इंडो-पैसिफिक क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति का केंद्र बन चुका है। चीन के बढ़ते प्रभाव, उसकी आक्रामक विदेश नीति और दक्षिण चीन सागर से लेकर ताइवान जलडमरूमध्य तक की गतिविधियों ने एशिया के कई देशों को अपनी सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है।
‘एशियाई नाटो’ का प्रस्ताव
- सन 2024 में जापान के शिगेरू इशिबा द्वारा ‘एशियाई नाटो’ का विचार प्रस्तुत किया गया। इशिबा का तर्क है कि एशिया में सामूहिक आत्मरक्षा की स्पष्ट और बाध्यकारी व्यवस्था का अभाव क्षेत्रीय अस्थिरता को जन्म दे सकता है।
- उनका मानना है कि यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो अन्य देशों की सामूहिक प्रतिक्रिया की गारंटी होनी चाहिए, जैसा कि नाटो में अनुच्छेद 5 में होता है।
- हालंकि ‘एशियाई नाटो’ की राह आसान नहीं है। एशियाई देशों की विदेश नीति प्राथमिकताएँ अलग-अलग हैं। कई देश, विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया के राष्ट्र, गुटनिरपेक्ष और संतुलनकारी नीति अपनाना पसंद करते हैं।
एशिया शक्ति–संतुलन की धुरी
21वीं सदी में वैश्विक शक्ति-संतुलन एशिया की ओर स्थानांतरित हो रहा है। चीन की सैन्य और आर्थिक शक्ति में तीव्र वृद्धि, दक्षिण चीन सागर में उसके दावे, ताइवान मुद्दा और बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) ने क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण को प्रभावित किया है।
- इस पृष्ठभूमि में, ‘एशियाई नाटो’ जैसे सैन्य गठबंधन की संभावना पर विचार हो रहा है, जो पश्चिमी नाटो की तर्ज पर सामूहिक सुरक्षा ढांचा प्रदान कर सके।
- भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे लोकतांत्रिक देश एकजुट होकर क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित कर सकते हैं।
- जापान में हाल के वर्षों में नेतृत्व परिवर्तन के साथ सुरक्षा नीति में भी बदलाव देखने को मिला है। जापान ने स्पष्ट संकेत दिया है कि वह ताइवान पर किसी भी संभावित चीनी हमले को हल्के में नहीं लेगा।
- इसी प्रकार, फिलीपींस ने भी चीन के बढ़ते दबाव के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत की है और भारत के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को गहरा किया है। इन कदमों से यह स्पष्ट है कि क्षेत्रीय शक्तियां अब चीन की नीतियों को चुनौती देने के लिए अधिक संगठित दृष्टिकोण अपना रही हैं।
वर्तमान वैश्विक शक्ति संतुलन की जटिलता
- यूक्रेन युद्ध ने वैश्विक शक्ति संतुलन को और जटिल बना दिया है। रूस और चीन के बीच बढ़ती निकटता ने पश्चिमी देशों को एशिया में अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित किया है।
- यदि एशिया में कोई सैन्य संकट उत्पन्न होता है, विशेषकर ताइवान को लेकर, तो उसका प्रभाव केवल क्षेत्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर भी पड़ेगा।
- ‘एशियाई नाटो’ की अवधारणा अभी विचार स्तर पर है और इसे लागू करना आसान नहीं होगा। एशियाई देशों की ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियां भिन्न हैं। फिर भी, साझा चिंताओं और सामूहिक सुरक्षा की आवश्यकता उन्हें एक मंच पर ला सकती है।
- भारत के लिए यह एक महत्वपूर्ण क्षण हो सकता है, जहां उसे संतुलित और दूरदर्शी नीति अपनाकर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करनी होगी।
इंडो–पैसिफिक क्षेत्र: स्थिरता, शांति, सहयोग, संवाद हेतु अवसर
- इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और शांति बनाए रखने के लिए सहयोग, संवाद और रणनीतिक संतुलन आवश्यक है। यदि लोकतांत्रिक देश एकजुट होकर कार्य करें, तो वे क्षेत्र में नियम-आधारित व्यवस्था को मजबूत कर सकते हैं और संभावित संघर्षों को टाल सकते हैं।
- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस ‘इंडो-पैसिफिक क्षेत्र’ की बात करते हैं, वह वस्तुतः यूक्रेन युद्ध के बाद की विश्व-व्यवस्था का प्रतीक बन गया है।
- यूक्रेन–रूस संघर्ष ने यह दिखा दिया है कि आक्रामक शक्तियों को रोकना कितना कठिन है। यदि किसी देश को शुरुआती चरण में नहीं रोका जाए, तो परिणाम दूरगामी होते हैं।
QUAD और संभावित ‘एशियाई नाटो’
- क्वाड (QUAD), जिसमें भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका शामिल हैं। औपचारिक सैन्य गठबंधन नहीं है। लेकिन यह लोकतांत्रिक देशों का एक ऐसा मंच है जो क्षेत्रीय स्थिरता, स्वतंत्र और खुला इंडो-पैसिफिक, तथा नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करता है।
- वर्तमान में क्वाड का उद्देश्य सैन्य गठबंधन बनना नहीं है, बल्कि सहयोग, संवाद और रणनीतिक समन्वय को मजबूत करना है।
- जापान और ऑस्ट्रेलिया पहले ही अपने रक्षा सहयोग को बढ़ा चुके हैं। अमेरिका की इंडो-पैसिफिक रणनीति भी चीन की बढ़ती शक्ति को संतुलित करने पर केंद्रित है।
- भारत ने भी अपनी समुद्री सुरक्षा, रक्षा साझेदारी और कूटनीतिक सक्रियता को बढ़ाया है।
एशियाई नाटो’ की संभावित संरचना कैसी हो सकती है
- मुख्य सदस्य: अमेरिका, भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया (QUAD के आधार पर) होंगे।
- संभावित सहयोगी: फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, वियतनाम के बीच हो सकता है।
- उद्देश्य: क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री सुरक्षा, नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की रक्षा चीन के संभावित आक्रामक कदमों का संतुलन करना।
भविष्य की प्रमुख चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ
- एशियाई देशों की राजनीतिक प्रणालियाँ और विदेश नीति प्राथमिकताएँ भिन्न हैं। भारत ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की नीति अपनाता है और किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन से बचता रहा है। ऐसे में पूर्ण सैन्य संधि में शामिल होना उसके लिए जटिल निर्णय होगा।
- जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का चीन के साथ गहरा व्यापारिक संबंध है। कठोर सैन्य गठबंधन से आर्थिक प्रतिशोध (Economic Retaliation) का खतरा बढ़ सकता है।
- यदि ताइवान को लेकर सैन्य संघर्ष होता है, तो संभावित गठबंधन को प्रत्यक्ष सैन्य हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। इससे क्षेत्रीय युद्ध की आशंका बढ़ेगी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ बाधित होंगी।
- नाटो की तरह एकीकृत कमान संरचना बनाना एशिया में कठिन होगा। अमेरिका का नेतृत्व स्वीकार करना सभी देशों के लिए सहज नहीं होगा।
- रूस और चीन के बीच बढ़ती निकटता एशिया में एक वैकल्पिक शक्ति-धुरी बना सकती है, जिससे द्विध्रुवीय प्रतिस्पर्धा और तीव्र होगी।
- भारत, चीन और उत्तर कोरिया परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं। किसी भी संघर्ष की स्थिति में परमाणु संतुलन का प्रश्न गंभीर हो जाएगा।
- दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्र आमतौर पर तटस्थता बनाए रखते हैं। वे खुले सैन्य गठबंधन के बजाय संतुलन की नीति अपनाते हैं।
भारत के लिए अवसर
- यह भारत के लिए एक निर्णायक क्षण हो सकता है। भारत की परंपरागत नीति ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ रही है। भारत किसी औपचारिक सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं रहा, लेकिन उसने बहुपक्षीय सहयोग के माध्यम से अपनी स्थिति मजबूत की है।
- यदि इंडो-पैसिफिक में तनाव बढ़ता है, तो भारत को संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। एक ओर उसे चीन की चुनौती का सामना करना है, तो दूसरी ओर क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक विकास को भी बनाए रखना है।
- फिलीपींस भले ही क्वाड का सदस्य न हो, लेकिन वह एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है। दक्षिण चीन सागर में चीन की गतिविधियों के कारण वह भी दबाव में है। भारत के लिए यह अवसर है कि वह ऐसे देशों के साथ सहयोग बढ़ाकर क्षेत्रीय संतुलन को मजबूत करे।
निष्कर्ष
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति का केंद्र बन सकता है। ‘एशियाई नाटो’ जैसी अवधारणा अभी औपचारिक रूप नहीं ले पाई है, लेकिन लोकतांत्रिक देशों के बीच बढ़ता सहयोग इस दिशा में संकेत देता है।
भारत के नीति-निर्माताओं के लिए यह समय है कि वे बदलती वैश्विक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शी और संतुलित रणनीति अपनाएं। इंडो-पैसिफिक में शांति, स्थिरता और नियम-आधारित व्यवस्था बनाए रखना भारत के दीर्घकालिक हित में है।
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