राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक दायित्व (Political Obligation) एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। सामान्य रूप से हम मानते हैं कि नागरिक को राज्य के कानूनों का पालन करना चाहिए, कर देना चाहिए, सार्वजनिक संस्थाओं का सम्मान करना चाहिए और राजनीतिक व्यवस्था में सहयोग करना चाहिए। लेकिन राजनीतिक सिद्धांत इस सामान्य धारणा से आगे बढ़कर एक अधिक मूलभूत प्रश्न पूछता है आखिर नागरिक को राज्य के कानूनों का पालन क्यों करना चाहिए?
राजनीतिक दायित्व का अर्थ
- सरल शब्दों में, राजनीतिक दायित्व वह नैतिक या राजनीतिक बाध्यता है जिसके आधार पर नागरिक से राज्य, उसकी संस्थाओं और उसके वैध कानूनों का पालन करने की अपेक्षा की जाती है।
- लेकिन राजनीतिक दायित्व को केवल कानून के पालन के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस के डर से कानून का पालन करता है, तो उसका व्यवहार केवल बाहरी दबाव का परिणाम हो सकता है। इसके विपरीत यदि वह इस विश्वास के कारण कानून का पालन करता है कि कानून सामाजिक व्यवस्था, सुरक्षा और न्याय के लिए आवश्यक है, तो यहाँ आज्ञाकारिता के पीछे एक नैतिक आधार भी मौजूद है।
- इसलिए राजनीतिक सिद्धांत का वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि “राज्य नागरिक को कानून मानने के लिए मजबूर कर सकता है या नहीं?” बल्कि यह है कि “नागरिक के पास राज्य की आज्ञा मानने का नैतिक कारण क्या है?”
यही प्रश्न राजनीतिक दायित्व को राजनीतिक सिद्धांत की केंद्रीय अवधारणाओं में से एक बनाता है।
राजनीतिक दायित्व और राजनीतिक सत्ता में अंतर
- राजनीतिक दायित्व को समझने के लिए इसे राजनीतिक सत्ता (Political Authority) से अलग करना आवश्यक है।
- राजनीतिक सत्ता का प्रश्न यह है कि राज्य या सरकार को नागरिकों को आदेश देने का अधिकार क्यों है। दूसरी ओर राजनीतिक दायित्व का प्रश्न यह है कि नागरिक को उस आदेश का पालन क्यों करना चाहिए।
इसलिए दोनों को इस प्रकार समझा जा सकता है:
राजनीतिक सत्ता (Political Authority) राज्य के आदेश देने के अधिकार से संबंधित है, जबकि राजनीतिक दायित्व (Political Obligation) नागरिक की उस आदेश का पालन करने की बाध्यता से संबंधित है।
- इसी प्रकार वैधता (Legitimacy) यह पूछती है कि राजनीतिक सत्ता उचित और वैध क्यों है, जबकि राजनीतिक दायित्व यह पूछता है कि उस वैध सत्ता के प्रति नागरिक की बाध्यता क्यों उत्पन्न होती है।
राजनीतिक दायित्व का मूल प्रश्न
राजनीतिक दायित्व को एक केंद्रीय प्रश्न “मैं राज्य की आज्ञा क्यों मानूँ?” में समेटा जा सकता है। इस एक प्रश्न के भीतर कई अन्य प्रश्न छिपे हुए हैं।
क्या राज्य की सत्ता स्वाभाविक रूप से वैध है? क्या नागरिक की सहमति राजनीतिक दायित्व के लिए आवश्यक है? क्या न्यायपूर्ण राज्य के प्रति दायित्व अन्य राज्यों की तुलना में अधिक मजबूत होगा? क्या राज्य से मिलने वाले लाभ नागरिक को राज्य के प्रति बाध्य करते हैं? क्या केवल किसी राज्य में जन्म लेना उस राज्य के प्रति दायित्व पैदा करता है? क्या मतदान करना सरकार की सहमति माना जा सकता है? और यदि राज्य अन्यायपूर्ण हो जाए, तो क्या नागरिक को कानून की अवज्ञा करनी चाहिए?
इस प्रकार राजनीतिक दायित्व का संबंध सत्ता, वैधता, सहमति, न्याय, स्वतंत्रता और प्रतिरोध सभी से जुड़ जाता है।
राजनीतिक दायित्व के प्रमुख आधार
- राजनीतिक सिद्धांत में राजनीतिक दायित्व को अलग-अलग विचारकों ने अलग-अलग आधारों पर समझाया है। व्यापक रूप से इसके प्रमुख आधारों को दैवी अधिकार, सामाजिक अनुबंध, सहमति, सुरक्षा, न्याय, उपयोगिता, कृतज्ञता, निष्पक्षता, सामुदायिक सदस्यता और नैतिक स्वायत्तता के माध्यम से समझा जा सकता है।
- इनमें से किसी एक आधार को सभी विचारक स्वीकार नहीं करते। वास्तव में राजनीतिक दायित्व का पूरा इतिहास इन्हीं अलग-अलग आधारों के बीच बहस का इतिहास है।
दैवी अधिकार और बिना शर्त राजनीतिक दायित्व
- राजनीतिक दायित्व की प्रारंभिक व्याख्याओं में राजाओं के दैवी अधिकार (Divine Right of Kings) का विशेष महत्व था। इस दृष्टिकोण के अनुसार राजा की सत्ता का स्रोत ईश्वर है और इसलिए उसकी राजनीतिक सत्ता को सामान्य नागरिक की सहमति पर निर्भर नहीं माना जाता।
- यदि राजा ईश्वर द्वारा नियुक्त है, तो राजा की आज्ञा का पालन करना नागरिक का धार्मिक और राजनीतिक कर्तव्य बन जाता है।
- रॉबर्ट फिलमर (Robert Filmer) ने राजा की सत्ता को पितृसत्तात्मक सत्ता से जोड़ते हुए उसका समर्थन किया। इसी प्रकार बोस्युए (Bossuet) और आरंभिक आधुनिक यूरोपीय राजनीतिक चिंतन की अन्य धाराओं में भी राजा की सत्ता को दैवी आधार प्रदान करने का प्रयास दिखाई देता है।
- इस दृष्टिकोण में नागरिक के दायित्व का आधार उसकी व्यक्तिगत सहमति नहीं है। दायित्व राजनीतिक व्यवस्था की पूर्व-स्वीकृत धार्मिक और पारंपरिक वैधता से उत्पन्न होता है।
आधुनिकता और राजनीतिक दायित्व की नई समस्या
- आधुनिक राजनीतिक विचार के विकास के साथ यह धारणा चुनौती के सामने आई कि राजनीतिक सत्ता को केवल परंपरा या दैवी अधिकार के आधार पर उचित माना जा सकता है।
यदि मनुष्य स्वतंत्र और समान है, तो प्रश्न उठता है कि एक व्यक्ति या संस्था को दूसरे स्वतंत्र व्यक्तियों पर शासन करने का अधिकार कैसे प्राप्त होता है? यहीं से राजनीतिक दायित्व की समस्या एक नए रूप में सामने आती है।
अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि राजा को ईश्वर ने सत्ता दी है या नहीं, बल्कि यह बन गया कि राजनीतिक सत्ता का मानवीय और नैतिक आधार क्या है।
इसी प्रश्न ने सामाजिक अनुबंध, सहमति और व्यक्तिगत अधिकारों पर आधारित आधुनिक राजनीतिक चिंतन को जन्म दिया।
सामाजिक अनुबंध और राजनीतिक दायित्व
- सामाजिक अनुबंध सिद्धांत (Social Contract Theory) राजनीतिक दायित्व की आधुनिक व्याख्या का एक महत्वपूर्ण आधार है।
- इस परंपरा में ग्रोटियस (Grotius), पुफेंडॉर्फ (Pufendorf), थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes), जॉन लॉक (John Locke) और ज्याँ–जाक रूसो (Jean-Jacques Rousseau) जैसे विचारकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- सामान्य रूप से सामाजिक अनुबंध का तर्क यह है कि मनुष्य किसी राजनीतिक समाज से पहले एक ऐसी स्थिति में था जहाँ राजनीतिक authority मौजूद नहीं थी। इस स्थिति की समस्याओं से बचने के लिए व्यक्तियों ने राजनीतिक समाज की स्थापना की।
इसे इस प्रकार समझ सकते हैं:
प्राकृतिक अवस्था → समस्या या असुरक्षा → राजनीतिक समझौता → राज्य की स्थापना → राजनीतिक सत्ता → नागरिक का दायित्व
हालाँकि इस क्रम में प्रत्येक विचारक की व्याख्या अलग है। हॉब्स के लिए मुख्य समस्या असुरक्षा है, लॉक के लिए प्राकृतिक अधिकारों की रक्षा महत्वपूर्ण है और रूसो के लिए सामूहिक आत्म-शासन प्रमुख है।
हॉब्स: सुरक्षा राजनीतिक दायित्व का आधार
- थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) राजनीतिक दायित्व को समझने वाले सबसे महत्वपूर्ण विचारकों में से एक हैं।
- हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में कोई ऐसी सर्वोच्च सत्ता नहीं होती जो सभी व्यक्तियों के व्यवहार को नियंत्रित कर सके। परिणामस्वरूप व्यक्ति अपने जीवन और संपत्ति की सुरक्षा को लेकर असुरक्षित रहते हैं और संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
- ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति का सबसे मूलभूत उद्देश्य अपने जीवन की रक्षा करना होता है। व्यक्ति समझता है कि यदि सभी लोग अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करेंगे और कोई सर्वोच्च सत्ता नहीं होगी, तो स्थायी शांति और सुरक्षा संभव नहीं होगी।
इसलिए व्यक्ति एक राजनीतिक समझौते के माध्यम से सर्वोच्च सत्ता (Sovereign) की स्थापना करता है।
हॉब्स की दृष्टि में राजनीतिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य है शांति और सुरक्षा स्थापित करना।
इसलिए राजनीतिक दायित्व का आधार मुख्य रूप से सुरक्षा (Security) बन जाता है।
व्यक्ति राज्य की आज्ञा इसलिए मानता है क्योंकि राजनीतिक सत्ता के बिना वह जिस असुरक्षा का सामना करेगा, उससे बचने के लिए उसे एक सर्वोच्च authority की आवश्यकता है।
लॉक: सहमति, प्राकृतिक अधिकार और सीमित सरकार
- जॉन लॉक (John Locke) ने राजनीतिक दायित्व को हॉब्स से अलग तरीके से समझाया।
- लॉक के अनुसार मनुष्य प्राकृतिक अवस्था में स्वतंत्र और समान है तथा उसके पास कुछ प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights) होते हैं। राजनीतिक समाज का उद्देश्य इन अधिकारों को समाप्त करना नहीं बल्कि उनकी बेहतर सुरक्षा करना है।
- लॉक के अनुसार सरकार का प्रमुख उद्देश्य नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा करना है।
- इसलिए सरकार की सत्ता सीमित होनी चाहिए और वह स्वयं कानून के अधीन होनी चाहिए।
- यहाँ राजनीतिक दायित्व का आधार केवल राज्य की शक्ति नहीं है। नागरिक की आज्ञाकारिता सरकार की सहमति (Consent), अधिकारों की रक्षा और सीमित सरकार (Limited Government) से जुड़ती है।
लॉक और मौन सहमति की समस्या
- लॉक की राजनीतिक दायित्व संबंधी अवधारणा में मौन सहमति (Tacit Consent) महत्वपूर्ण है।
- इसका अर्थ है कि व्यक्ति यदि किसी राजनीतिक व्यवस्था के भीतर रहता है और उसके संरक्षण तथा सुविधाओं का उपयोग करता है, तो उसके व्यवहार को अप्रत्यक्ष सहमति के रूप में देखा जा सकता है।
- लेकिन इस विचार में गंभीर समस्या है।
- यदि किसी व्यक्ति ने स्वयं राज्य की राजनीतिक व्यवस्था को चुनकर स्वीकार नहीं किया है, तो केवल उस राज्य की सीमा के भीतर रहना उसकी सहमति कैसे माना जा सकता है?
- उदाहरण के लिए, कोई व्यक्ति जिस देश में जन्म लेता है, उसने स्वयं उस देश की राजनीतिक व्यवस्था को चुनने का निर्णय नहीं लिया होता। इसलिए जन्म या निवास को वास्तविक सहमति के बराबर मानना कठिन हो सकता है।
- यही कारण है कि मौन सहमति राजनीतिक दायित्व के सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण विवाद का विषय है।
रूसो: सामान्य इच्छा और आत्म–शासन
- ज्याँ–जाक रूसो (Jean-Jacques Rousseau) ने राजनीतिक दायित्व की समस्या को एक अलग दिशा में विकसित किया।
- उनका मूल प्रश्न था कि यदि मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है, तो राजनीतिक समाज में रहते हुए भी वह स्वतंत्र कैसे रह सकता है?
- रूसो का उत्तर सामान्य इच्छा (General Will) की अवधारणा में मिलता है।
- यदि कानून किसी बाहरी शासक की इच्छा नहीं बल्कि राजनीतिक समुदाय की सामूहिक इच्छा की अभिव्यक्ति है, तो कानून का पालन केवल किसी दूसरे व्यक्ति की आज्ञा मानना नहीं है। व्यक्ति स्वयं उस सामूहिक राजनीतिक इच्छा का हिस्सा है।
- इस प्रकार रूसो के यहाँ राजनीतिक आज्ञाकारिता को आत्म–शासन (Self-Government) और आत्म–निर्धारण (Self-Determination) से जोड़ा जाता है।
- यहाँ एक महत्वपूर्ण विचार सामने आता है कि उचित राजनीतिक व्यवस्था में स्वतंत्रता और आज्ञाकारिता आवश्यक रूप से एक–दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
ह्यूम: उपयोगिता और राजनीतिक स्थिरता
- डेविड ह्यूम (David Hume) ने सामाजिक अनुबंध को राजनीतिक दायित्व का अनिवार्य आधार मानने पर प्रश्न उठाया।
- ह्यूम के लिए राजनीतिक व्यवस्था का औचित्य इस बात से भी समझा जा सकता है कि वह समाज को कितनी उपयोगिता (Utility) और स्थिरता प्रदान करती है।
- सरकार कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और सामाजिक सहयोग की ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती है जिनके बिना सामूहिक जीवन कठिन हो सकता है।
- इसलिए नागरिकों का राजनीतिक व्यवस्था के प्रति सहयोग उसके उपयोगी परिणामों और सामाजिक स्थिरता से जुड़ सकता है।
- ह्यूम के यहाँ राजनीतिक दायित्व किसी ऐतिहासिक अनुबंध की अपेक्षा उपयोगिता और स्थिरता के आधार पर अधिक व्यावहारिक रूप में समझा जाता है।
बेंथम: उपयोगिता का सिद्धांत
- जेरेमी बेंथम (Jeremy Bentham) ने राजनीतिक और कानूनी संस्थाओं का मूल्यांकन उपयोगिता के सिद्धांत (Principle of Utility) के आधार पर किया।
- उनके दृष्टिकोण में कानूनों और राजनीतिक संस्थाओं को इस आधार पर देखा जा सकता है कि वे समाज के लिए कितनी उपयोगिता और सामूहिक सुख उत्पन्न करते हैं।
- इस प्रकार राजनीतिक दायित्व का औचित्य किसी दैवी अधिकार या काल्पनिक अनुबंध में खोजने के बजाय उसके सामाजिक परिणामों में खोजा जा सकता है।
टी. एच. ग्रीन: नैतिक स्वतंत्रता और सामान्य हित
- टी. एच. ग्रीन ( H. Green) ने राजनीतिक दायित्व को व्यक्ति और समाज के नैतिक संबंध के संदर्भ में समझाया।
- ग्रीन के अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ केवल राज्य या अन्य व्यक्तियों के हस्तक्षेप की अनुपस्थिति नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तब संभव होती है जब व्यक्ति अपनी क्षमताओं का विकास करने के लिए आवश्यक सामाजिक परिस्थितियाँ प्राप्त कर सके।
- इसलिए राज्य केवल दमनकारी संस्था नहीं है। उचित राज्य व्यक्ति के नैतिक और सामाजिक विकास के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है।
- इस दृष्टिकोण में राजनीतिक दायित्व का संबंध सामान्य हित (Common Good) और नैतिक नागरिकता (Moral Citizenship) से जुड़ता है।
न्यायपूर्ण सरकार और राजनीतिक दायित्व
- अब राजनीतिक दायित्व की बहस एक नए प्रश्न तक पहुँचती है कि क्या नागरिक का राजनीतिक दायित्व सरकार के न्यायपूर्ण होने पर निर्भर करता है?
- यहाँ हन्ना पिटकिन (Hanna Pitkin) और जॉन रॉल्स (John Rawls) के विचार महत्वपूर्ण हैं।
- यदि कोई सरकार न्यायपूर्ण संस्थाओं का निर्माण करती है और नागरिकों को समान राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था प्रदान करती है, तो उसके प्रति नागरिकों का दायित्व अधिक मजबूत आधार प्राप्त कर सकता है।
- लेकिन यहाँ यह समझना आवश्यक है कि न्यायपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था और प्रत्येक न्यायपूर्ण कानून एक ही बात नहीं हैं।
- किसी व्यवस्था को व्यापक रूप से न्यायपूर्ण माना जा सकता है, जबकि उसके भीतर कोई विशेष कानून अन्यायपूर्ण हो सकता है।
- यहीं से राजनीतिक दायित्व और सविनय अवज्ञा के बीच संबंध स्थापित होता है।
रॉल्स: न्याय और निष्पक्षता
- जॉन रॉल्स (John Rawls) ने राजनीतिक दायित्व को न्याय (Justice) और निष्पक्षता (Fairness) से जोड़ा।
- यदि नागरिक एक न्यायपूर्ण सामाजिक सहयोग की व्यवस्था से लाभ प्राप्त करते हैं, तो उनसे उस व्यवस्था को बनाए रखने में उचित योगदान की अपेक्षा की जा सकती है।
- इसे निष्पक्षता का सिद्धांत (Principle of Fairness) कहा जाता है।
- लेकिन रॉल्स यह भी मानते हैं कि किसी broadly न्यायपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था में प्रत्येक कानून आवश्यक रूप से न्यायपूर्ण नहीं होगा।
- इसलिए नागरिक का सामान्य राजनीतिक दायित्व और किसी विशेष अन्यायपूर्ण कानून का पालन करने का प्रश्न अलग-अलग हो सकते हैं।
- यही विचार आगे चलकर सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) की चर्चा के लिए आधार प्रदान करता है।
बर्क: परंपरा और समुदाय
- एडमंड बर्क (Edmund Burke) ने राजनीतिक दायित्व को व्यक्तिगत सहमति से आगे बढ़ाकर परंपरा, समुदाय और ऐतिहासिक निरंतरता के संदर्भ में समझाया।
- बर्क के लिए समाज केवल वर्तमान पीढ़ी के व्यक्तियों के बीच किया गया अनुबंध नहीं है। समाज एक ऐतिहासिक समुदाय है जो अतीत, वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों को जोड़ता है।
- व्यक्ति ऐसी संस्थाओं और परंपराओं के भीतर जन्म लेता है जिन्हें उसने स्वयं निर्मित नहीं किया है, फिर भी वह उनसे जुड़ा होता है।
- इसलिए राजनीतिक दायित्व को केवल व्यक्तिगत सहमति के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। सामुदायिक सदस्यता और ऐतिहासिक संबंध भी दायित्व के आधार हो सकते हैं।
हीगल: राज्य और नैतिक जीवन
- जॉर्ज विल्हेम फ्रेडरिक हीगल ( W. F. Hegel) ने राजनीतिक दायित्व को व्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक संस्थाओं के व्यापक संबंध के भीतर समझाया।
- हीगल के अनुसार व्यक्ति की स्वतंत्रता केवल निजी इच्छा पूरी करने की क्षमता नहीं है। व्यक्ति अपनी वास्तविक सामाजिक और नैतिक स्वतंत्रता को संस्थाओं के माध्यम से प्राप्त करता है।
- हीगल के सामाजिक दर्शन में परिवार (Family), नागरिक समाज (Civil Society) और राज्य (State) महत्वपूर्ण संस्थाएँ हैं।
- राज्य के स्तर पर व्यक्ति और समाज के संबंध एक व्यापक नैतिक व्यवस्था में दिखाई देते हैं। इसलिए हीगल के लिए उचित राज्य व्यक्ति की स्वतंत्रता का केवल दमन नहीं करता बल्कि उसकी नैतिक आत्म–साक्षात्कार (Ethical Self-Realisation) की परिस्थितियाँ भी पैदा कर सकता है।
थोरो: अंतरात्मा और राज्य
- हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau) ने राजनीतिक दायित्व को व्यक्तिगत अंतरात्मा के संदर्भ में देखा।
- उनके लिए व्यक्ति को केवल इसलिए किसी अन्यायपूर्ण राज्य की नीति में सहयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह राज्य द्वारा बनाई गई है।
- यदि राज्य किसी गंभीर अन्याय में सहभागी है, तो व्यक्ति की नैतिक अंतरात्मा उसे उस अन्याय में सहयोग करने से रोक सकती है।
- इस प्रकार थोरो के विचार में व्यक्तिगत अंतरात्मा (Individual Conscience) और राज्य की आज्ञा (State Authority) के बीच टकराव होने पर व्यक्ति को अपनी नैतिक जिम्मेदारी पर विचार करना चाहिए।
गांधी: सत्य, अहिंसा और सविनय अवज्ञा
- महात्मा गांधी ने राजनीतिक दायित्व और सविनय अवज्ञा की बहस को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के संदर्भ में एक विशिष्ट नैतिक रूप दिया।
- गांधी के लिए अन्यायपूर्ण कानून का विरोध हिंसा या अराजकता के माध्यम से नहीं बल्कि सत्य (Truth), अहिंसा (Non-violence) और नैतिक साहस के माध्यम से किया जाना चाहिए।
- गांधी की सत्याग्रह (Satyagraha) की अवधारणा में व्यक्ति अन्याय का विरोध करते हुए भी विरोधी के प्रति घृणा या हिंसा का सहारा नहीं लेता।
- इसलिए गांधी के यहाँ राजनीतिक अवज्ञा केवल कानून तोड़ने की क्रिया नहीं है। यह एक नैतिक और सार्वजनिक राजनीतिक कार्य है जिसका उद्देश्य अन्याय को उजागर करना और व्यवस्था में परिवर्तन लाना है।
भारतीय संदर्भ में राजनीतिक दायित्व
- भारतीय राजनीतिक चिंतन में राजनीतिक दायित्व को समझते समय राजधर्म (Rajdharma) की अवधारणा विशेष महत्व रखती है।
- भारतीय परंपरा में शासक और प्रजा का संबंध केवल शक्ति और आज्ञाकारिता का संबंध नहीं था। शासक के ऊपर भी न्याय, सुरक्षा, धर्म और लोककल्याण से संबंधित दायित्व माने गए।
- इसलिए भारतीय संदर्भ में राजनीतिक दायित्व को एक पारस्परिक संबंध के रूप में समझा जा सकता है।
- नागरिक से राजनीतिक व्यवस्था के प्रति कर्तव्य की अपेक्षा की जाती है, लेकिन शासक से भी न्यायपूर्ण शासन और लोककल्याण की अपेक्षा की जाती है।
इस दृष्टिकोण में राजनीतिक दायित्व केवल यह नहीं कहता कि “नागरिक को राज्य की आज्ञा माननी चाहिए।” बल्कि यह भी पूछता है कि “राज्य का नागरिक के प्रति अपना दायित्व क्या है?”
यही प्रश्न भारतीय राजनीतिक चिंतन को राजनीतिक दायित्व की आधुनिक बहस से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
राजनीतिक दायित्व की पूरी बहस एक क्रम में
| विचारक | राजनीतिक दायित्व का प्रमुख आधार |
| रॉबर्ट फिलमर (Robert Filmer) | राजनीतिक दायित्व को दैवी और पितृसत्तात्मक सत्ता के आधार पर समझा जा सकता है। |
| ग्रोटियस (Grotius) | प्राकृतिक विधि और वैध समझौते राजनीतिक दायित्व को आधार प्रदान करते हैं। |
| पुफेंडॉर्फ (Pufendorf) | प्राकृतिक और अर्जित दायित्व सामाजिक जीवन और राजनीतिक व्यवस्था से जुड़े हैं। |
| हॉब्स (Hobbes) | सुरक्षा, covenant और सर्वोच्च राजनीतिक सत्ता राजनीतिक दायित्व के प्रमुख आधार हैं। |
| लॉक (Locke) | सहमति, प्राकृतिक अधिकार और सीमित सरकार राजनीतिक दायित्व को वैधता प्रदान करते हैं। |
| रूसो (Rousseau) | सामान्य इच्छा और आत्म-शासन के माध्यम से राजनीतिक आज्ञाकारिता को स्वतंत्रता से जोड़ा जाता है। |
| ह्यूम (Hume) | उपयोगिता, स्थिरता और सामाजिक व्यवस्था राजनीतिक सहयोग का आधार हैं। |
| बेंथम (Bentham) | राजनीतिक संस्थाओं का औचित्य उनके सामाजिक उपयोगी परिणामों से जुड़ा है। |
| टी. एच. ग्रीन (T. H. Green) | राजनीतिक दायित्व सामान्य हित और नैतिक नागरिकता से जुड़ा है। |
| रॉल्स (Rawls) | न्यायपूर्ण सहयोग और निष्पक्षता राजनीतिक दायित्व का आधार बन सकते हैं। |
| नॉजिक (Nozick) | बिना सहमति प्राप्त लाभ को स्वतः राजनीतिक दायित्व का आधार नहीं माना जा सकता। |
| बर्क (Burke) | परंपरा, समुदाय और ऐतिहासिक निरंतरता राजनीतिक दायित्व को समझने में महत्वपूर्ण हैं। |
| हीगल (Hegel) | राज्य नैतिक जीवन और व्यक्ति के आत्म-साक्षात्कार की संस्थागत अभिव्यक्ति हो सकता है। |
| मार्क्स (Marx) | राजनीतिक दायित्व को वर्गीय संबंधों और आर्थिक सत्ता-संरचना के संदर्भ में देखा जाता है। |
| थोरो (Thoreau) | व्यक्ति की नैतिक अंतरात्मा अन्यायपूर्ण राजनीतिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का आधार बन सकती है। |
| गांधी | सत्य, अहिंसा और नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर अन्यायपूर्ण कानून का विरोध किया जा सकता है। |
निष्कर्ष
राजनीतिक दायित्व का पूरा प्रश्न अंततः इस बात से संबंधित है कि एक स्वतंत्र व्यक्ति और राजनीतिक सत्ता के बीच नैतिक रूप से उचित संबंध क्या होना चाहिए।
हॉब्स के लिए राजनीतिक व्यवस्था की आवश्यकता मुख्यतः सुरक्षा और शांति के कारण है। लॉक के लिए राजनीतिक दायित्व सहमति, प्राकृतिक अधिकार और सीमित सरकार से जुड़ा है। रूसो राजनीतिक आज्ञाकारिता को सामान्य इच्छा और आत्म–शासन के माध्यम से स्वतंत्रता के साथ जोड़ते हैं। ह्यूम और बेंथम राजनीतिक व्यवस्था की उपयोगिता और स्थिरता पर बल देते हैं। ग्रीन राजनीतिक दायित्व को सामान्य हित और नैतिक नागरिकता से जोड़ते हैं। रॉल्स इसे न्याय और निष्पक्षता के संदर्भ में देखते हैं। बर्क और हीगल व्यक्तिगत सहमति से आगे बढ़कर समुदाय, परंपरा और नैतिक जीवन को महत्व देते हैं। मार्क्सवादी दृष्टिकोण राजनीतिक दायित्व को वर्ग और आर्थिक सत्ता के संदर्भ में देखता है, जबकि अराजकतावादी दृष्टिकोण राज्य की राजनीतिक authority की नैतिक अनिवार्यता पर ही प्रश्न उठाता है।
अंततः थोरो और गांधी हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि राज्य के प्रति नागरिक का दायित्व अंधी आज्ञाकारिता नहीं हो सकता। यदि कानून और न्याय के बीच गंभीर टकराव उत्पन्न हो, तो नागरिक की नैतिक अंतरात्मा, न्याय की भावना और प्रतिरोध का प्रश्न सामने आता है। इसलिए राजनीतिक दायित्व को केवल “नागरिक को राज्य की आज्ञा क्यों माननी चाहिए?” के प्रश्न तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए।
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