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क्या भारत और चीन शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में रह सकते हैं?

भारत और चीन के संबंधों की वर्तमान स्थिति को “प्रबंधित सह-अस्तित्व” कहना सबसे उपयुक्त होगा। आज का मूल प्रश्न यही है कि क्या ये दोनों देश आने वाले समय में शांतिपूर्वक साथ रह सकते हैं। यह प्रश्न इसलिए गंभीर है क्योंकि सीमा पर गश्त के दौरान होने वाला छोटा-सा “विचलन” भी आमने-सामने के टकराव का रूप ले लेता है। इससे सीमा क्षेत्र की शांति और स्थिरता ही नहीं, समूचे द्विपक्षीय संबंध संकट में पड़ जाते हैं।

दोनों देश युद्ध की स्थिति में नहीं हैं, फिर भी यह प्रबंधित सह-अस्तित्व स्वयं में अनेक समस्याओं से भरा है। विडंबना यह है कि सीमा संबंधी मतभेदों के अतिरिक्त दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच संघर्ष का कोई ठोस और स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता। अतः इस संबंध की जटिलता को समझने के लिए इतिहास, भूगोल, रणनीति और मनोविज्ञान, सभी पक्षों पर दृष्टि डालना आवश्यक है।

1962 का युद्ध: अविश्वास की स्थायी जड़

1962 का भारत-चीन युद्ध दोनों देशों के संबंधों का सबसे निर्णायक मोड़ माना जाता है। एक मत के अनुसार यह युद्ध “ग्रेट लीप फॉरवर्ड” जैसी विनाशकारी आर्थिक नीति की विफलता के पश्चात माओ त्से-तुंग के अहंकार का परिणाम था। हालांकि इतिहासकार इसके पीछे अन्य कारण भी गिनाते हैं।

  • युद्ध के पश्चात लद्दाख क्षेत्र की सीमा दोनों देशों के बीच विवाद का गंभीर केंद्र बन गई।
  • भारत की दृष्टि में “हिंदी-चीनी भाई-भाई” के वर्षों के बाद चीन का यह विश्वासघात इस धारणा में बदल गया कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
  • लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भूभाग की क्षति भारतीय जनमानस में एक स्थायी घाव बन गई।
  • फिर भी यह युद्ध अकेले इस बात की पूरी व्याख्या नहीं करता कि दोनों देशों के बीच कटुता आज तक इतनी गहरी क्यों बनी हुई है।

गलवान 2020: तनाव का नया अध्याय

वर्तमान विश्लेषक प्रायः 2020 की गलवान घाटी की झड़प को इस निरंतर तनाव का प्रमुख कारण मानते हैं। इस हिंसक संघर्ष में भारत के 20 सैनिक शहीद हुए थे। इसके बाद पूर्वी लद्दाख में लगभग चार वर्ष तक सैन्य गतिरोध बना रहा, जो अक्टूबर 2024 में देपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी संबंधी समझौते के बाद शिथिल हुआ।

किंतु दो सभ्यताओं के बीच की दूरी को किसी एक घटना से नहीं समझाया जा सकता। अब समय आ गया है कि इन कारणों की परतें खोली जाएं, ताकि भारत और चीन विश्व समुदाय में अपना उचित स्थान प्राप्त कर सकें।

क्या यह कोई प्राचीन विभाजन है?

  • सीमा का अस्पष्ट निर्धारण: लद्दाख का अनुचित रूप से चिह्नित भूभाग प्रायः दोनों देशों के बीच समाधान में सबसे बड़ी बाधा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अरुणाचल प्रदेश के संदर्भ में भी ऐसे ही तर्क दिए जाते हैं।
  • मैकमोहन रेखा की भूमिका: अरुणाचल क्षेत्र में वास्तविक दोषी चीन जितनी ही मैकमोहन रेखा भी है। 1914 के शिमला सम्मेलन में ब्रिटिश भारत और तिब्बत के प्रतिनिधियों के बीच खींची गई यह रेखा अपने पीछे एक अस्पष्ट और विवादित सीमा छोड़ गई, जिसे चीन ने कभी स्वीकार नहीं किया।
  • सीमा का भौगोलिक स्वरूप: भारत के अनुसार वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) लगभग 3,488 किमी लंबी है और यह तीन क्षेत्रों में विभाजित है:

  1. पश्चिमी क्षेत्र: लद्दाख (अक्साई चिन विवाद)
  2. मध्य क्षेत्र: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड
  3. पूर्वी क्षेत्र: सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश (चीन अरुणाचल को “दक्षिणी तिब्बत” कहता है)

संबंधों में सुधार के प्रयास: एक ऐतिहासिक यात्रा

1988: राजीव गांधी की ऐतिहासिक यात्रा

हाल के इतिहास में संबंधों में नरमी लाने के अनेक प्रयास हुए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण 1988 में प्रधानमंत्री राजीव गांधी की चीन यात्रा थी, जिसमें उन्होंने डेंग शियाओपिंग जैसे नेताओं से भेंट की। यह भारत-चीन संबंधों में एक नया युगांतकारी मोड़ था। दुर्भाग्यवश दोनों पक्षों के नेताओं ने बाद में इस उपलब्धि को काफी हद तक गंवा दिया, किंतु यह आज भी प्रकाश-स्तंभ की भांति मार्गदर्शक बनी हुई है।

इस यात्रा की प्रमुख उपलब्धियां थीं:

  • तनाव कम करने और राज्य-स्तरीय संबंध सुधारने के उपायों पर सहमति
  • सीमा प्रश्न को व्यापक संबंधों से अलग रखकर उस पर पृथक वार्ता का मार्ग
  • नौकरशाही बाधाओं को दरकिनार करते हुए आगे बढ़ना
  • सैन्य विश्वास-निर्माण उपायों (CBMs) की नींव
  • बाद के प्रमुख पड़ाव

इसके पश्चात संबंधों में अनेक पड़ाव आए:

  • 1993: LAC पर शांति और स्थिरता बनाए रखने संबंधी समझौता
  • 1996: सैन्य क्षेत्र में विश्वास-निर्माण उपायों पर समझौता
  • 2003: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की यात्रा के दौरान विशेष प्रतिनिधि (SR) तंत्र की स्थापना
  • 2005: सीमा प्रश्न के समाधान हेतु राजनीतिक मानदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर समझौता
  • 2012: परामर्श और समन्वय हेतु कार्य तंत्र (WMCC) की स्थापना
  • 2018 एवं 2019: वुहान और मामल्लपुरम में अनौपचारिक शिखर वार्ताएं

वर्तमान पहलें और “शून्य-योग खेल” की धारणा

वर्तमान में अनेक पहलें चल रही हैं, किंतु वे “शून्य-योग खेल” जैसी प्रतीत होने लगी हैं, जहां एक पक्ष का लाभ दूसरे की हानि माना जाता है। इसमें बाहरी कारकों की भी भूमिका है। अमेरिका प्रायोजित क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसी पहलें इस गतिरोध को बनाए रखने में सहायक रही हैं।

चीनी रणनीतिकार, जो प्रायः भारत के मामले में हठधर्मी रुख अपनाते हैं, मानते हैं कि अमेरिकी योजनाओं में भारत की भागीदारी चीन को घेरने की चाल है। इसी कारण वे भारत के साथ संबंध सुधारने के लिए कदम उठाने का कोई औचित्य नहीं देखते।

क्या भारत को चीन से भयभीत होना चाहिए?

बदलती विश्व व्यवस्था का संदर्भ:कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने यह बहुचर्चित टिप्पणी की थी कि पुरानी नियम-आधारित विश्व व्यवस्था समाप्त हो चुकी है और अब देशों को अपने हितों की रक्षा के लिए इच्छुक देशों के नए गठबंधन बनाने होंगे। किंतु इस कथन को भारत-चीन संबंधों पर लागू करना गंभीर भूल होगी।

अस्तित्व का खतरा या प्रतिस्पर्धा?भारत और चीन के बीच अनेक मुद्दे सुलझाने बाकी हैं, फिर भी भारत के लिए चीन को अपने अस्तित्व के लिए खतरा मानना गलत होगा। यह संभव है कि चीन समय के साथ भारत को कुछ क्षेत्रों में अपनी श्रेष्ठता के लिए चुनौती के रूप में देखे। किंतु नकारात्मक दिशा अपनाने के स्थान पर दोनों देशों को रचनात्मक मार्ग चुनना चाहिए।

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वार्ताओं के बाद लोकप्रिय हुई अवधारणा “रणनीतिक स्थिरता का रचनात्मक संबंध” जितनी चीन-अमेरिका संबंधों पर लागू होती है, उतनी ही भारत-चीन संबंधों पर भी।

ज्ञान का असंतुलन

भारत को एक कड़वी सच्चाई स्वीकार करनी होगी। प्रतिष्ठित पत्रिका “द इकोनॉमिस्ट” के अनुसार चीन भारत के बारे में कहीं अधिक शोध करता है, जबकि भारत चीन को समझने का उतना प्रयास नहीं करता। यह असंतुलन भारत की नीति-निर्माण क्षमता के लिए चिंताजनक है।

चीन की वास्तविक शक्ति और प्रत्यक्ष संघर्ष की असंभाव्यता

  • एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारत, और वस्तुतः विश्व, चीन की वास्तविक सैन्य शक्ति, युद्ध जीतने की उसकी क्षमता और भविष्य के युद्धों को कितना समझता है।
  • भारत चीन का सहयोगी नहीं है, किंतु यह मानना भी अतिशयोक्ति है कि भारत चीन का वास्तविक प्रतिद्वंद्वी है या दोनों के बीच संघर्ष अपरिहार्य या आसन्न है।
  • भारत के साथ कोई भी संघर्ष चीन को कई वर्ष पीछे धकेल देगा और 2049 तक विश्व की “नंबर एक” शक्ति बनने के उसके लक्ष्य को पटरी से उतार देगा।
  • भारत की भी चीन के साथ संघर्ष में उतरने की कोई इच्छा नहीं है।

अतः विवादों के निपटारे के साधन के रूप में प्रत्यक्ष संघर्ष को स्पष्ट रूप से खारिज कर देना चाहिए। दोनों देशों की सेनाओं और सीमा रक्षकों तक यह संदेश पहुंचना चाहिए कि गलवान जैसी घटनाएं दोबारा न हों। विवादित हिमालयी क्षेत्रों में किसी भी देश को निर्णायक बढ़त प्राप्त नहीं है, इसलिए अनजाने में होने वाली किसी भी कार्रवाई से बचना अनिवार्य है।

चीन को समझना क्यों आवश्यक है?

सैन्य श्रेष्ठता का मिथक

  • चीन की सैन्य श्रेष्ठता के उस मिथक को तोड़ना आवश्यक है, जिसे अनेक राजनीतिक समूह और सैन्य विशेषज्ञ बार-बार उछालते हैं।
  • पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN), विशेषकर नौसेना, ने युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय प्रगति की है, किंतु वे अभी विश्वस्तरीय नहीं हैं।
  • ताइवान को पुनः प्राप्त करने हेतु युद्ध छेड़ने से चीन का बचना उसकी सेना में व्याप्त यथार्थवाद को दर्शाता है।
  • लंबी दूरी की मिसाइलें, पनडुब्बियां, निगरानी प्रणालियां और उभयचर क्षमता के बावजूद ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों में भारत चीन का पूरी तरह मुकाबला करने में सक्षम है।
  • चीन के खतरे को अत्यंत गंभीर बताना कुछ निहित स्वार्थी समूहों द्वारा फैलाया गया मिथक है।

चीन के इरादों की सही समझ

भारत को चीन को सही ढंग से पढ़ना होगा और ऐसा कुछ भी करने से बचना होगा, जिससे चीन ऐसी कठोर प्रतिक्रिया दे जो उसका मूल उद्देश्य न रहा हो। यह मान लेना भी भारी भूल होगी कि चीन विश्व में भारत की स्थिति कमजोर करने के लिए उसकी शक्ति की परीक्षा लेने को तत्पर है।

चीन झुकना भी जानता है: 2005 का समझौता

चीन जानता है कि कब लचीलापन दिखाना है। 2005 में राष्ट्रपति हू जिनताओ के कार्यकाल में चीन ने भारत के साथ दीर्घकालिक, रचनात्मक और सहयोगी साझेदारी को बढ़ावा देने हेतु समझौता किया।

अनुच्छेद I: कोई भी पक्ष दूसरे के विरुद्ध बल का प्रयोग नहीं करेगा और न ही बलप्रयोगग की धमकी देगा।

अनुच्छेद VII: सीमा समाधान तक पहुंचने में दोनों पक्ष सीमावर्ती क्षेत्रों में बसी आबादी के उचित हितों की रक्षा करेंगे।

चीन की राष्ट्रीय पहचान की सीमाएं

यह भी ध्यान रखना होगा कि चीन की राष्ट्रीय पहचान उतनी सुसंगठित नहीं है, जितनी प्रायः समझी जाती है। “किंग राजवंश” की दुर्बलताएं और उसकी सीमाओं की लचीली प्रकृति चीन से व्यवहार करने वाले सभी देशों, विशेषकर भारत, के लिए एक प्रारंभिक पाठ हैं।

संबंधों के अन्य महत्वपूर्ण आयाम

आर्थिक निर्भरता और व्यापार असंतुलन: चीन भारत के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में है, किंतु व्यापार घाटा भारत के लिए गंभीर चिंता है। वर्ष 2024-25 में यह घाटा लगभग 99 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। इलेक्ट्रॉनिक्स, सक्रिय औषधीय घटक (API) और सौर उपकरणों में चीन पर निर्भरता रणनीतिक जोखिम उत्पन्न करती है। 2020 के बाद भारत ने सुरक्षा कारणों से अनेक चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया और सीमावर्ती देशों से आने वाले निवेश पर कड़े नियम लागू किए।

जल सुरक्षा: ब्रह्मपुत्र (चीन में यारलुंग त्सांगपो) पर चीन की विशाल जलविद्युत परियोजनाएं, विशेषकर मेडोग क्षेत्र का प्रस्तावित बांध, भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए जल-सुरक्षा और पर्यावरणीय चिंता का विषय हैं।

चीन-पाकिस्तान धुरी: पाक-अधिकृत कश्मीर से गुजरने वाला चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती उपस्थिति भी भारत की सामरिक चिंताओं को बढ़ाती है।

संबंधों में हालिया सुधार

  • अक्टूबर 2024 में कज़ान (BRICS) और अगस्त-सितंबर 2025 में तियानजिन (SCO) में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शी की भेंट के बाद संबंधों में धीरे-धीरे सुधार आया है।
  • 2025 में राजनयिक संबंधों के 75 वर्ष पूरे हुए।
  • कैलाश मानसरोवर यात्रा पुनः आरंभ हुई और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें बहाल हुईं।
  • मई 2026 में WMCC की 35वीं बैठक बीजिंग में हुई।
  • 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं वार्ता हुई, जिसमें सीमा निर्धारण, सीमा प्रबंधन और सीमा-पार सहयोग पर चर्चा हुई। तीन निर्धारित सीमा व्यापार केंद्रों के पुनः खुलने का स्वागत किया गया और 26वीं वार्ता 2027 में भारत में आयोजित करने पर सहमति बनी।

निष्कर्ष: सह-अस्तित्व ही एकमात्र विकल्प

चीन को गलत समझना भारत के लिए अत्यंत महंगा सिद्ध हो सकता है। दोनों देशों के इतिहास में ऐसा कुछ नहीं है, जो यह संकेत दे कि वे सदा के लिए युद्ध की स्थिति में रहने को अभिशप्त हैं। आवश्यकता है यथार्थवादी दृष्टि, चीन की गहन समझ, सीमा पर संयम और संवाद तंत्रों के सुदृढ़ीकरण की। भारत आज चीन के साथ शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व में रह सकता है, और उसे ऐसा करना भी चाहिए।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • भारत ने चीन के साथ राजनयिक संबंध 1 अप्रैल 1950 को स्थापित किए।
  • पंचशील समझौता 1954 में हुआ।
  • भारत-चीन युद्ध 1962 में हुआ।
  • मैकमोहन रेखा 1914 के शिमला सम्मेलन में निर्धारित हुई।
  • भारत के अनुसार LAC की लंबाई लगभग 3,488 किमी है।
  • राजीव गांधी ने 1988 में चीन यात्रा कर डेंग शियाओपिंग से भेंट की।
  • विशेष प्रतिनिधि (SR) तंत्र की स्थापना 2003 में हुई।
  • राजनीतिक मानदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों का समझौता 2005 में हुआ।
  • WMCC की स्थापना 2012 में हुई।
  • डोकलाम गतिरोध 2017 में हुआ।
  • गलवान झड़प जून 2020 में हुई, जिसमें 20 भारतीय सैनिक शहीद हुए।
  • देपसांग और डेमचोक में सैनिकों की वापसी पर समझौता अक्टूबर 2024 में हुआ।
  • विशेष प्रतिनिधियों की 25वीं वार्ता 25 अगस्त 2026 को बीजिंग में हुई।
  • चीन का लक्ष्य 2049 तक विश्व की अग्रणी शक्ति बनना है।
  • क्वाड के सदस्य भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया हैं।

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