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भारत-यूके सबंध: भारत-यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA), 2026

India-UK Comprehensive Economic and Trade Agreement (CETA), 2026

भारत और यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) के मध्य व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (Comprehensive Economic and Trade Agreement – CETA) 15 जुलाई 2026 से औपचारिक रूप से प्रभावी हो गया। इसके साथ ही डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (Double Contribution Convention – DCC) भी लागू हुआ, जिसने दोनों देशों के आर्थिक, व्यापारिक तथा व्यावसायिक संबंधों को एक नई दिशा प्रदान की।

यह समझौता केवल शुल्क (Tariff) में कटौती तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवाओं के व्यापार, निवेश, पेशेवरों की आवाजाही, सामाजिक सुरक्षा, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Global Value Chain) तथा रणनीतिक आर्थिक साझेदारी को भी सुदृढ़ बनाता है। भारत-यूएई CEPA, भारत-ऑस्ट्रेलिया ECTA तथा अब भारत-यूके CETA इसी रणनीतिक परिवर्तन का परिणाम हैं। यह समझौता विकसित भारत (Viksit Bharat 2047) के लक्ष्य की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

भारतयूके CETA क्या है?

भारतयूके CETA की प्रमुख विशेषताएँ

  • CETA की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि यूनाइटेड किंगडम ने भारत के लगभग 99 प्रतिशत निर्यात उत्पादों को शून्य सीमा शुल्क (Zero Duty) की सुविधा प्रदान की है।
  • पहले भारतीय उत्पादों को शुल्क के कारण बांग्लादेश, वियतनाम अथवा अन्य देशों की तुलना में प्रतिस्पर्धात्मक नुकसान उठाना पड़ता था। अब यह अंतर काफी हद तक समाप्त हो जाएगा।
  • CETA में भारत ने भी ब्रिटेन के लिए अपने बाजार को आंशिक रूप से खोला है, किंतु यह उदारीकरण अत्यंत सावधानीपूर्वक और चरणबद्ध तरीके से किया गया है। भारत ने लगभग 5 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर रियायतें देने का निर्णय लिया है, किन्तु इन रियायतों का अधिकांश भाग कई वर्षों में क्रमशः लागू होगा।
  • यह रणनीति ‘संतुलित व्यापार उदारीकरण’ (Balanced Trade Liberalisation) का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें मुक्त व्यापार और राष्ट्रीय आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है।
  • मुक्त व्यापार समझौतों की सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि घरेलू कृषि एवं लघु उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा का सामना नहीं कर पाते। भारत ने इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए CETA में अपने संवेदनशील क्षेत्रों को विशेष संरक्षण प्रदान किया है।
  • CETA के अंतर्गत ब्रिटेन ने पहली बार अपने लगभग सभी प्रमुख सेवा क्षेत्रों को भारतीय सेवा प्रदाताओं के लिए अधिक सुलभ बनाया है। इससे भारतीय आईटी कंपनियों, इंजीनियरों, चिकित्सकों, वित्तीय विशेषज्ञों तथा अन्य पेशेवरों को ब्रिटिश बाजार में कार्य करने के अधिक अवसर प्राप्त होंगे।
  • इसका प्रभाव केवल सेवा निर्यात तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय प्रतिभाओं (Indian Talent) की वैश्विक पहचान तथा भारत की ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) को भी नई गति मिलेगी।

भारत के लिए CETA का सामरिक एवं भूराजनीतिक महत्व

  • भारत-यूके CETA केवल आर्थिक समझौता नहीं है, बल्कि इसका गहरा सामरिक एवं भू-राजनीतिक महत्व भी है। ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन वैश्विक स्तर पर अपनी नई व्यापारिक रणनीति विकसित कर रहा है, जबकि भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक भूमिका को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में दोनों देशों का यह समझौता साझा रणनीतिक हितों को भी प्रतिबिंबित करता है।
  • यह समझौता भारत की ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ (Multi-alignment) विदेश नीति का उत्कृष्ट उदाहरण है। भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के साथ आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ग्लोबल साउथ (Global South) के देशों के साथ भी सहयोग बनाए हुए है। CETA इस संतुलित विदेश नीति को और अधिक मजबूती प्रदान करता है।
  • इसके अतिरिक्त, यह समझौता चीन-केंद्रित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (China-centric Supply Chains) पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि भारत ब्रिटेन सहित अन्य पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक संबंधों को गहरा करता है, तो वह वैश्विक विनिर्माण एवं आपूर्ति श्रृंखलाओं का एक विश्वसनीय विकल्प बन सकता है।

डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (Double Contribution Convention – DCC)

  • CETA के साथ लागू किया गया डबल कंट्रीब्यूशन कन्वेंशन (DCC) इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। इसका उद्देश्य भारतीय एवं ब्रिटिश पेशेवरों को दोहरे सामाजिक सुरक्षा अंशदान (Dual Social Security Contribution) के बोझ से मुक्त करना है।
  • पहले जब कोई भारतीय पेशेवर सीमित अवधि के लिए ब्रिटेन में कार्य करने जाता था, तो उसे भारत में भी सामाजिक सुरक्षा अंशदान देना पड़ता था और ब्रिटेन में भी राष्ट्रीय बीमा (National Insurance) के अंतर्गत योगदान करना पड़ता था। इससे कर्मचारियों और कंपनियों दोनों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ता था।
  • DCC के लागू होने के बाद भारतीय पेशेवर, जो निर्धारित अवधि तक ब्रिटेन में कार्य करेंगे, उन्हें इस दोहरे योगदान से राहत मिलेगी। इसके लिए उन्हें भारत के कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) द्वारा जारी Certificate of Coverage (CoC) प्राप्त करना होगा, जिससे यह प्रमाणित होगा कि वे भारत की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में योगदान कर रहे हैं।

भारत–यूके द्विपक्षीय व्यापार एवं निवेश की वर्तमान स्थिति

भारत–यूके CETA द्विपक्षीय व्यापार, सेवाक्षेत्र, निवेश एवं वैश्विक आर्थिक साझेदारी को नई गति प्रदान करते हुए दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को अधिक संस्थागत, प्रतिस्पर्धी एवं दीर्घकालिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

क्षेत्रवर्तमान स्थितिभारत के लिए महत्व
वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार (2025–26)कुल व्यापार 25.12 अरब अमेरिकी डॉलरभारत–यूके व्यापारिक संबंधों की निरंतर प्रगति को दर्शाता है।
भारत का निर्यात13.44 अरब अमेरिकी डॉलरब्रिटिश बाजार में भारतीय उत्पादों की मजबूत प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति।
भारत का आयात11.68 अरब अमेरिकी डॉलरआवश्यक वस्तुओं एवं प्रौद्योगिकी तक भारत की पहुँच सुनिश्चित होती है।
व्यापार अधिशेष (Trade Surplus)1.76 अरब अमेरिकी डॉलरभारत के पक्ष में सकारात्मक व्यापार संतुलन एवं विदेशी मुद्रा अर्जन।
सेवाओं का व्यापार (2024)35.44 अरब अमेरिकी डॉलरसेवाक्षेत्र भारत–यूके आर्थिक संबंधों का प्रमुख आधार है।
सेवा क्षेत्र में भारत का अधिशेष7.88 अरब अमेरिकी डॉलरआईटी, वित्तीय सेवाओं एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दर्शाता है।
प्रमुख सेवा क्षेत्रसूचना प्रौद्योगिकी (IT), वित्तीय सेवाएँ, व्यवसाय परामर्श, अनुसंधान एवं विकास (R&D), डिजिटल सेवाएँज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था (Knowledge Economy) में भारत की बढ़ती भूमिका।
ब्रिटेन का भारत में निवेशबैंकिंग, बीमा, विनिर्माण, शिक्षा, ऊर्जा, स्वास्थ्य, हरित प्रौद्योगिकी एवं वित्तीय सेवाओं में निवेशपूंजी, तकनीक, रोजगार एवं औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन।
भारतीय कंपनियों की ब्रिटेन में उपस्थितिअनेक भारतीय कंपनियाँ सफलतापूर्वक कार्यरत तथा हजारों लोगों को रोजगार प्रदान कर रही हैंभारत की वैश्विक व्यावसायिक उपस्थिति एवं निवेश क्षमता का विस्तार।
CETA का संभावित प्रभावव्यापार एवं निवेश संबंधों को अधिक संस्थागत, स्थायी एवं सुदृढ़ आधार प्रदान करेगाद्विपक्षीय आर्थिक सहयोग, निवेश प्रवाह एवं दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी को मजबूती।

भारत–यूके CETA की प्रमुख चुनौतियाँ

  1. गैर-शुल्कीय बाधाएँ (Non-Tariff Barriers): गुणवत्ता मानक (SPS), तकनीकी प्रमाणन एवं पर्यावरणीय नियम भारतीय निर्यात, विशेषकर MSMEs और कृषि उत्पादों के लिए चुनौती बने हुए हैं।
  2. कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM): ब्रिटेन की कार्बन-आधारित व्यापार नीति इस्पात, एल्यूमिनियम, सीमेंट एवं अन्य ऊर्जा-गहन भारतीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित कर सकती है।
  3. रूल्स ऑफ ओरिजिन (Rules of Origin) की जटिलता: विस्तृत दस्तावेज़ीकरण, प्रमाणन एवं सत्यापन की प्रक्रिया छोटे एवं मध्यम उद्योगों (MSMEs) के लिए अतिरिक्त लागत और प्रशासनिक बोझ उत्पन्न करती है।
  4. सीमित पेशेवर गतिशीलता (Limited Professional Mobility): CETA पूर्ण वीज़ा उदारीकरण प्रदान नहीं करता, जिससे भारतीय आईटी विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं एवं अन्य पेशेवरों की आवाजाही अभी भी सीमित है।
  5. MSMEs में जागरूकता एवं क्षमता का अभाव: मुक्त व्यापार समझौतों की प्रक्रियाओं, गुणवत्ता मानकों एवं निर्यात अवसरों की सीमित जानकारी के कारण अनेक MSMEs CETA का पूरा लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

आगे की राह (Way Forward)

भारत-यूके CETA को सफल बनाने के लिए केवल समझौते पर हस्ताक्षर पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि घरेलू आर्थिक सुधारों तथा प्रभावी कार्यान्वयन की भी आवश्यकता है।

  1. सबसे पहले भारत को अपनी गुणवत्ता अवसंरचना (Quality Infrastructure) को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप विकसित करना होगा। आधुनिक परीक्षण प्रयोगशालाएँ, प्रमाणन संस्थाएँ तथा निर्यात गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली विकसित किए बिना विकसित देशों के बाजारों में स्थायी सफलता प्राप्त करना कठिन होगा।
  2. दूसरे, भारत को हरित विनिर्माण (Green Manufacturing) तथा कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में निवेश बढ़ाना चाहिए। भविष्य का वैश्विक व्यापार पर्यावरणीय मानकों पर आधारित होगा; इसलिए ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा तथा स्वच्छ उत्पादन तकनीकों को प्रोत्साहित करना अत्यंत आवश्यक है।
  3. तीसरे, लघु एवं मध्यम उद्योगों को CETA की प्रक्रियाओं, निर्यात अवसरों तथा वैश्विक गुणवत्ता मानकों के संबंध में प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। डिजिटल निर्यात प्लेटफॉर्म, व्यापार सुविधा केंद्र तथा वित्तीय सहायता योजनाएँ इस दिशा में उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं।
  4. चौथे, भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), साइबर सुरक्षा, फिनटेक, डिजिटल सेवाएँ, जैव-प्रौद्योगिकी तथा अनुसंधान एवं विकास जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में ब्रिटेन के साथ सहयोग को और अधिक सुदृढ़ करना चाहिए। इससे भारत केवल विनिर्माण निर्यातक ही नहीं, बल्कि वैश्विक नवाचार (Global Innovation) का भी प्रमुख केंद्र बन सकता है।

आलोचनात्मक मूल्यांकन (Critical Analysis)

  • भारत-यूके CETA भारतीय व्यापार नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत देता है। यह दर्शाता है कि भारत अब केवल घरेलू बाजार की सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
  • फिर भी यह समझौता अपने आप में कोई अंतिम समाधान नहीं है। यदि भारतीय उद्योग उत्पादकता, गुणवत्ता, अनुसंधान, नवाचार तथा हरित प्रौद्योगिकी में निवेश नहीं करते, तो केवल शुल्क रियायतों के आधार पर दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता।
  • इसके अतिरिक्त, कृषि, डेयरी तथा MSME क्षेत्र के हितों की निरंतर निगरानी आवश्यक होगी। सरकार को समय-समय पर इस समझौते के प्रभाव का मूल्यांकन करना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षा उपाय (Safeguard Measures) अपनाए जा सकें।
  • एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि CETA भारत की मुक्त व्यापार के साथ आत्मनिर्भरता (Open Trade with Strategic Self-Reliance) की नीति को भी प्रतिबिंबित करता है। भारत ने एक ओर अपने संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक व्यापार के अवसरों को भी स्वीकार किया है। यही संतुलन इस समझौते की सबसे बड़ी विशेषता है।

निष्कर्ष

भारत-यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) केवल एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि भारत की बदलती आर्थिक एवं विदेश नीति का दर्पण है। यह समझौता भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक प्रभावी भागीदारी, निर्यात वृद्धि, निवेश आकर्षण, रोजगार सृजन तथा तकनीकी सहयोग के नए अवसर प्रदान करता है। दूसरी ओर, यह भारत को यह भी स्मरण कराता है कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सफलता केवल बाजार खोलने से नहीं, बल्कि गुणवत्ता, नवाचार, हरित प्रौद्योगिकी, संस्थागत सुधार तथा कुशल कार्यान्वयन से प्राप्त होती है।

यदि भारत इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करता है, तो CETA न केवल भारत-ब्रिटेन संबंधों को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएगा, बल्कि विकसित भारत 2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में भी एक महत्वपूर्ण आधारशिला सिद्ध होगा। इस दृष्टि से CETA को भारत की 21वीं सदी की आर्थिक कूटनीति (Economic Diplomacy) का एक मील का पत्थर कहा जा सकता है।

Previous Year Questions

प्रश्न 1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए

  1. भारत WTO का संस्थापक सदस्य है।
  2. WTO ने GATT का स्थान लिया।

सही उत्तर चुनिए।

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)

प्रश्न 2 हमने ब्रिटिश मॉडल पर आधारित संसदीय लोकतंत्र को अपनाया है, लेकिन हमारा मॉडल ब्रिटिश मॉडल से किस प्रकार भिन्न है?

  1. ब्रिटिश संसद सर्वोच्च (Sovereign) है, जबकि भारत में संसद की विधि-निर्माण शक्ति सीमित है।
  2. भारत में संसद के किसी अधिनियम के संशोधन की संवैधानिक वैधता से संबंधित मामलों को सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ को संदर्भित किया जाता है।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

(a) केवल 1
(b) केवल 2
(c) 1 और 2 दोनों
(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (c)

प्रश्न 3 ‘Regional Comprehensive Economic Partnership (RCEP)’ शब्द किस समूह के संदर्भ में प्रयुक्त होता है?

(a) G-20

(b) ASEAN

(c) SCO

(d) SAARC

उत्तर: (b)

प्रश्न 4 भारतयूके CETA के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए

  1. ब्रिटेन ने लगभग 99% भारतीय निर्यात को शुल्क-मुक्त बाजार उपलब्ध कराया है।
  2. भारत ने अपने सभी कृषि उत्पादों पर शुल्क समाप्त कर दिया है।

सही उत्तर चुनिए

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1, न ही 2

उत्तर: (a)


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