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चीन का प्रतीक्षा का खेल/China’s Waiting Game

China’s Waiting Game- THE STATESMAN

भारत और चीन के बीच सीमा विवाद केवल पर्वतों, घाटियों और बर्फीले क्षेत्रों का संघर्ष नहीं है; यह इतिहास, साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, भूराजनीति, शक्तिसंतुलन और एशिया के भविष्य के नेतृत्व की लड़ाई है।

भारत और चीन एशिया की दो सबसे प्राचीन सभ्यताएँ हैं। हजारों वर्षों तक दोनों देशों के बीच संबंध मुख्यतः व्यापार, बौद्ध धर्म, संस्कृति और ज्ञान के आदान-प्रदान पर आधारित रहे। चीन के यात्री फाह्यान (Fa-Hien) और ह्वेनसांग (Xuanzang) भारत आए, जबकि भारतीय भिक्षु चीन गए। इन संबंधों में आधुनिक अर्थों में सीमा विवाद जैसी कोई समस्या नहीं थी।

  • आज स्थिति बिल्कुल भिन्न है। विश्व की दो सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश, दो परमाणु शक्तियाँ, दो तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएँ और एशिया के दो प्रमुख शक्ति केंद्र भारत और चीन लगभग 3,488 किलोमीटर लंबी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दशकों से आमने-सामने खड़े हैं।
  • प्रश्न यह है कि जब दोनों देशों ने 1993, 1996, 2005 और उसके बाद अनेक समझौते किए, तो सीमा विवाद क्यों बना रहा? चीन LAC को स्पष्ट रूप से स्वीकार क्यों नहीं करता? क्या यह केवल सीमा का प्रश्न है, या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीतिक सोच कार्य कर रही है?

इन प्रश्नों का उत्तर केवल वर्तमान घटनाओं में नहीं, बल्कि लगभग दो शताब्दियों के इतिहास में छिपा है।

भारतचीन सीमा विवाद की ऐतिहासिक उत्पत्ति

क्या भारत और चीन की कभी साझा सीमा थी?

यह प्रश्न पहली दृष्टि में सरल लगता है, परंतु ऐतिहासिक रूप से इसका उत्तर नहीं है।

  • 1949 से पहले आधुनिक चीन और आधुनिक भारत के बीच प्रत्यक्ष सीमा नहीं थी। दोनों के बीच तिब्बत एक बफर (Buffer State) के रूप में मौजूद था। तिब्बत अपनी विशिष्ट राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान रखता था।
  • अंतरराष्ट्रीय संबंधों में Buffer State Theory बताती है कि दो शक्तिशाली देशों के बीच स्थित एक छोटा राज्य दोनों के बीच प्रत्यक्ष संघर्ष को कम करता है। इतिहास में बेल्जियम (फ्रांस और जर्मनी के बीच), अफगानिस्तान (ब्रिटिश भारत और रूस के बीच) तथा तिब्बत (भारत और चीन के बीच) इसी प्रकार की भूमिका निभाते रहे।

जब तक तिब्बत स्वतंत्र या अर्ध-स्वायत्त था, भारत और चीन के बीच सीमा विवाद लगभग नगण्य था।

औपनिवेशिक राजनीति औरग्रेट गेम

  • उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य भारत पर शासन कर रहा था। दूसरी ओर रूस मध्य एशिया की ओर तेजी से विस्तार कर रहा था। ब्रिटेन को भय था कि यदि रूस हिमालय पार कर भारत तक पहुँच गया, तो उसका सबसे मूल्यवान उपनिवेश खतरे में पड़ जाएगा।
  • इसी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को इतिहास में “The Great Game” कहा जाता है।
  • ब्रिटेन ने हिमालयी क्षेत्रों लद्दाख, सिक्किम, भूटान, नेपाल और तिब्बत को अपनी सुरक्षा नीति का हिस्सा बनाना शुरू किया। यही वह समय था जब पहली बार सीमा निर्धारण का प्रश्न गंभीर रूप से सामने आया।

अक्साई चिन का विवाद कैसे शुरू हुआ?

अक्साई चिन लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर का निर्जन, ऊँचा और शुष्क पठारी क्षेत्र है। देखने में यह बर्फीला रेगिस्तान लगता है, किंतु सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

भारत के लिए महत्व

  • लद्दाख की सुरक्षा
  • काराकोरम दर्रे के निकट स्थिति
  • सियाचिन क्षेत्र के समीप
  • उत्तरी सीमाओं की सामरिक गहराई

चीन के लिए महत्व

चीन के लिए अक्साई चिन केवल भूमि नहीं है।

  • यह शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाला सबसे छोटा स्थलीय मार्ग है। 1950 के दशक में चीन ने इसी क्षेत्र से होकर G219 राष्ट्रीय राजमार्ग बनाया, जो आज भी उसकी सैन्य और प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण जीवनरेखा है।
  • इसी कारण चीन इस क्षेत्र पर किसी प्रकार का समझौता करने को तैयार नहीं दिखाई देता।

मैकमोहन रेखा का जन्म

  • 1913-14 में ब्रिटिश भारत, तिब्बत और चीन के प्रतिनिधियों के बीच शिमला सम्मेलन आयोजित हुआ।
  • ब्रिटिश प्रतिनिधि सर हेनरी मैकमोहन ने पूर्वी सीमा का एक नया मानचित्र तैयार किया जिसे बाद में मैकमोहन लाइन कहा गया।
  • भारत इस रेखा को अपनी वैध अंतरराष्ट्रीय सीमा मानता है और चीन इसे अस्वीकार करता है।

चीन के अस्वीकार करने के कारण

  1. चीन का दावा है कि तिब्बत स्वतंत्र संधि करने का अधिकार नहीं रखता था।
  2. सम्मेलन के अंतिम दस्तावेज़ पर चीन ने हस्ताक्षर नहीं किए।
  3. चीन इसे औपनिवेशिक साम्राज्यवाद की देन मानता है।

यहीं से अरुणाचल प्रदेश (जिसे चीन “दक्षिण तिब्बत” कहता है) विवाद का केंद्र बन गया।

तिब्बत: पूरे विवाद की कुंजी

1950 से पहले: तिब्बत अपनी अलग राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था रखता था। भारत के साथ उसके व्यापारिक और सांस्कृतिक संबंध प्राचीन थे।

1949: माओत्से तुंग के नेतृत्व में चीन में साम्यवादी क्रांति सफल हुई।

1950: चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) तिब्बत में प्रवेश कर गई।

1951: तिब्बत पर चीन का प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो गया।

यही वह क्षण था जिसने भारत और चीन को पहली बार प्रत्यक्ष सीमा वाले पड़ोसी बना दिया।

पंचशील और नेहरू की विदेश नीति

1954 में भारत और चीन ने पंचशील समझौता किया।

इसके पाँच सिद्धांत थे;

  • एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान
  • आक्रमण न करना
  • आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करना
  • समानता एवं पारस्परिक लाभ
  • शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व

नेहरू को विश्वास था कि नवस्वतंत्र एशियाई राष्ट्र सहयोग का नया मॉडल प्रस्तुत करेंगे।

इसी समय लोकप्रिय नारा बना हिंदीचीनी भाईभाई

परंतु इसी दौरान चीन गुप्त रूप से अक्साई चिन में सड़क निर्माण कर रहा था। यहीं भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल मानी जाती है।

यथार्थवाद (Realism) बनाम आदर्शवाद (Idealism)

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के सिद्धांत इस घटना को गहराई से समझाते हैं।

  • नेहरू की विदेश नीति पर आदर्शवाद (Idealism) का प्रभाव था। उनका विश्वास था कि नैतिकता, अंतरराष्ट्रीय कानून और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व युद्ध की संभावना कम करेंगे।
  • वही माओत्से तुंग ने शक्तिराजनीति (Power Politics) अपनाई। यह Classical Realism का उत्कृष्ट उदाहरण था।

Hans Morgenthau के अनुसार, “अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मूल उद्देश्य शक्ति प्राप्त करना और उसे बनाए रखना है।”

तिब्बत का विद्रोह : 1959 की निर्णायक घटना

  • 1950 में तिब्बत पर चीनी नियंत्रण स्थापित होने के बाद स्थानीय समाज में असंतोष बढ़ने लगा। धार्मिक संस्थाओं पर नियंत्रण, प्रशासनिक परिवर्तन और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की बढ़ती उपस्थिति ने व्यापक विरोध को जन्म दिया।
  • मार्च 1959 में ल्हासा में बड़ा विद्रोह हुआ। हजारों तिब्बती नागरिक और भिक्षु चीनी शासन के विरुद्ध सड़कों पर उतर आए। चीन ने इस विद्रोह को कठोर सैन्य बल से दबा दिया।
  • यही वह समय था जब 14वें दलाई लामा अपने अनुयायियों के साथ हिमालय पार करके भारत पहुँचे। भारत सरकार ने उन्हें शरण दी और बाद में धर्मशाला (हिमाचल प्रदेश) में तिब्बती निर्वासित सरकार की स्थापना हुई।

भारत में दलाई लामा को मानवीय आधार पर शरण दी गई, परंतु चीन ने इसे अलग दृष्टि से देखा। बीजिंग की रणनीतिक सोच में यह केवल मानवीय निर्णय नहीं था, बल्कि चीन की संप्रभुता को चुनौती देने वाला कदम माना गया। चीन को आशंका थी कि तिब्बती राष्ट्रवाद भारत की भूमि से पुनर्जीवित हो सकता है। यहीं से चीन के राजनीतिक नेतृत्व के मन में भारत के प्रति अविश्वास गहरा होने लगा।

Forward Policy : भारत की रणनीतिक भूल?

1961 में भारत सरकार ने तथाकथित Forward Policy अपनाई।

इस नीति के अंतर्गत भारतीय सेना को निर्देश दिया गया कि वे सीमा के निकट अधिक से अधिक चौकियाँ स्थापित करें, यहाँ तक कि कुछ चौकियाँ चीनी सैन्य ठिकानों के समीप भी बनाई गईं।

भारत का उद्देश्य था कि चीन को यह संदेश दिया जाए कि भारतीय सीमा पर उसकी उपस्थिति मजबूत है।

लेकिन कई सैन्य इतिहासकारों का मानना है कि;

  • पर्याप्त रसद उपलब्ध नहीं थी।
  • सड़कें नहीं थीं।
  • हथियार आधुनिक नहीं थे।
  • पर्वतीय युद्ध का अनुभव सीमित था।
  • राजनीतिक नेतृत्व और सैन्य नेतृत्व के बीच समन्वय कमजोर था।

इस प्रकार Forward Policy ने भारत की राजनीतिक इच्छाशक्ति तो दिखाई, लेकिन सैन्य तैयारी उसके अनुरूप नहीं थी।

1967 : नाथू ला और चो ला संघर्ष भारत की बदली हुई सैन्य क्षमता

1967 में सिक्किम (जो उस समय भारत का संरक्षित राज्य था) के नाथू ला और चो ला दर्रों पर भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच गंभीर संघर्ष हुआ।

भारत सीमा पर तारबंदी (Fencing) कर रहा था। चीन ने इसका विरोध किया और भारतीय सैनिकों को रोकने का प्रयास किया। स्थिति तेजी से हिंसक हो गई।

चीनी सेना ने भारतीय चौकियों पर गोलाबारी की। इस बार भारतीय सेना ने पीछे हटने के बजाय संगठित और प्रभावी जवाब दिया। भारतीय तोपखाने (Artillery) ने चीन की अग्रिम चौकियों को भारी क्षति पहुँचाई।

परिणाम

  • चीन को पीछे हटना पड़ा।
  • भारतीय सेना ने अपनी स्थिति बनाए रखी।
  • 1962 के विपरीत, इस बार भारत ने सामरिक बढ़त दिखाई।

1988 : राजीव गांधी की चीन यात्रा – संबंधों में नया अध्याय

दिसंबर 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने चीन की ऐतिहासिक यात्रा की।

यह 34 वर्षों बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली चीन यात्रा थी।

राजीव गांधी और देंग शियाओपिंग के बीच वार्ता ने दोनों देशों के संबंधों को नई दिशा दी।

प्रमुख परिणाम

  • सीमा विवाद को शेष संबंधों से अलग रखने (Compartmentalization) पर सहमति।
  • संयुक्त कार्य समूह (Joint Working Group) का गठन।
  • व्यापार और सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा।

यहीं से दोनों देशों ने यह स्वीकार किया कि सीमा विवाद का त्वरित समाधान कठिन है, इसलिए अन्य क्षेत्रों में सहयोग जारी रखा जा सकता है।

1993 का समझौता : शांति और स्थिरता की शुरुआत

1993 में दोनों देशों ने Agreement on the Maintenance of Peace and Tranquility along the Line of Actual Control पर हस्ताक्षर किए।

मुख्य बिंदु

  • LAC पर शांति बनाए रखना।
  • सैन्य गतिविधियों को नियंत्रित करना।
  • तनाव कम करना।
  • विवादों का समाधान वार्ता से करना।

लेकिन एक गंभीर समस्या बनी रही;

LAC कहाँ है, इस पर दोनों देशों की सहमति ही नहीं बनी।

यहीं चीन की “Waiting Game” रणनीति की नींव दिखाई देती है।

चीन LAC को स्पष्ट क्यों नहीं करना चाहता?

यदि LAC स्पष्ट हो जाए, तो;

  • चीन की रणनीतिक लचीलापन (Strategic Flexibility) समाप्त हो जाएगी।
  • नए दावे करना कठिन होगा।
  • सैन्य दबाव बनाने की क्षमता कम होगी।
  • वार्ता में उसकी सौदेबाजी की शक्ति घटेगी।

इसलिए चीन अस्पष्टता (Strategic Ambiguity) को अपने हित में मानता है।

2012 में शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने और 2013 में राष्ट्रपति। उनके नेतृत्व में चीन की विदेश नीति ने “Low Profile Diplomacy” (देंग शियाओपिंग की नीति) से आगे बढ़कर “Major Power Diplomacy” का रूप लिया।

शी जिनपिंग ने “Chinese Dream” (चीनी पुनर्जागरण) की अवधारणा प्रस्तुत की। इसका उद्देश्य केवल आर्थिक विकास नहीं, बल्कि 2049 तक चीन को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाना था। इस लक्ष्य के लिए तीन प्रमुख स्तंभ उभरे;

  1. पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का आधुनिकीकरण।
  2. वैश्विक अवसंरचना और संपर्क (BRI) का विस्तार।
  3. विवादित क्षेत्रों पर चीन के दावों को अधिक दृढ़ता से स्थापित करना।

इसी रणनीति का प्रभाव दक्षिण चीन सागर, ताइवान, पूर्वी चीन सागर और भारत-चीन सीमा पर स्पष्ट दिखाई देने लगा।

Belt and Road Initiative (BRI) : केवल आर्थिक परियोजना नहीं

2013 में चीन ने Belt and Road Initiative (BRI) की घोषणा की। इसे आधुनिक “सिल्क रोड” के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिसका उद्देश्य एशिया, अफ्रीका और यूरोप को सड़क, रेल, बंदरगाह और ऊर्जा परियोजनाओं से जोड़ना था।

भारत की चिंता

भारत ने BRI का समर्थन नहीं किया क्योंकि;

  • चीनपाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से होकर गुजरता है।
  • यह भारत की संप्रभुता का उल्लंघन माना गया।
  • हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति से भारत की समुद्री सुरक्षा प्रभावित हो सकती थी।

यहीं से भारत-चीन प्रतिस्पर्धा केवल हिमालय तक सीमित नहीं रही, बल्कि हिंद महासागर और इंडो-पैसिफिक तक फैल गई।

Grey Zone Warfare : युद्ध और शांति के बीच की रणनीति

आधुनिक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में Grey Zone Warfare का अर्थ है;

ऐसी गतिविधियाँ जो युद्ध भी नहीं हैं और पूर्ण शांति भी नहीं।

इसमें शामिल हैं;

  • सीमित घुसपैठ।
  • साइबर हमले।
  • सूचना युद्ध।
  • मनोवैज्ञानिक दबाव।
  • सीमा पर सैनिकों की तैनाती।
  • आर्थिक निर्भरता का उपयोग।
  • कानूनी दावे (Lawfare) और प्रचार (Narrative Building)।

चीन ने भारत के साथ-साथ दक्षिण चीन सागर और ताइवान के संदर्भ में भी इसी रणनीति का प्रयोग किया है।

“China’s Waiting Game” क्यों खेल रहा है?

यह किसी प्रशासनिक कठिनाई का परिणाम नहीं, बल्कि एक सुनियोजित रणनीति है। LAC की अस्पष्टता चीन को भविष्य में अपनी सैन्य और राजनीतिक आवश्यकताओं के अनुसार सीमावर्ती क्षेत्रों में दबाव बनाने की स्वतंत्रता देती है।

सीमा विवाद का वास्तविक कारण केवल भूमि नहीं, बल्कि शक्तिसंतुलन है: चीन स्वयं को एशिया की प्रमुख शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, जबकि भारत भी एक उभरती हुई शक्ति है। इसलिए सीमा विवाद दोनों देशों की व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का प्रतीक बन गया है।

चीनStrategic Ambiguity” का उपयोग करता है: चीन सीमा को स्पष्ट करने के बजाय “Strategic Ambiguity” अर्थात् रणनीतिक अस्पष्टता बनाए रखना चाहता है। जब सीमा स्पष्ट नहीं होगी, तब चीन किसी भी क्षेत्र में अपनी सैन्य गश्त बढ़ाकर यह दावा कर सकता है कि उसकी सेना अपने ही क्षेत्र में कार्य कर रही है। इस प्रकार चीन बिना औपचारिक युद्ध के भी यथास्थिति (Status Quo) को धीरे-धीरे बदल सकता है।

चीनSalami Slicing Strategy” अपनाता है: चीन एक साथ बड़े क्षेत्र पर कब्ज़ा करने की बजाय सीमित सैन्य गतिविधियों, गश्त, सड़क निर्माण और अस्थायी चौकियों के माध्यम से अपने दावों को मजबूत करता है। प्रत्येक कदम इतना सीमित होता है कि दूसरा पक्ष पूर्ण युद्ध का जोखिम नहीं उठाता।

निष्कर्ष

चीन सीमा विवाद को शीघ्र समाप्त नहीं करना चाहता। उसके लिए LAC की अस्पष्टता एक रणनीतिक उपकरण (Strategic Instrument) है, जिसके माध्यम से वह भारत पर निरंतर सैन्य, कूटनीतिक और मनोवैज्ञानिक दबाव बनाए रख सकता है। इस प्रकार बिना पूर्ण युद्ध किए चीन अपने दीर्घकालिक भू-राजनीतिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।

 


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