भारत में पिछले एक दशक में न्याय व्यवस्था को अधिक सुलभ, पारदर्शी, डिजिटल और नागरिक–केंद्रित बनाने के लिए अनेक सुधार किए गए हैं। इन सुधारों का उद्देश्य ‘Ease of Justice’ और ‘विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करना है।
सुशासन में न्याय की भूमिका
‘Ease of Justice’ का अर्थ है – न्याय तक पहुँचना आसान हो, न्यायिक कार्य कुशलता से हो, और कानून को हर नागरिक आसानी से समझ सके।
न्याय किसी भी लोकतांत्रिक और सभ्य समाज की सबसे महत्वपूर्ण नींव है। जब लोगों को यह विश्वास होता है कि उनके अधिकारों की रक्षा होगी और विवादों का निष्पक्ष समाधान मिलेगा, तब समाज में शांति, कानून का सम्मान और विकास को बढ़ावा मिलता है।
यदि न्याय व्यवस्था धीमी, महंगी या जटिल हो, तो लोगों का विश्वास कम हो सकता है और सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित हो सकती हैं।
सुधारों की आवश्यकता
- भारत में दुनिया के सबसे अधिक लंबित अदालती मामले हैं। भारतीय न्यायपालिका को सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिनमें मामलों का ढेर लगना और न्याय प्रशासन एवं वितरण में देरी शामिल है।
- 2024 तक, न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों और प्रकारों में लंबित मामलों की संख्या 51 मिलियन से अधिक हो गई थी, जिसमें 169,000 से अधिक जिला और उच्च न्यायालय के मामले शामिल थे जो तीन दशकों (30 वर्षों) से अधिक समय से लंबित थे।
- गौरतलब है कि अकेले जिला अदालतें ही इन मामलों में से 87% से अधिक, यानी लगभग 45 मिलियन (4.5 करोड़) मामलों को संभालती हैं, जो जमीनी स्तर पर भारी बोझ को दर्शाता है।
- नीति आयोग के 2018 के रणनीति पत्र में कहा गया है कि मौजूदा 29 मिलियन लंबित मामलों को निपटाने में उस समय की मुकदमों की दर के हिसाब से 324 साल से अधिक का समय लगेगा। अनुमान है कि लंबित मामलों की वजह से भारत को अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.5% से 2% तक खर्च करना पड़ेगा।
- वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट के रूल ऑफ लॉ इंडेक्स 2023 में भारत को नागरिक न्याय में 142 देशों में से 111वां स्थान और आपराधिक न्याय में 93वां स्थान दिया गया है, जो अदालती कार्यवाही में होने वाली महत्वपूर्ण देरी को दर्शाता है।
न्यायिक रिक्तियां
- उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों दोनों में न्यायाधीशों की कमी लंबित मामलों की संख्या में काफी योगदान देती है।
- जनवरी 2024 में, 25 उच्च न्यायालयों में 1,114 न्यायाधीशों में से केवल 783 ही स्वीकृत थे। 2023 की शुरुआत तक, जिला स्तर पर लगभग 5,000 पद रिक्त थे।
- न्यायिक नियुक्तियों में देरी, जो अक्सर न्यायपालिका और प्रशासन के बीच तनाव के कारण होती है, मौजूदा न्यायाधीशों पर दबाव बढ़ाकर और न्यायिक प्रक्रिया में देरी करके समस्या को और बढ़ा देती
न्याय से होने वाले प्रमुख लाभ
- विश्वास (Trust): नागरिकों का सरकार और न्यायपालिका पर भरोसा बढ़ता है।
- समानता (Equality): सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समान अवसर और समान संरक्षण मिलता है।
- सामाजिक स्थिरता (Social Stability): विवादों का शांतिपूर्ण समाधान होने से हिंसा और असंतोष कम होता है।
- आर्थिक विकास (Economic Growth): प्रभावी न्याय व्यवस्था निवेश और व्यापार के लिए अनुकूल वातावरण बनाती है।
सरकार का ‘Ease of Justice’ दृष्टिकोण
सरकार का उद्देश्य केवल न्याय देना नहीं, बल्कि न्याय तक पहुँचना और उसे समझना भी आसान बनाना है। इसके लिए तीन प्रमुख आयामों पर ध्यान दिया गया है:
- वादियों (Litigants) के लिए प्रक्रिया आसान बनाना – Ease of Engagement
वादी (Litigant) वह व्यक्ति या संस्था होती है जो किसी कानूनी मामले में अदालत जाती है।
उद्देश्य:
- न्याय पाने की प्रक्रिया को सरल, तेज और कम खर्चीला बनाना।
- अनावश्यक कागजी कार्यवाही और बार-बार अदालत आने की आवश्यकता कम करना।
उदाहरण:
- ई–फाइलिंग (e-Filing): मुकदमे और दस्तावेज़ ऑनलाइन दाखिल किए जा सकते हैं।
- e-Seva Kendras: नागरिकों को अदालत संबंधी सेवाओं में सहायता प्रदान करते हैं।
- Tele-Law: दूरस्थ क्षेत्रों के लोगों को डिजिटल माध्यम से कानूनी सलाह उपलब्ध कराता है।
- न्यायाधीशों और वकीलों के लिए कार्य को सरल बनाना – Ease of Working
न्यायिक अधिकारियों और अधिवक्ताओं के लिए आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध कराने से मामलों का निपटारा अधिक कुशलता से हो सकता है।
उद्देश्य:
- कार्यभार कम करना।
- मामलों के प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाना।
- तकनीक के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया को तेज बनाना।
उदाहरण:
- e-Courts: डिजिटल रिकॉर्ड और ऑनलाइन केस प्रबंधन।
- वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग: दूरस्थ सुनवाई की सुविधा।
- वर्चुअल कोर्ट: कुछ मामलों का ऑनलाइन निपटारा।
- डिजिटल दस्तावेज़ प्रबंधन: कागज पर निर्भरता कम।
- आम नागरिकों के लिए कानून और न्याय को समझना आसान बनाना – Ease of Understanding
भारत एक बहुभाषी देश है, इसलिए न्यायिक जानकारी को सरल भाषा और विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है।
उद्देश्य:
- नागरिकों को कानूनी प्रक्रियाओं और निर्णयों को आसानी से समझने में मदद करना।
- भाषा और तकनीकी जटिलताओं को कम करना।
उदाहरण:
- SUVAS: सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
- Bhashini: एआई आधारित भाषा तकनीक, जो विभिन्न भाषाओं में सामग्री उपलब्ध कराने में सहायता करती है।
- National Judicial Data Grid (NJDG): मामलों और न्यायिक आँकड़ों तक सार्वजनिक पहुँच प्रदान करता है।
| आयाम | अर्थ | उदाहरण |
| Ease of Engagement | वादियों के लिए न्याय तक पहुँचना आसान बनाना | e-Filing, Tele-Law, e-Seva Kendras |
| Ease of Working | न्यायाधीशों और वकीलों के कार्य को अधिक कुशल बनाना | e-Courts, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, डिजिटल रिकॉर्ड |
| Ease of Understanding | आम नागरिकों के लिए कानून और न्याय को समझना सरल बनाना | SUVAS, Bhashini, NJDG |
नागरिकों के लिए न्याय तक आसान पहुँच
(क) Tele-Law
- डिजिटल माध्यम से निःशुल्क कानूनी सलाह उपलब्ध कराता है।
- लाखों नागरिकों ने इसका लाभ उठाया है।
(ख) Nyaya Bandhu
- प्रो बोनो (निःशुल्क) कानूनी सेवाओं को बढ़ावा देता है।
- DISHA कार्यक्रम के अंतर्गत संचालित।
(ग) ई–फाइलिंग और e-Seva Kendras
- अदालतों में ऑनलाइन आवेदन और दस्तावेज़ जमा करना आसान हुआ।
- समय और लागत में कमी आई।
न्यायिक सुधारों के पहलू
- न्यायिक प्रणाली का आधुनिकीकरण: भारत सरकार न्यायिक प्रणाली में सुधार के लिए विभिन्न तकनीकी उपाय अपना रही है। इनमें अदालती अभिलेखों का डिजिटलीकरण, ऑनलाइन केस फाइल करना और ई-कोर्ट सेवाएं प्रदान करना शामिल है। इससे सुनवाई में देरी कम हुई है और न्याय तक पहुंच में सुधार हुआ है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि: भारत में न्यायाधीशों की भारी कमी है। सरकार ने अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए कई उपाय किए हैं, जिनमें नए पद सृजित करना और रिक्तियों को भरना शामिल है। इससे अदालतों में लंबित मामलों की संख्या कम होने की संभावना है।
- वैकल्पिक विवाद समाधान: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के तहत वैकल्पिक विवाद समाधान की व्यवस्था की गई है, जो कानून के समक्ष समानता, जीवन के अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित हैं। सरकार न्यायिक प्रणाली से बाहर मुद्दों को सुलझाने के तरीके के रूप में मध्यस्थता और मध्यस्थता जैसी वैकल्पिक विवाद समाधान प्रक्रियाओं को प्रोत्साहित करती रही है। इससे अदालतों पर दबाव कम होता है और विवाद निपटान का एक तेज़ और कम खर्चीला तरीका मिलता है।
- कानूनी सहायता: भारत सरकार उन लोगों को कानूनी सहायता (अनुच्छेद 30ए) प्रदान करती है जो वकील रखने का खर्च वहन नहीं कर सकते। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक स्थिति कैसी भी हो, सभी को न्याय तक पहुंच प्राप्त हो।
- त्वरित निपटान के लिए विशेष न्यायालय: सरकार ने बच्चों और महिलाओं के खिलाफ अपराधों से संबंधित मामलों के साथ-साथ अन्य ऐसे मामलों के निपटान के लिए त्वरित निपटान न्यायालयों की स्थापना की है जिनमें त्वरित निर्णय की आवश्यकता होती है।
- आपराधिक न्याय प्रणाली में सुधार: सरकार ने आपराधिक न्याय प्रणाली में कई बदलाव किए हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि निर्दोषों को गलत तरीके से दोषी न ठहराया जाए और दोषियों को बरी न किया जाए। इसमें फोरेंसिक कौशल बढ़ाना, त्वरित जांच और अभियोजन सुनिश्चित करना और अभियोक्ता के अधिकारों की रक्षा करना शामिल है।
निष्कर्ष
भारत की न्याय व्यवस्था को डिजिटल, पारदर्शी, सस्ती, समावेशी और नागरिक–केंद्रित बनाने की दिशा में कई सुधार किए जा रहे हैं। Ease of Justice का उद्देश्य केवल न्याय उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उसे समझने, प्राप्त करने और उपयोग करने की प्रक्रिया को भी सरल बनाना है। यह विकसित भारत 2047 की दिशा में सुशासन और विधि के शासन (Rule of Law) को मजबूत करने का महत्वपूर्ण आधार है।
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