जो विस्तार व्यवस्था की रीढ़ थे, उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किसानों के बीच अथक परिश्रम किया और उनके व्यवहार में परिवर्तन लाया।
शासकीय से विकासोन्मुख प्रशासन की ओर
यही वह कालखंड था जब स्वतंत्रता-पूर्व की नियमन-केंद्रित भारतीय सिविल सेवा (ICS) का रूपांतरण एक नागरिक-केंद्रित और विकासोन्मुख सेवा के रूप में हुआ। कलेक्टर और जिला मजिस्ट्रेट का पद, जो पहले राजस्व वसूली और कानून-व्यवस्था तक सीमित था, अब ‘जिला अधिकारी’ के रूप में पुनर्परिभाषित हुआ, जो विकास कार्यक्रमों का प्रभारी बना।
जिला प्रशासन: विकास प्रशासन की धुरी
73वें और 74वें संविधान संशोधन (1992) के बाद पंचायतों और नगरीय निकायों को शक्तियों का बड़े पैमाने पर हस्तांतरण हुआ। इसके बावजूद जिला अधिकारी का कार्यालय विकास प्रशासन की धुरी बना रहा।
आकांक्षी जिला कार्यक्रम
इसका सबसे सशक्त प्रमाण तब मिला जब प्रधानमंत्री के निर्देशन में नीति आयोग ने आकांक्षी जिलों के कायाकल्प का दायित्व जिला प्रशासन को सौंपा। जनवरी 2018 में आरंभ इस कार्यक्रम में देश के 112 पिछड़े जिलों को चुना गया। परिणाम उल्लेखनीय रहे और निम्नलिखित क्षेत्रों के संकेतकों में ठोस सुधार दिखा:
- स्वास्थ्य
- शिक्षा
- पोषण
- वित्तीय समावेशन
- बुनियादी ढाँचा
इस परिवर्तन में जिला अधिकारियों के नेतृत्व ने विभागों के बीच समन्वय स्थापित किया, विभागीय दीवारें (silos) तोड़ीं और नवाचार को बढ़ावा दिया। जिलों की रैंकिंग उनकी क्रमिक प्रगति के आधार पर होने से उनमें स्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी पनपी।
विस्तार: आकांक्षी प्रखंड और धन-धान्य जिले
इस अवधारणा को आगे बढ़ाते हुए जनवरी 2023 में 500 प्रखंडों के लिए आकांक्षी प्रखंड कार्यक्रम शुरू किया गया। हाल ही में कम उत्पादकता, कम फसल सघनता और कम ऋण वितरण वाले 100 जिलों के लिए प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना लाई गई है। यह योजना 2025-26 से छह वर्षों के लिए 24,000 करोड़ रुपये के वार्षिक परिव्यय के साथ स्वीकृत हुई और इसका क्रियान्वयन 11 विभागों की 36 मौजूदा योजनाओं के अभिसरण से होगा। प्रत्येक धन-धान्य जिले की प्रगति की निगरानी डैशबोर्ड के माध्यम से 117 प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों पर मासिक आधार पर की जाएगी।
तकनीक-आधारित सुशासन
सरकार का तकनीक-आधारित सुशासन का एजेंडा, जिसका उद्देश्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाना, भ्रष्टाचार घटाना और जमीनी स्तर पर व्यवहारगत परिवर्तन लाना है, राज्य और जिला स्तर के प्रशासनिक तंत्र ने सफलतापूर्वक लागू किया है। प्रमुख उपलब्धियाँ हैं:
- लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS)
- कल्याणकारी लाभों का प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT)
- भू-अभिलेखों का डिजिटलीकरण
- कृषि के लिए डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI)
इन पहलों ने नागरिक और सरकार के बीच के संवाद को आमूलचूल बदल दिया है तथा शासन के अनुभव को अधिक पारदर्शी और संतोषजनक बनाया है।
महाकुंभ: प्रशासनिक उत्कृष्टता का प्रतिमान
- हाल ही में उत्तर प्रदेश में आयोजित महाकुंभ का सर्वत्र सराहा गया प्रबंधन इस बात का सटीक उदाहरण है कि जब राजनीतिक कार्यपालिका का नेतृत्व, दृष्टि और इच्छाशक्ति लोकसेवा की निष्ठा और प्रतिबद्धता से मेल खाती है, तो शासन में उत्कृष्टता संभव होती है।
- संगम के बाढ़ क्षेत्र को मात्र दो महीनों में एक विशाल नगर में बदल दिया गया।
- तंबुओं के इस नगर में बिजली, सड़क, पेयजल, स्वच्छता और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन जैसी सभी आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध थीं।
- यह नगर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर पवित्र स्नान हेतु प्रयाग पहुँचे करोड़ों श्रद्धालुओं की सेवा के लिए बसाया गया।
- 13 जनवरी से 26 फरवरी 2025 तक चले 45 दिनों के इस आयोजन में 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया।
- इस भव्य आयोजन में सेवा-प्रदाय का अद्भुत रूपांतरण और गुणवत्ता राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराही गई। यह शासन की एक बड़ी उपलब्धि थी, जिसमें लोकसेवाओं ने अत्यधिक दबाव के वातावरण में एक सुगठित टीम की तरह काम किया।
कोविड-19: संकट में प्रशासन की परीक्षा
- कोविड-19 वैश्विक महामारी भारत सहित सभी देशों की शासन व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती थी। भारत की लोकसेवाएँ इस चुनौती पर खरी उतरीं और इस लड़ाई में अग्रिम पंक्ति में रहीं।
- नीति स्तर पर: केंद्र और राज्यों के राजनीतिक नेतृत्व ने रणनीति और नीति को दिशा दी, जबकि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तंत्र ने ‘टेस्ट-ट्रैक-ट्रीट’ की रणनीति के साथ अथक संघर्ष किया।
- राज्य और जिला स्तर पर: प्रशासन ने एक टीम के रूप में उपाय लागू किए, जिनमें लॉकडाउन का कड़ाई से अनुपालन, रणनीतिक रूप से नियंत्रित चरणबद्ध अनलॉक, जन-जागरूकता और घर-घर सर्वेक्षण शामिल थे।
- ग्राम स्तर तक: पूरी मशीनरी को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य तथा चिकित्सा शिक्षा विभागों के सहयोग के लिए सक्रिय किया गया।
प्रवासी श्रमिकों का संकट
- लॉकडाउन के बाद प्रवासी श्रमिकों का एक राज्य से दूसरे राज्य की ओर बड़े पैमाने पर पलायन एक भीषण मानवीय त्रासदी का रूप ले सकता था। किंतु केंद्र और राज्य सरकारों के कुशल एवं समन्वित प्रबंधन ने उनकी सुगम आवाजाही सुनिश्चित की।
- जिला अधिकारियों के नेतृत्व में प्रशासन ने राहत शिविर चलाए, संदिग्ध व्यक्तियों की जाँच की और उचित क्वारंटीन की व्यवस्था की।
- इसके बाद श्रमिकों की मैपिंग (कौशल-मानचित्रण) की गई।
- अकुशल श्रमिकों को उस समय सक्रिय मनरेगा के अंतर्गत रोजगार दिया गया, जबकि कुशल श्रमिकों को श्रमिकों की कमी झेल रहे उद्योगों में खपाया गया।
स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव: लोकतंत्र की आधारशिला
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला हैं। लोकसेवाओं की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में चुनाव प्रक्रिया का संचालन है, जिसकी विश्व स्तर पर प्रशंसा हुई है। स्वतंत्रता के बाद से जनादेश के आधार पर केंद्र और राज्यों में एक राजनीतिक व्यवस्था से दूसरी को सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होता रहा है।
चुनावी तंत्र की संरचना
हमारे लोकतंत्र की दृढ़ता और परिपक्वता का एक बड़ा कारण चुनाव प्रक्रिया की शुचिता है। इस प्रक्रिया की रीढ़ जिला स्तर से लेकर मतदान केंद्र तक फैली लोकसेवाएँ हैं:
- जिला कलेक्टर, जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के रूप में नेतृत्व करते हैं।
- वे राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के अधीन तथा भारत निर्वाचन आयोग के पर्यवेक्षण और नियंत्रण में कार्य करते हैं।
- संविधान के अनुच्छेद 324(6) के अंतर्गत राष्ट्रपति और राज्यपाल, आयोग के अनुरोध पर आवश्यक कर्मचारी उपलब्ध कराते हैं, और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 13CC के अनुसार चुनाव कार्य में लगे अधिकारी उस अवधि में आयोग की प्रतिनियुक्ति पर माने जाते हैं।
निष्पक्षता का अनूठा उदाहरण
यह लोकसेवाओं के श्रेय की बात है कि चुनावी तंत्र ने प्रायः अत्यंत वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष ढंग से काम किया है। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है कि जो तंत्र सामान्यतः किसी राजनीतिक व्यवस्था के प्रत्यक्ष नियंत्रण में काम करता है, वही कुछ महीनों के लिए निर्वाचन आयोग के नियंत्रण में आ जाता है, ताकि सभी दलों को समान अवसर (level playing field) मिल सके। यह तंत्र यह भलीभाँति जानते हुए भी निष्पक्ष रहता है कि चुनाव समाप्त होते ही उसका नियंत्रण पुनः राजनीतिक व्यवस्था के हाथ में चला जाएगा।
लोकसेवाओं के मूल्यांकन की कसौटी
लोकसेवाओं के प्रदर्शन का आकलन कुछ अधिकारियों के भ्रष्टाचार या कदाचार में लिप्त होने के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय राष्ट्र-निर्माण में उनके समग्र योगदान को समग्र दृष्टि से देखना होगा।
गुमनामी: नौकरशाही का गुण
सोशल मीडिया के सर्वव्यापी युग में भी गुमनामी (anonymity) नौकरशाही का एक गुण बनी हुई है। व्यक्तिगत आत्म-प्रचार न तो लोकसेवकों से अपेक्षित है और न ही सहकर्मी समूह द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है। ऐसे अनगिनत अधिकारी हैं जिन्होंने नीति-निर्माण, क्रियान्वयन और सेवा-प्रदाय का हिस्सा बनकर गुमनाम रहते हुए अथक योगदान दिया है। उनकी व्यावसायिकता, प्रतिबद्धता और निष्पक्षता की कहानियाँ प्रायः स्मृतियों में किस्सों के रूप में रह जाती हैं या सरकारी फाइलों में दबी रहती हैं।
वर्तमान चुनौतियाँ और सुधार की दिशा
उपलब्धियों के साथ यह स्वीकारना भी आवश्यक है कि लोकसेवाओं के समक्ष कुछ गंभीर चुनौतियाँ हैं:
- राजनीतिकरण और बार-बार स्थानांतरण: टी.एस.आर. सुब्रमण्यम बनाम भारत संघ (2013) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने निश्चित कार्यकाल, सिविल सेवा बोर्ड के गठन और मौखिक के स्थान पर लिखित निर्देशों पर बल दिया।
- यथास्थितिवाद और नियम-केंद्रित मानसिकता: परिणाम के बजाय प्रक्रिया पर अधिक ध्यान।
- सामान्यज्ञ बनाम विशेषज्ञ बहस: जटिल नीतिगत क्षेत्रों में विशेषज्ञता की बढ़ती माँग, जिसके चलते लेटरल एंट्री जैसे प्रयोग हुए।
- क्षमता निर्माण: इस दिशा में 2020 में आरंभ ‘मिशन कर्मयोगी’ (राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता निर्माण कार्यक्रम) नियम-आधारित से भूमिका-आधारित प्रशासन की ओर बढ़ने का प्रयास है, जिसमें iGOT कर्मयोगी मंच के माध्यम से निरंतर प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
- पुलिस सुधार: प्रकाश सिंह मामले (2006) में दिए गए निर्देशों का पूर्ण क्रियान्वयन अभी भी अपेक्षित है।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी परिणाम-आधारित मूल्यांकन, जवाबदेही और नागरिक-केंद्रित शासन पर बल दिया है।
निष्कर्ष
स्वतंत्र भारत की विकास यात्रा के लगभग हर महत्वपूर्ण पड़ाव पर लोकसेवाओं की छाप दिखाई देती है, चाहे वह खेतों में हरित क्रांति हो, आकांक्षी जिलों का कायाकल्प हो, डिजिटल शासन का विस्तार हो, महाकुंभ जैसे विराट आयोजन हों, महामारी का संकट हो या लोकतंत्र का महापर्व चुनाव। सरदार पटेल ने जिस ‘स्टील फ्रेम’ की कल्पना की थी, वह समय के साथ नियंत्रण के ढाँचे से विकास और सेवा के उपकरण में रूपांतरित हुआ है। विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए आवश्यक है कि यह ढाँचा अधिक संवेदनशील, जवाबदेह, तकनीक-सक्षम और नागरिक-केंद्रित बने, ताकि ये मौन शिल्पी राष्ट्र-निर्माण की अपनी भूमिका और प्रभावी ढंग से निभा सकें।
वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन
- अखिल भारतीय सेवा अधिनियम 29 अक्टूबर 1951 को अस्तित्व में आया।
- सरदार पटेल को अखिल भारतीय सेवाओं का जनक माना जाता है।
- 31 अक्टूबर (पटेल जयंती) को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है।
- सिविल सेवा दिवस 21 अप्रैल को मनाया जाता है।
- पटेल ने 21 अप्रैल 1947 को मेटकाफ हाउस, दिल्ली में लोकसेवाओं को ‘स्टील फ्रेम’ कहा।
- भारतीय वन सेवा का गठन 1966 में हुआ।
- अनुच्छेद 312 नई अखिल भारतीय सेवा के सृजन से संबंधित है।
- अनुच्छेद 311 लोकसेवकों को मनमानी पदच्युति से संरक्षण देता है।
- हरित क्रांति 1960 के दशक में HYV बीज, रासायनिक उर्वरक और सिंचाई पर आधारित थी।
- आकांक्षी जिला कार्यक्रम जनवरी 2018 में नीति आयोग ने 112 जिलों के लिए शुरू किया।
- आकांक्षी प्रखंड कार्यक्रम जनवरी 2023 में 500 प्रखंडों के लिए शुरू हुआ।
- पीएम धन-धान्य कृषि योजना 100 जिलों के लिए, छह वर्षों हेतु, 24,000 करोड़ रुपये वार्षिक परिव्यय के साथ स्वीकृत।
- धन-धान्य योजना में 11 विभागों की 36 योजनाओं का अभिसरण होगा।
- महाकुंभ 2025 में 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने स्नान किया।
- कोविड प्रबंधन की रणनीति ‘टेस्ट-ट्रैक-ट्रीट’ पर आधारित थी।
- जिला कलेक्टर जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) के रूप में कार्य करते हैं।
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 13CC चुनाव कार्य में लगे अधिकारियों को आयोग की प्रतिनियुक्ति पर मानती है।
- मिशन कर्मयोगी 2020 में आरंभ हुआ।
- टी.एस.आर. सुब्रमण्यम मामला (2013) अधिकारियों के निश्चित कार्यकाल से संबंधित है।
- प्रकाश सिंह मामला (2006) पुलिस सुधारों से संबंधित है।
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