वर्तमान वैश्विक व्यवस्था अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रभावित है। इस प्रतिस्पर्धा का प्रभाव केवल दोनों महाशक्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित समूचे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की विदेश नीति, व्यापार, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी पर भी पड़ रहा है।
अमेरिका में ट्रंप प्रशासन की नीतियों जैसे उच्च आयात शुल्क (Tariffs), H-1B वीज़ा नियमों को कठोर बनाना तथा पाकिस्तान के साथ संबंधों में सुधार ने भारत में यह बहस पुनः प्रारंभ कर दी है कि क्या भारत को चीन के साथ अपने आर्थिक संबंधों को सामान्य बनाना चाहिए। उद्योग जगत का एक वर्ग चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने का पक्षधर है, जबकि रणनीतिक विश्लेषकों का मत है कि आर्थिक लाभों के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों से समझौता करना भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं होगा।
बहस दोबारा क्यों उभरी? (Why Has the Debate Re-emerged?)
- हाल के वर्षों में भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों में कुछ तनाव देखने को मिले हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए शुल्क, H-1B वीज़ा संबंधी प्रतिबंधों तथा ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति ने भारतीय उद्योगों में यह धारणा उत्पन्न की कि भारत ने चीन को संतुलित करने की अमेरिकी रणनीति के साथ अत्यधिक निकटता बना ली है, जबकि उसके आर्थिक हितों की पर्याप्त रक्षा नहीं हो सकी।
- इसके साथ ही भारतीय उद्योग यह भी तर्क देते हैं कि भारत आज भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीन पर निर्भर है। औद्योगिक मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर उपकरण, दवा उद्योग के लिए आवश्यक सक्रिय औषधीय अवयव (Active Pharmaceutical Ingredients – APIs), दुर्लभ खनिज तथा अनेक विनिर्माण आपूर्ति शृंखलाएँ चीन से जुड़ी हुई हैं। इसलिए चीन के साथ आर्थिक संबंधों को पुनः मजबूत करने से उत्पादन लागत कम होगी, निर्यात बढ़ेगा और आर्थिक विकास को गति मिलेगी।
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए चीन पर अधिक निर्भर होना भारत के लिए सुरक्षित विकल्प होगा?
चीन के साथ आर्थिक संबंध सामान्य बनाने के पक्ष में तर्क
- चीन के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने के समर्थकों का मानना है कि वर्तमान वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन को पूरी तरह अलग रखना व्यावहारिक नहीं है।
- उनका तर्क है कि चीन विश्व की सबसे बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और भारत के औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक अनेक कच्चे माल, मशीनरी और मध्यवर्ती उत्पाद (Intermediate Goods) वहीं से प्राप्त होते हैं।
- सस्ते चीनी उत्पाद भारतीय उद्योगों की लागत को कम करते हैं, जिससे भारतीय वस्तुएँ वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकती हैं। यदि दोनों देशों के बीच आपूर्ति शृंखलाएँ पुनः सुचारु रूप से कार्य करें, तो भारत के विनिर्माण और निर्यात क्षेत्र को भी लाभ मिल सकता है।
कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आर्थिक परस्पर निर्भरता दोनों देशों के बीच तनाव को कम कर सकती है और राजनीतिक संवाद के लिए बेहतर वातावरण तैयार कर सकती है।
हालाँकि ये तर्क अल्पकालिक आर्थिक लाभों पर आधारित हैं और दीर्घकालिक रणनीतिक जोखिमों को पर्याप्त महत्व नहीं देते।
बिना शर्त चीन के साथ संबंध सामान्य करना क्यों जोखिमपूर्ण है?
- चीन का आक्रामक व्यवहार भारत की सुरक्षा के लिए निरंतर चुनौती
- भारत-चीन संबंधों का इतिहास केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहा है। पिछले एक दशक में चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर कई बार यथास्थिति बदलने का प्रयास किया है।
- 2013 में डेपसांग, 2014 में चुमार, 2017 में डोकलाम और 2020 में गलवान घाटी की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि चीन सीमा विवाद को केवल कूटनीतिक माध्यम से नहीं, बल्कि सैन्य दबाव के माध्यम से भी प्रभावित करने का प्रयास करता रहा है।
- इसके अतिरिक्त चीन अरुणाचल प्रदेश पर लगातार दावा करता है, भारतीय नागरिकों को स्टेपल्ड वीज़ा जारी करता है तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढाँचे और सैन्य तैनाती को निरंतर बढ़ाता रहा है। ऐसी परिस्थितियों में केवल आर्थिक सहयोग के आधार पर रणनीतिक विश्वास स्थापित करना कठिन प्रतीत होता है।
- आर्थिक निर्भरता को चीन रणनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग करता है
- चीन ने कई अवसरों पर यह प्रदर्शित किया है कि वह व्यापार और आपूर्ति शृंखलाओं का उपयोग विदेश नीति के उपकरण के रूप में करता है।
- दुर्लभ मृदा तत्वों (Rare Earths), महत्वपूर्ण औद्योगिक कच्चे माल तथा उच्च प्रौद्योगिकी उत्पादों पर अपनी प्रभुत्वपूर्ण स्थिति का उपयोग वह अन्य देशों पर दबाव बनाने के लिए कर चुका है। यदि भारत अत्यधिक सीमा तक चीनी आयातों पर निर्भर हो जाता है, तो भविष्य में किसी सीमा संकट या राजनीतिक विवाद की स्थिति में चीन आवश्यक आपूर्ति रोककर भारतीय उद्योगों को गंभीर क्षति पहुँचा सकता है।
- अर्थात आर्थिक परस्पर निर्भरता आवश्यकता पड़ने पर आर्थिक दबाव (Economic Coercion) का साधन भी बन सकती है।
- चीन–पाकिस्तान रणनीतिक साझेदारी भारत के हितों के विपरीत
चीन की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष पाकिस्तान के साथ उसका घनिष्ठ रणनीतिक सहयोग है।
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पाकिस्तान-आधारित आतंकवादी संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई में चीन ने अनेक बार पाकिस्तान का संरक्षण किया है।
- इसी प्रकार उसने भारत की न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) की सदस्यता का विरोध किया है तथा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) सहित व्यापक सैन्य एवं रणनीतिक सहयोग को निरंतर बढ़ावा दिया है।
- ये तथ्य स्पष्ट करते हैं कि चीन की क्षेत्रीय रणनीति अनेक मामलों में भारत की सुरक्षा और सामरिक हितों के विपरीत है।
- आर्थिक सहयोग से राजनीतिक सद्भाव स्वतः उत्पन्न नहीं होता
यह मान लेना कि अधिक व्यापार अपने-आप राजनीतिक विश्वास पैदा कर देगा, व्यावहारिक नहीं है।
- चीन की दीर्घकालिक रणनीति एशिया में क्षेत्रीय वर्चस्व स्थापित करने की है। वह भारत को समान रणनीतिक शक्ति के रूप में स्वीकार करने के बजाय अपने प्रभाव क्षेत्र के भीतर सीमित रखने का प्रयास करता है।
- यदि भारत बिना किसी पारस्परिक रियायत के चीनी कंपनियों को व्यापक बाजार उपलब्ध करा देता है, तो इससे भारत का व्यापार घाटा और बढ़ सकता है, तकनीकी निर्भरता गहरी हो सकती है तथा भविष्य में भारत की वार्ता क्षमता कमजोर पड़ सकती है।
- गलवान के बाद उठाए गए कदम भारत की रणनीतिक शक्ति बने
- गलवान संघर्ष के बाद भारत ने अनेक चीनी मोबाइल अनुप्रयोगों पर प्रतिबंध लगाया, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की जाँच को कठोर बनाया तथा दूरसंचार जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में चीनी कंपनियों की भागीदारी सीमित की।
- इन उपायों ने केवल सुरक्षा को मजबूत नहीं किया बल्कि भारत को कूटनीतिक स्तर पर भी अतिरिक्त वार्ता-क्षमता प्रदान की। यदि बिना सीमा विवाद के समाधान अथवा सुरक्षा संबंधी प्रगति के इन प्रतिबंधों को समाप्त कर दिया जाता है, तो भारत का रणनीतिक दबाव कम हो सकता है।
भारत के लिए रणनीतिक स्वायत्तता क्यों आवश्यक है?
हाल के वर्षों में अमेरिका की नीतियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रत्येक महाशक्ति अंततः अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देती है। चाहे वह व्यापार नीति हो, तकनीकी नियंत्रण हो अथवा सुरक्षा सहयोग हर निर्णय अमेरिका की घरेलू और वैश्विक प्राथमिकताओं के अनुरूप होता है।
दूसरी ओर, चीन की नीतियाँ भी भारत की संप्रभुता, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव को चुनौती देती रही हैं।
ऐसी स्थिति में भारत के लिए सबसे उपयुक्त नीति यह होगी कि वह किसी एक शक्ति-गुट पर अत्यधिक निर्भर न होकर रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) बनाए रखे। इसका अर्थ है कि भारत प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय ले, न कि किसी महाशक्ति के दबाव में।
भारत के लिए आगे की रणनीति (Way Forward)
- आत्मनिर्भर औद्योगिक क्षमता को सुदृढ़ करना: भारत को मेक इन इंडिया तथा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (Production Linked Incentive – PLI) योजनाओं के माध्यम से घरेलू विनिर्माण को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना होगा। इससे आयात पर निर्भरता घटेगी और रोजगार सृजन को भी प्रोत्साहन मिलेगा।
- व्यापारिक साझेदारियों का विविधीकरण: भारत को केवल अमेरिका या चीन तक सीमित रहने के बजाय यूरोप, जापान, दक्षिण कोरिया, आसियान, ऑस्ट्रेलिया तथा वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ व्यापार और निवेश संबंधों को और मजबूत करना चाहिए। विविधीकृत व्यापारिक संबंध किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करते हैं।
- महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आत्मनिर्भरता: सेमीकंडक्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रक्षा विनिर्माण, साइबर सुरक्षा तथा उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में घरेलू अनुसंधान एवं विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है। तकनीकी आत्मनिर्भरता भविष्य की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में भारत की स्थिति को मजबूत करेगी।
- सीमा अवसंरचना और सैन्य तैयारी को सुदृढ़ करना: सीमा क्षेत्रों में सड़क, सुरंग, हवाई पट्टियों और संचार नेटवर्क का विस्तार करते हुए सैन्य आधुनिकीकरण जारी रखना आवश्यक है। इससे किसी भी सीमा संकट का प्रभावी ढंग से सामना किया जा सकेगा।
- चयनात्मक आर्थिक सहयोग की नीति अपनाना: भारत को चीन के साथ पूर्ण आर्थिक अलगाव या पूर्ण निर्भरता दोनों से बचना चाहिए। गैर-संवेदनशील क्षेत्रों में व्यापार जारी रखा जा सकता है, जबकि दूरसंचार, रक्षा, डिजिटल अवसंरचना, डेटा तथा महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में आवश्यक सुरक्षा उपाय बनाए रखने चाहिए।
- लचीली एवं सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाओं का निर्माण: भारत को ऐसी वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएँ विकसित करनी चाहिए जो किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भर न हों। इससे भविष्य में किसी भू-राजनीतिक संकट या व्यापारिक प्रतिबंध की स्थिति में भारतीय अर्थव्यवस्था अधिक सुरक्षित रहेगी।
निष्कर्ष
भारत की विदेश नीति न तो वाशिंगटन की नीतियों के उतार-चढ़ाव से संचालित होनी चाहिए और न ही अल्पकालिक आर्थिक लाभों के कारण बीजिंग के प्रति अत्यधिक झुकाव अपनाना चाहिए। चीन भारत के लिए केवल एक व्यापारिक साझेदार नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति शृंखला, क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन और सामरिक प्रतिस्पर्धा से जुड़ी दीर्घकालिक चुनौती भी है।
इसलिए भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक आत्मनिर्भरता, विविधीकृत वैश्विक साझेदारियाँ, तकनीकी क्षमता–विकास तथा समग्र राष्ट्रीय शक्ति (Comprehensive National Power) को सुदृढ़ करना है। भारत को अमेरिका और चीन के बीच किसी एक पक्ष का चयन करने के बजाय ऐसी क्षमता विकसित करनी होगी जिससे वह दोनों देशों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित, आत्मविश्वासी और स्वतंत्र संबंध बनाए रख सके।
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