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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के लिए Money Bill का मार्ग चुना गया

Money Bill के नियम और उपयुक्त शर्ते

संसद ने Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2026 पारित करके सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 34 से बढ़ाकर 38 कर दिया है। इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हैं। इस संशोधन के माध्यम से चार अतिरिक्त न्यायिक पदों का सृजन किया गया है, जिसका प्रमुख उद्देश्य सर्वोच्च न्यायालय के बढ़ते न्यायिक कार्यभार से निपटना है।

हालाँकि यह कदम न्यायिक क्षमता बढ़ाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, लेकिन इस विधेयक को Money Bill के रूप में पारित किए जाने ने एक महत्वपूर्ण संवैधानिक बहस को जन्म दिया है।

विवाद का मूल प्रश्न यह है कि क्या अतिरिक्त न्यायिक पदों से उत्पन्न सरकारी व्यय और Consolidated Fund of India से उसके संबंध के आधार पर इस विधेयक को Money Bill के रूप में वर्गीकृत करना उचित है।

सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता

  • सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक कार्यभार लगातार बढ़ने के संदर्भ में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना न्यायिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक संस्थागत कदम है। चार नए पदों के सृजन से न्यायालय के पास मामलों की सुनवाई और निपटारे के लिए अतिरिक्त न्यायिक क्षमता उपलब्ध होगी।
  • हालाँकि अतिरिक्त न्यायिक पद केवल न्यायाधीशों की नियुक्ति तक सीमित नहीं होते। इनके साथ सहायक कर्मचारियों, आधिकारिक आवास, वाहनों और सुरक्षा जैसी प्रशासनिक व्यवस्थाओं की भी आवश्यकता होती है। इस कारण इस प्रकार का विस्तार सार्वजनिक व्यय से जुड़ता है और यहीं से इसे Money Bill के रूप में प्रस्तुत किए जाने का संवैधानिक आधार सामने आता है।

Money Bill के रूप में विधेयक पारित करने का प्रश्न

  • सरकार ने इस विधेयक को Money Bill के रूप में प्रस्तुत किया। इसके पीछे मुख्य तर्क यह है कि न्यायाधीशों के अतिरिक्त पदों के निर्माण से सरकारी व्यय बढ़ेगा और यह व्यय Consolidated Fund of India से संबंधित होगा।
  • यहीं पर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उठता है। किसी कानून के क्रियान्वयन में सरकारी खर्च होना और किसी विधेयक का संविधान के Article 110 के अर्थ में Money Bill होना एक ही बात नहीं है। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि विधेयक का मूल विषय Article 110 में निर्धारित Money Bill की संवैधानिक सीमाओं के भीतर आता है या नहीं।
  • यही कारण है कि इस मामले को केवल प्रशासनिक खर्च के प्रश्न के रूप में नहीं बल्कि Constitutional Classification of Bills के प्रश्न के रूप में देखना चाहिए।

Article 110 और Money Bill की संवैधानिक अवधारणा

  • भारतीय संविधान का Article 110 Money Bill की परिभाषा प्रदान करता है। इसके अंतर्गत ऐसे विधेयक आते हैं जिनका संबंध मुख्य रूप से कराधान, सरकार द्वारा उधार लेने, भारत की संचित निधि से धन के विनियोग तथा उससे संबंधित अन्य निर्धारित वित्तीय विषयों से होता है।
  • Article 110 में उन मामलों को भी शामिल किया गया है जो इन वित्तीय विषयों से incidental अर्थात आकस्मिक या सहायक रूप से संबंधित हों। यही प्रावधान Money Bill की सीमा को लेकर संवैधानिक बहस का एक महत्वपूर्ण आधार बनता है।

Article 110(1)(g) और Incidental Matters

Article 110(1)(g) उन मामलों को Money Bill के दायरे में शामिल करता है जो Article 110 में पहले से वर्णित वित्तीय विषयों के incidental matters हों।

इस प्रावधान की व्याख्या इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आलोचकों को आशंका है कि “incidental matters” की व्यापक व्याख्या करके ऐसे विधेयकों को भी Money Bill का दर्जा दिया जा सकता है जिनका मूल विषय प्रत्यक्ष रूप से वित्तीय नहीं है।

इसका संवैधानिक महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि किसी विधेयक को Money Bill घोषित करने से उसकी संसदीय प्रक्रिया बदल जाती है और राज्यसभा की भूमिका सामान्य विधेयक की तुलना में काफी सीमित हो जाती है।

Money Bill और Rajya Sabha की भूमिका

  • Money Bill के संदर्भ में लोकसभा और राज्यसभा की शक्तियों में महत्वपूर्ण अंतर है। सामान्य विधेयक के मामले में दोनों सदनों की विधायी भूमिका अपेक्षाकृत व्यापक होती है, जबकि Money Bill के मामले में लोकसभा को निर्णायक बढ़त प्राप्त होती है।
  • जब लोकसभा अध्यक्ष किसी विधेयक को Money Bill के रूप में प्रमाणित करते हैं, तब राज्यसभा उसे अस्वीकार या उसमें संशोधन नहीं कर सकती। राज्यसभा केवल अपनी सिफारिशें लोकसभा को भेज सकती है। इन सिफारिशों को स्वीकार करना या अस्वीकार करना लोकसभा पर निर्भर करता है।
  • इसलिए किसी विधेयक का Money Bill के रूप में वर्गीकरण केवल तकनीकी या प्रक्रियात्मक प्रश्न नहीं है। इसका सीधा प्रभाव संसद के दोनों सदनों के बीच Legislative Power Distribution पर पड़ता है।

Lok Sabha Speaker की भूमिका

  • Money Bill की प्रक्रिया में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि विधेयक को Money Bill के रूप में प्रमाणित करने की शक्ति Speaker के पास होती है।
  • यह संवैधानिक व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Speaker के प्रमाणन के बाद राज्यसभा की भूमिका सीमित हो जाती है। इसी कारण Speaker की Certification Power और उसके न्यायिक परीक्षण की सीमा संवैधानिक बहस का महत्वपूर्ण विषय बन गई है।
  • इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या Speaker का Money Bill Certification पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर होना चाहिए, विशेषकर तब जब किसी विधेयक के Money Bill होने या न होने का प्रश्न संसद के दोनों सदनों की शक्तियों को प्रभावित करता हो।
  • प्रदत्त सामग्री के अनुसार Speaker की इस शक्ति के दायरे का प्रश्न वर्तमान में Seven Judge Constitution Bench के समक्ष लंबित है।

Aadhaar Judgment और Money Bill विवाद

  • Money Bill के मार्ग को लेकर बहस को समझने के लिए 2018 का Aadhaar Judgment महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करता है।
  • आधार अधिनियम को Money Bill के रूप में पारित किए जाने पर न्यायमूर्ति Y. Chandrachud ने अपने dissenting opinion में इस प्रक्रिया को “fraud on the Constitution” और “subterfuge” के रूप में वर्णित किया था।
  • इस टिप्पणी का मूल प्रश्न यह था कि क्या Money Bill की विशेष संसदीय प्रक्रिया का उपयोग करके राज्यसभा की संवैधानिक भूमिका को प्रभावी रूप से सीमित किया जा सकता है।
  • इसलिए वर्तमान मामले को समझते समय Aadhaar controversy एक महत्वपूर्ण comparative constitutional reference बन जाती है।

Bicameralism और Parliamentary Scrutiny

  • भारत की संसद द्विसदनीय है और इसमें लोकसभा तथा राज्यसभा दोनों शामिल हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल दो सदनों के माध्यम से कानून पारित करना नहीं है, बल्कि विधायी प्रक्रिया में अतिरिक्त समीक्षा और संस्थागत संतुलन सुनिश्चित करना भी है।
  • राज्यसभा विशेष रूप से विधेयकों की समीक्षा, विस्तृत विचार विमर्श और राज्यों के हितों के प्रतिनिधित्व के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए जब किसी विधेयक को Money Bill के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, तो राज्यसभा की सीमित भूमिका के कारण Bicameralism और Parliamentary Scrutiny से संबंधित प्रश्न उठते हैं।
  • इस दृष्टि से Money Bill की संवैधानिक श्रेणी का अत्यधिक विस्तार संसद के भीतर checks and balances को प्रभावित कर सकता है।

Federalism से संबंध

  • राज्यसभा का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक महत्व यह भी है कि वह राज्यों के प्रतिनिधित्व का मंच है। इसलिए राज्यसभा की विधायी भूमिका केवल एक दूसरे सदन की भूमिका नहीं है, बल्कि भारतीय संघवाद के संस्थागत ढाँचे से भी जुड़ी हुई है।
  • यदि ऐसे विधेयकों का दायरा बढ़ता है जिन्हें Money Bill के रूप में पारित किया जाता है, तो राज्यसभा की सीमित भूमिका के कारण Federal Voice in Parliament भी प्रभावित हो सकती है।
  • इसलिए इस मुद्दे को Money Bill + Bicameralism + Federalism के त्रिकोण के माध्यम से समझना UPSC के लिए अधिक उपयोगी होगा।

Separation of Powers और Constitutional Balance

  • Money Bill का प्रश्न शक्तियों के पृथक्करण से भी जुड़ता है। भारतीय संविधान में विभिन्न संस्थाओं के बीच शक्तियों का वितरण केवल कार्यात्मक सुविधा के लिए नहीं बल्कि संस्थागत नियंत्रण और जवाबदेही के लिए भी किया गया है।
  • यदि किसी विधेयक का वर्गीकरण Money Bill के रूप में होने से राज्यसभा की भूमिका कम हो जाती है, तो यह आवश्यक हो जाता है कि उस वर्गीकरण का संवैधानिक आधार स्पष्ट और मजबूत हो।
  • इसलिए इस मुद्दे में मूल संवैधानिक चिंता यह है कि Legislative Efficiency और Constitutional Accountability के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जाए।

न्यायिक क्षमता और Judicial Reform

  • इस विधेयक का एक दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष न्यायिक सुधार से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का उद्देश्य न्यायिक संस्थान की क्षमता को मजबूत करना है।
  • बढ़ती न्यायिक लंबितता के संदर्भ में केवल मामलों की संख्या कम करना पर्याप्त नहीं है। न्यायिक संस्थाओं को पर्याप्त मानव संसाधन, प्रशासनिक सहयोग और बुनियादी ढाँचे की भी आवश्यकता होती है।
  • इसलिए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का कदम Judicial Capacity, Institutional Efficiency और Access to Justice के व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है।
  • हालाँकि न्यायिक क्षमता बढ़ाने के साथ यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि संसदीय प्रक्रिया संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो।

सरकार के पक्ष में संभावित तर्क

  • सरकार के दृष्टिकोण से इस विधेयक को Money Bill के रूप में प्रस्तुत करने का आधार यह है कि अतिरिक्त न्यायिक पदों के सृजन से सार्वजनिक व्यय होगा और यह व्यय Consolidated Fund से जुड़ा है।
  • इसके अलावा न्यायिक लंबित मामलों और बढ़ते कार्यभार को देखते हुए न्यायिक पदों का शीघ्र सृजन प्रशासनिक दृष्टि से आवश्यक माना जा सकता है।
  • इस दृष्टिकोण से Money Bill Route को ऐसी प्रक्रिया के रूप में देखा जा सकता है जो वित्तीय प्रभाव वाले विधायी उपाय को अपेक्षाकृत शीघ्रता से लागू करने में सहायता करती है।

आलोचकों की मुख्य चिंता

  • आलोचकों की चिंता यह है कि केवल सरकारी व्यय का होना किसी विधेयक को स्वतः Money Bill नहीं बना देना चाहिए।
  • यदि किसी विधेयक का मुख्य विषय वित्तीय नहीं है, लेकिन उसके क्रियान्वयन में कुछ सरकारी खर्च होता है, तो केवल उस खर्च के आधार पर उसे Money Bill घोषित करने से Article 110 की सीमा व्यापक हो सकती है।
  • इससे राज्यसभा की भूमिका सीमित हो सकती है और संसद की द्विसदनीय संरचना में संस्थागत संतुलन प्रभावित हो सकता है।
  • इसलिए आलोचना का केंद्र यह नहीं है कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि उस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए कौन सी संवैधानिक विधायी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।

आगे की राह

  • आगे की राह का उद्देश्य Money Bill की प्रक्रिया को कमजोर करना नहीं बल्कि उसके संवैधानिक उद्देश्य को स्पष्ट रूप से बनाए रखना होना चाहिए।
  • वित्तीय मामलों में लोकसभा की विशेष भूमिका संविधान द्वारा निर्धारित है। लेकिन इस विशेष प्रक्रिया का प्रयोग केवल उन्हीं परिस्थितियों में होना चाहिए जहाँ विधेयक वास्तव में Article 110 की आवश्यकताओं को पूरा करता हो।
  • Speaker की Certification Power में संवैधानिक निष्पक्षता, स्पष्ट मानदंड और न्यायिक समीक्षा की उचित सीमा बनाए रखना Parliamentary Accountability को मजबूत कर सकता है।
  • साथ ही न्यायपालिका की क्षमता बढ़ाने के लिए केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के बजाय न्यायिक बुनियादी ढाँचे, प्रशासनिक संसाधनों और संस्थागत क्षमता को भी मजबूत करना आवश्यक है।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करना न्यायिक क्षमता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इस विधेयक को Money Bill के रूप में पारित करने का प्रश्न भारतीय संविधान के व्यापक संस्थागत संतुलन से जुड़ा हुआ है।

यह मुद्दा स्पष्ट करता है कि लोकतांत्रिक शासन में Efficiency और Legitimacy दोनों आवश्यक हैं। न्यायिक लंबित मामलों को कम करने के लिए त्वरित संस्थागत कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन ऐसी कार्रवाई संवैधानिक प्रक्रिया और संसदीय जवाबदेही के अनुरूप भी होनी चाहिए।

Money Bill की विशेष प्रक्रिया का उद्देश्य वित्तीय मामलों को प्रभावी ढंग से संचालित करना है। इसलिए इसकी व्याख्या ऐसी होनी चाहिए जो Lok Sabha की वित्तीय भूमिका, Rajya Sabha की समीक्षा भूमिका, Bicameralism, Federalism और Constitutional Accountability के बीच संतुलन बनाए रखे।

अंततः, न्यायिक सुधार की आवश्यकता और संवैधानिक प्रक्रिया की पवित्रता दोनों को साथ लेकर चलना ही लोकतांत्रिक शासन की वास्तविक कसौटी है।

 

 


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