ई–गवर्नेस: अर्थ एवं परिभाषा
- तात्पर्य: ई-गवर्नेस (इलेक्ट्रॉनिक गवर्नेस) से अभिप्राय सरकार द्वारा सार्वजनिक सेवाओं के वितरण, सूचनाओं के आदान-प्रदान और प्रशासनिक दक्षता में सुधार हेतु सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT) के अनुप्रयोग से है।
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) एवं वैश्विक परिप्रेक्ष्य:
- थॉमस बी. रिले के अनुसार: “सरकार और शासन दोनों ही शासितों की सहमति और सहयोग प्राप्त करने के माध्यम हैं। यहाँ सरकार विकास के उद्देश्यों का औपचारिक उपकरण है, जबकि शासन लाभार्थियों द्वारा प्राप्त परिणाम है”।
- विश्व बैंक के अनुसार: ई-सरकार से आशय सरकारी एजेंसियों द्वारा ऐसी सूचना प्रौद्योगिकियों के उपयोग से है जो नागरिकों, व्यवसायों और सरकार के अन्य अंगों के बीच संबंधों को रूपांतरित करने की क्षमता रखती हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय: ई-गवर्नेस केवल कार्यालयों के बैक-ऑफिस संचालन के कम्प्यूटरीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शासन प्रणाली में मूलभूत संरचनात्मक परिवर्तन तथा विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका व नागरिकों के उत्तरदायित्वों का पुनर्गठन है।
यूरोपीय परिषद ने ई–शासन को निम्न प्रकार से परिभाषित किया है :
सार्वजनिक कार्रवाई के तीन क्षेत्रों में इलेक्ट्रॉनिक प्रौद्योगिकियों का उपयोग।
- सार्वजनिक अधिकारियों और नागरिक समाज के बीच संबंध।
- लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सभी चरणों में सार्वजनिक प्राधिकरणों का कामकाज (इलेक्ट्रॉनिक लोकतंत्र)
- सार्वजनिक सेवाओं (इलेक्ट्रॉनिक सार्वजनिक सेवाओं) का प्रावधान।
‘स्मार्ट‘ (SMART) शासन की अवधारणा
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (11वीं रिपोर्ट: ‘Promoting e-Governance – The Smart Way Forward’) में ई-गवर्नेस को SMART शासन के आधार के रूप में रेखांकित किया गया है:
- S – Simple (सरल): नियमों, विनियमों और प्रक्रियाओं का सरलीकरण कर नागरिक-अनुकूल व्यवस्था बनाना।
- M – Moral (नैतिक): प्रशासनिक तंत्र में शुचिता, पारदर्शिता और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना ताकि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगे।
- A – Accountable (जवाबदेह): प्रभावी प्रबंधन सूचना प्रणाली (MIS) और प्रदर्शन माप तंत्र द्वारा लोकसेवकों की जवाबदेही तय करना।
- R – Responsive (उत्तरदायी / प्रतिक्रियाशील): सेवा वितरण में तीव्रता लाना और नागरिक आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील बनना।
- T – Transparent (पारदर्शी): सरकारी निर्णयों और प्रक्रियाओं को सार्वजनिक डोमेन (वेबसाइटों/पोर्टलों) पर उपलब्ध कराकर सूचना की समरूपता सुनिश्चित करना।
ई–गवर्नेस के चार मुख्य स्तंभ (Four Pillars)
ई-गवर्नेस की संपूर्ण कार्यप्रणाली चार घटकों पर टिकी है:
- लोग (People): नागरिक, लोकसेवक एवं अन्य हितधारक।
- प्रक्रिया (Process): प्रशासनिक कार्यप्रणाली एवं उसका पुनर्अभियांत्रिकीकरण (Re-engineering)।
- प्रौद्योगिकी (Technology): हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर, नेटवर्क व साइबर सुरक्षा अवसंरचना।
- संसाधन (Resources): वित्तीय पूंजी, डेटा केंद्र, अवसंरचना और भौतिक पहुँच बिंदु।
ई–गवर्नेस के मॉडल (अंतःक्रिया के आयाम)
- G2C (सरकार से नागरिक): सार्वजनिक सेवाओं का सीधा वितरण (जैसे- परिवहन, अस्पताल, शिक्षा, ऑनलाइन जॉब पोर्टल, जन्म/जाति प्रमाण पत्र)।
- G2B (सरकार से व्यापार): व्यापारिक सुगमता (Ease of Doing Business), जैसे- MCA21, ई-टैक्सेशन, लाइसेंस जारी करना, सुरक्षित इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन।
- G2G (सरकार से सरकार): अंतर-विभागीय समन्वय, जैसे- खजाने (ट्रेजरी ऑटोमेशन), ई-कोर्ट, ई-सचिवालय, ई-पुलिस।
- G2E (सरकार से कर्मचारी): सिविल सेवकों के लिए ई-लर्निंग, डिजिटल सेवा रिकॉर्ड, ज्ञान साझाकरण और क्षमता निर्माण।

ई–गवर्नेस के विकास के चरण
- एकतरफ़ा सूचना प्रसार: सरकारी नीतियों और प्रपत्रों को केवल वेबसाइटों पर प्रदर्शित करना।
- दो–तरफा संचार: उपयोगकर्ताओं द्वारा अनुरोध भेजना और ईमेल या वेब पोर्टलों के माध्यम से प्रतिक्रिया प्राप्त करना।
- सेवा एवं वित्तीय लेनदेन: पूर्णतः ऑनलाइन सेवा वितरण और डिजिटल वित्तीय भुगतान प्रणाली।
- क्षैतिज व ऊर्ध्वाधर एकीकरण: केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर के विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों का एकीकृत डेटाबेस।
- राजनीतिक भागीदारी: नीति निर्माण में नागरिकों की सीधी सहभागिता (जैसे- MyGov मंच, ऑनलाइन सर्वेक्षण, ई-वोटिंग विमर्श)।
भारत में ई–गवर्नेस का संस्थागत एवं नीतिगत विकास
| वर्ष | प्रमुख मील का पत्थर |
| 1998 | सूचना प्रौद्योगिकी एवं सॉफ्टवेयर विकास पर राष्ट्रीय कार्यबल का गठन। |
| 1999 | केंद्र में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का गठन। |
| 2000 | सूचना प्रौद्योगिकी (IT) अधिनियम, 2000 पारित (2008 में संशोधित)। |
| 2000 | सामान्य कार्ययोजना हेतु राज्यों के आईटी मंत्रियों का प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन। |
| संस्थान | NISG (नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्मार्ट गवर्नमेंट) की स्थापना। |
| 2006 | राष्ट्रीय ई–गवर्नेस योजना (NeGP): 31 मिशन मोड परियोजनाओं (MMP) के साथ स्वीकृत (2011 में स्वास्थ्य, शिक्षा, PDS और डाक को शामिल किया गया)। |
| 2008 | द्वितीय ARC की 11वीं रिपोर्ट: “ई–गवर्नेस को बढ़ावा देना – आगे बढ़ने का स्मार्ट तरीका“। |
| 2012 | राष्ट्रीय सूचना प्रौद्योगिकी नीति (NPIT) को अपनाया गया। |
| 2015 | डिजिटल इंडिया कार्यक्रम: 9 प्रमुख स्तंभों (जैसे ब्रॉडबैंड हाईवे, ई-क्रांति, पब्लिक इंटरनेट एक्सेस आदि) पर आधारित। |

प्रमुख योजनाएँ एवं परियोजनाएँ
- ई–क्रांति (NeGP 2.0): डिजिटल इंडिया का प्रमुख स्तंभ, जिसका उद्देश्य नागरिक-केंद्रित सेवाओं को परिणाम-उन्मुख और तीव्र बनाना है।
- आधार (UIDAI): बायोमेट्रिक आधारित 12-अंकीय विशिष्ट पहचान संख्या, जो कल्याणकारी योजनाओं के लक्षित वितरण (DBT) और ई-हस्ताक्षर (e-Sign) को सुगम बनाती है।
- MyGov: नीति निर्माण में जनभागीदारी, परामर्श और क्राउडसोर्सिंग हेतु एनआईसी (NIC) द्वारा विकसित नागरिक मंच।
- भूमि प्रोजेक्ट (कर्नाटक): ग्रामीण भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, जिसने किसानों के लिए अभिलेखों की उपलब्धता पारदर्शी बनाई।
- खजाने (कर्नाटक): सरकारी कोषागार प्रणाली का एंड-टू-एंड ऑटोमेशन (G2G मॉडल)।
- ई–सेवा (आंध्र प्रदेश): एकल खिड़की के माध्यम से नागरिक बिल भुगतान और उपयोगिता सेवाओं का वितरण।
- e-District: जिला स्तर पर जन्म, मृत्यु, आय, जाति प्रमाण पत्र और पेंशन वितरण।
- e-Courts: न्याय विभाग द्वारा संचालित; अदालती प्रक्रियाओं, केस स्टेटस और न्यायिक सेवाओं का डिजिटलीकरण।
- MCA21: कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय द्वारा कंपनियों के ऑनलाइन पंजीकरण और अनुपालन हेतु मंच।
- e-Office: प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग (DARPG) द्वारा ‘लेस पेपर ऑफिस’ के माध्यम से फाइलों के त्वरित निस्तारण की पहल।

प्रशासनिक, सामाजिक एवं आर्थिक महत्व
- प्रशासनिक दक्षता: फाइलों के भौतिक संचलन में कमी, लालफीताशाही और मध्यस्थों का खात्मा तथा पदानुक्रम में कमी।
- आर्थिक विकास: लेनदेन लागत (Transaction Cost) में भारी कमी, व्यापार सुगमता और लीकेज की रोकथाम।
- सामाजिक सशक्तिकरण: सूचना तक निर्बाध पहुँच से नागरिकों का सशक्तिकरण और अंतिम व्यक्ति तक कल्याणकारी योजनाओं की सीधी पहुँच।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: डिजिटल ऑडिट ट्रेल से भ्रष्टाचार में कमी और जन विश्वास में वृद्धि। प्रमुख चुनौतियाँ एवं आगे की राह
- डिजिटल विभाजन (Digital Divide): ग्रामीण-शहरी असमानता और डिजिटल साक्षरता की कमी को दूर करना आवश्यक है।
- साइबर सुरक्षा व डेटा गोपनीयता: मजबूत डेटा संरक्षण कानूनों और सुरक्षित सर्वर अवसंरचना (Data Centres) का विस्तार।
- एकीकरण एवं अंतर–संचालनीयता: विभिन्न मंत्रालयों के स्टैंडअलोन सॉफ्टवेयर के स्थान पर मानकीकृत राष्ट्रीय वास्तुकला तैयार करना।
- निजी–सार्वजनिक भागीदारी (PPP): नवीन तकनीकों (AI, ब्लॉकचेन, क्लाउड) के उपयोग हेतु उद्योग और सरकार के मध्य सहभागिता को बढ़ावा देना।
- पायलट से पूर्ण कार्यान्वयन: किसी भी बड़े कार्यक्रम को लागू करने से पूर्व छोटे स्तर पर प्रायोगिक (Pilot) परीक्षण करना।
सुझाव
- ग्रामीण क्षेत्रों में ई-शासन की पहल ज़मीनी हकीकत की पहचान और विश्लेषण करके की जानी चाहिये।
- सरकार को विभिन्न हितधारकों अर्थात नौकरशाहों, ग्रामीण जनता, शहरी जनता, निर्वाचित प्रतिनिधियों, आदि के लिये उचित, व्यवहार्य, विशिष्ट और प्रभावी क्षमता निर्माण तंत्र के विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।
- ई-गवर्नेंस से संबंधित सेवाओं के वितरण को बढ़ाने में क्लाउड कंप्यूटिंग की एक बड़ी भूमिका है। क्लाउड कंप्यूटिंग न केवल लागत में कमी लाने का एक उपकरण है, बल्कि नई सेवाओं को प्रदान करने में सक्षम होने के साथ ही शिक्षा प्रणाली में सुधार और नई नौकरियों / अवसरों के सृजन में भी मदद करता है।
- मेघराज- जीआई क्लाउड सही दिशा में एक कदम है। इस पहल का उद्देश्य सरकार के आईसीटी खर्च को कम करते हुए देश में ई-सेवाओं के वितरण में तेज़ी लाना है।
- क्षेत्रीय भाषाओं के माध्यम से ई-गवर्नेंस भारत जैसे विविधतापूर्ण राष्ट्र के लिये अत्यंत प्रासंगिक है।
निष्कर्ष
- ई-गवर्नेंस सेवाएँ भारत में गति पकड़ रही हैं, लेकिन सार्वजनिक जागरूकता बढाने और डिजिटल डिवाइड को कम करने की आवश्यकता है।
- ई-गवर्नेंस उपायों की सफलता काफी हद तक हाई-स्पीड इंटरनेट की उपलब्धता पर निर्भर करती है, और निकट भविष्य में 5-जी तकनीक का देशव्यापी प्रसार हमारे संकल्प को मज़बूत करेगा।
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