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BRICS 2026: शक्ति-संतुलन से विकल्प-संतुलन तक

(18वां BRICS शिखर सम्मेलन)

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में BRICS अब केवल पाँच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है। इसके विस्तार ने इसे ऐसी बहुपक्षीय व्यवस्था में बदल दिया है, जिसमें वैश्विक दक्षिण की आर्थिक, राजनीतिक और विकासात्मक आकांक्षाएँ अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। भारत के लिए 2026 की BRICS अध्यक्षता इसलिए विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह ऐसे समय में आई है जब विश्व व्यवस्था युद्धों, आपूर्ति-श्रृंखला व्यवधानों, ऊर्जा असुरक्षा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, जलवायु संकट और वैश्विक संस्थाओं की प्रतिनिधित्व संबंधी कमियों से जूझ रही है।

  • भारत 12–13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। 2026 भारत की BRICS अध्यक्षता का चौथा अवसर है और इस वर्ष BRICS की स्थापना के 20 वर्ष भी पूरे हो रहे हैं।
  • भारत ने अपनी अध्यक्षता के लिए “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” अर्थात लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता के लिए निर्माण को केंद्रीय विषय बनाया है। इसके पीछे प्रधानमंत्री के “Humanity First” दृष्टिकोण को भी जोड़ा गया है।
  • वर्तमान में BRICS में 11 सदस्य हैं, ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया और सऊदी अरब।

BRICS का बदलता स्वरूप: आर्थिक समूह से व्यापक वैश्विक मंच तक

BRICS की शुरुआत आर्थिक क्षमता और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की भूमिका को रेखांकित करने वाले विचार से हुई थी। लेकिन समय के साथ इसका एजेंडा व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर वित्त, ऊर्जा, स्वास्थ्य, कृषि, विज्ञान एवं तकनीक, पर्यावरण, शिक्षा, आपदा प्रबंधन और जन-से-जन संपर्क तक पहुँच गया।

  • भारत के विदेश मंत्रालय के अनुसार BRICS सहयोग मुख्यतः तीन व्यापक स्तंभों में विकसित हुआ है राजनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग, आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग तथा सांस्कृतिक एवं जन–से–जन संपर्क। 2021 में भारत की पिछली अध्यक्षता के दौरान भी बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार, आतंकवाद-रोधी सहयोग, सतत विकास लक्ष्यों के लिए डिजिटल एवं तकनीकी साधनों तथा जन-से-जन संपर्क पर जोर दिया गया था।
  • 2024 के बाद हुए विस्तार ने इस मंच की भौगोलिक और राजनीतिक विविधता को बहुत बढ़ा दिया। परिणामस्वरूप BRICS के भीतर अब ऐसे देश हैं जिनकी विदेश-नीतियाँ, आर्थिक संरचनाएँ और सुरक्षा प्राथमिकताएँ एक-दूसरे से काफी भिन्न हैं।
  • यहीं से भारत की दृष्टि महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत BRICS को किसी वैचारिक या सैन्य गठबंधन के रूप में नहीं देखता, बल्कि व्यावहारिक सहयोग और वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने वाले मंच के रूप में उपयोग करना चाहता है।

भारत के लिए BRICS का अवसर

  • भारत की 2026 की अध्यक्षता का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने BRICS को केवल नेताओं की वार्षिक बैठक तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक परिणाम देने वाले संस्थागत सहयोग की दिशा में आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
  • भारत की अध्यक्षता में 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्च-स्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। इन बैठकों का उद्देश्य राजनीतिक एवं सुरक्षा, आर्थिक एवं वित्तीय तथा सांस्कृतिक एवं जन-से-जन तीनों क्षेत्रों में सहयोग को मजबूत करना रहा है।

इससे भारत के लिए दो प्रकार के अवसर पैदा होते हैं।

  • पहला, भारत अपने रणनीतिक हितों को आगे बढ़ा सकता है। दूसरा, भारत अपनी घरेलू विकासात्मक पहलों जैसे डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, ऊर्जा परिवर्तन, आपदा प्रबंधन, स्टार्ट-अप और कौशल विकास को अन्य विकासशील देशों के साथ साझा कर सकता है।

इस अर्थ में BRICS भारत के लिए केवल विदेश नीति का मंच नहीं है; यह भारतीय विकास अनुभव को अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक वस्तु (International Public Good) के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर भी है।

  1. लचीलापन: संकटों से निपटने की सामूहिक क्षमता
  • आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में किसी एक देश की आर्थिक शक्ति उसके लिए पर्याप्त नहीं है। कोविड-19 महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और समुद्री व्यापार मार्गों की असुरक्षा ने दिखाया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था कितनी परस्पर निर्भर है।
  • इसी संदर्भ में भारत ने BRICS के भीतर लचीलापन (Resilience) को प्रमुख प्राथमिकता बनाया है।
  • ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की अध्यक्षता का एक महत्वपूर्ण परिणाम BRICS Digital Centre of Excellence for Smart Grids and Energy Storage का शुभारंभ है। यह मंच स्मार्ट ग्रिड और ऊर्जा भंडारण के क्षेत्र में ज्ञान-साझाकरण, क्षमता निर्माण, तकनीकी सहयोग तथा नीतिगत सर्वोत्तम प्रक्रियाओं के आदान-प्रदान को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है।
  • इस पहल का महत्व केवल बिजली क्षेत्र तक सीमित नहीं है। भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था में नवीकरणीय ऊर्जा, भंडारण, डिजिटल प्रौद्योगिकी और स्मार्ट ग्रिड एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए ऊर्जा लचीलापन सीधे आर्थिक सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ जाता है।
  • इसी प्रकार आपदा जोखिम न्यूनीकरण के क्षेत्र में जुलाई 2026 में BRICS संयुक्त वक्तव्य अपनाया गया, जिसमें 2025–2028 की BRICS Disaster Risk Reduction Work Plan के कार्यान्वयन और अधिक मजबूत सहयोग पर जोर दिया गया।
  • इससे स्पष्ट होता है कि भारत के लिए लचीलापन केवल आर्थिक संकटों से बचाव नहीं, बल्कि ऊर्जा, आपदा, खाद्य, स्वास्थ्य और आपूर्ति-श्रृंखला सुरक्षा को एक साथ देखने की अवधारणा है।
  1. नवाचार: BRICS को तकनीकी सहयोग का मंच बनाना
  • 21वीं सदी में शक्ति का अर्थ केवल सैन्य या आर्थिक क्षमता नहीं है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, क्वांटम कंप्यूटिंग, डिजिटल अवसंरचना, जैव-प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण जैसी तकनीकें आने वाले दशकों में वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करेंगी।

भारत इसलिए BRICS के भीतर नवाचार (Innovation) को प्राथमिकता दे रहा है।

  • BRICS Incubator Network, Startup Innovation Fund और तकनीकी सहयोग जैसी पहलों का उद्देश्य सदस्य देशों के स्टार्ट-अप पारिस्थितिकी तंत्र, अनुसंधान संस्थानों और नवाचार संस्थाओं को एक-दूसरे से जोड़ना है। आगामी शिखर सम्मेलन में Incubator Network, Startup Innovation Fund और Logistics Supply-Chain Cooperation Framework को आगे बढ़ाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
  • यहाँ भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत ने डिजिटल पहचान, डिजिटल भुगतान और सार्वजनिक डिजिटल प्रणालियों के क्षेत्र में जो अनुभव विकसित किया है, उसे अन्य विकासशील देशों के साथ साझा करना भारत की तकनीकी कूटनीति का महत्वपूर्ण साधन बन सकता है।
  • इसी प्रकार AI के क्षेत्र में BRICS का प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा देश तकनीकी दौड़ में सबसे आगे है। अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या उभरती तकनीकें विकासशील समाजों के लिए सुलभ, सुरक्षित और न्यायपूर्ण बनाई जा सकती हैं?
  • यहीं BRICS को एक वैकल्पिक तकनीकी सहयोग मॉडल विकसित करने का अवसर मिलता है।
  1. सहयोग: राजनीतिक मतभेदों के बावजूद साझा हित
  • BRICS का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि इसके सदस्य देश एक-दूसरे के साथ सहयोग भी करते हैं और कई मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा भी।
  • भारत और चीन इसके सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा मौजूद है, लेकिन दोनों BRICS, G20, SCO और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर साथ काम करते हैं।

इसीलिए भारत की BRICS नीति को “सहयोग के लिए प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करना” कहा जा सकता है।

  • भारत का उद्देश्य यह नहीं है कि BRICS के भीतर सभी देशों की विदेश नीति समान हो जाए। इसके बजाय लक्ष्य यह है कि जहाँ साझा हित मौजूद हों, वहाँ सहयोग संभव हो।
  • उदाहरण के लिए ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, व्यापार सुविधा, डिजिटल प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य आपदा प्रबंधन, विज्ञान एवं अनुसंधान जैसे मुद्दों पर राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सहयोग विकसित किया जा सकता है।
  • यही कारण है कि BRICS की सफलता का वास्तविक पैमाना उसकी घोषणाओं की संख्या नहीं बल्कि ठोस संस्थागत और विकासात्मक परिणाम होंगे।
  1. समावेशी विकास: BRICS का लाभ सामान्य नागरिक तक
  • BRICS यदि केवल सरकारों, केंद्रीय बैंकों और बड़ी कंपनियों का मंच बनकर रह जाता है, तो उसकी सामाजिक प्रासंगिकता सीमित हो जाएगी।
  • भारत की अध्यक्षता में शिक्षा, उद्यमिता, युवा, स्वास्थ्य, कौशल और समावेशी विकास को व्यापक एजेंडे से जोड़ने का प्रयास किया गया है। भारत के आधिकारिक BRICS 2026 ढाँचे में “Education, Entrepreneurship & Future Readiness” तथा “Inclusive Development & Youth Wellbeing” जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
  • इसका अर्थ है कि BRICS का उद्देश्य केवल देशों के बीच व्यापार बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसी नीतियों के आदान-प्रदान को बढ़ावा देना भी होना चाहिए जिनसे युवाओं, महिलाओं, छोटे उद्यमों और कमजोर समुदायों को लाभ मिले।
  • यहाँ भारत के लिए अपनी कौशल विकास, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, स्टार्ट–अप और वित्तीय समावेशन संबंधी उपलब्धियों को साझा करने का अवसर है।

इससे BRICS की अवधारणा अधिक जन–केंद्रित (People-Centric) बन सकती है।

  1. सततता और जलवायु लचीलापन
  • BRICS देशों में अधिकांश देश विकासशील या उभरती अर्थव्यवस्थाएँ हैं। इसलिए इनके लिए जलवायु परिवर्तन का प्रश्न केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं है; यह गरीबी, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, रोजगार और आजीविका से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
  • भारत की अध्यक्षता में सततता को इसी व्यापक दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।
  • अगस्त 2026 में नई दिल्ली में BRICS Environment Ministers Meeting के दौरान पर्यावरणीय प्राथमिकताओं, जलवायु परिवर्तन और सतत विकास पर सहयोग को आगे बढ़ाया गया।
  • यहाँ भारत की दृष्टि विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि विकासशील देशों के लिए जलवायु नीति में शमन (Mitigation) के साथ-साथ अनुकूलन (Adaptation) भी उतना ही आवश्यक है।
  • किसान, तटीय समुदाय, शहरी गरीब, छोटे उत्पादक और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समुदाय जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। इसलिए जलवायु लचीलापन तभी प्रभावी होगा जब वह स्थानीय और सामुदायिक स्तर तक पहुँचे।

इस दृष्टि से BRICS सतत विकास और विकास के अधिकार के बीच संतुलन बनाने वाला मंच बन सकता है।

BRICS और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था

  • BRICS के विस्तार को अक्सर पश्चिमी प्रभुत्व के विरुद्ध एक नए समूह के निर्माण के रूप में देखा जाता है। लेकिन भारत के लिए ऐसी व्याख्या अधूरी है।
  • भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) और बहुध्रुवीयता पर बल देती रही है। भारत पश्चिम के साथ भी सहयोग करता है और रूस, चीन तथा अन्य वैश्विक दक्षिण देशों के साथ भी।
  • इसलिए भारत के लिए BRICS का अर्थ “पश्चिम के विरुद्ध नया गुट” बनाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अधिक विकल्प और अधिक प्रतिनिधित्व पैदा करना है।
  • यही विचार उस संपादकीय तर्क से भी जुड़ता है कि BRICS को “more blocs” अर्थात नए गुटों की राजनीति के बजाय “more choices” अर्थात अधिक विकल्पों का मंच होना चाहिए।
  • BRICS की 2025 की घोषणा में भी अधिक प्रतिनिधित्वकारी वैश्विक शासन, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में सुधार तथा वैश्विक दक्षिण की भागीदारी को बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।
  • इसलिए BRICS को विरोध की राजनीति के बजाय बहुध्रुवीय बहुपक्षवाद (Multipolar Multilateralism) के रूप में समझना अधिक उचित है।

सबसे बड़ी चुनौती: विविधता बनाम सहमति

  • BRICS की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है।
  • विस्तारित BRICS में ऐसे देश हैं जिनके बीच राजनीतिक और रणनीतिक मतभेद गहरे हैं। उदाहरण के लिए ईरान और संयुक्त अरब अमीरात के बीच क्षेत्रीय तनाव, रूस और पश्चिम के बीच संघर्ष, भारत-चीन प्रतिस्पर्धा तथा अलग-अलग देशों की अमेरिका के साथ अलग-अलग प्रकार की रणनीतिक साझेदारियाँ संगठन के भीतर सहमति बनाना कठिन बनाती हैं।
  • 2026 के शिखर सम्मेलन के सामने पश्चिम एशिया का युद्ध और ईरान से जुड़ा संकट विशेष चुनौती है। वर्तमान परिस्थितियों ने BRICS की सामूहिक स्थिति और साझा घोषणा को लेकर भी कठिन प्रश्न पैदा किए हैं।

इसलिए BRICS के सामने मूल प्रश्न यह है: क्या इतने विविध हितों वाले देश साझा विकासात्मक एजेंडे पर पर्याप्त सहमति बना सकते हैं?

यदि इसका उत्तर सकारात्मक है, तो BRICS की उपयोगिता बढ़ेगी। यदि संगठन अत्यधिक भू-राजनीतिक विवादों में उलझ जाता है, तो उसका व्यावहारिक सहयोग कमजोर हो सकता है।

BRICS में भारत की रणनीतिक भूमिका

  • भारत की भूमिका इस पूरे परिदृश्य में विशेष है क्योंकि भारत एक साथ कई स्तरों पर काम करता है।
  • भारत एक ओर अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ रणनीतिक एवं आर्थिक संबंध मजबूत कर रहा है; दूसरी ओर रूस के साथ दीर्घकालिक संबंध बनाए हुए है; साथ ही चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद दोनों जारी रखता है; और BRICS के भीतर वैश्विक दक्षिण की विकासात्मक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने का प्रयास करता है।
  • इसलिए BRICS भारत की विदेश नीति में रणनीतिक विविधीकरण का साधन बनता है।
  • भारत BRICS के माध्यम से ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहता है जिसमें किसी एक शक्ति-केंद्र पर अत्यधिक निर्भरता न हो और विभिन्न देशों के पास अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए अनेक मंच उपलब्ध हों।

क्या BRICS “पश्चिम–विरोधी” मंच बन सकता है?

यह प्रश्न वर्तमान BRICS बहस के केंद्र में है।

  • कुछ सदस्य देश डॉलर-निर्भरता कम करने, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और वैकल्पिक भुगतान तंत्र विकसित करने की वकालत करते हैं। लेकिन इसे तत्काल किसी साझा BRICS मुद्रा के निर्माण के रूप में समझना उचित नहीं होगा।
  • 2025 में BRICS की ओर से भी स्पष्ट किया गया था कि उस समय साझा मुद्रा बनाने की चर्चा नहीं हो रही थी; चर्चा का केंद्र भुगतान लागत कम करने और स्थानीय मुद्राओं के उपयोग जैसे विकल्प थे।
  • भारत के लिए यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत किसी एक मौजूदा व्यवस्था को हटाकर दूसरी व्यवस्था स्थापित करने के बजाय बहुविकल्पीय वैश्विक वित्तीय व्यवस्था चाहता है।

इसीलिए भारत की BRICS नीति को “विकल्पों का विस्तार” कहा जा सकता है, न कि “गुटों का विस्तार”।

भारत की BRICS अध्यक्षता का वास्तविक परीक्षण

भारत की अध्यक्षता की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि कितनी बैठकें आयोजित हुईं या कितने समझौते घोषित किए गए।

वास्तविक परीक्षण यह होगा कि

  1. क्या BRICS के भीतर व्यापार और निवेश वास्तव में बढ़ता है?
  2. क्या आपूर्ति-श्रृंखलाएँ अधिक सुरक्षित बनती हैं?
  3. क्या ऊर्जा सहयोग ठोस परियोजनाओं में बदलता है?
  4. क्या स्टार्ट-अप और वैज्ञानिक सहयोग संस्थागत रूप लेता है?
  5. क्या जलवायु अनुकूलन के लिए विकासशील देशों को व्यावहारिक सहायता मिलती है?
  6. क्या डिजिटल और AI सहयोग में वास्तविक परिणाम दिखाई देते हैं?
  7. क्या वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग अधिक प्रभावी बनती है?
  8. क्या BRICS अपने गहरे राजनीतिक मतभेदों के बावजूद संवाद और सहयोग बनाए रख पाता है?

यदि इन प्रश्नों के सकारात्मक उत्तर मिलते हैं, तभी भारत की अध्यक्षता को दीर्घकालिक सफलता माना जाएगा।

निष्कर्ष: अधिक विकल्प, न कि अधिक गुट

BRICS आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर इसकी सदस्यता और आर्थिक क्षमता इसे वैश्विक राजनीति में अधिक प्रभावशाली बना रही है; दूसरी ओर इसकी बढ़ती विविधता संगठन के भीतर सहमति की चुनौती को भी बढ़ा रही है। भारत की अध्यक्षता इस विरोधाभास का एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करती दिखाई देती है—BRICS को वैचारिक या विरोधी गुट के रूप में नहीं, बल्कि व्यावहारिक सहयोग, विकास और बहुध्रुवीयता के मंच के रूप में मजबूत करना। लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सततता पर भारत का जोर इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। स्मार्ट ग्रिड और ऊर्जा भंडारण से लेकर आपदा प्रबंधन, स्टार्ट-अप सहयोग, तकनीकी नवाचार और पर्यावरणीय सहयोग तक भारत की अध्यक्षता में कुछ ठोस पहलें सामने आई हैं। भारत के लिए BRICS का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह उसकी रणनीतिक स्वायत्तता को व्यापक अंतरराष्ट्रीय आधार देता है। भारत एक ऐसी विश्व व्यवस्था का समर्थन कर सकता है जिसमें शक्ति का वितरण अधिक संतुलित हो, वैश्विक दक्षिण की आवाज अधिक प्रभावी हो और विकासशील देशों के पास अपनी प्राथमिकताओं के अनुरूप सहयोग के अधिक विकल्प हों। इसलिए BRICS का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि वह पश्चिम का कितना प्रभावी प्रतिरोध करता है। उसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि वह कितने व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराता है। और यही भारत की वर्तमान BRICS दृष्टि का सार है BRICS को अधिक गुट नहीं, बल्कि अधिक विकल्प बनाने चाहिए; अधिक टकराव नहीं, बल्कि अधिक सहयोग; और केवल घोषणाएँ नहीं, बल्कि ठोस परिणाम देने चाहिए।

 


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