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खंडित होती विश्व व्यवस्था में मध्यम शक्तियों का उदय

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है जिसमें पुरानी व्यवस्था की नींव डगमगा रही है और नई व्यवस्था का स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं है। इसी पृष्ठभूमि में “मध्यम शक्ति क्षण” (Middle Power Moment) की अवधारणा वैश्विक विमर्श के केंद्र में आ गई है। सांसद और संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने इस प्रश्न पर अक्टूबर के आरंभ में बर्लिन में विचार रखे। संयोग यह रहा कि इससे ठीक एक दिन पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दिल्ली में इसी विषय पर भाषण दिया था। इससे स्पष्ट हुआ कि यह विषय इस वर्ष नई प्रासंगिकता प्राप्त कर चुका है।

इस बहस को गति जनवरी में दावोस में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के उस आह्वान से मिली, जिसमें उन्होंने मध्यम शक्तियों से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की चुनौतियों का सामूहिक रूप से समाधान करने की अपील की थी। यह विचार इसलिए टिका रहा क्योंकि अब यह व्यापक स्वीकृति है कि विश्व न तो केवल महाशक्तियों के गुरुत्वाकर्षण से संचालित है और न ही शीत युद्ध जैसी द्विध्रुवीय खेमेबंदी से। आज की दुनिया अनेक राष्ट्रों के एक विस्तृत समूह से आकार ले रही है। ये राष्ट्र न तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर आधिपत्य रखते हैं और न ही निष्क्रिय होकर उसके आगे झुकते हैं। उनका प्रभाव रणनीतिक स्थिति, आर्थिक वजन, कूटनीतिक कुशलता और मानकीय महत्वाकांक्षा से उपजता है।

मध्यम शक्ति की अवधारणा और स्वरूप

मध्यम शक्तियों को परिभाषित करना सरल नहीं है। सामान्यतः इनकी पहचान कुछ विशेषताओं के संयोजन से होती है:

  • उल्लेखनीय क्षेत्रीय उपस्थिति और प्रभाव
  • वैश्विक स्तर पर अधिक प्रासंगिक बनने की आकांक्षा
  • निरंतर बढ़ती आर्थिक क्षमताएँ
  • विश्वसनीय कूटनीतिक तंत्र
  • अपने तात्कालिक पड़ोस से परे जाकर सक्रिय होने की राजनीतिक इच्छाशक्ति

ये पारंपरिक अर्थ में “महाशक्तियाँ” नहीं हैं, किंतु वैश्विक शासन में इनका पर्याप्त भार है और स्वतंत्र रणनीति अपनाने की स्वायत्तता भी। इनका प्रभाव दबाव या बलप्रयोग से कम और गठबंधन निर्माण, एजेंडा निर्धारण तथा विभिन्न पक्षों के बीच सेतु बनने की क्षमता से अधिक प्रकट होता है।

विविधता में एकता

मध्यम शक्तियाँ कोई एकरूप समूह नहीं हैं। भारत, ब्राजील, कनाडा, मिस्र, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका, जापान, तुर्किये, मैक्सिको और जर्मनी अलग-अलग रूपों में इस श्रेणी के उदाहरण हैं। विशिष्ट परिस्थितियों या विशेष क्षेत्रों में दक्षिण कोरिया, नीदरलैंड्स, संयुक्त अरब अमीरात, नाइजीरिया और कतर भी इस परिभाषा में आ सकते हैं। एक रोचक प्रश्न यह भी है कि क्या फ्रांस और ब्रिटेन, जिन्हें कभी-कभी अतीत की महाशक्तियों से मध्यम शक्ति में परिवर्तित माना जाता है, आज इसी श्रेणी के अंग हैं।

स्पष्ट है कि यह परिभाषा लचीली ही रहेगी। इन देशों को जोड़ने वाला तत्व आकार या हितों की समानता नहीं, बल्कि यह साझा अनुभूति है कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था उनकी आकांक्षाओं और कर्तृत्व को पर्याप्त स्थान नहीं देती। ये देश परिवर्तनशील विश्व में मार्ग निकालते हैं, वार्ता करते हैं और उसे आकार देने का प्रयास करते हैं।

अवधारणा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

“मध्यम शक्ति” का विचार नया नहीं है। राजनीतिक चिंतन में इसकी जड़ें सोलहवीं शताब्दी के इतालवी विचारक जियोवानी बोटेरो तक खोजी जाती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों ने अपनी विदेश नीति की पहचान इसी अवधारणा से जोड़ी। वर्ष 2013 में मैक्सिको, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, तुर्किये और ऑस्ट्रेलिया ने MIKTA नामक अनौपचारिक मंच बनाया, जो मध्यम शक्तियों के संस्थागत सहयोग का उदाहरण है। इसी प्रकार 2003 में ब्रासीलिया घोषणा से गठित IBSA (भारत, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका) भी तीन लोकतांत्रिक मध्यम शक्तियों का संवाद मंच है।

वैधता का संकट: पुरानी संस्थाएँ, नई दुनिया

विश्व को संचालित करने वाली संस्थाएँ स्वयं विश्व की तुलना में बहुत कम बदली हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आज भी 1945 की किसी तस्वीर जैसी प्रतीत होती है, जबकि इस बीच साम्राज्यों का अंत हुआ, अनेक नवस्वतंत्र राष्ट्रों का उदय हुआ और आर्थिक शक्ति के वितरण में गहरे परिवर्तन आए।

इन संस्थाओं की वैधता दो कारणों से कमजोर हुई है:

  1. अपर्याप्त प्रतिनिधित्व: विश्व की बड़ी जनसंख्या और उभरती अर्थव्यवस्थाएँ निर्णय प्रक्रिया से बाहर हैं।
  2. अंतरराष्ट्रीय कानून का असंगत पालन: शक्तिशाली राष्ट्र नियमों का पालन चयनात्मक ढंग से करते हैं।

जिन देशों से “नियम आधारित व्यवस्था” की रक्षा की अपेक्षा की जाती है, उन्हें यह पूछने का पूरा अधिकार है कि नियम कौन बनाता है, क्या वे सब पर समान रूप से लागू होते हैं और क्या शक्तिशाली देश भी उनसे समान रूप से बंधे हैं। सार्थक प्रभाव से वंचित देश सत्ता के वर्तमान वितरण को अनंत काल तक पवित्र और अपरिवर्तनीय नहीं मान सकते। परंतु दूसरी ओर, इन संस्थाओं को ध्वस्त करना उन सुरक्षाओं को भी नष्ट कर देगा जिन पर ये देश स्वयं निर्भर हैं। अतः मध्यम शक्तियों का दायित्व है कि वे अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधिक और विश्वसनीय बनाएँ, साथ ही शक्ति पर अंकुश लगाने और सहयोग बनाए रखने की उसकी क्षमता को भी सुरक्षित रखें।

उल्लेखनीय है कि भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान का G4 समूह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता हेतु सुधार की माँग लंबे समय से उठाता रहा है, जो इसी वैधता संकट की अभिव्यक्ति है।

“मध्यम शक्ति”: क्षमता और संकल्प का द्योतक

यह शब्द क्षमता और इरादे, दोनों को समेटता है। यह उन देशों का वर्णन करता है जो अब केवल नियमों को स्वीकार करने वाले (rule-takers) बने रहने को तैयार नहीं हैं, किंतु शास्त्रीय अर्थ में नियम बनाने वाले (rule-makers) भी नहीं हैं। ये देश बहुध्रुवीय विश्व चाहते हैं, परंतु किसी एकीकृत गुट के रूप में नहीं, बल्कि अपने-अपने खेमों से मानक गढ़ने वाले (norm-shapers) के रूप में।

इनकी प्रमुख माँगें और प्राथमिकताएँ इस प्रकार हैं:

  • वैश्विक संस्थाओं में आवाज और प्रभाव का अधिक न्यायसंगत वितरण
  • बहुपक्षीय शासन व्यवस्था में सुधार
  • विकास, जलवायु न्याय, न्यायसंगत व्यापार और प्रौद्योगिकी तक पहुँच जैसे मुद्दे, जो ग्लोबल साउथ में गहराई से गूँजते हैं
  • इनकी कूटनीति वैचारिक के बजाय व्यावहारिक, एक दिशा में बंधी होने के बजाय बहुआयामी (multi-vector) और गठबंधन की बजाय रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा पर केंद्रित होती है, विशेषकर ऐसे युग में जब महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता तीव्र होती जा रही है।

कार्य का अवसर: संकुचन और विस्तार साथ-साथ

आज की भू-राजनीतिक उथल-पुथल में, जिसमें अमेरिका अपनी भूमिका को पुनर्परिभाषित कर रहा है और चीन तथा रूस आक्रामक मुद्रा अपना रहे हैं, मध्यम शक्तियों के लिए प्रभावी कार्रवाई की संभावनाएँ एक साथ बढ़ भी रही हैं और सिमट भी रही हैं।

सीमाएँ

  • महाशक्तियों के बीच सहमति का क्षरण
  • बहुपक्षीय संस्थाओं का पंगु होना
  • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का विखंडन
  • ये कारक अनिश्चितता उत्पन्न करते हैं और सामूहिक कार्रवाई का दायरा सीमित करते हैं।

संभावनाएँ

दूसरी ओर, जब युद्धोत्तर अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की मूल मान्यताओं पर प्रश्न उठ रहे हैं, संस्थाएँ संदेह के घेरे में हैं और महाशक्तियों की होड़ साझा चुनौतियों को प्रतिस्पर्धा के अवसर में बदल रही है, तब मध्यम शक्तियों के लिए पहल करने का अवकाश भी खुला है। वे स्वयं को वैश्विक ढाँचे का हितधारक मानती हैं और आगे की गिरावट रोकने हेतु, आदर्श रूप से मिलकर, कदम उठाना चाहेंगी। वे:

  • मुद्दा आधारित गठबंधन बना सकती हैं
  • महाशक्तियों के बीच विवादों में मध्यस्थता कर सकती हैं
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता शासन, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य सुरक्षा और विकास सहयोग जैसे क्षेत्रों में वैश्विक मानक गढ़ सकती हैं
  • पश्चिम और ग्लोबल साउथ, दोनों से एक साथ संवाद करने की क्षमता इन्हें वह कूटनीतिक बढ़त देती है जो न महाशक्तियों के पास है, न छोटे राज्यों के पास।

हाल के उदाहरण

पिछले कुछ वर्षों ने दिखाया है कि मध्यम शक्तियाँ इस अवसर का उपयोग करने को तत्पर हैं:

  • भारत: 2023 में G20 की अध्यक्षता, जिसमें “वसुधैव कुटुंबकम” की थीम के अंतर्गत अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाया गया। भारत ने “वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ” शिखर सम्मेलनों के माध्यम से विकासशील देशों की चिंताओं को स्वर भी दिया।
  • ब्राजील: जलवायु कूटनीति का नेतृत्व, जिसमें 2025 में बेलें में COP30 की मेजबानी उल्लेखनीय है।
  • दक्षिण अफ्रीका: वैश्विक स्वास्थ्य और वैक्सीन समानता के लिए सक्रियता; 2025 में अफ्रीका महाद्वीप पर पहली G20 अध्यक्षता।
  • जर्मनी: यूरोप को स्थिर करने के साथ-साथ हिंद-प्रशांत क्षेत्र से संलग्नता।

ये देश सदैव एकमत नहीं होते, किंतु इनमें यह साझा विश्वास है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को 1945 की शक्ति संरचना के बजाय समकालीन यथार्थ का प्रतिबिंब होना चाहिए।

युद्धोत्तर व्यवस्था के कमजोर होने से उन देशों के लिए अवसर बना है जिनके पास पर्याप्त कूटनीतिक, आर्थिक या तकनीकी प्रभाव है, परंतु वे अकेले अंतरराष्ट्रीय वातावरण निर्धारित नहीं कर सकते। सहयोग में उनका गहरा हित है और विश्व की दिशा तय करने की उनकी क्षमता बढ़ रही है। यह क्षमता कितनी निर्णायक होगी, यह उन साझेदारियों पर निर्भर करेगा जो वे बनाने को तैयार हैं।

सहयोग की माँग: यह क्षण विशिष्ट क्यों है

यह “मध्यम शक्ति क्षण” केवल कुछ देशों की आकांक्षा से अधिक है। इसकी विशिष्टता चार प्रवृत्तियों के एक साथ घटित होने में है:

  1. कमजोर होती संस्थागत व्यवस्था: एक अप्रत्याशित महाशक्ति, जिसकी उसी व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता संदिग्ध है जिसे उसने स्वयं रचा था
  2. आर्थिक और तकनीकी क्षमताओं का विकेंद्रीकरण: ऐसी वैश्विक प्रतिद्वंद्विताएँ जो सबसे शक्तिशाली राष्ट्रों को सामूहिक प्रयासों का नेतृत्व करने से रोकती हैं
  3. सहयोग की माँग ठीक उसी अनुपात में बढ़ी है जिस अनुपात में निर्विवाद नेतृत्व की आपूर्ति घटी है। यही अंतराल उन देशों के लिए अवसर है जो दूसरों को साथ लाने की क्षमता रखते हैं।
  4. महाशक्तियों से अलगाव नहीं: इसका अर्थ महाशक्तियों का बहिष्कार नहीं है। क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया), ब्रिक्स, भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (IMEC), चीन की बेल्ट एंड रोड पहल और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (INSTC), सभी में मध्यम शक्तियों और स्थापित महाशक्तियों के बीच सहयोग समाहित है।

भिन्न दृष्टिकोण, भिन्न प्राथमिकताएँ

स्वाभाविक रूप से प्रत्येक देश की स्थिति अलग है:

  • भारत की बहु-संरेखण (multi-alignment) नीति, जिसमें अनेक साझेदारों से लाभकारी संबंध बनाए जाते हैं, पिछले एक-दो वर्षों में उसके अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अशांति को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
  • ब्राजील या इंडोनेशिया चीन को मुख्यतः आर्थिक इंजन के रूप में देख सकते हैं, जबकि बीजिंग के प्रति भारत का निराशावाद अपरिभाषित सीमा पर तनाव में निहित है। यही कारण है कि अमेरिका और रूस, दोनों से संबंध भारत के लिए व्यावहारिक आवश्यकता बन जाते हैं।
  • अमेरिका के मध्यावधि चुनाव परिणामों ने वाशिंगटन की विश्व राजनीति में भूमिका को लेकर नई अनिश्चितताएँ उत्पन्न कर दी हैं।

चुनौतियाँ और सीमाएँ

मध्यम शक्तियाँ महाशक्तियों द्वारा उत्पन्न आर्थिक झटकों के प्रति अधिक संवेदनशील होती हैं, जिससे उनका प्रभाव सीमित हो सकता है। इसके अतिरिक्त:

  • इनके हितों में भिन्नता इन्हें स्थायी गुट बनने से रोकती है।
  • क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएँ (जैसे कुछ मध्यम शक्तियों के आपसी विवाद) सामूहिक कार्रवाई को कठिन बनाती हैं।
  • संसाधनों और सैन्य क्षमता की सीमाएँ इन्हें दीर्घकालिक संकटों में निर्णायक भूमिका से वंचित रखती हैं।

निष्कर्ष

मध्यम शक्तियों की भूमिका महाशक्तियों का स्थान लेना नहीं, बल्कि संयम लाना, मध्यस्थता करना और नवाचार करना है, ताकि ऐसे समय में वे स्थिरता के वाहक बन सकें जब स्थिरता दुर्लभ होती जा रही है। भारत के लिए यह क्षण विशेष महत्व रखता है। अपनी आर्थिक क्षमता, लोकतांत्रिक साख, ग्लोबल साउथ में विश्वसनीयता और रणनीतिक स्वायत्तता की परंपरा के बल पर भारत इस नई व्यवस्था का प्रमुख शिल्पी बन सकता है, बशर्ते वह साझेदारियों का विवेकपूर्ण निर्माण करे और वैश्विक संस्थाओं के सुधार को अपनी कूटनीति के केंद्र में रखे।

रिवीजन हेतु वन लाइनर तथ्य

  • MIKTA की स्थापना 2013 में मैक्सिको, इंडोनेशिया, दक्षिण कोरिया, तुर्किये और ऑस्ट्रेलिया ने की।
  • IBSA का गठन 2003 की ब्रासीलिया घोषणा से हुआ।
  • संयुक्त राष्ट्र चार्टर 26 जून 1945 को हस्ताक्षरित हुआ और 24 अक्टूबर 1945 को लागू हुआ।
  • सुरक्षा परिषद में 15 सदस्य हैं: 5 स्थायी और 10 अस्थायी (दो वर्ष के कार्यकाल हेतु निर्वाचित)।
  • G4 समूह: भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान।
  • अफ्रीकी संघ नई दिल्ली G20 शिखर सम्मेलन (2023) में G20 का स्थायी सदस्य बना।
  • भारत की G20 अध्यक्षता की थीम: “वसुधैव कुटुंबकम: एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य”।
  • IMEC की घोषणा सितंबर 2023 में नई दिल्ली G20 शिखर सम्मेलन के दौरान हुई।
  • INSTC समझौता वर्ष 2000 में भारत, ईरान और रूस ने किया।
  • COP30 का आयोजन 2025 में ब्राजील के बेलें शहर में हुआ।
  • क्वाड के सदस्य: भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया।
  • मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जनवरी 2024 में ब्रिक्स के पूर्ण सदस्य बने।

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